CHAPTER 6 Class 11 History तीन वर्ग

प्रश्न 1. फ्रांस में अभिजात वर्ग की दशा का वर्णन करो।
अथवा
फ्रांस में अभिजात वर्ग को कौन-कौन से अधिकार प्राप्त थे? विवेचना कीजिए

उत्तर : (i) फ्रांस अभिजात वर्ग को पादरियों ने दूसरे वर्ग में रखा था परन्तु वास्तव में, उनकी सामाजिक प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका थी। ऐसा भूमि पर उनके अधिकार के कारण था। यह वेसालेज नामक एक प्रथा के विकास के कारण हुआ।
(ii) फ्रांस के शासकों का लोगों से जुड़ाव एक प्रथा के कारण था जिसे ‘जागीरदारी’ प्रथा कहते थे और यह प्रथा जर्मनी के लोगों, जिनमें से फ्रैंक भी एक थे, में समान रूप से पाई जाती थी। बड़े भू-स्वामी और अभिजात वर्ग राजा के अधीन होते थे जबकि कृषक जागीरदारों के अधीन होते थे।
(iii) अभिजात वर्ग राजा को अपना स्वामी (Seigneur) मान लेता था और वे आपस में वचनबद्ध होते थे- ज़ागीरदार लार्ड (लार्ड लोफ (loaf) शब्द से बना है जिसका अर्थ था रोटी देने वाला) दास की रक्षा करता था और बदले में वह उसके प्रति निष्ठावान रहता था। इन संबंधों में व्यापक रीति-रिवाजां और शपथों का विनिमय शामिल था जो कि चर्च में बाइबिल की शपथ लेकर की जाती थी।
(iv) अभिजात वर्ग की एक विशेष स्थिति थी। लॉर्ड के पास सम्पूर्ण वैधानिक अधिकार थे और उसका अपनी संपदा पर पूर्ण नियंत्रण था। वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा सकते थे (जिसे साम सैन्य भरती कहा जाता था) और युद्ध क्षेत्र में उनका नेतृत्व का सकते थे। वे अपना स्वयं का न्यायालय लगा सकते थे और अपनी विशिष्ट मुद्रा भी प्रचलित कर सकते थे।
(v) लॉर्ड अपनी भूमि पर बसे सभी व्यक्तियों के मालिक थे। वे विस्तृत क्षेत्रों के मालिक थे जिसमें उनके घर, उनके व्यक्तिगत खेत, जोत व चरागाह और उनके असामी-कृषक (Tenant- peasant) के घर और खेत होते थे। उनका घर ‘मेनर’ कहा जाता था।
(vi) उनकी व्यक्तिगत भूमि कृषकों द्वारा जोती जाती थी जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के समय पैदल सैनिकों के रूप में कार्य करना पड़ता था और साथ ही साथ अपने खेतों पर भी कार्य करना पड़ता था।
(vii) लार्ड का अपना मेनर-भवन होता था। वह गाँवों पर नियंत्रण रखता था। महान लार्ड अनेक गाँव जहाँ पर कृषक रहते थे., पर नियंत्रण कर सकता था। एक छोटी मेनर जागीर में दर्जन भर और बड़ी ज़ागीर में 50 या 60 परिवार निवास करते थे।
(viii) प्रतिदिन के उपभोग की प्रत्येक वस्तु जागीर पर मिलती थी-अनाज खेतों में उगाये जाते थे, लोहार और बढ़ई लॉर्ड के औज़ारों की देखभाल और हथियारों की मरम्मत किया करते थे, जबकि राजमिस्त्री उनकी इमारतों की देखभाल करते थे। औरतें र वस्त्र कातती एवं बुनती थीं और बच्चे लार्ड की मदिरा सम्पीडक में कार्य करते थे।
(ix)ज़ागीरों में विस्तृत अरण्यभूमि और वन होते थे जहाँ लार्ड शिकार करते थे। उनके यहाँ चरागाह होते थे जहाँ उनके पशु और घोड़े चरते थे। वहाँ पर एक चर्च और सुरक्षा के लिए एक महल होता था।
(x) तेरहवीं सदी से कुछ महलों को बड़ा बनाया जाने लगा जिससे वे नाइट (knight) के परिवार का निवास बन सकें। वास्तव में, इंग्लैण्ड में नॉरमन विजय से पहले महलों की कोई जानकारी नहीं थी और इनका विकास सामंत प्रथा के अंतर्गत राजनीतिक प्रशासन और सैन्य शक्ति के केन्द्रों के रूप में हुआ था।

