विद्रौही और राज {1857 का आंदौलन और उसके व्याक्यान}

विद्रौही और राज {1857 का आंदौलन और उसके व्याक्यान}

Class 12 | Chapter 11

हिंदी नोट्स

याद रखने यौग्य बाते

  1. विद्रोह  का आरंभ भारतीय सैनिकों को पैदल सेना से हुआ था जो जल्द को मुड़सवार सेना और फिर शहर तक फैल गया। शहर और आसपास के देहात के लोग सिपाहियों के साथ आ मिले। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया।
  2. जैसे हो यह खबर फैली कि दिल्ली पर विद्रोहियों का कब्जा हो चुका है और बहादुर शाह ने विद्रोह को अपना समर्थन दे दिया है, स्थिति तेजी से बदलने लगी। गंगा घाटी तथा दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह के स्वर तेज होने लगे।
  3. विद्रोह में आम लोगों के शामिल हो जाने के साथ हमलों में विस्तार आता गाया। लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे बड़े शहरों में साहूकार और ध लोग विद्रोहियों के क्रोध का शिकार बनने लगे। किसान इन लोगों को न केवल अपना उत्पीड़क बल्कि अंग्रेजों का पिदव मानते थे।
  4. अलग-अलग स्थानों पर विद्रोह के स्वरूप में समानता का कारण आशिक रूप से उसकी योजना थी। विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच अच्छ संपर्क बना हुआ था। सिपाही लाइनों में रहते थे और सभी की जीवन-शैली एक जैसी थी।
  5. अप्रेजों से लोहा लेने के लिए नेतृत्व और संगठन आवश्यक थे। इस उद्देश्य से विद्रोहियों ने कई बार एंसे लोगों की शरण ती जो अंग्रेजों से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे। उदाहरण के लिए मेरठ के विद्रोही सिपाहियों ने तुरंत मुगल सम से विद्रोह का नेतृत्व प्राप्त करने का आग्रह किया। 
  6. लखनक में ब्रिटिश राज के ढहने की खबर पर लोगों ने नवाब के युवा पुत्र बिरजिस कद्र को अपना नेता घोषित कर दिया था।
  7.  यह अफवाह भी जोरों पर थी कि अंग्रेज सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक भयानक षड्यंत्र रचा है। यह अफवाह फैलाने वालों का कहना था कि इसी उद्देश्य से अंग्रेजों ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सूअर की हड्डियों का चूरा मिलवा दिया है। इसलिए शहरों और छावनियों में सिपाहियों तथा आम लोगों ने आटे को छूने से भी इन्कार कर दिया। 
  8. उत्तर भारत के विभिन्न भागों में गाँव-गाँव में चपातियाँ बँटने की भी रिपोर्ट आ रही थीं। लोग इसे किसी आने वाली उथल-पुथल का संकेत मान रहे थे।
  9. शासकीय अयोग्यता तथा पुत्र गोद लेने को अवैध घोषित कर देने की आड़ में अंग्रेजों ने न केवल अवध बल्कि झाँसी तथा सतारा जैसी बहुत-सी रियासतों को भी अधिकार में ले लिया था। जो रियासत या प्रदेश उनके कब्जे में आ जाता था, वहाँ वे अपनी शासन व्यवस्था, अपने कानून, भूमि विवादों के निपटारे की अपनी पद्धति और भूराजस्व वसूली की अपनी व्यवस्था लागू कर देते थे।
  10. अवध 1857 के विद्रोह का एक बहुत बड़ा केन्द्र था। 1856 में इस रियासत को औपचारिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। 
  11. लॉर्ड डलहौजी द्वारा किए गए राज्यों के इस अधिग्रहण से सभी इलाकों और रियासतों में गहरा असंतोप था परन्तु इतना रोप और कहीं नहीं था जैसा कि उत्तर भारत की शान कहे जाने वाले अवध में था। यहाँ के नवाब वाजिद अली शाह पर कुशासन का आरोप लगाकर गद्दी से हटा दिया गया था और कलकत्ता निष्कासित कर दिया गया था। 
  12. अवध के अधिग्रहण से केवल नवाब की हो गद्दी नहीं गई थी। इसने प्रदेश के ताल्लुकदारों को भी लाचार कर दिया था। अवध के समूचे देहात में ताल्लुकदारों की जागीरें और किले बिखरे हुए थे। ये लोग सदियों से अपने इलाके में जमीन और सत्ता पर नियंत्रण रखते आए थे। 
  13.  ताल्लुकदारों की सत्ता छिनने से एक पूरी सामाजिक व्यवस्था भंग हो गई। निष्ठा और संरक्षण के जिन बंधनों से किसान ताल्लुकदारों के साथ जुड़े हुए थे वे अस्त व्यस्त हो गए। अंग्रेजों से पहले ताल्लुकदार ही जनता का उत्पीड़न करते थे परन्तु जनता की नजर में बहुत-से ताल्लुकदार दयालु होने की छवि भी रखते थे।
  14.  किसानों का असंतोष अब सैनिक बैरकों में भी पहुंचने लगा था क्योंकि बहुत-से सिपाही अवध के गाँवों से ही भर्ती किए गए थे। दशकों से ये सिपाही कम वेतन और समय पर छुट्टी न मिलने के कारण असंतुष्ट थे। 1850 के दशक तक आते-आते कई अन्य कारणों से भी मुख्य असंतोष बढ़ गया। 
  15. 1857 में विद्रोहियों द्वारा जारी घोषणाओं में, जाति और धर्म का भेद किए बिना, समाज के सभी वर्गों का आह्वान किया जाता था। बहुत सी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की ओर से या उनके नाम पर जारी की गई थीं परन्तु उनमें भी हिन्दुओं 
  16.  ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाने के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर आदि स्थानों पर विद्रोहियों ने एक समान सत्ता और शासन की भावनाओं का ध्यान रखा जाता था। स्थापित करने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने पुरानी दरबारी संस्कृति का सहारा लिया। विभिन्न पदों पर नियुक्तियाँ की गई। भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन के भुगतान की व्यवस्था की गई। लूटपाट बंद करने के लिए हुक्मनामे जारी किए गए। इसके साथ-साथ अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी रखने की योजनाएँ भी बनाई गई।

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