Class 10 Geography Chapter 3 जल संसाधन

Index

Class 12th Geography

1. मानव भूगोल

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

2. विश्व जनसँख्या

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. जनसँख्या संघटन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. मानव विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

5. प्राथमिक क्रियाएं

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

6. द्वितीयक क्रियाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाकलाप

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. परिवहन एवं संचार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

9. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

सारांश:-

1. प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ:-

  • इलाहाबाद के नजदीक श्रिग्विरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को सुरक्षित करने के लिए जल संग्रहण तंत्र।
  • चंद्रगुप्त मौर्य के समय बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण।
  • कलिंग, नागार्जुन कोडा, बेन्नुर और कोल्हापुर में सिंचाई तंत्र।
  • कृत्रिम झील – भोपाल झील, 11वीं शताब्दी में बनाई गई।
  • इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज़ खास बनवाया।

2. बाँध:-
बाँध बहते जल को रोकने, दिशा देने, बहाव कम करने के लिए खड़ी की गई बाधा है जो आमतौर पर जलाशय, झील अथवा जलभरण बनाती है।

  • बाँधों का वर्गीकरण उनकी संरचना और उद्देश्य या ऊँचाई के अनुसार।
  • संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर बाँधों को लकड़ी के बाँध, तटबंध बाँध या पक्का बाँध में विभाजन।
  • ऊँचाई के अनुसार बाँध को बड़े बाँध और मुख्य बाँध या नीचे बाँध, माध्यम बाँध और उच्च बाँधों में वर्गीकृत।

3. वर्षा जल संग्रहण:-

  • पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में लोगों ने गुल अथवा कुल जैसी वाहिकाएँ बनाई।
  • गुल या कुल में नदी की धारा का रास्ता बदला जाता था। छत वर्षा जल संग्रहण करना।
  • बाढ़ जल बाहिकाएँ बनाना। – गढ्ढे बनाना।
  • राजस्थान के ज़िले जैसलमेर में खादीन और जोहड़ बनाना।
  • टाँका या भूमिगत टैंक-पीने का पानी संग्रहित करने के लिए।
  • बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में।
  • आकार एक कमरे जितना।
  • छत का पानी पीने के लिए संग्रहित।
  • वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में उपयोग।
  • वर्षा जल को पालर पानी कहना।
  • टाँकों के साथ भूमिगत कमरे गर्मी से राहत देते थे।
  • कुछ घरों में टाँका आज भी मौजूद क्योंकि नल के पानी का उन्हें स्वाद पसंद नहीं।
  • गंडायूर गाँव में छत वर्षा जल संग्रहण

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें:-
1. प्राचीन भारत में बनी जलीय कृतियों का विवरण दें।
2. बाँध किसे कहते हैं? बाँधों का वर्गीकरण किस आधार पर किया जाता हैं?
3. वर्षा जल संग्रहण के विभिन्न तरीके बताओ।
4. कुल या गुल भारत के किस हिस्से में प्रचलित थे?
5. राजस्थान में कौन से विभिन्न तरीकों से वर्षा जल संग्रहण होता है?
6. टाँका क्या है? यह कहाँ और क्यों बनाएँ जाते थे?
7. वर्षा का पहला जल क्यों एकत्रित नहीं किया जाता था?
8. टाँके के साथ भूमिगत कमरे क्यों बनाए जाते थे?

उत्तर

1. प्राचीन भारत में बनी जलीय कृतियों का विवरण इस प्रकार है:–

  • इलाहाबाद के नजदीक श्रिग्विरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को सुरक्षित करने के लिए जल संग्रहण तंत्र।
  • चंद्रगुप्त मौर्य के समय बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण।
  • कलिंग, नागार्जुन कोडा, बेन्नुर और कोल्हापुर में सिंचाई तंत्र।
  • कृत्रिम झील – भोपाल झील, 11वीं शताब्दी में बनाई गई।
  • इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज़ खास बनवाया।

2. बाँध एक अवरोध है जो जल को बहने से रोकता है और एक जलाशय बनाने में मदद करता है। इससे बाढ़ आने से तो रुकती ही है, जमा किये गया जल सिंचाई, जल विद्युत, पेय जल की आपूर्ति, नौवहन आदि में भी सहायक होती है। बांधों का वर्गी करें उनकी संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर किया जाता है। बाधों को लकड़ी के बांध, पक्का बांध तटबंध बांध के वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