प्रश्न 2. यूरोप के शक्तिशाली राज्यों में अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए अभिजात वर्ग ने क्या नीति अपनाई? क्या वे इसमें सफल रहे?
उत्तर : अभिजात वर्ग ने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए एक चाल चली। उन्होंने नई शासन-व्यवस्था का विरोधी होने की बजाय राजभक्त होने का दिखावा किया। इसी कारण शाही निरंकुशता को सामंतवाद का सुधरा हुआ रूप माना जाता है।
वास्तव में लॉर्ड, जो सामंती प्रथा में शासक थे, राजनीतिक परिदृश्य पर अभी भी छाए हुए थे। उन्हें प्रशासनिक सेवाओं में ती स्थायी स्थान दिए गए थे। फिर भी नयी शासन व्यवस्था कई र महत्त्वपूर्ण तरीकों से सामंती प्रथा से अलग थी। शासक अब उस तो पिरामिड के शिखर पर नहीं था जहाँ राजभक्ति आपसी विश्वास और आपसी निर्भरता पर टिकी थी। अब वह एक व्यापक दरबारी समाज तंत्र का केन्द्र बिन्दु था। वह अपने अनुयायियों को आश्रय भी देता था। सभी राजतंत्र चाहे वे कमजोर थे या शक्तिशाली सत्ता में भाग लेने वाले व्यक्तियों का सहयोग चाहते थे। राजा द्वारा दिया गया संरक्षण अथवा आश्रय इस सहयोग को सुनिश्चित करने का साधन था। संरक्षण धन के माध्यम से दिया या प्राप्त किया जा सकता था। इसलिए धन व्यापारियों और साहूकारों जैसे गैर-अभिजात वर्गों के लिए दरबार में प्रवेश पाने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बन गया। वे राजाओं को धन उधार देते थे जो इसका उपयोग सैनिकों को वेतन देने के लिए करते थे। इस प्रकार राज्य व्यवस्था में गैर-सामंती तत्त्वों को भी स्थान मिल गया।
1614 में शासक लुई XIII के शासनकाल में फ्रांस की परामर्शदात्री सभा, एस्टेट्स जनरल का एक अधिवेशन हुआ। इसके तीन सदन थे जो समाज के तीन वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसके पश्चात् 1789 तक इसे फिर नहीं बुलाया गया क्योंकि राजा तीन वर्गों के साथ अपनी शक्ति नहीं बाँटना चाहते थे।
इंग्लैंड में नॉरमन विजय से भी पहले एंग्लो सैक्सन लोगों की एक महान् परिषद होती थी कोई भी कर लगाने से पहले राजा को इस परिषद् की सलाह लेनी पड़ती थी। इसने आगे चलकर दो सदनों वाली पार्लियामेंट का रूप धारण कर लिया। ये सदन थे-हाउस ऑफ लॉर्ड्स तथा हाउस ऑफ कामन्स। हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य लॉर्ड तथा पादरी थे। हाउस ऑफ कामन्स नगरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता था। राजा चार्ल्स प्रथम (1629-40) ने पार्लियामेंट को बिना बुलाए ग्यारह वर्षों तक शासन किया। एक बार धन की आवश्यकता पड़ने पर ही उसने पार्लियामेंट को बुलाने का निर्णय लिया परन्तु पालिर्यामेंट के एक भाग ने उसके विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। बाद में उसे प्राणदंड देकर गणतंत्र की स्थापना कर दी गई। यह व्यवस्था भी अधिक समय तक नहीं चल पाई और राजतंत्र की पुनः स्थापना हुई। यह निर्णय हुआ कि अब पार्लियामेंट नियमित रूप से बुलाई जाएगी। इससे स्पष्ट है कि अभिजात वर्ग शक्तिशाली राज्यों में भी अपनी शक्ति बनाये रखने में सफल रहा।

प्रश्न 3. एबी एवं उसमें रहने वाले भिक्षुओं के जीवन पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर : एबी चर्च के अतिरिक्त कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक दूसरी तरह की संस्था थी। कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति, पादरियों के विपरीत जो लोगों के बीच में नगरों और गाँवों में रहते थे, एकांत जीवन जीना पसंद करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें ऐबी (abbeys) या मठ कहते थे और जो अधिकतर मनुष्य की आम आबादी से बहुत दूर होते थे। दो सबसे अधिक मठों में एक मठ 529 में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) था और दूसरा 910 में बरगंडी (Burguncy) में स्थापित कलूनी (Clury) था।
भिक्षु अपना सारा जीवन ऐबी में रहने और समय प्रार्थना करने, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का व्रत लेता था। पादरी-कार्य के विपरीत भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे-ऐसे पुरुषों को मॉक (Mauk) तथा स्त्रियाँ नन (Nun) कहलाती थीं कुछ अपवादों को छोड़कर सभी ऐबी में एक ही लिंग के व्यक्ति रह सकते थे। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग ऐबी थे। पादरियों की तरह, भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकती थीं।
दस या बीस पुरुष/ स्त्रियों के छोटे समुदाय से बढ़कर मठ अब सैकड़ों की संख्या के समुदाय बन गए जिसमें बड़ी इमारतें और भू जागीरों के साथ-साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल सम्बद्ध थे। इन समुदायों ने कला के विकास में योगदान दिया। ऐबस हेडेलगार्ड एक प्रतिभाशाली संगीतज्ञ था जिसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। तेरहवीं सदी से भिक्षुओं के कुछ समूह जिन्हें फायर (friars) कहते थे उन्होंने मठों में न रहने का निर्णय लिया! वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते और दान से अपनी जीविका चलाते थे।

प्रश्न 4. नाइट कौन थे? उनकी जीवन शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : नौवीं सदी में, यूरोप में स्थानीय युद्ध निरन्तर होते रहते थे। शौकिया कृषक-सैनिक इनके लिए पर्याप्त नहीं थे और कुशल घुड़सवार की आवश्यकता थी। इसने एक नए वर्ग को बढ़ावा दिया जो नाइट्स (Knights) कहलाते थे। वे लार्ड से उसी प्रकार सम्बद्ध थे जिस प्रकार लार्ड राजा से सम्बद्ध था।लार्ड ने नाइट को भूमि का एक भाग (जिसे फ़िफ़ कहा गया) दिया और उसकी रक्षा करने का वचन दिया। फिफ (/fief) को उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता था। यह 1000-2000 एकड़ या उससे अधिक में फैली हुई हो सकती थी जिसमें नाइट और उसके परिवार के लिए एक पनचक्की और मदिरा संपीडक के अलावा. उसके व उसके परिवार के लिए घर, चर्च और उस पर निर्भर व्यक्तियों के रहने की व्यवस्था शामिल थी। फ्यूडल मेनर (feudal manor) की तरह, फ़िफ़ की भूमि को कृषक जोतते थे। बदले में, नाइट अपने लार्ड को एक निश्चित धनराशि देता था और यद्ध में उसकी ओर से लड़ने का वचन देता था। नाइट अपनी सेवाएँ अन्य लोगों को भी दे सकता था पर उसकी सर्वप्रथम निष्ठा अपने लार्ड के लिए ही होती थी।
नाइट योग्यताओं को बनाए रखने के लिए, प्रतिदिन अपना समय पुतलों से रणकौशल एवं अपने बचाव का अभ्यास करने में निकालते थे। बारहवीं सदी से गायक फ्रांस के मेनरो में वीर राजाओं और नाइट्स की वीरता की कहानियाँ, गीतों के रूप में सुनाते हुए घूमते रहते थे जो अंशतः ऐतिहासिक और अंशत: काल्पनिक होती थीं। उस काल में जब बहुत अधिक संख्या में पढ़े-लिखे लोग नहीं थे और पांडुलिपियाँ भी अधिक नहीं थीं, ये घुमक्कड़ चारण बहुत प्रसिद्ध थे। अनेक मेनरों के यहाँ हाल के ऊपर एक संकरी दीर्घा होती थी जहाँ मेनर के लोग भोजन के लिए एकत्र होते थे। यह एक गायक दीर्घा होती थी जो कि संगीतज्ञों द्वारा अभिजात वर्ग के लोगों का भोजन करते वक्त मनोरंजन करने के लिए बनी थी।

