यायावार साम्राज्य Chapter 5 Class 11 History

दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 6. तैमूर कौन था? उसके भारत पर आक्रमण का विवरण देते हुए लिखें कि उसके आक्रमण के क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर : (i) अमीर तैमूर : अमीर तैमूर मध्य एशिया का एक प्रबल-विजयी और शक्तिशाली सेनानायक हो गुजरा है। उसका जन्म 1335 ई. में समरकन्द के समीप एक छोटे से गाँव में हुआ बचपन में ही एक टाँग लंगड़ी होने के कारण वह तैमूरलंग कहलाने लगा! अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् 33 वर्ष की आयु में उसने अपने चुगताई कबीले का नेतृत्व संभाला। शीघ्र ही उसने मेसोपोटामिया, ईरान, तुर्किस्तान और अफगानिस्तान आदि पर अधिकार कर 1398 ई. में भारत पर चढ़ाई की।
तैमूर के भारत पर आक्रमण के उद्देश्य के विषय में मतभेद है। कुछ का मत है कि वह सिकन्दर की भाँति महत्त्वाकांक्षी था और दूर-दूर के प्रदेशों को जीतकर नाम पैदा करना चाहता थां वह भारत पर आक्रमण कर भारत के धन को लूटना चाहता था। कुछ इतिहासकारों का मत है कि वह भारत में काफिरों को मारकर इस्लाम धर्म की सेवा करना चाहता था परन्तु यह मत अब अधिक मान्य नहीं है। वास्तव में तैमूर का मुख्य उद्देश्य भारत का धन लूटना ही था।
(ii) तैमूर का आक्रमण : तैमूर ने भारत में फैली अशान्ति और अराजकता का लाभ उठाकर कोई 92,000 सैनिकों के साथ 1398 ई. में भारत पर आक्रमण कर दिया। उस समय तुगलक वंश का अन्तिम और कमजोर शासक महमूद तुगलक दिल्ली का सुल्तान था। तैमूर लूटमार करता हुआ दिल्ली तक आ पहुँचा। शाही सेनाओं को पराजित करके उसने दिल्ली में प्रवेश किया। पाँच दिन तक दिल्ली में लूटमार का बाजार गर्म रहा। असख्य निर्दोष व्यक्ति मारे गए, अनेक भवन नष्ट हुए और करोड़ों की सम्पत्ति तबाह हो गई। दिल्ली में 15 दिन ठहरने के पश्चात् वह मेरठ, हरिद्वार और जम्मू होता हुआ और लूट-मार करता हुआ अपनी राजधानी समरकन्द वापिस लौटा। वह अपने साथ बहुत-सा धन और कारीगर ले गया ताकि वह अपनी राजधानी को सुन्दर भवनों से सजा सके। वह अपने पीछे पंजाब के शासक खिजरखाँ सैयद को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर गया।
(iii) तैमूर के आक्रमण के प्रभाव :तैमूर आँधी की भाँति आया और तूफान की भाँति चला गया। इसलिए उसके आक्रमण के कोई स्थायी प्रभाव तो न पड़े परन्तु कुछ अस्थायी प्रभाव अवश्य पड़े-(a) चारों ओर अशान्ति और अराजकता फैल गई। इसका लाभ उठाकर कई सूबेदार और शासक स्वतन्त्र हो गए। इस प्रकार दिल्ली का राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। (b) तुगलक वंश का राज्य पहले ही काफी शिथिल हो गया था। तैमूर के आक्रमण ने अन्तिम प्रहार कर इसे भारी आघात पहुँचाया और इसका जनाजा ही निकाल दिया। (c) तैमूर के आक्रमण ने भारत को गरीबी और बर्बादी के अलावा कुछ न दिया। वह भारत से सोना-चाँदी और धन लूटकर ले गया। अनगिनत संख्या में लोग मारे गए और करोड़ों रुपये की सम्पत्ति नष्ट हो गयी। इस आक्रमण के पश्चात् देश में अकाल और बीमारी से लाखों व्यक्ति मरे। (d) हिन्दू मुसलमानों के पहले ही विरोधी थे और उनसे घृणा करते थे। तैमूर ने हिन्दुओं का वध कर, उनके मन्दिरों को लूट और नष्ट कर आपसी द्वेष की खाई को गहरा कर दिया। (e) तैमूर वापिस लौटने से पहले खिजरखाँ को पंजाब का गवर्नर नियुक्त कर गया जिसने बाद में दिल्ली के सिंहासन पर अपना आधिपत्य जमा लिया। () तैमूर ने दिल्ली के राजसिंहासन पर गहरा प्रहार कर ऐसा धक्का पहुँचाया कि बाद में इसके लिए संभलना कठिन हो गया। इससे बाबर के लिए भारत विजय का मार्ग साफ हो गया। (g) तैमूर के आक्रमण का एक प्रभाव अच्छा भी पड़ा। तैमूर अपने साथ अनेक भारतीय कारीगर ले गया जिन्होंने भारतीय कला के आधार पर कला का दूसरे देशों में प्रसार हुआ।

