Class 10 Geography Chapter 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

Index

Class 12th Geography

1. मानव भूगोल

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

2. विश्व जनसँख्या

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. जनसँख्या संघटन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. मानव विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

5. प्राथमिक क्रियाएं

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

6. द्वितीयक क्रियाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाकलाप

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. परिवहन एवं संचार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

9. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

सारांश

1. खनिजों की उपलब्धता:-
समान्यता खनिज अयस्कों में पाये जाते हैं। खनन का आर्थिक महत्व तभी है जब अयस्क में खनिजों का संचयन पर्याप्त मात्र में हो। खनिज प्रायः शैल समूहों से प्राप्त होते हैं।

  • आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानों में खनिज दरारों, जोड़ों, भ्रंशों व शिराओं में मिलते हैं?
  • मुख्य धात्विक खनिज जैसे – जस्ता, तांबा, जिंक और सीसा आदि इसी तरह शिराओं व जमावों के रूप में प्राप्त होते हैं।
  • अनेक खनिज अवसादी चट्टानों के अनेक खनिज संस्तरों या परतों में पाए जाते हैं। इनका निर्माण क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव का परिणाम हैं। कोयला तथा लौह अयस्कों लम्बी अवधि तक अत्यधिक उष्मा दबाव का परिणाम है।
  • धरातनीय चट्टानों का अपघटन:- चट्टानों के घुलनशील तत्वों के अपरदन के पश्चात् अयस्क वाली अवशिष्ट चट्टाने रह जाती है। बॉक्साइट का निर्माण इसी प्रकार होता है।
  • पहाडियों के आधार तथा घाटी के रेते में ‘प्लेसर निक्षेप’ सोना, चाँदी, टिन व प्लेटिनम।
  • महासागरीय जल में खनिज व्यापक वितरित आर्थिक सार्थकता कम है। नमक, मैगनीशिम तथा ब्रोमाइन, मैगनीज।

2. भारत में लौह अयस्क की पेटियाँ:-

  • उडीसा – झारखंड पेटी:- हेमेटाईट किस्म का लौह अयस्क म्यूरभंज व केछुंझर जिलों में , झारखंड के सिंहभूम जिले में गुआ तथा नोआमुंडी में।
  • दुर्ग-बस्तर-चन्द्रपुर पेटी:- छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में बेलाडिला में हेमेटाइट पाया जाता है, इस्पात बनाने के गुण।
  • बेलारी – चित्रदूर्ग, चिकमगलूर-तुमकुर पेटी:- कर्नाटक में पश्चिमीघाट में अवस्थित कुद्रेमुख।
  • महाराष्ट्र- गोआ पेटी:- रत्नागिरी जिले में स्थित है। मार्मागुआ से निर्यात होता है।

3. ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण:-

  • आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में प्रत्येक क्षेत्र कृषि उद्योग, परिवहन, वाणिज्य व घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊर्जा निवेश की आवश्यकता हमें ऊर्जा के सीमित संसाधनों को उपयोग न्यायसंगत से करना है?
  • निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक वाहनों का उपयोग।
  • जब प्रयोग न हो रही हो तो बिजली बन्द करें।
  • गैर परांपरिक ऊर्जा संसाधनों का प्रयोग।

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें:-
1. 
कौन सा खनिज अपक्षयित पदार्थ के अवशिष्ट भार को त्यागता हुआ चट्टानों के अपघटन से बनता है।
2. किस चट्टान के स्तरों में खनिजों का निक्षेपण और संचयन होता है?
3. मोनाजाइट रेत में कौन सा खनिज पाया जाता हैं?
4. आग्नेय तथा कायातरित चट्टानों में खनिजों का निर्माण कैसे होता है?
5. भारत में कोयले तथा लौहे के वितरण का वर्णन करें।
6. संसाधनों का संरक्षण क्यों जरूरी है?

उत्तर :–

1. बॉक्साइट नामक खनिज अप  अपक्षित प्रदार्थ के अवशिष्ट भार को त्यागता हुआ चट्टानों के अपघटन से बनता है।

2. तलछटी चट्टान के स्तरों में खनिजों का निक्षेपण और संचयन होता है।

3. थोरियम मोनाजाइट रेत में पाया जाता है ।

4. अंग्रेजी में इन्हें ‘इंग्नीयस रॉक्स’ कहा जाता है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इनके निर्माण में अग्नि का योगदान प्रमुख होता है । इनका निर्माण या तो ज्वालामुखी से निकलकर पृथ्वी पर फैले हुए लावा के ठण्डे हो जाने से होता है या फिर पृथ्वी के अन्दर ही धधक रहे मैग्मा के ठण्डे हो जाने से । उदाहरण के लिए बेसाल्ट काले रंग की आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के ऊपर लावा के ठण्डा होने से बनी है । जबकि ग्रेनाइट मोटे दानों वाली आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के अन्दर मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से बनी है।