प्रश्न 5. सामंतवाद के पतन के क्या कारण थे?
उत्तर : सामंतवाद मध्यकालीन यूरोप की एक बहुत बड़ी विशेषता थी। लगभग 700 वर्षों तक यूरोप में इस प्रथा का बोलबाला रहा, परन्तु कुछ कारणों से इस प्रथा का पतन हा गया। जिसका वर्णन इस प्रकार है
(i) मध्य युग के अन्त में शासन शक्तिशाली सम्राटों के हाथों । में आ गया। इन सम्राटों ने सामतों की बढ़ती हुई शक्ति का दमन कर दिया।
(ii) जनता में राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। उधर राजाओं ने जनता की भलाई की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। इससे सामंत प्रथा को बड़ी क्षति पहुँची।
(iii) इसी बीच व्यापार की वृद्धि के कारण एक नये व्यापारी वर्ग का जन्म हुआ। उन्होंने राजाओं को अनेक प्रकार के कर देने शुरू कर दिए। अब राजा इस धन से स्थायी सेना रखने में समर्थ हो गए। स्थायी सेनाओं ने बड़े-बड़े सामंतों का दमन कर दिया।
(iv) इंग्लैंड तथा फ्रांस में लंबे समय तक युद्ध चलता रहा। इन युद्धों में बड़े-बड़े सामंत मारे गए और उनकी जागीरों को राजा ने अपने हाथों में ले लिया।
(v) संतानहीन सामंती की जागीरें भी राजाओं ने छीन लीं। इससे सामंतवाद को काफी धक्का लगा।
(vi) गोला-बारूद का आविष्कार हो जाने से राजा की शक्ति बहुत बढ़ गई। अब राजा को सामंतों पर निर्भर रहने की आवश्यकता न रही।
(vii)धर्मयुद्धों में भाग लेने के कारण कुछ सामंत मार गए और शेष सामंतों की शक्ति कम हो गई।
सच तो यह है कि शक्तिशाली राजाओं के उदय, सहयोग, धर्मयुद्धों, व्यापार के विकास आदि अनेक बातों ने सामंतवाद को पतन के द्वार पर ला खड़ा किया।

प्रश्न 6. सामन्तवाद के समय यदि तुम निम्नलिखित में से किसी वर्ग में होते, तो लिखो कि अपना समय किय प्रकार बिताते : नाईट, सर्फ, मेनर का स्वामी, भिक्षु।
उत्तर : (i) यदि मैं नाइट होता (If I were a knight): मैं नाइट होता. तो विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करता। मेरा अगर एक भव्य भवन होता। मेरे आगे पीछे नौकर मेरी सेवा के लिए होते। पहनने के लिए मेरे पास बहुमूल्य और सुन्दर कपड़े होते। मैं अपने अधिपति (ड्यूक या बैरन) का पूर्ण सम्मान करता। मैं कुशल सैनिकों एवं अच्छे घोड़ों की टुकड़ी हमेशा तैयार रखता। मैं निश्चित होकर अपना समय शिकार करने, युद्ध करने एवं पार्टियों में बिताता। मैं न्यायधीश के रूप में अपना कार्य निष्पक्ष होकर करता। स्त्रियों को उचित सम्मान देता।
(ii) यदि मैं सर्फ होता (If I were a Serf) : अगर में सफ होता तो मेरा जीवन दुखों से घिरा होता। अपनी इस भूमि पर काम करने के अलावा मुझे अपने सामन्त के खेतों पर बेगार करनी पड़ती। मैं सामन्त का आज्ञाकारी गुलाम होता। मैं अपनी भूमि पर होने वाली उपज का एक भाग सामन्त को चुपचाप देता। कभी भी अपनी जमीन छोड़कर न भागता। मेरी इच्छा यही होती कि मेरा स्वामी मेरे कार्य में खुश हो जाए और मुझे स्वतन्त्र किसान बना दे. जिससे मेरा जीवन अच्छा बन जाए।
(iii) यदि मैं मेनर का स्वामी होता (If lwere Lord of a Manor) : अगर मैं मेनर का स्वामी होता तो मेरे पास गाँव में सबसे बड़ा खूबसूरत किले जैसा भवन होता । मेरे भवन में बहुत से कमरे होते और उनमें साज-सज्जा का सामान लगा होता। मेरे पास एक कृषि फार्म होता। जिस पर कृषिदास एवं दास कृषक कार्य करते। मेरे मकान के पास ही चरागाह तथा जंगल होता। मेरे गाँव में मेरा ही राज्य होता। इस तरह से मेरा जीवन पूर्णत: सुखी होता।
(iv) अगर मैं भिक्षु होता (If I were a Monk) : यदि मैं भिक्षु होता, तो मुझे संन्यासियों जैसा जीवन बिताना पड़ता। मैं अपना अधिकांश समय ईश्वर भक्ति में ही व्यतीत करता। मैं मठ में रहता तथा तप और पुण्य का जीवन व्यतीत करता। मैं मठ के नियमों का पालन करते हुए कठोर अनुशासन में रहता ।