प्रश्न 7. चंगेज़ खान के उपरांत यायावर साम्राज्य में मंगोलों की क्या दशा थी?
उत्तर : (i) चंगेज ख़ान की मृत्यु के उपरांत हम मंगोल साम्राज्य को दो भागों में बाँट सकते हैं। प्रथम 1236-1242, तक जिसमें मुख्य सफलताएँ रूस के घास मैदानों, बुलघार, पोलैंड तथा हंगरी में प्राप्त की गई।
(ii) दूसरे 1255-1300 तक ही जिसमें समस्त चीन (सन् 1279 ई.), ईरान, इराक और सीरिया पर विजय प्राप्त की गई। इन अभियानों के पश्चात् साम्राज्य की सीमाओं को बढ़ाने का कार्य थम सा गया था।
(iii) सन् 1203 के पश्चात् के दशकों में मंगोल सेनाओं को पराजय का सामना कभी नहीं करना पड़ा परन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि सन् 1260 ई. के पश्चात् पश्चिम के अभियानों की मूल शक्ति को कम नहीं किया जा सका परन्तु विश्ना और कुछ हटकर पश्चिमी यूरोप एवं मिस्र मंगोल सेनाओं के अधिकार में ही बने रहे। फिर भी मंगोलों के हंगरी के घास के मैदानों से पीछे हट जाने और मिस्र की सेनाओं द्वारा पराजित होने से नवीन राजनीतिक प्रवृत्तियों के उदय के संकेत मिलते हैं । ये प्रवृत्तियाँ दो प्रकार की थीं।
(iv) प्रथम में मंगोल परिवार में उत्तराधिकार को लेक आंतरिक कलह थी। जब प्रथम दो पीढ़ियाँ जोची और ओगदई के उत्तराधिकारी महान खान के राज्य पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक साथ हो गए। अब उनके लिए यूरोप में अभियान करते की अपेक्षा अपने उन हितों की रक्षा करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया।
(v) दूसरी स्थिति उस समय उत्पन्न हुई जब चंगेज खान के वंश की टोलूयिद शाखा के उत्तराधिकारियों ने जोची और ओगेदई वंशों को अपने से दूर हटा दिया। मोन्के जो चंगेज खान के सबसे छोटे पुत्र टोलुई का वंशज था उसके राज्याभिषेक के पश्चात। 1250 ई. के दशक में ईरान में शक्तिशाली अभियान प्रारंभ हुए।
(vi) मिस्र की सेना का सामना करने के लिए मंगोलों ने एक छोटी, अपर्याप्त सेना को भेजा। मंगोलों की पराजय और टोलूई परिवार की चीन के प्रति निरंतर बढ़ती हुई रुचि से उनका पश्चिम की ओर विस्तार पूरी तरह रुक गया। इसके साथ रूस और चीन की सीमा पर जोची और टोलुई वंशजों के संघर्षों ने यूरोप में आगे बढ़ने पर रोक लगा दी।

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