Class 10 History Chapter 5 औद्योगीकरण का युग

पूर्व औद्योगीकरण: यूरोप में सबसे पहले कारखाने लगने के पहले के काल को पूर्व औद्योगीकरण का काल कहते हैं। इस अवधि में शहर के व्यापारी गाँवों में बने हुए सामान खरीदते थे।

व्यापारियों का गाँवों पर ध्यान देने का कारण: शहरों में जो ट्रेड और क्राफ्ट गिल्ड होते थे वे काफी शक्तिशाली होते थे। इस तरह के संगठन प्रतिस्पर्धा और कीमतों पर अपना नियंत्रण रखते थे और नये लोगों को बाजार में काम शुरु करने से भी रोकते थे। इसलिए व्यापारियों के लिए शहरों में नया व्यवसाय शुरु करना मुश्किल होता था। इसलिए वे शहरों की बजाय गाँवों पर ज्यादा ध्यान देते थे।

ब्रिटेन में पूर्व औद्योगीकरण के लक्षण:

  • गाँवों के किसानों को व्यापारियों द्वारा पैसे दिये जाते थे। वे उन किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पाद बनाने के लिए प्रोत्साहित करते थे।
  • गाँवों में जमीन की कमी होती जा रही थी। बढ़ती हुई जनसंख्या की जरूरतें जमीन के छोटे टुकड़ों से पूरी नहीं होती थी। किसानो आय के अतिरिक्त साधनों की तलाश में रहते थे।
  • पूर्व औद्योगीकरण के समय एक प्रकार से विनिमयों का जाल फैला हुआ था; जिसे व्यापारी लोग नियंत्रित करते थे। सामान का उत्पादन वैसे किसानों द्वारा किया जाता था जो कारखानों की बजाय अपने खेतों में काम करते थे। अंतिम उत्पाद कई चरणों से गुजरता हुआ लंदन के बाजारों तक पहुँचता था। लंदन से इन उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भेजा जाता था।

कारखानों की शुरुआत: इंगलैंड में कारखाने सबसे पहले 1730 के दशक में बनना शुरु हुए। अठारहवीं सदी के आखिर तक पूरे इंगलैड में जगह जगह कारखाने दिखने लगे। 1760 में ब्रिटेन में 2.5 मिलियन पाउंड का कपास आयातित होता था। 1787 तक यह मात्रा बढ़कर 22 मिलियन पाउंड हो गई थी।

कारखानों से लाभ: कारखानों ने श्रमिकों की कार्यकुशलता को बढ़ा दिया। नई मशीनों की सहायता से एक श्रमिक ज्यादा अधिक मात्रा में बेहतर उत्पाद बना सकता था। औद्योगीकरण मुख्य रूप से सूती कपड़ा उद्योग में हुआ। श्रमिकों की निगरानी और उनसे काम लेना गाँवों की तुलना में कारखानों में अधिक आसान हो गया।

औद्योगिक परिवर्तन की गति: ब्रिटेन में सूती कपड़ा और धातु उद्योग सबसे गतिशील उद्योग थे। औद्योगीकरण के पहले दौर में (1840 के दशक तक) सूती कपड़ा उद्योग अग्रणी क्षेत्रक था। रेलवे के प्रसार के बाद लोहा इस्पात उद्योग में तेजी से वृद्धि हुई। रेल का प्रसार इंगलैंड में 1840 के दशक में हुआ और उपनिवेशों में यह 1860 के दशक में हुआ। 1873 आते आते ब्रिटेन से लोहा और इस्पात के निर्यात की कीमत 77 मिलियन पाउंड हो गई। यह सूती कपड़े के निर्यात का दोगुना था।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक पूरे कामगारों का 20% से भी कम तकनीकी रूप से उन्नत औद्योगिक क्षेत्रक में नियोजित था। इससे यह पता चलता है कि नये उद्योग पारंपरिक उद्योगों को विस्थापित नहीं कर पाये थे।

