यात्रियों के नजरिये | समाज के बारे में उनकी समझ Through the eyes of travelers Hindi Notes

यात्रियों के नजरिये

Class 12 | Chapter 5

हिंदी नोट्स

 याद रखने योग्य बातें

  1.  अल-बिरूनी का जन्म आधुनिक उज्बेकिस्तान में स्थित ख्वारिज्म में 973 ई० में हुआ था। ख्वारिज्म शिक्षा का एक प्रमुख केंद था वह कई भाषाएँ जानता था. जिनमें सीरियाई, फारसी. हिब्रू तथा संस्कृत शामिल थी। 
  2. किताब-उल-हिंद अरबी में लिखी गई अल-विरुनी की कृति है। इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रंथ है। 
  3. विद्वानों का तर्क है कि अल-बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था। इसी कारण ही उसकी पुस्तक, बहुत ही स्पष्ट बन पड़ी है।
  4.  अल-बिरूनी ने लेखन में भी अरबी भाषा का प्रयोग किया था। उसे संस्कृत, पाली तथा प्राकृत ग्रंथों के अरबी भाषा में अनुवादों तथा रूपांतरणों की जानकारी थी।
  5.  इब्न बतूता द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा वृत्तांत रिहला के नाम से विख्यात है। इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से प्राप्त अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। इसलिए उसे यात्राएँ करने का बहुत शौक था।
  6. इब्न बतूता ने चीन में व्यापक रूप से यात्रा की। वह बीजिंग तक या, परंतु वहाँ वह लंबे समय तक नहीं ठहरा। चीन के विषय में उसके वृत्तांत की तुलना मार्कोपालों के वृत्तांत से की जाती है।
  7. इब्न बतूता ने 14वीं शताब्दी में अपनी यात्राएँ ठस समय की थीं जब यात्रा करना अत्यधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था।
  8. इब्न बतूता वास्तव में एक हठी यात्री था। उसने उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में अपने निवास स्थान मोरक्को वापस जाने से पूर्व कई वर्ष उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिय के कई भागों, भारतीय उप-महाद्वीप तथा चीन की यात्रा की थी।
  9. 1600 ई० के बाद भारत में आने वाले यात्रियों में फ्रांसीसी जौहरी ज्यों-बैप्टिस्ट तैवनियर एक था। उसने कम-से कम छह भारत की यात्रा की। वह विशेष रूप से भारत की व्यापारिक स्थितियों से प्रभावित थी।
  10. फ्रांस्वा बर्नियर एक फ्रांसीसी यात्री था। वह एक चिकित्सक, राजनीतिक, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। वह मुगल साम्राज्य की तलाश में आया था।
  11. वर्नियर की रचनाएँ फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई थी। अगले पाँच वर्षों के भीतर ही इनका अंग्रेजी. डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में अनुवाद हो गया।
  12. जाति-व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अल-बिरूनी ने अपवित्रता को मान्यता को अस्थाका कर दिया। उसने लिखा कि प्रत्येक वस्तु जो अपवित्र हो जाती है अपनी खोई पवित्रता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर है और सफल हो जाती है। 
  13.  14वीं शताब्दी में जब इब्न बतूता दिल्ली आया था, उस समय तक पूरा उपमहाद्वीप एक वैश्विक संचार तंत्र का भाग बन चुक्षा था। यह संचार तंत्र पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में उत्तर- पश्चिमी अफ्रीका तथा यूरोप तक फैला हुआ था।
  14.  अधिकांश बाजारों में एक मसजिद तथा एक मंदिर होता था। कुछ बाजारों में नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी विद्यमान थे। 
  15. इब्न बतूता के अनुसार भारतीय कृषि बहुत अधिक उत्पादक थी। इसका कारण मिट्टी का उपजाऊपन था। अत: किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना आसान था।
  16.  इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित रह गया। डाक प्रणाली इतनी कुशल थी कि जहाँ सिंध से दिल्ली को यात्रा में पचास दिन लग जाते थे. वहीं सुलतान तक गुप्तचरों की खबर मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थी।
  17. बनियर सपा भारत की तुलना में तत्कालीन पूरोप की कश्रेष्ठता पर बल देता रहा। उसका भारत चित्रण प्रतिकूलता पर आधारित है। इसमें भारत को यूरोप के विपरीत दिखाया गया है।
  18. फ्रांसीसी पार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग पूर्वी निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया। इसके अनुसार पूर्व एशिया में शासक अपनी प्रजा पर असीम प्रभुत्व का उपयोग करते थे।
  19. 17वीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या नगरों में रहती थी। यह अनुपात उस समय की पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
  20. मुगल काल में सभी प्रकार के नगर पाए जाते थे उत्पादन केंद्र, ष्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र. तीर्थस्थान आदि।
  21. इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है सुलतान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। सुलतान अपने अमीरों पर नजर रखने के लिए भी दासियों को नियुक्त करता था।
  22. सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला व्यवहार पश्चिमी तथा पुर्षो समाओं के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण सूचक था। इसलिए बनियर ने सती-प्रथा पर अपना ध्यान विशेष रूप से केंदित किया ।

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