औपनिवेशक शहर {नगरीकरण, नगर-योजना, स्थापत्य}

औपनिवेशक शहर {नगरीकरण, नगर-योजना, स्थापत्य}

Class 12 | Chapter 12

हिंदी नोट्स

 याद रखने योग्य बातें

  1. उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कस्बे बडे शहर बन गए। नए शासक यहीं से पूरे देश पर नियंत्रण करते थे। इन नगरों में आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करने तथा नए शासकों के प्रभुत्व को दर्शाने के लिए विशेष संस्थानों की स्थापना की गई।
  2.  लोग ग्रामीण इलाकों में खेती, जंगलों में संग्रहण या पशुपालन द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके विपरीत कस्यों में शिल्पकार, व्यापारी, प्रशासक तथा शासक रहते थे। कस्बों का ग्रामीण जनता पर प्रभुत्व होता था और वे खेती से प्राप्त करों और अधिशेष के आधार पर फलते-फूलते थे। प्राय: कस्बों और शहरों की किलबंदी की जाती थी।
  3. दक्षिण भारत के नगरों जैसे मदुरई और कांचीपुरम में मुख्य केन्द्र मंदिर होता था। ये नगर महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी थे।
  4.  मध्यकालीन शहरों में शासक वर्ग के वर्चस्व वाली सामाजिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती थी कि उसे समाज में अपने स्थान का पता हो। उत्तर भारत में इस व्यवस्था को बनाए रखने का कार्य कोतवाल नामक राजकीय अधिकारी करता था। 
  5. सत्रहवीं शताब्दी में विकसित हुए सूरत, मछलीपटनम तथा ढाका आदि नगर पतनोन्मुख हो गए। 1757 में प्लासी के युद्ध बाद जैसे-जैसे अंग्रेजों ने राजनीतिक नियंत्रण प्राप्त किया और इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार बढ़ा, मद्रास, कलकत्ता के तथा बंबई आदि औपनिवेशिक बंदरगाह नगर नई आर्थिक राजधानियों के रूप में उभरे। 
  6. उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजों ने वार्षिक नगर पालिका कर वसूली के द्वारा शहरों के रखरखाव के लिए पैसा इकट्ठा करना यों शुरू कर दिया था। टकरावों से बचने के लिए उन्होंने कुछ जिम्मेदारियाँ निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों को भी सौंपी हुई थी। आशिक लोक-प्रतिनिधित्व वाले नगर-निगम जैसे संस्थानों का उद्देश्य शहरों में जलापूर्ति, जल निकासी, सड़क निर्माण और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसी अत्यावश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराना था। 
  7. अखिल भारतीय जनगणना का पहला प्रयास 1872 में किया गया था। 1881 से दशकीय अर्थात् हर 10 साल में होने वाली जनगणना एक नियमित व्यवस्था बन गई।
  8. औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का केन्द्र होने के कारण बंबई, कलकत्ता तथा मद्रास भारतीय सूती कपड़े जैसे निर्यात होने वाले उत्पादों के लिए संग्रह डिपो थे परन्तु इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद इस प्रवाह की दिशा बदल गई।
     
  9. 1853 में रेलवे का आरंभ हुआ। इसने शहरों की कायापलट कर दी। आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र परंपरागत शहरों से दूर जाने लगा क्योंकि ये शहर पुराने मार्गों और नदियों के समीप थे। प्रत्येक रेलवे स्टेशन कच्चे माल के संग्रह तथा आयातित वस्तुओं के वितरण का केन्द्र बन गया।
  10.  यूरोपीय कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण सुरक्षा के उद्देश्य से इन बस्तियों की किलेबंदी कर दी गई थी। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और बंबई में फोर्ट आदि प्रदेश ब्रिटिश आबादी के रूप में जाने जाते थे।
  11. ‘लेक टाउन’ न केवल अराजकता और उपद्रव के केन्द्र थे. वे गंदगी और बीमारी का स्रोत भी थे। 
  12.  छावनियों की तरह हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह) भी औपनिवेशिक शहरी विकास का एक विशेष पहलू था। हिल स्टेशनों की स्थापना तथा आवास का कार्य सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से जुड़ा था। 
  13. हिल स्टेशनों को सेनेटोरियम के रूप में भी विकसित किया गया था सैनिकों को यहाँ विश्राम करने और इलाज कराने के लिए भजा जाता था। 
  14. शहरों में स्त्रियों के लिए नए अवसर थे। पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं और पुस्तकों के माध्यम से मध्यवर्गीय महिलाएँ स्वयं को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही थीं। 
  15. शहरों में गरीब श्रमिकों या कामगारों का एक नया वर्ग उभर रहा था। गरीब ग्रामीण रोजगार की तलाश में शहरों की ओर आ रहे थे। 
  16. आधुनिक नगर-नियोजन का आरंभ औपनिवेशिक शहरों से हुआ था। इस प्रक्रिया में भूमि उपयोग तथा भवन निर्माण के नियमों द्वारा शहर के स्वरूप को परिभाषित किया गया। इसका अर्थ यह था कि शहरी लोगों के जीवन को सरकार ने नियंत्रित करना शुरू कर दिया था।
  17. 1798 में लॉर्ड वेलेजली गवर्नर-जनरल बने। उन्होंने कलकत्ता में अपने लिए गवर्नमेंट हाऊस नामक एक महल बनवाया। यह भवन अंग्रेजों की सत्ता का प्रतीक था।
  18. ब्रिटिश साम्राज्य के प्रसार के साथ-साथ अंग्रेज कलकत्ता, बंबई और मद्रास जैसे शहरों को शानदार शाही राजधानियों में बदलने की कोशिश करने लगे।
  19. बंबई में भवन निर्माण में तीन स्थापत्य शैलियाँ अपनाई गई-नवशास्त्रीय अथवा नियोक्लासिकल शैली. नव-गॉथिक शैली इंडो-सारासेनिक शैली।

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