सूती कपड़ा और धातु उद्योग पारंपरिक उद्योगों में बदलाव नहीं ला पाये। लेकिन पारंपरिक उद्योगों में भी कई परिवर्तन हुए जो बड़े ही साधारण से दिखने वाले लेकिन नई खोजों के कारण हुए। इस तरह के उद्योगों के उदाहरण हैं; खाद्य संसाधन, भवन निर्माण, बर्तन निर्माण, काँच, चमड़ा उद्योग, फर्नीचर, आदि।

नई तकनीकों को पैर जमाने में काफी वक्त लगा। मशीनों की ऊँची कीमत और महंगे मरम्मत के कारण व्यापारी और उद्योगपति नई मशीनों से दूर ही रहना पसंद करते थे। नई मशीनें उतनी भी कुशल नहीं थी जैसा कि उनके आविष्कारकों या निर्माताओं द्वारा दावा किया जाता था।

इतिहासकार इस बात को मानते हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य का एक आम श्रमिक कोई मशीन चलाने वाला नहीं बल्कि एक पारंपरिक कारीगर या श्रमिक होता था।

मानव शक्ति और भाप की शक्ति: उस जमाने में श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी। श्रमिकों की अच्छी आपूर्ति के कारण श्रमिकों की कमी या अधिक पारिश्रमिक जैसी कोई समस्या नहीं थी। इसलिए व्यापारी और उद्योगपति महंगी मशीनों में पूँजी लगाने की अपेक्षा श्रमिकों से काम लेना बेहतर समझते थे।

मशीन से बनी चीजें एक ही जैसी होती थीं और वे हाथ से बनी चीजों की गुणवत्ता और सुंदरता का मुकाबला नहीं कर सकती थीं। उच्च वर्ग के लोग हाथ से बनी हुई चीजों को अधिक पसंद करते थे।

लेकिन उन्नीसवीं सदी के अमेरिका में स्थिति कुछ अलग थी। वहाँ पर श्रमिकों की कमी होने के कारण मशीनीकरण ही एकमात्र रास्ता बचा था।

श्रमिकों का जीवन: काम की तलाश में भारी संख्या में लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे थे। नौकरी मिलना इस बात पर निर्भर करता था कि किसी के कितने अधिक दोस्त या रिश्तेदार पहले से ही वहाँ काम पर लगे हैं। जिन लोगों की शहरों में जान पहचान नहीं होती थी उन्हें नौकरी मुश्किल से मिलती थी। कई लोगों को नौकरी पाने के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था। ऐसे लोगों को अपनी रातें पुलों या रैन बसेरों में बितानी पड़ती थी। कई निजी लोगों ने भी रैन बसेरे बनवाये थे। गरीबों के लिए बनी पूअर लॉ अथॉरिटी ऐसे लोगों के लिए कैजुअल वार्ड की व्यवस्था करती थी।

कई नौकरियाँ साल के कुछ गिने चुने महीनों में ही मिलती थीं। जैसे ही वे व्यस्त महीने समाप्त हो जाते थे तो बेचारे गरीब फिर से सड़क पर आ जाते थे। उनमें से कुछ तो अपने गाँव लौट जाते थे लेकिन ज्यादातर शहर में ही रुक जाते थे ताकि छोटे मोटे काम पा सकें।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में पारिश्रमिक में थोड़ा सा इजाफा हुआ था। लेकिन विभिन्न क्षेत्रकों के आँकड़े प्राप्त करना मुश्किल है क्योंकि उनमें हर साल काफी उतार चढ़ाव होता था। किसी भी श्रमिक के जीवन स्तर पर नियोजन की अवधि का पूरा असर पड़ता था। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अच्छे दौर में भी शहरों की आबादी का लगभग 10% अत्यधिक गरीब हुआ करता था। आर्थिक मंदी के दौर में बेरोजगारी बढ़कर 35 से 75% के बीच हो जाती थी।

कई बार बेरोजगारी के डर से श्रमिक लोग नई तकनीक का जमकर विरोध करते थे। उदाहरण के लिए जब स्पिनिंग जेनी को लाया गया तो महिलाओं ने इन नई मशीनों को तोड़ना शुरु किया क्योंकि वे हाथ से कताई करके अपना गुजारा करती थीं।