प्रश्न 7. यूरोप में मध्यकाल में नगरों का विकास किन कारणों से हुआ?
उत्तर : यूरोप में मध्य वर्ग के जन्म के साथ दो बातें घटित हुई। एक तो बड़े नगर अस्तित्व में आए और दूसरे सामंतवादी ढाँचे की नींव हिल गई। नगरों के उत्थान से मेनर में बसने वाले लोगों ने नगरों में रहना आरंभ कर दिया। नगर में उद्योग थे, धन था तथा ऐश्वर्य भरा जीवन था। एक ऐसा समय आया जब स्वयं सामंत भी जाकर इन नगरों में रहने लगे।
मध्यकाल में इन नगरों के इर्द-गिर्द पत्थर की चारदीवारी होती थी। चारदीवारी के बाहर खाई और उसके ऊपर बड़े-बड़े बुर्ज होते थे। नगर में एक बड़ा बाजार और कुछ तंग गलियाँ होती थीं। इन नगरों के विकास के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-
1.सामंतों का आश्रय : नगरों का आरंभ मध्य वर्ग के उदय होने के कारण हुआ। मध्य वर्ग का उदय 11वीं शताब्दी के अन्त में हुआ। इसका आरम्भ शिल्पकारों से हुआ। शिल्पकार अपने उद्योग वहीं उन्नत कर सकते थे, जहाँ उन्हें रक्षा की आशा थी। ऐसे स्थान सामंतों की गढ़ियां थीं। आरंभ में उन्होंने गढ़ियों के समीप आश्रय लिया। वे सामंत से रक्षा की आशा करते थे। वे उसको रक्षक मानते थे और उसका पूर्ण आदर करते थे गढ़ी के समीप रहने वाली बस्तियाँ ।।वीं तथा 12वीं शताब्दी में विस्तृत रूप धारण करने लगीं। अंततः ये नगर बन गए।
2.धर्म-युद्ध : धर्म-युद्ध ने भी नगरों के विकास में विशेष भूमिका निभाई। ये धर्म-युद्ध ईसाइयों और मुसलमानों के बीच हुए। ये ग्यारहवीं शताब्दी के अन्त से लेकर तेरहवीं शताब्दी के अंत तक चलते रहे। इन युद्धों के फलस्वरूप यूरोप और एशिया के देशों का व्यापार कई गुना बढ़ गया। व्यापार से नगरों में स्थित मंडियों की रौनक बढ़ी। लोगों की संख्या बढ़ने लगी जिसके कारण नगरों का आकार बढ़ा। कुछ लोग ये नगर छोड़कर दूर जाकर बसने लगे। इस प्रकार नवीन नगर अस्तित्व में आए।
3.मुद्रा में वृद्धि : मुद्रा की वृद्धि के कारण नगरों का विकास हुआ। जब व्यापारियों की वस्तुओं की मांग बढ़ी तो उन्होंने अधिक मात्रा में वस्तुएँ बनानी आरंभ कर दीं। माल विदेशों में भी भेजा जाता था। विदेशी व्यापारियों से सोना-चाँदी में मूल्य लिया जाता था। इससे मुद्रा या सिक्कों में वृद्धि हुई। आंतरिक मंडियों में व्यापार आरंभ में वस्तुओं के आदान-प्रदान से होता रहा, परन्तु धीरे-धीरे यहाँ भी सिक्कों का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार मुद्रा के प्रसार ने व्यापारिक वृद्धि में बड़ा योगदान दिया और व्यापार के कारण नगरों का विकास हुआ।
4.नगरों का स्वतंत्र जीवन : समय बीतने के साथ-साथ नगर सामंतों से स्वतंत्र हो गए। उन्होंने व्यापारियों से धन लेकर नगर व्यापारियों को सौंप दिए। इन व्यापारियों ने गिल्ड प्रणाली द्वारा नगरों के जीवन को नया रूप दिया।
नगरों के स्वतंत्र जीवन का प्रभाव प्राकृतिक रूप से आस-पास के क्षेत्र पर भी पड़ा। सामंतों के दास और काम करने वालों पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा। उनमें से कई लोग सामंतों के अत्याचारों से तंग आकर समीप के नगरों में शरण लेने लगे। नगर में कुछ समय रहने के बाद वे स्वतंत्र समझे जाते थे समयानुसार सामंतों ने भी अपनी गढ़ियाँ खाली कर दी तथा नागरिक जीवन के सुख प्राप्त करने के लिए नगरों में आकर रहने लगे।
5.नगरों को प्रतिनिधित्व : तेरहवीं शताब्दी में नगरों की शक्ति बहुत बढ़ गई। सम्राटों को इनके प्रतिनिधियों की विधानमंडलों में लेना पड़ा। इससे नगरों का महत्त्व बढ़ा और उनके विकास में योगदान मिला। सच तो यह है कि नगरों के विकास ने सामाजिक उन्नति के द्वार खोल दिये। इसके कारण सामंत-प्रधान समाज की नींव हिल गई। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बल मिला तथा व्यापार और उद्योग स्थापित हुए। इस प्रकार पूरे समाज का ही रूप बदल गया।

प्रश्न 8. चर्च अथवा पादरियों की जीवन शैली तथा अधिकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर : तत्कालीन कैथोलिक चर्च के अपने विशिष्ट नियम थे, राजा द्वारा दी गई भूमियाँ थीं जिनसे वे कर प्राप्त कर सकते थे। इसलिए यह एक शक्तिशाली संस्था थी जो राजा पर निर्भर नहीं थी। पश्चिमी चर्च के शीर्ष पर पोप था, जो रोम में रहता था। यूरोप में ईसाई समाज का मार्गदर्शन बिशपों तथा पादरियों द्वारा किया जाता था जो प्रथम वर्ग के अंग थे। अधिकतर गाँव में अपने चर्च हुआ करते थे जहाँ पर प्रत्येक रविवार को लोग पादरी का धर्मोपदेश सुनने तथा सामूहिक प्रार्थना करने के लिए एकत्र होते थे।
प्रत्येक व्यक्ति पादरी नहीं बन सकता था। कृषि-दास पर प्रतिबंध था। शारीरिक रूप से बाधित व्यक्तियों और स्त्रियों पर प्रतिबंध था। जो पुरुष पादरी बनते थे वे शादी नहीं कर सकते थे। धर्म के क्षेत्र में बिशप अभिजात माने जाते थे। बिशपों के पास भी लार्ड के समान विस्तृत जागीरें थीं और वे शानदार महलों में रहते थे। चर्च को एक वर्ष के अंतराल में कृषक से उसकी उपज का दसवाँ भाग लेने का अधिकार था जिसे “टीथे” (Tithe) कहते थे। अमीरों द्वारा अपने कल्याण और मरणोपरान्त अपने रिश्तेदारों के कल्याण हेतु दिया जाने वाला दान भी आय का एक प्रमुख स्रोत था।
चर्च के औपचारिक रीति-रिवाज की कुछ महत्त्वपूर्ण रस्में, सामंती कुलीनों की नकल थीं । प्रार्थना करते वक्त, हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर घुटनों के बल झुकना, नाइट द्वारा अपने वरिष्ठ लार्ड के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेते वक्त अपनाए गए तरीके की नकल था। इसी प्रकार से, ईश्वर के लिए लार्ड शब्द का प्रचलन एक उदाहरण था जिसके द्वारा सामंतवादी संस्कृति चर्च के उपासना कक्षों में प्रवेश करने लगी। इस प्रकार अनेक सांस्कृतिक सामंतवादी रीति-रिवाजों और तौर-तरीकों को चर्च की दुनिया में यथावत् स्वीकार कर लिया गया था।

