Class 10 Civics Chapter 4 जाति, धर्म और लैंगिक मसले

सारांश:- 

लिंग:- श्रम का लैंगिक विभाजन:– काम का वह विभाजन जिसके अंदर घर के अंदर का सारा काम घर की औरतें करती हैं।

नारीवादी आंदोलन:– जिन आंदोलनों के द्वारा नारी के जीवन में व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में बराबरी की मांग उठाई गई उन आंध्र लोगों को नारीवादी आंदोलन कहते हैं।

समाज में महिलाओं की भूमिका :– 

१. यह प्रचलित विश्वास है या चलन है कि औरतों का काम केवल बच्चों की देखभाल करना और घर की देखभाल करना है।
२. उनके कार्य को ज्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता है।
३. आबादी में औरतो का हिस्सा आता है परंतु राजनीतिक जीवन या सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका न के बराबर ही है। 
૪. नारीवादी आंदोलनों की आवश्यकता औरतों की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए,शिक्षा के लिए, मतदान के लिए महिलाओं की राजनीतिक स्थिति एवं सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए है।इन आंदोलनों में महिलाओं के राजनीतिक और वैधानिक दर्जें को ऊँचा उठाने और उनके लिए शिक्षा तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने की माँग की गई मूलगामी बदलाव की माँग करने वाली महिला आंदोलनों ने औरतों के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भी बराबरी की माँग उठाई।

सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका का परिदृश्य बदल रहा है:–

१. आज सार्वजनिक जीवन के परिदृश्य में औरतों  की भूमिकाएं काफी बदल गई हैं। वे एक वैज्ञानिक, डॉक्टर, शिक्षक आदि के रूप में सार्वजनिक जीवन में भूमिका निभाती दिखाई देती  हैं।

२. सार्वजनिक जीवन में औरतों की भागीदारी फिनलैंड, स्वीडन, नार्वे जैसे देशों में अधिक है।

महिलाओं के साथ भेदभाव तथा अत्याचार होते हैं:–

 महिलाओं में साक्षरता की दर 54% है जबकि पुरुषों में 76% । इसी प्रकार अब भी स्कूल पास करने वाली लड़कियों की एक सीमित संख्या ही उच्च शिक्षा की ओर कदम कदम बढ़ा पाई है क्योंकि माँ बाप लड़कियों की जगह लड़कों की शिक्षा पर ज्यादा खर्च करना पसंद करते हैं। पहुंचे पदों तक बहुत ही कम महिलाएं पहुंच पाई है।

उच्च भुगतान अनुपात में औरतों की संख्या बहुत ही कम है।अभी महिला सांसदों की लोकसभा में संख्या 100% तक नहीं पहुंची और प्रांतीय विधानसभाओं में उनकी संख्या 50% से भी कम है।महिलाओं को ज्यादातर काम पैसे के लिए नहीं मिलते, पुरुषों की अपेक्षा उनको मजदूरी भी कम मिलती है,भले ही दोनों ने समान कार्य किया हो। लड़की का जन्म परिवार पर एक बोझ समझा जाता है क्योंकि उसे जन्म से लेकर मृत्यु तक परिवार को कुछ न कुछ देना ही पड़ता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों से भेदभाव किया जाता है। जहां लड़कों को जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई काम सिखाया जाता है वही लड़कियों को रसोई तक ही सिमित रखा जाता है।

पितृ प्रधान समाज – हमारा समाज पुरूष प्रधान समाज है। दिन प्रति महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, इसके बावजूद महिलाएँ अभी पीछे हैं। इसलिए हमारे समाज को पितृ प्रधान समाज माना जाता है।

निजी और सार्वजनिक विभाजन

  • श्रम के लैंगिक विभाजन अधिकतर महिलाएँ अपने घरेलू काम के अतिरिक्त अपनी आमदनी के लिए कुछ न कुछ काम करती हैं लेकिन उनके काम को ज्यादा मूल्यवान नहीं माना जाता और उन्हें दिन रात काम करके भी उसका श्रेय नहीं मिलता।
  • मनुष्य जाति की आबादी में औरतों का हिस्सा आधा है पर सार्वजनिक जीवन में खासकर राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य ही है।
  • विभिन्न देश में महिलाओं को वोट का अधिकार प्रदान करने के लिए आंदोलन हुए। इन आंदोलनों को नारीवादी आंदोलन कहा जाता है।

जीवन के विभिन्न पहलू जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेदभाव होता है वे निम्नलिखित हैं:–

१. समाज में महिलाओं का निम्न स्थान- भारतीय समाज में महिला को सदा पुरुष के दिन ही रखा गया है उससे कभी भी स्वतंत्र रूप से रहने का अवसर नहीं दिए गए हैं।

