Class 10 History Chapter 7 मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया

पहली प्रिंटेड किताब: प्रिंट टेक्नॉलोजी सबसे पहले चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई थी। 594 इसवी के बाद से ही चीन में लकड़ी के ब्लॉक पर स्याही लगाकर और फिर उसपर कागज को लगाकर प्रिंटिंग की जाती थी। पारंपरिक कागज पतले और छेददार होते थे इसलिए उनके दोनों तरफ छपाई करना संभव नहीं था। ऐसे कागज के दोनों सिरों को टाँके लगाकर फिर बाकी कागज को मोड़कर एकॉर्डियन बुक बनाई जाती थी।

एक लंबे समय तक चीन का राजतंत्र ही छपे हुए सामान का सबसे बड़ा उत्पादक था। चीन के प्राशासनिक तंत्र में सिविल सर्विस परीक्षा द्वारा लोगों की बहाली होती थी। चीन का राजतंत्र इस परीक्षा के लिए पाठ्यपुस्तकों को बड़े पैमाने पर छपवाता था। सोलहवीं सदी में इस परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या बहुत बढ़ गई और इसलिए किताबें छपने की रफ्तार भी बढ़ गई।

सत्रहवीं सदी तक चीन में शहरी परिवेश बढ़ने के कारण छपाई का इस्तेमाल कई कामों में होने लगा। अब छपाई केवल बुद्धिजीवियों या अधिकारियों तक ही सीमित नहीं थी। अब व्यापारी भी रोजमर्रा के जीवन में छपाई का इस्तेमाल करने लगे ताकि व्यापार से जुड़े हुए आँकड़े रखना आसान हो जाये। कहानी, कविताएँ, जीवनी, आत्मकथा, नाटक आदि छपकर आने लगे ताकि पढ़ने के शौकीन लोगों के शौक पूरे हो सकें। खाली समय में पढ़ना एक फैशन जैसा बन गया था। रईस महिलाओं में भी पढ़ने का शौक बढ़ने लगा और उनमें से कईयों ने तो अपनी कविताएँ और कहानियाँ भी छपवाईं।

जापान में प्रिंट: 768 से 770 इसवी के आस पास बौद्ध धर्म के प्रचारकों ने प्रिंट टेक्नॉलोजी को चीन से जापान लाया। सन 868 में छपने वाली बौद्ध धर्म की किताब डायमंड सूत्र को जापानी भाषा की सबसे पुरानी किताब माना जाता है। उस समय पुस्तकालयों और किताब की दुकानों में हाथ से छपे हुए किताबे और और अन्य सामग्रियाँ भरी हुई थीं। किताबें नाना प्रकार के विषयों पर थीं; जैसे महिलाएँ, वाद्य यंत्र, गणना, चाय समारोह, फूल सज्जा, शिष्टाचार, पाककला, प्रसिद्ध स्थल, आदि।

यूरोप में प्रिंट का आना:इटली के महान खोजी मार्को पोलो का नाम आपने सुना ही होगा। मार्को पोलो 1295 में चीन से लौटा और अपने साथ ब्लॉक प्रिंटिंग की जानकारी लेकर आया। इस तरह से इटली में प्रिंटिंग की शुरुआत हुई। उसके बाद यह यूरोप के अन्य भागों में भी फैल गई। उस समय कागज पर छपी हुई किताबों को सस्ती चीज समझा जाता था और हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसलिए कुलीन और रईस लोगों के लिए किताब छापने के लिए वेलम का इस्तेमाल होता था। वेलम चमड़े से बनाया जाता है और पतली शीट की तरह होता है। वेलम पर छपी किताब को रईसी की निशानी माना जाता था।

पंद्रह सदी के शुरुआत तक यूरोप में तरह तरह के सामानों पर छपाई करने के लिए लकड़ी के ब्लॉक का जमकर इस्तेमाल होने लगा। इससे हाथ से लिखी हुई किताबें लगभग गायब ही हो गईं।

गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस: गुटेनबर्ग किसी व्यापारी के बेटे थे। अपने बचपन से ही उन्होंने जैतून और शराब की प्रेस देखी थी। उसने पत्थरों पर पॉलिस करने की कला भी सीखी थी। उसे सोने के जेवर बनाने में भी महारत हासिल थी और वह लेड के साँचे भी बनाता था जिनका इस्तेमाल सस्ते जेवरों को ढ़ालने के लिए किया जाता था।

इस तरह से गुटेनबर्ग के पास हर वह जरूरी ज्ञान था जिसका इस्तेमाल करके उसने प्रिंटिंग टेक्नॉलोजी को और बेहतर बनाया। उसने जैतून के प्रेस को अपने प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल बनाया और अपने साँचों का इस्तेमाल करके छापने के लिए अक्षर बनाये। 1448 इसवी तक गुटेनबर्ग ने अपने प्रिंटिंग प्रेस को दुरुस्त बना लिया था। उसने अपने प्रेस में सबसे पहले बाइबिल को छापा।

शुरु शुरु में छपने वाली किताबें डिजाइन के मामले में पांडुलिपी जैसी ही लगती थीं। उसके बाद 1450 से 1550 के बीच के एक सौ सालों में यूरोप के अधिकाँश हिस्सों में प्रेस लगाये गये। प्रिंट उद्योग में इतनी अच्छी वृद्धि हुई कि पंद्रहवीं सदी के उत्तरार्ध्र में यूरोप के बाजारों में लगभग 2 करोड़ किताबें छापी गईं। सत्रहवीं सदी में यह संख्या बढ़कर 20 करोड़ हो गई।