1840 के दशक के बाद शहरों में भवन निर्माण में तेजी आई। इससे रोजगार के नये अवसर उदित हुए। 1840 में यातायात के क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या दोगुनी हो गई जो आने वाले तीस वर्षों में फिर से दोगुनी हो गई।

भारत में कपड़ा उद्योग का युग: अठारहवीं सदी के मध्य तक ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपना बिजनेस जमा लिया था। इस अवधि में व्यापार के तब तक रह चुके केंद्रों (जैसे सूरत और हुगली) का पतन हो चुका था। इसी दौरान व्यापार के नये केंद्रों (जैसे कलकत्ता और बम्बई) का उदय हुआ।

जब एक बार ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपनी राजनैतिक प्रभुता स्थापित कर ली तो इसने व्यापार पर अपने एकाधिकार को जताना शुरु कर दिया।

कम्पनी ने कपड़ा व्यवसाय से जुड़े हुए तत्कालीन व्यापारियों और दलालों को उखाड़ना शुरु किया। इसने बुनकरों पर सीधा नियंत्रण बनाने की कोशिश की। इस काम के लिए लोगों को वेतन पर रखा गया। ऐसे लोगों को गुमाश्ता कहा जाता था। गुमाश्ता का काम था बुनकरों के काम की निगरानी करना, आने वाले माल का संग्रहण करना और कपड़े की क्वालिटी की जाँच करना।

कम्पनी यह कोशिश भी करती थी कि बुनकर किसी दूसरे ग्राहक के साथ डील न कर लें। इस काम को एडवांस के सिस्टम द्वारा पुख्ता किया जाता था। इस सिस्टम के तहत बुनकरों को कच्चे माल खरीदने के लिए कर्ज दिया जाता था। जब कोई बुनकर कर्ज ले लेता था तो फिर वह किसी अन्य व्यापारी को अपना माल नहीं बेच सकता था।

एडवांस के इस नये सिस्टम ने बुनकरों के लिए कई समस्याएँ खड़ी कर दी। पहले वे अपने खेतों पर कुछ अनाज उगाया करते थे जिससे उनके परिवार का काम चल जाता था। अब उनके पास खेती के लिए समय ही नहीं बचता था और अपनी जमीन काश्तकारों को देनी पड़ती थी।

पारंपरिक व्यापारियों के विपरीत गोमाश्ता बाहरी आदमी होता था जिसका गाँव में कोई नातेदार रिश्तेदार नहीं होता था। वह सिपाहियों और चपरासियों के साथ आता था और समय पर काम न पूरा होने की स्थिति में बुनकरों को दंड भी देता था। गोमाश्ता अक्सर हेकड़ी दिखाया करता था। गाँवों में कई बार गोमाश्ता और बुनकरों के बीच लड़ाई हो जाती थी।

एडवांस के सिस्टम के कारण कई बुनकर कर्ज के जाल में फँस गये। कर्णाटक और बंगाल के कई स्थानों पर तो बुनकर अपने गाँव छोड़कर दूसरे गाँवों में चले गये ताकि अपना करघा लगा सकें। कई बुनकरों ने एडवांस लेने से मना कर दिया, अपनी दुकान बंद कर दी और खेती करने लगे।

मैनचेस्टर का भारत में प्रकोप: उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही भारत से कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी। 1811 – 12 में भारत से होने वाले निर्यात में सूती कपड़े की हिस्सेदारी 33% थी जो 1850 – 51 आते आते मात्र 3% रह गई।

ब्रिटेन के निर्माताओं के दबाव के कारण सरकार इंपोर्ट ड्यूटी लग्गा दी ताकि इंगलैंड में सिर्फ वहाँ बनने वाली वस्तुएँ ही बिकें। उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी पर भी इस बात के लिए दबाव डाला कि वह ब्रिटेन में बनी चीजों को भारत के बाजारों में बेचे। अठारहवीं सदी के अंत तक भारत में सूती कपड़ों का आयात न के बराबर था। लेकिन 1850 आते-आते कुल आयात में 31% हिस्सा सूती कपड़े का था। 1870 के दशक तक यह हिस्सेदारि बढ़कर 70% हो गई।