२. बालिकाओं के प्रति उपेक्षा -आज भी बालिकाओं की अनेक प्रकार से अवहेलना की जाती है लड़के के जन्म पर आज भी सभी बड़े खुश होते हैं और अन्य जेसन बनाते हैं परन्तु लड़की के जन्म पर परिवार में चुपचाप हो जाता है दूसरी लड़की का जन्म परिवार पर एक बोझ समझा जाता क्योंकि उसे जन्म से लेकर मिलते हैं तो परिवार को कुछ न कुछ देना ही पड़ता है तीसरे शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कियों से भेदभाव किया जाता है चौथे जबकि लड़कों का जीवन यापन के लिए कोई न कोई काम सिखाया जाता है लड़कियों को रसोई तक ही सीमित रखा जाता है।

  • साक्षरता दर के आधार पर
  • ऊँची तनख्वाह वाले और ऊँचे पदों पर पहुँचने वाली महिलाओं की संख्या कम है।
  • महिलाओं के घर के काम को मूल्यवान नहीं माना जाता।
  • पुरूषों की तुलना में कम मजदूरी
  • लड़की को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर देना।
  • महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और उन पर होने वाली हिंसा।

​ सांप्रदायिकता:-अपने धर्म को ऊंचा समझना तथा दूसरे धर्मों को नीचा समझना और अपने धर्म से प्यार करना और दूसरे धर्मों से घृणा करने की प्रवृत्ति को सांप्रदायिकता कहते हैं।ऐसी भावना आप से जंगलों का मुख्य कारण बन जाती है और इस प्रकार प्रजातंत्र के मार्ग में एक बड़ी बाधा उपस्थित हो जाती है देश का बटवारा इसी भावना का परिणाम था। इस बुराई को निम्नलिखित विधियों से दूर किया जा सकता है:–

१. शिक्षा द्वारा–शिक्षा के पाठ्यक्रम में सभी धर्मों की अच्छा है बताया जाए और विद्यार्थियों को सहिष्णुता एवं सभी धर्मों के प्रति आदर भाव सिखाया जाए।

२. प्रचार द्वारा- समाचार-पत्र रेडियो टेलीविजन आदि से जनता को धार्मिक सहिष्णुता की शिक्षा दी जाए।

धर्म और सांप्रदायिकता और राजनीति

  • लैंगिक विभाजन के विपरीत धार्मिक विभाजन अक्सर राजनीति के मैदान में अभिव्यकत होता है।
  • धार्मिक विभाजन को सम्प्रदायवाद कहते हैं। सम्प्रदायवाद के कारण देश में झगड़े होते हैं और शांति भंग होती है।ऐसे वातावरण में लोकतंत्र पनप नहीं सकता है।
  • समुदायवाद के कारण देश के अंदर घृणा व मतभेद उत्पन्न होते हैं और देश की एकता समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार लोकतंत्र को खतरा पैदा हो जाता है।
  • जब एक धर्म के विचारों को दूसरे से श्रेष्ठ माना जाने लगता है और कोई एक धार्मिक समूह अपनी माँगों को दूसरे समूह के विरोध में खड़ा करने लगता है। इस प्रक्रिया में जब राज्य अपनी सत्ता का इस्तेमाल किसी एक धर्म के पक्ष में करने लगता है तो स्थिति और विकट होने लगती है। राजनीति से धर्म और इस तरह जोड़ना ही सांप्रदायिकता या सम्प्रदायवाद है।
  • लोकतंत्र की सफलता का आधार है जनता में सहनशीलता, साझेदारी, बंधुत्व, सभी के विचारों के प्रति सहिष्णुता आदि। परन्तु सम्प्रदायवाद के कारण इन सभी के मार्ग में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

सांप्रदायिकता के रूप

  • एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ मानना।
  • अलग राजनीतिक इकाई बनाने की इच्छा।
  • धर्म के पवित्र प्रतिकों, धर्मगुरूओं की भावनात्मक अपीलों का प्रयोग।
  • संप्रदाय के आधार पर हिंसा, दंगा और नरसंहार

धर्मनिरपेक्ष शासन

  • भारत का संविधान किसी धर्म को विशेष दर्जा नहीं देता।
  • किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने की आजादी।
  • धर्म के आधार पर किए जाने वाले किसी तरह के भेदभाव को अवैधानिक घोषित।
  • शासन को धार्मिक मामलों में दखल देने का अधिकार
  • संविधान में किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का निषेध किया गया है।