प्रश्न 9. एबी एवं उसमें रहने वाले भिक्षुओं के जीवन पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर : एबी चर्च के अतिरिक्त कुछ विशेष श्रद्धालु ईसाइयों की एक दूसरी तरह की संस्था थी। कुछ अत्यधिक धार्मिक व्यक्ति, पादरियों के विपरीत जो लोगों के बीच में नगरों और गाँवों में रहते थे, एकांत जीवन जीना पसंद करते थे। वे धार्मिक समुदायों में रहते थे जिन्हें ऐबी (abbeys) या मठ कहते थे और जो अधिकतर मनुष्य की आम आबादी से बहुत दूर होते थे। दो सबसे अधिक मठों में एक मठ 529 में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) था और दूसरा 910 में बरगंडी (Burgundy) में स्थापित कलूनी (Clury) था।
भिक्षु अपना सारा जीवन ऐबी में रहने और समय प्रार्थना करने, अध्ययन और कृषि जैसे शारीरिक श्रम में लगाने का ब्रत लेता था। पादरी-कार्य के विपरीत भिक्षु का जीवन पुरुष और स्त्रियाँ दोनों ही अपना सकते थे-ऐसे पुरुषों को मॉक (Mauk) तथा स्त्रियाँ नन (Nun) कहलाती थीं। कुछ अपवादों को छोड़कर सभी ऐबी में एक ही लिंग के व्यक्ति रह सकते थे। पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग ऐबी थे। पादरियों की तरह, भिक्षु और भिक्षुणियाँ भी विवाह नहीं कर सकती थीं।
दूस या बीस पुरुष/ स्त्रियों के छोटे समुदाय बढ़कर मठ अब सैकड़ों की संख्या के समुदाय बन गए जिसमें बड़ी इमारतें और जागीरों के साथ-साथ स्कूल या कॉलेज और अस्पताल भू सम्बद्ध थे। इन समुदायों ने कला के विकास में योगदान दिया। ऐबस हेडेलगार्ड एक प्रतिभाशाली संगीतज्ञ था जिसने चर्च की प्रार्थनाओं में सामुदायिक गायन की प्रथा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। तेरहवीं सदी से भिक्षुओं के कुछ समूह जिन्हें फायर (friars) कहते थे उन्होंने मठों में न रहने का निर्णय लिया। वे एक % स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते और दान से अपनी जीविका चलाते थे।

प्रश्न 10. मध्यकालीन यूरोप के समाज पर चर्च के प्रभाव की चर्चा कीजिए |
उत्तर : यूरोपवासी ईसाई तो बन गए थे परन्तु उन्होंने अभी । तक चमत्कार और रीति-रिवाजों से जुड़े अपने पुराने विश्वासों को व पूरी तरह नहीं छोड़ा था। क्रिसमस और ईस्टर चौथी शताब्दी में व ही कैलेंडर की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ बन गए थे। 25 दिसम्बर का मनाए जाने वाले क्रिसमस अथवा ईसा मसीह के जन्मदिन ने एक पुराने-पूर्व-रोमन त्यौहार का स्थान ले लिया। इस तिथि की गणना सौर-पंचांग (Solar Calendar) के आधार पर की गई थी।
ईस्टर : ईस्टर ईसा के शूलारोपण और उनके पुनर्जीवित होने का प्रतीक था परन्तु इसकी तिथि निश्चित नहीं थी क्योंकि इसने चन्द्र-पंचांग (Zanar Calendar) पर आधारित एक प्राचीन त्योहार का स्थान लिया था। यह प्राचीन त्योहार लंबी सर्दी के पश्चात बसंत के आगमन का स्वागत करने के लिए मनाया जाता था एक परंपरा के अनुसार उस दिन प्रत्येक गाँव के व्यक्ति अपने गाँव की भूमि का दौरा करते थे। ईसाई धर्म अपनाने पर भी उन्होंने इसे जारी रखा परन्तु अब वे उसे ग्राम के स्थान पर ‘पैरिश’ कहने लगे।
त्योहारों का महत्त्व : काम से दबे कृषक इन पवित्र दिनों अथवा छुट्टियों (Holidays) का स्वागत इसलिए करते थे क्योंकि इन दिनों उन्हें कोई काम नहीं करना पड़ता था। वैसे तो यह दिन प्रार्थना करने के लिए था परन्तु लोग सामान्यत: इसका अधिकतर समय अपना मनोरंजन करने और दावतों में बिताते थे।
तीर्थयात्रा : तीर्थयात्रा, ईसाइयों के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण भाग थी। बहुत-से लोग शहीदों की समाधियों या बड़े गिरिजाघरों की लंबी यात्राओं पर जाते थे।