भारत में हाथ से बने सूती कपड़ों की तुलना में मशीन से बने हुए कपड़े अधिक सस्ते थे। इसलिए ब्रिटेन से होने वाले आयात के मुकाबले यहाँ के बुनकरों का मार्केट शेअर गिर गया। 1850 का दशक आते आते भारत के सूती कपड़े के अधिकांश केंद्रों में भारी गिरावट आ गई।

1860 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका में गृह युद्ध शुरु हो चुका था। इसलिए वहाँ से ब्रिटेन को मिलने वाले कपास की सप्लाई बंद हो चुकी थी। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन को भारत की ओर मुँह करना पड़ा। उससे भारत के बुनकरों के लिए कच्चे कपास की भारी कमी हो गई।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक भारत में भी सूती कपड़े के कारखाने खुलने लगे। भारत के पारंपरिक सूती कपड़ा उद्योग के लिए यह किसी आखिरी आघात से कम न था।

भारत में कारखानों की शुरुआत: बम्बई में पहला सूती कपड़ा मिल 1854 में बना और उसमें उत्पादन दो वर्षों के बाद शुरु हो गया। 1862 तक चार मिल चालू हो गये थे। उसी दौरान बंगाल में जूट मिल भी खुल गये। कानपुर में 1860 के दशक में एल्गिन मिल की शुरुआत हुई। अहमदाबाद में भी इसी अवधि में पहला सूती मिल चालू हुआ। मद्रास के पहले सूती मिल में 1874 में उत्पादन शुरु हो चुका था।

शुरु के व्यवसायी: कई बिजनेस ग्रुप का इतिहास में चीन के साथ होने वाला व्यापार छुपा हुआ है। अठारहवीं सदी के आखिर से ब्रिटिश ने भारत अफीम का निर्यात चीन को करना शुरु किया और वहाँ से चाय का आयात करना शुरु किया। इस काम में कई भारतीय व्यापारियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। वे पूँजी लगाते थे, माल मंगवाते थे और फिर माल को भेजते थे। जब उन व्यापारियों ने अच्छे पैसे कमा लिए तो वे भारत में औद्योगिक उपक्रम बनाने के सपने भी देखने लगे।

ऐसे लोगों में द्वारकानाथ टैगोर एक अग्रणी व्यक्ति थे जिन्होंने 1830 और 1840 के दशक में उद्योग लगाने शुरु किये। टैगोर का उद्योग 1840 के व्यापार संकट के दौर में तबाह हो गया। लेकिन उन्नीसवीं सदी के आखिरी दौर में कई व्यापारी सफल उद्योगपति हो गये। बम्बई में दिनशॉ पेटिट और जमशेदजी नसेरवनजी टाटा जैसे पारसी लोगों ने बड़े बड़े उद्योग स्थापित किये। कलकत्ता में पहला जूट मिल 1917 में एक मारवाड़ी उद्यमी सेठ हुकुमचंद द्वारा खोला गया था। इसी तरह से चीन से सफल व्यापार करने वालों ने बिड़ला ग्रुप को बनाया था।

बर्मा, खाड़ी देशों और अफ्रिका के व्यापार नेटवर्क के रास्ते भी पूँजी जमा की गई थी।

भारत के व्यवसाय पर ब्रिटिश लोगों का ऐसा शिकंजा था कि उसमें भारतीय व्यापारियों को बढ़ने के लिए अवसर ही नहीं थे। पहले विश्व युद्ध तक भारतीय उद्योग के के अधिकतम हिस्से पर यूरोप की एजेंसियों की पकड़ हुआ करती थी।

मजदूर कहाँ से आते थे?: ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों में आस पास के जिलों से मजदूर आते थे। इनमें से अधिकांश मजदूर आस पास के गाँवों से पलायन करके आये थे। फसल की कटाई और त्योहारों के समय वे अपने गाँव भी जाते थे ताकि अपनी जड़ों से भी जुड़े रहें।

कुछ समय बीतने के बाद, लोग काम की तलाश में अधिक दूरी तक भी जाने लगे। उदाहरण के लिए यूनाइटेड प्रोविंस के लोग भी बम्बई और कलकत्ता की तरफ पलायन करने लगे।