जातिवाद:–

जाति प्रथा आज भी भारतीय समाज का अभिन्न अंग है। समय समय पर इसमें अनेक बदलाव आते गए और अनेक सुधार को नहीं से सुधारने का प्रयत्न किया।भारतीय संविधान ने किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव का निश्चित किया है और जाति व्यवस्था से पैदा होने वाले अन्याय को समाप्त करने पर जोर दिया है। परन्तु इतना सब कुछ होने पर भी समकालीन भारत से जाति प्रथा विदा नहीं हुई है जाति व्यवस्था के कुछ पुराने पहलू आज भी विद्यमान है।अभी भी अधिकतर लोग अपनी जाति या कबीले नहीं विवाह करते हैं सदियों से जिन जातियों का पढ़ाई लिखाई के क्षेत्रों में प्रभुत्व स्थापित था वह आज भी है और आधुनिक शिक्षा में उन्हीं का बोल बाला है। जिन जातियों को पहले शिक्षा से वंचित रखा गया था उनके सदस्य अभी तक स्वाभाविक रूप से पिछड़े हुए हैं। जिन लोगों का आर्थिक क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित था वे आज भी थोड़े बहुत अंतर के बाद मौजूद है। जाति और आर्थिक हैसियत मे काफी निकट का संबंध माना जाता है। देश में सवैधानिक प्रावधान के बावजूद युवा छोटी प्रथा अभी पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है।

राजनीति में जाति

  • चुनाव क्षेत्र के मतदाताओं की जातियों का हिसाब ध्यान में रखना
  • समर्थन हासिल करने के लिए जातिगत भावनाओं को उकसाना।
  • देश के किसी भी एक संसदीय चुनाव क्षेत्र में किसी एक जाति के लोगों का बहुमत नहीं है।
  • कोई भी पार्टी किसी एक जाति या समुदाय के सभी लोगों का वोट हासिल नहीं कर सकती।

प्रश्न
1.
 लैंगिक विभाजन का क्या अर्थ है?
2. नारीवाद का क्या अर्थ हैं?
3. सांप्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?
4. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को धर्म निरपेक्ष बनाते है।
5. लैंगिक श्रम विभाजन का क्या अर्थ है?
6. विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दें और सबके साथ एक – एक उदाहरण भी दें।

उत्तर:–

1. लैंगिक विभाजन का अर्थ है बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात।

2. नारीवाद का अर्थ होता है पुरुष और महिला के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास रखने वाले महिला या पुरुष।

3. चुनावी राजनीति में कई राजनेता विभिन्न धार्मिक समुदायों का सहारा लेते हैं चुनाव जीतने के लिए इस को सांप्रदायिक राजनीति कहा जाता है।

4. भारत को धर्म निर्देश बनाने वाले दो प्रावधान निम्नलिखित है:–

१. यह धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।

२. किसी धर्म समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।

5. काम के बंटवारे का ऐसा करेगा जिसमें घर के अंदर के सारे कार्य परिवार की ओर से करती हैं या अपनी देख रेख मे नौकरों या नौकरानियों से करती हैं। इसी को श्रम का लैंगिक विभाजन कहते हैं।

6. विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा इस प्रकार है:–

१. सांप्रदायिकता से प्रेरित व्यक्ति अपने धर्म को औरों के धर्म से श्रेष्ठ मानने लगता है। अनेक धर्म गुरुओं को अपने अपने धर्मों का गुडगाँव करते हुए हमने अक्सर देखा होगा वह अपने धर्म के पक्ष में पुल बांध देते हैं।

२. सांप्रदायिक विचारधारा सना इस्प्रेट में रहती है कि उनका अपना धर्म किसी न किसी ढंग से अपना प्रभुत्व स्थापित कर ले। जो लोग बहुसंख्यक होते हैं उनका यही प्रयत्न रहता है कि वे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर बहुसंख्या के बाद थोक दें जो संसदीय परंपराओं के सदा विरुद्ध होता है। ऐसा श्रीलंका में हो रहा है।

३. चुनावी राजनीति में कई राजनेता विभिन्न धार्मिक समुदायों की धार्मिक भावनाओं से खेलते हुए उन्हें उल्लू बनाने का प्रयत्न करते हैं और सीधे- सीधे लोग उनके बहकावे में आ जाते हैं। 

૪. कई बार सांप्रदायिक राजनीति सबसे गन्दा रूप ले लेती है जो वे धर्म और संप्रदाय के आधार पर लोगों में आपसी दंगे तक करवा देती है जिसमें हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं। कुछ ऐसा ही 1947 ई. में देश के विभाजन के समय हुआ जब हजारों लोग घटिया साम्प्रदायिक राजनीति का शिकार हुए।

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