प्रश्न 11. 11वीं सदी में कृषि में आए तकनीकी परिवर्तनों पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर : ग्यारहवीं सदी तक विभिन्न तकनीकी परिवर्तनों के प्रमाण प्राप्त होते हैं। कृषि के उपयोग में आने वाले औज़ार बदल गए। मूल रूप से लकड़ी से बने हल के स्थान पर लोहे की भारा नोक वाले हल और साँचेदार पटरे (Mould boards) का प्रयोग किया जाने लगा। ऐसे हल अधिक गहरा खोद सकते थे और सांचेदार पटरे सही ढंग से उपरि मृदा को पलट सकते थे। इसके फलस्वरूप भूमि में व्याप्त पौष्टिक तत्त्वों का बेहतर उपयोग होने लगा। पशुओं को हलों में जोतने के तरीकों में भी सुधार हुआ। गले (Neck Larness) के स्थान पर जुआ अब कंधे पर बांधा जाने लगा। इससे पशुओं को अधिक शक्ति मिलने लगी। घोड़े के खुरों पर अब लोहे की नाल ठोकी जाने लगी जिससे उनके खुर सुरक्षित हो गए। कृषि के लिए वायु और जल शक्ति का उपयोग अधिकता से होने लगा। यूरोप में अन्न को पीसने और अंगूरों को निचोड़ने के लिए अधिक जलशक्ति और वायुशक्ति से चलने वाले कारखाने स्थापित हो रहे थे ।
भूमि के उपयोग के तरीके में भी बदलाव आया। सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन था दो खेतों वाली व्यवस्था से तीन खेतों वाली व्यवस्था में परिवर्तन। इस व्यवस्था में कृषक तीन वर्षों में से दो वर्ष अपने खेत का उपयोग कर सकता था बशर्ते वह एक फ़सल शरत् ऋतु में और उसके डेढ़ वर्ष पश्चात् दूसरी बसंत में बोता। इसका अर्थ था कि कृषक अपने जोतों को तीन खेतों में बाँट सकते थे वे मानव उपभोग के लिए एक खेत में शरत् ऋतु में गेहूँ या राई बो सकते थे। दूसरे में, बसंत ऋतु में मनुष्यों के उपभोग के लिए मटर, सेम और मसूर तथा घोड़ों के लिए जौ और बाजरा बो सकते थे, तीसरा खेत परती यानी खाली रखा जाता था। प्रत्येक वर्ष वे तीनों खेतों का प्रयोग बदल-बदल कर करते थे।
इन सुधारों के कारण, भूमि की प्रत्येक इकाई में होने वाले उत्पादन में वृद्धि हो गई। भोजन की उपलब्धता दुगुनी हो गई। मटर और सेम जैसे पौधों का अधिक उपयोग एक औसत यूरोपीय के आहार में अधिक प्रोटीन का तथा उनके पशुओं के लिए अच्छे चारे का स्रोत बन गया था। फलस्वरूप कृषकों को बेहतर अवसर मिलने लगा। वे अब कम भूमि पर अधिक भोजन का उत्पादन कर सकते थे। तेरहवीं सदी तक एक कृषक के खेत का औसत आकार सौ एकड़ से घटकर बीस से तीस एकड़ तक रह गया। छोटी जोतों पर अधिक कुशलता से कृषि की जा सकती थी और उसमें कम श्रम की आवश्यकता थी। इससे कृषकों को अन्य गतिविधियों के लिए समय मिलने लगा।
इनमें से कुछ तकनीकी परिवर्तनों में अत्यधिक धन लगता था। कृषकों के पास पनचक्की और पवनचक्की स्थापित करने के लिए पर्याप्त धन नहीं था इसलिए इस मामले में इसकी पहल लाडो द्वारा की गई परन्तु कृषक भी कई अन्य क्षेत्रों में पहल करने में सक्षम रहे, जैसे कि कृषि योग्य भूमि का विस्तार करने में। उन्होंने फ़सलों की तीन-चक्रीय व्यवस्था को अपनाया और गाँवों में लोहार की दुकानें और भट्टियाँ स्थापित की, जहाँ पर लोहे की नोक वाले हल और घोड़े की नाल बनाने और मरम्मत करने के काम को, सस्ती दरों पर किया जाने लगा।
ग्यारहवीं सदी से, व्यक्तिगत संबंध, जो सामंतवाद का आधार थे कमजोर पड़ने लगे क्योंकि आर्थिक लेन-देन अधिक से अधिक मुद्रा पर आधारित होने लगा। लॉर्डों को लगान, उनकी सेवाओं के बजाय नकदी में लेना अधिक सुविधाजनक लगने लगा और कृषकों ने अपनी फ़सल व्यापारियों को मुद्रा में (उन्हें वस्तुओं से बदलने के स्थान पर) बेचना शुरू कर दिया जो पुनः उन वस्तुओं को शहर में बेच देते थे। धन का बढ़ता उपयोग कीमतों को प्रभावित करने लगा जो खराब फसल के समय बहुत अधिक हो जाती थीं। उदाहरण के लिए, इंग्लैण्ड में 1270 और 1320 के बीच कृषि मूल्य दुगुने हो गए थे।

प्रश्न 12. मध्यकाल में, सामन्तवाद के अन्तर्गत, लोगों के सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश डालें।

उत्तर : सांस्कृतिक जीवन (Cultural Life) : (i) विद्या : मध्ययुग में शिक्षा का इतना प्रचार नहीं था। कुछ पादरियों और सामन्तों को छोड़कर बाकी बहुत कम लोग शिक्षित होते थे। धार्मिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाता इसलिए मठों से ही प्रायः पाठशालाओं का काम लिया जाता था। परन्तु बाद में अनेक स्कूलों और कॉलिजों की स्थापना की गई। इग्लैंड के दो सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों-आक्सफोर्ड (Oxford) और कैम्ब्रिज (Cambridge) का जन्म भी मध्ययुग में ही हुआ।
(ii) साहित्य : मध्ययुग का बहुत-सा साहित्य लातीनी भाषा में ही लिखा गया। चाहे विभिन्न देशों में लोग अपनी स्थानीय भाषाएँ ही बोलते थे परन्तु लातीनी भाषा उन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में बोली जाती थी। इटली के सुप्रसिद्ध इतिहासकार (Dante) ने बहुत कुछ इसी लातीनी भाषा में लिखा और गाया। परन्तु लातीनी के साथ-साथ अंग्रेजी, फ्रांसीसी तथा जर्मन आदि स्थानीय भाषाओं ने भी धीरे-धीरे उन्नत होना प्रारम्भ कर दिया था।अंग्रेज़ी साहित्य के सबसे प्रथम कवि चौसर (Chaucer) ने इसी युग में अपने महाकाव्य ‘केण्टरबली टेल्ज’ (The Canterbury Tales) की रचना की।
(iii) कला तथा भवन : निर्माण कला-मध्ययुग में कला, विशेषकर भवन-निर्माण-कला के क्षेत्र में काफी उन्नति हुई। इस काल में बड़े-बड़े गिरजाघर बनाए गए जो विशाल होने के साथ-साथ अपनी सुन्दरता में अद्वितीय थे और आज भी उस समय की कला का वों परिचय देते हैं। इन गिरजाघरों के अतिरिक्त मध्ययुग में बने हुए कुछ विशाल दुर्ग भी देखने को मिलते हैं जिनसे हम आसानी से उस काल की वास्तुकला अथवा भवन-निर्माण-कला की महानता का अनुमान लगा सकते हैं।