3. शहरी क्षेत्रों में वर्षा के जल को संचित करने के लिए बहुत सी संचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्र में वर्षा जल का संचयन वाटर शेड को एक इकाई के रूप लेकर करते हैं। आमतौर पर सतही फैलाव तकनीक अपनाई जाती है क्योंकि ऐसी प्रणाली के लिए जगह प्रचुरता में उपलब्ध होती है तथा पुनर्भरित जल की मात्रा भी अधिक होती है। ढलान, नदियों व नालों के माध्यम से व्यर्थ जा रहे जल को बचाने के लिए इन तकनीकों को अपनाया जा सकता है। गली प्लग, परिरेखा बांध (कंटूर बंड), गेबियन संरचना, परिस्त्रवण टैंक (परकोलेशन टैंक), चैक बांध/सीमेन्ट प्लग/नाला बंड, पुनर्भरण शाफ्‌ट, कूप डग वैल पुनर्भरण, भूमि जल बांध/उपसतही डाईक, आदि। ग्रामीण क्षेत्रों में छत से प्राप्त वर्षाजल से उत्पन्न अप्रवाह संचित करने के लिए भी बहुत सी संरचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है। शहरी क्षेत्रों में इमारतों की छत, पक्के व कच्चे क्ष्रेत्रों से प्राप्त वर्षा जल व्यर्थ चला जाता है। यह जल जलभृतों में पुनर्भरित किया जा सकता है व ज़रूरत के समय लाभकारी ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है। वर्षा जल संचयन की प्रणाली को इस तरीके से अभिकल्पित किया जाना चाहिए कि यह संचयन/इकट्‌ठा करने व पुनर्भरण प्रणाली के लिए ज्यादा जगह न घेरे। शहरी क्षेत्रों में छत से प्राप्त वर्षा जल का भण्डारण करने की कुछ तकनीके इस प्रकार से हैं। पुनर्भरण पिट (गड्ढा), पुनर्भरण खाई, नलकूप और पुनर्भरण कूप, आदि।

4. कुल या गुल भारत के पश्चिमी हिमालय/ पर्वतीय क्षेत्र में प्रचलित थे।

5. राजस्थान का एक बहुत बड़ा भाग मरुस्थल है।इसलिए यहाँ पानी का अभाव सदा ही एक समस्या बना रहता है। इस तथ्य को सामने रखते हुए वहां के विभिन्न शासकीय ने एक प्रकार की राशियों का निर्माण करके इस समस्या को दूर करने का प्रयत्न किया। आज भी बहुत से जलाशय हमें राजस्थान के विभिन्न भागों में देखने को मिल जाते हैं। राजस्थान में कुछ मानव निर्मित झीलें और सरोवर इस प्रकार है ज्ञानदत्त के परमार राजा भोज द्वारा निर्मित भोपाल ताल उदयपुर में पिछोला और उदयसागर जैसलमेर में गडसीसर,अजमेर में अनासागर जयपुर के निकट जयगढ़ का किला जल संग्रहण और तथा अभियांत्रिकी का उत्तम नमूना प्रस्तुत करता है। यह प्रयत्न समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं और हमारी विरासत का एक महत्वपूर्ण पहलू है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए राजस्थान में अनेक बावलियों का निर्माण किया गया है। ऐसी अनेक बावलियां आज भी राजस्थान के अनेक नगरों एवं कस्बों में देखे जा सकते हैं। इनमें से कुछ बावनी है तो अनेक मंजिलों वाले हैं और उनकी भीतरी भाग अनेक मूर्तियों तथा अन्य अलंकारों से सुसज्जित किए गए हैं।

6. राजस्थान के अर्ध शुष्क और शुष्क क्षेत्रों विशेषकर बीकानेर,फलोदी और बाड़मेर में लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिका टैंक का निर्माण करवाया जाता है। इन्हीं टंकियों को टांका कहते हैं।

7. वर्षा का पहला जल्द छतों और नालियों को साफ करने के लिए प्रयोग किया जाता है इसलिए उसको संग्रहीत नहीं किया जाता।

8. टाँके के साथ भूमिगत कमरे बनाए जाते थे क्योंकि जल का स्रोत इन कमरों को ठंडा रखता था।

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