लेकिन काम मिलना आसान नहीं होता था। उद्योगपति अक्सर लोगों को काम पर रखने के लिए जॉबर की मदद लेते थे। अक्सर कोई पुराना और भरोसेमंद मजदूर जॉबर बन जाता था। जॉबर अक्सर अपने गाँव के लोगों को प्रश्रय देता था। वह उन्हें शहर में बसने में मदद करता था और जरूरत के समय कर्ज भी देता था। इस तरह से जॉबर एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गया था। वह लोगों से बदले में पैसे और उपहार माँगता था और मजदूरों के जीवन में भी दखल देता था।

औद्योगिक विकास का अनूठापन: यूरोप की मैनेजिंग एजेंसी कुछ खास तरह के उत्पादों में ही रुचि दिखाती थी। वे अपना ध्यान चाय और कॉफी के बागानों, खनन, नील और जूट पर लगाती थीं। ऐसे उत्पाद की जरूरत मुख्य रूप से निर्यात के लिए होती थी और उन्हें भारत में बेचा नहीं जाता था।

भारत के व्यवसायी यहाँ के बाजार में मैनचेस्टर के सामानों से प्रतिस्पर्धा से बचना चाहते थे। उदाहरण के लिए वे सूट के मोटे कपड़े बनाते थे जिनका इस्तेमाल या तो हथकरघा वाले करते थे या जिनका निर्यात चीन को होता था

बीसवीं सदी के पहले दशक तक औद्योगीकरण के ढ़र्रे पर कई बदलावों का प्रभाव पड़ चुका था। यह वह समय था जब स्वदेशी आंदोलन जोर पकड़ रहा था। औद्योगिक समूहों ने संगठित होना शुरु कर दिया था ताकि सरकार से अपने सामूहिक हितों की बात कर सकें। उन्होंने सरकार पर आयात शुल्क बढ़ाने और अन्य रियायतें देने के लिए दबाव डाला। यह वह समय था जब भारत से चीन को होने वाला भारतीय धागे का निर्यात घट रहा था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीनी और जापानी मिलों के उत्पाद ने चीन के बाजार को भर दिया था। भारतीय उत्पादकों ने सूती धागे को छोड़कर वस्त्र बनाने पर अधिक जोर दिया। 1900 और 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।

पहले विश्व युद्ध तक उद्योग के विकास की दर धीमी थी। युद्ध ने स्थिति बदल दी। ब्रिटेन की मिलें सेना की जरूरतें पूरा करने में व्यस्त हो गईं। इससे भारत में आयात घट गया। भारत की मिलों के सामने एक बड़ा घरेलू बाजार तैयार था। भारत की मिलों को ब्रिटेन की सेना के लिए सामान बनाने के लिए भी कहा गया। इससे उद्योग धंधे में तेजी आ गई।

युद्ध खत्म होने के बाद भी मैनचेस्टर यहाँ के बाजार में अपनी खोई हुई पकड़ दोबारा नहीं बना पाया। अब ब्रिटेन के उद्योग संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी और जापान से टक्कर लेने की स्थिति में नहीं थे।

लघु उद्योगों का वर्चस्व: उद्योग में वृद्धि के बावजूद अर्थव्यवस्था में बड़े उद्योगों का शेअर बहुत कम था। लगभग 67% बड़े उद्योग बंगाल और बम्बई में थे। देश के बाकी हिस्सों में लघु उद्योग का बोलबाला था। कामगारों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही रजिस्टर्ड कम्पनियों में काम करता था। 1911 में यह शेअर 5% था और 1931 में 10%|

बीसवीं सदी में हाथ से होने वाले उत्पाद में इजाफा हुआ। हथकरघा उद्योग में लोगों ने नई टेक्नॉलोजी को अपनाया। बुनकरों ने अपने करघों में फ्लाई शटल का इस्तेमाल शुरु किया। 1941 आते आते भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लग चुका था। त्रावणकोर, मद्रास, मैसूर, कोचिन और बंगाल जैसे मुख्य क्षेत्रों में तो 70 से 80% हथकरघों में फ्लाई शटल लगे हुए थे। इसके अलावा और भी कई नये सुधार हुए जिससे हथकरघा के क्षेत्र में उत्पादन क्षमता बढ़ गई थी।