प्रश्न 13, मध्यकालीन यूरोप में शक्तिशाली राज्यों ( राष्ट्र राज्यों) का उदय किस प्रकार हुआ? क्या अभिजात वर्ग द्वारा इसका विरोध हुआ?
उत्तर : मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ राजनीतिक क्षेत्रों में भी परिवर्तन आए। पंद्रहवीं और सोलहवीं सदियों में यूरोपीय शासकों ने अपनी सैनिक तथा वित्तीय शक्ति में वृद्धि की। उनके द्वारा स्थापित नए शक्तिशाली राज्य उस समय होने वाले आर्थिक परिवर्तनों के समान ही महत्त्वपूर्ण थे। फ्रांस में लुई ग्यारहवें, आस्ट्रिया में मैक्समिलन, इंग्लैंड में हेनरी सप्तम और स्पेन में ईसाबेला और फडीनेंड निरंकुश शासक थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्थायी सेनाओं तथा स्थायी नौकरशाही की व्यवस्था की तथा कर-प्रणाली स्थापित की। स्पेन तथा पुर्तगाल ने समुद्र पार यूरोप के विस्तार में भूमिका निभाई।
सहायक तत्त्व : राष्ट्र राज्यों के उदय में निम्नलिखित तत्त्वों ने सहायता पहुँचाई :
(i) इन राजतंत्रों की सफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में होने वाला सामाजिक परिवर्तन था। जागीरदारी (Versalage) और सामंतशाही (lordship) वाली सामंत प्रथा के विलय और आर्थिक विकास की धीमी गति ने इन शासकों को प्रभावशाली बनाया और जनसाधारण पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का अवसर प्रदान किया। नए शासकों ने सामंतों से अपनी सेना के लिए कर लेना बन्द कर दिया। इसके स्थान पर उन्होंने बंदूकों और बड़ी तोपों से सुसज्जित प्रशिक्षित सेना तैयार की जो पूर्ण रूप से उनके अधीन थी। इस प्रकार राजा इतने शक्तिशाली हो गए कि अभिजात वर्ग उनका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाता था।
(ii) करों में वृद्धि से शासकों को पर्याप्त राजस्व प्राप्त होने लगा। इससे उन्हें पहले से बड़ी सेनाएँ रख पाने में सहायता मिली। सेनाओं की सहायता से उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की और उनका विस्तार किया। सेना के बल पर उनके लिए राजसत्ता के प्रति होने वाले आंतरिक प्रतिरोधों को दबाना भी सरल हो गया।
विरोध : इसका अर्थ यह नहीं था कि अभिजात वर्ग ने केन्द्रीय सत्ता का विरोध नहीं किया। अब कर प्रणाली के प्रश्न पर विद्रोह हुए। इंग्लैंड में इस विद्रोह का 1497, 1536, 1547, 1549 और 1553 में दमन कर दिया गया।
फ्रांस में लुई XI (1461-83) को ड्यूकों तथा राजकुमारों के विरुद्ध एक लंबा संघर्ष करना पड़ा। छोटे सरदारों और अधिकांश स्थानीय सभाओं के सदस्यों ने भी अपनी शक्ति के जबरदस्ती हड़पे जाने का विरोध किया। सोलहवीं शताब्दी में फ्रांस में होने वाले ‘धर्म-युद्ध’ कुछ सीमा तक शाही सुविधाओं और क्षेत्रीय स्वतंत्रता के बीच संघर्ष थे।

प्रश्न 14. मध्यकाल में, सामन्तवाद के अन्तर्गत, लोगों के राजनैतिक जीवन पर प्रकाश डालें।
उत्तर : मध्ययुग (Middle Ages) : संसार के प्रत्येक देश को तीन युगों (प्राचीन, मध्य तथा आधुनिक युग) से गुजरना पड़ा है। कौन-सा युग किसी विशेष देश में कब शुरू हुआ यह कहना तनिक कठिन है, परन्तु फिर भी इतिहासकारों ने इन युगों के लिए कोई-न-कोई विशेष तिथि देने का यथा सम्भव प्रयत्न किया है। इस तरह यूरोप में दसवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं- पन्द्रहवीं शताब्दी तक के इन पाँच-छ: सौ वर्षों के समय को मध्ययुग (Middle Ages) का नाम दिया गया है। यह मध्ययुग एक ओर प्राचीन युग और दूसरी ओर आधुनिक युग से काफी भिन्न था। इस युग की अपनी ही विशेषताएँ थीं जो निम्नलिखित हैं:
राजनैतिक जीवन (Political Life)
1.छोटे-छोटे राज्यों का स्थापित होना : मध्ययुग में लोगों के राजनैतिक जीवन को देखने से सबसे पहली बात जो दृष्टिगोचर होती है वह यह है कि अब शक्तिशाली महान् राजतन्त्र की अवनति होने लगी थी, शासन का केन्द्रीकरण समाप्त हो रहा था और उसके स्थान पर अनेक छोटे-छोटे राज्य सत्तारूढ़ हो रहे थे। अकेले जर्मनी में कोई ऐसे छोटे-छोटे 200 राज्य थे।
2.अव्यवस्था और अशान्ति का काल : अब क्योंकि बड़े-बड़े राज्य नहीं रहे थे इसलिए चारों ओर अव्यवस्था तथा अशान्ति का बोलबाला हो गया। ये छोटे-छोटे राज्य सदा आपसी लड़ाई झगड़ों में लगे रहते थे जिससे चारों ओर अशान्ति का वातावरण छाया रहता था।
3.सामन्त प्रथा का सर्वप्रिय होना : मध्ययुग की आधारशिला वास्तव में सामन्त-प्रथा (Fedualism) ही था। इस प्रथा का तात्पर्य यह था कि राजा कुछ विशेष सेवाओं और करों के बदले अपने राज्य की भूमि बड़े-बड़े जागीरदारों अथवा सामन्तों (Feuda. Lords) में बाँट देता था। धीरे-धीरे ये सामन्त काफी शक्तिशाल हो गए और इन्होंने राजा की निरंकुशता पर एक बन्धन-सा लग दिया।
4.जनसाधारण का राज्य कार्य में कोई विशेष भाग होना : मध्ययुग में साधारण जनता का देश के शासन-कार्य ं कोई विशेष हाथ न था। सारी शक्ति राजा, सामन्तवर्ग तथा पादं वर्ग (Clergy) में बँटी हुई थी।