5. लोह अयस्क के भंडार — भारत में तो इस के विशाल भंडार निक्षेप हैं इनमें हैमेटाईट ऑर मैग्नेटिक लॉ एस्का प्राप्त होता है जिनमें लोहे का अंश क्रमश 60 से 70% होता है। भारत में लिमोनाइट प्रकार का घटिया लौह अयस्क भी मिलता है। लोह के उत्पादन में भारत का संसार में सबसे ऊंचा स्थान है। भारत में संसार के लगभग 20% लोह अयस्क  के भंडार हैं।एक अनुमान के अनुसार भारत में लोह अयस्क के कुछ भंडार कोई 1300 करोड़ टन है।

उत्पादन क्षेत्र– भारत में लोह अयस्क झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ तथा कर्नाटक राज्यों में पाया जाता है।

झारखण्ड — इस राज्य में लौह अयस्क मुख्यतः सिहंभूम क्षेत्र से प्राप्त होता है। विशेषकर पश्चिमी और पूर्वी सिंहभूम जिला में लोह अयस्क काफी निकाला जाता है।

उड़ीसा —  यहाँ से भारत के कोई एक तिहाई से अधिक लोह अयस्क  प्राप्त होता है प्रधान क्षेत्र केंदुझर, मयूरभंज और सुंदरगढ़ आदि हैं ।

आंध्रा प्रदेश — इस राज्य में लोह अयस्क  के निक्षेप कृष्णा,करनुल, चित्तूर, वारंगल, गुंटूर आदि जिलों में पाए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ — इन राज्यों में लोह अयस्क दुर्ग और दन्तेवाड़ा जिलों से प्राप्त होता है। इस राज्य की बेलाडिला क्षेत्र की खानों के नौ एस के का उत्पादन और विकास अधिकतर निर्यात के लिए किया जाता है।

कर्नाटक — इस राज्य में बेल्लारी,चित्त दुर्ग तथा चिकमंगलूर जिलों में लोह अयस्क मिलता है।

भारत में जितना लोह अयस्क  निकाला जाता है उसका लगभग आधा भाग विदेशों को भेजा जाता है। जापान उस सब में से ऊपर है। इसके अतिरिक्त भारत से लौह अयस्क का निर्यात कोरिया, यूरोपीय देशों और खाड़ी देशों में किया जाता है। भारत में नौ एस का निर्यात विशाखापत्तनम, मार्रमागाअो परादीप और कोलकाता के बंदरगाहों से होता है। 1997-1998 में भारत में लोह अयस्क  का उत्पादन 715 लाख टन हुआ जबकि 1950-51 में केवल 30 लाख टन लोह अयस्क का उत्पादन हुआ था।

कोयले का वितरण — कोयले के भारत में विस्तृत भंडार है जो कोई 2,14000 मिलियन टन के लगभग है भारत में कुल उत्पादन का दो तिहाई कोयला झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से निकाला जाता है। बाकी की एक तिहाई कोयला आंध्रा प्रदेश ,महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से प्राप्त होता है। हमारे देश में लिग्नाइट कोयले के प्रचुर क्षेत्र तमिलनाडु में नेवेली, राजस्थान में पल्लू तथा जम्मू कश्मीर में रियासी में हैं। हमारे देश में डिलाइट कोयला चाहे उत्तम दर्जे का नहीं होता परन्तु फिर भी है बड़ा उपयोगी होता है। इसको बिजली एवं गैस में बदला जा सकता है कुछ लोगों का तो यह भी विश्वास है कि इसे तेल में भी बदला जा सकता है। तमिलनाडु के लिए यह वरदान सिद्ध हुआ है। 1997-98 में भारत में कोई 32 करोड़ टन कोयले का उत्पादन हुआ था जबकि 1991 में केवल 3.23 करोड़ कोयले का हुआ था। भारत में उत्पादित होने वाले कोयले का दो तिहाई से भी अधिक भाग बिजली पैदा करने के काम आता है कोई 10% कोयला लोहा और इस्पात उद्योग में, 4%  प्रतिशत सीमेंट उद्योग में और शेष कोयला रसायन उर्वरक उद्योग एवं घरेलू कामकाज में प्रयुक्त किया जाता है।

6. संसाधनों का संरक्षण निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है:–

१. हमारे उद्योग है और किसी का विकास बहुत हद तक अनिल निक्षेपों और उनसे निर्मित पदार्थों का निर्माण करता है।

२. कारण योग निक्षेपों की कुल मात्रा बहुत ही कम है जो कुल भु-परर्पटि केवल 1% मात्र के ही बराबर है। इतनी थोड़ी मात्रा कभी भी समाप्त/ कम हो सकती है।

३. हम इन अल्प मात्रा खनिज संसाधनों को बड़ी तीव्र गति से प्रयोग कर रहे हैं,जिनका निर्माण होने में लाखों वर्ष लग गए।

૪. खनिज संसाधन सीमित ही नहीं वरन नवीकरण योग्य भी नहीं है।एक बार उनका प्रयोग हो जाने पर वे दोबारा पैदा नहीं किये जा सकते।

५. इन खनिजों पर लोगों की बहुत सी सुविधाएं निर्भर करती हैं और देश का निर्यात निर्भर करता है।

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