बाजार में होड़: ग्राहकों को रिझाने के लिए उत्पादक कई तरीके अपनाते थे। ग्राहक को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन एक जाना माना तरीका है।

मैनचेस्टर के उत्पादक अपने लेबल पर उत्पादन का स्थान जरूर दिखाते थे। ‘मेड इन मैनचेस्टर’ का लबेल क्वालिटी का प्रतीक माना जाता था। इन लेबल पर सुंदर चित्र भी होते थे। इन चित्रों में अक्सर भारतीय देवी देवताओं की तस्वीर होती थी। स्थानीय लोगों से तारतम्य बनाने का यह एक अच्छा तरीका था।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक उत्पादकों ने अपने उत्पादों को मशहूर बनाने के लिए कैलेंडर बाँटने भी शुरु कर दिये थे। किसी अखबार या पत्रिका की तुलना में एक कैलेंडर की शेल्फ लाइफ लंबी होती है। यह पूरे साल तक ब्रांड रिमाइंडर का काम करता था।

भारत के उत्पादक अपने विज्ञापनों में अक्सर राष्ट्रवादी संदेशों को प्रमुखता देते थे ताकि अपने ग्राहकों से सीधे तौर पर जुड़ सकें।

सारांश –

संरक्षण तटकर – आयात की जाने वाली वस्तुओं पर उनके आयात को रोकने के लिए तटकर का लगाना। घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के उद्देश्य से किया जाता है। संरक्षण तटकर के द्वारा घरेलू वस्तुओं को विदेशी वस्तुओं की प्रतियोगिता से बचाने के लिए और स्थानीय निर्माताओं के हितों की रक्षा करने के लिए।

  • मुक्त व्यापार की नीति – अर्थशास्त्रिायों का कहना है कि विकास की गति तीव्र करने के लिए वाणिज्यवाद या मुक्त व्यापार की नीति अपनाई जानी चाहिए। सरकार को उद्योग एवं व्यापार में या तो बिल्कुल भी हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए या फिर कम से कम हस्तक्षेप ही करना चाहिए। इस सिद्धांत को 1776 में ब्रिटेन के अर्थशास्त्राी एइम स्थिम ने पेश किया था।
  • संरक्षण की नीति – नए उद्योगों को कठोर प्रतियोगिता से बचाने के लिए नीति को लागू करना।
  • शाही प्राथमिकता – ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटेन से भारत में आयात की जा रही वस्तुओं को विशेष सुविधाएँ एवं विशेषाधिकार प्रदान करना।
  • चैंबर ऑफ़ कॉमर्स – सामूहिक चिंता के मुद्दों पर फैसला लेने और व्यवसाय ठीक तरह से चला सके 19वीं सदी में इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए चैंबर ऑफ़ कॉमर्स की स्थापना की गई। भारत में पहला चैंबर मद्रास में खोला गया।
  • राष्ट्रवादी संदेश – भारतीय निर्माताओं के विज्ञापनों में राष्ट्रवादी संदेश साफ दिखाई देता था। उनका कहना था कि अगर राष्ट्र की परवाह करते हो तो उन चीजों को खरीदे जिन्हें, भारतीय ने बनाया हैं। विज्ञापन स्वदेशी वस्तुओं के राष्ट्रवादी संदेश के वाहक बन गये थे।

प्रश्न:-
1.
 ब्रिटेन ने संरक्षण तटकर नीति को अपनाना क्यों जरूरी समझा?
2. सरकार को उद्योग व व्यापार में दखल न देने के लिए अर्थशास्त्रिायों ने किस नीति को अपनाने का सुझाव दिया?
3. आदि औद्योगिकरण से क्या अभिप्राय हैं?
4. चैंबर ऑफ़ कॉमर्स का पहला कार्यालय भारत में कहाँ स्थापित हुआ? इसकी स्थापना के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य क्या था?
5. नये उपभोक्तों को लुभाने के लिए विज्ञापनों का क्या महत्त्व है। इन के द्वारा राष्ट्रवादी संदेश कैसे पहुंचाया जाता था?

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