प्रश्न 15, चौदहवीं सदी का संकट क्या था? इसे सामाजिक असंतोष कैसे उपजा ?
उत्तर : चौदहवीं सदी के प्रारम्भ तक, यूरोप का आर्थिक विस्तार शिथिल पड़ गया। इसके तीन कारण थे- उत्तरी यूरोप में, तेरहवीं सदी के अंत तक पिछले तीन सौ की तेज़ ग्रीष्म ऋतु का स्थान तीव्र ठंडी ऋतु ने ले लिया था |
पैदावार वाले मौसम छोटे हो गए थे और ऊंची भूमि पर फ़सल उगाना कठिन हो गया। तूफ़ानों और महासागरीय बाढ़ों ने अनेक फ़ार्म प्रतिष्ठानों को नष्ट कर दिया जिसके परिणामस्वरूप सरकार को करों द्वारा कम आय हुई। तेरहवीं सदी के पूर्व की अनुकूल जलवायु द्वारा प्रदान किए गए अवसरों के कारण अनेक जंगल और चरागाह कृषि भूमि में बदल गए, परन्तु गहन जुताई ने फ़सलों के तीन क्षेत्रीय फ़सल-चक्र के प्रचलन के बावजूद भूमि को कमजोर बना दिया। फसलों में अंतर रखने के साथ-साथ उचित भू-संरक्षण के अभाव में ऐसा हुआ था। चारागाहों की कमी के कारण पशुओं की संख्या में कमी आ गई। जनसंख्या वृद्धि ने संसाधनों को भी पीछे छोड़ दिया था जिसका तात्कालिक परिणाम था अकाल। 1315 और 1317 के बीच यूरोप में भयंकर अकाल पड़े। इसके पश्चात् 1320 के दशक में अनगिनत पशुओं की मौतें हुई।
बारहवीं व तेरहवीं सदी में जैसे-जैसे वाणिज्य का विस्तार हुआ तो दूर देशों से व्यापार करने वाले पोत यूरोपीय तटों पर आने लगे। पोतों के साथ-साथ चूहे आए जो अपने साथ महामारी ब्यूबोनिक प्लेग का संक्रमण (Black death) लाए। पश्चिमी यूरोप, जो प्रारंभिक सदियों में अपेक्षाकृत अधिक अलग-थलग रहा था, 1347 और 1350 के मध्य महामारी से प्रभावित हो गया। आधुनिक आकलन के आधार पर यूरोप की आबादी का करीब 20% भाग काल-कवलित हो गया जबकि कुछ स्थानों पर मरने वालों की संख्या वहाँ की जनसंख्या का 40% तक थी।
व्यापार का केन्द्र होने के कारण, नगर सबसे अधिक प्रभावित हुए। बंद समुदाय में, जैसे मठों और आश्रमों में जब एक व्यक्ति प्लेग की चपेट में आ जाता था तो सबको इसे पकड़ने में देर नहीं लगती थी और प्रत्येक मामले में कोई भी नहीं बचता था। प्लेग, शिशुओं, युवाओं और वृद्धों को सबसे अधिक प्रभावित करता था। इस प्लेग के पश्चात् 1360 और 1370 में प्लेग की अपेक्षाकृत छोटी घटनाएँ हुई। यूरोप की जनसंख्या 1300 में 730 लाख से घटकर 1400 में 450 लाख हो गई।
सामाजिक असंतोष का उत्पन्न होना : इन संकटों से लाखों की आमदनी बुरी तरह प्रभावित हो गई। मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों की गिरावट ने अभिजात वर्ग की आमदनी को कम कर दिया। निराशा में उन्होंने उन धन अनुबंधों को तोड़ दिया जिसे उन्होंने हाल ही में अपनाया था और उन्होंने पुरानी मजदूरी सेवाओं को पुनः प्रचलित कर दिया। इसका कृषकों विशेषकर पढ़े-लिखे और समृद्ध कृषकों द्वारा हिंसक विरोध किया गया। 1323 में कृषकों ने फ्लैंडर्स (Flanders) में, 1358 में फ्रांस में और 1381 में इंग्लैण्ड में विद्रोह किए।
यद्यपि इन विद्रोहों का निर्दयतापूर्वक दमन कर दिया गया पर महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये विद्रोह अधिक हिंसक तरीकों से उन स्थानों पर हुए जहाँ पर आर्थिक विस्तार के कारण समृद्धि हुई थी। यह इस बात का संकेत था कि कृषक पिछली सदियों में होने वाले लाभों को बचाने का प्रयास कर रहे थे। तीव्र दमन के बावजूद मात्र कृषक विद्रोहों की तीव्रता ने यह सुनिश्चित कर दिया कि पुराने सामंती रिश्तों को पुनः लादा नहीं जा सकता। धन अर्थव्यवस्था (money economy) काफी अधिक विकसित थी जिसे पलटा नहीं जा सकता था। इसलिए, यद्यपि लार्ड विद्रोहों का दमन करने में सफल रहे, परन्तु कृषकों ने यह सुनिश्चित कर लिया कि दासता के पुराने दिन पुनः नहीं लौटेंगे।


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