प्रिंट क्राँति और उसके प्रभाव

पाठकों का एक नया वर्ग: प्रिंट टेक्नॉलोजी के आने से पाठकों का एक नया वर्ग उदित हुआ। प्रिंट के कारण किताबें सस्ती हो गईं। अब आसानी से किसी भी किताब की अनेक कॉपी बनाई जा सकती थी। इससे पाठकों की बढ़ती संख्या को संतुष्ट करने में काफी मदद मिली।

अब किताबें सामान्य लोगों की पहुँच में आ गईं। इससे पढ़ने की एक नई संस्कृति का विकास हुआ। बारहवीं सदी के यूरोप में साक्षरता का स्तर काफी नीचे था। प्रकाशक इस बात का ध्यान रखते हुए ही किताबें छापते थे ताकि ज्यादातर लोगों तक पहुँचा जा सके। लोकप्रिय गीत, लोक कथाएँ और अन्य कहानियों को इसलिए छापा जाता था ताकि अनपढ़ लोग भी उन्हें सुनकर ही समझ लें। पढ़े लिखे लोग इन कहानियों को उन लोगों को पढ़कर सुनाते थे जिन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता था।

धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर: प्रिंट के आने से नये तरह के बहस और विवाद को अवसर मिलने लगे। लोग धर्म के कुछ स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने लगे। पुरातनपंथी लोगों को लगता था कि यह पुरानी व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी कर रहा था। ईसाई धर्म की प्रोटेस्टैंट क्राँति भी प्रिंट संस्कृति के कारण ही संभव हो पाई थी। धार्मिक मान्यताओं पर सवाल उठाने वाले नये विचारों से रोम के चर्च को परेशानी होने लगी। 1558 के बाद तो चर्च ने प्रतिबंधित किताबों की लिस्ट भी रखनी शुरु कर दी।

पढ़ने का जुनून: सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में यूरोप में साक्षरता के स्तर में काफी सुधार हुआ। अठारहवीं सदी के अंत तक यूरोप के कुछ भागों में साक्षरता का स्तर तो 60 से 80 प्रतिशत तक पहुँच चुका था। साक्षरता बढ़ने के कारण लोगों में पढ़ने का जुनून पैदा हो गया। किताब की दुकान वाले अकसर फेरीवालों को बहाल करते थे जो गाँवों में घूम घूम कर किताबें बेचा करते थे। पत्रिकाएँ, उपन्यास, पंचांग, आदि सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबें थीं।

अब वैज्ञानिकों और तर्कशास्त्रियों के नये विचार और नई खोज सामान्य लोगों तक आसानी से पहुँच पाते थे। किसी भी नये आइडिया को अब अधिक से अधिक लोगों के साथ बाँटा जा सकता था और उसपर बेहतर बहस भी हो सकती थी।

प्रिंट संस्कृति और फ्रांसीसी क्राँति

कई इतिहासकारों का मानना है कि प्रिंट संस्कृति ने ऐसा माहौल बनाया जिसके कारण फ्रांसीसी क्राँति की शुरुआत हुई। इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित हैं:

  • प्रिंट के कारण ज्ञानोदय के विचारकों के विचार लोकप्रिय हुए। इन विचारकों ने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुशवाद की कड़ी आलोचना की। वॉल्तेअर और रूसो को ज्ञानोदय के अग्रणी विचारक माना जाता है।
  • प्रिंट के कारण संवाद और वाद-विवाद की नई संस्कृति का जन्म हुआ। अब आम आदमी भी मूल्यों, संस्थाओं और प्रचलनों पर विवाद करने लगा और स्थापित मान्यताओं पर सवाल करने लगा।
  • 1780 के दशक आने तक ऐसे साहित्य की बाढ़ आ गई जिसमें राजशाही का मखौल उड़ाया जाने लगा और उनकी नैतिकता की आलोचना होने लगी। प्रिंट के कारण राजशाही की ऐसी छवि बनी जिसमें यह दिखाया गया कि आम जनता की कीमत पर राजशाही के लोग विलासिता करते थे।

उन्नीसवीं सदी में यूरोप में साक्षरता में जबरदस्त उछाल आया। इससे पाठकों का एक ऐसा नया वर्ग उभरा जिसमें बच्चे, महिलाएँ और मजदूर शामिल थे। बच्चों की कच्ची उम्र और अपरिपक्व दिमाग को ध्यान में रखते हुए उनके लिये अलग से किताबें लिखी जाने लगीं। कई लोककथाओं को बदल कर लिखा गया ताकि बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकें। कई महिलाएँ पाठिका के साथ साथ लेखिका भी बन गईं और इससे उनका महत्व और बढ़ गया। किराये पर किताब देने वाले पुस्तकालय सत्रहवीं सदी में ही प्रचलन में आ गये थे। अब उस तरह के पुस्तकालयों में व्हाइट कॉलर मजदूर, दस्तकार और निम्न वर्ग के लोग भी अड्डा जमाने लगे।

प्रिंट तकनीक में अन्य सुधार: न्यू यॉर्क के रिचर्ड एम. हो ने उन्नीसवीं सदी के मध्य तक शक्ति से चलने वाला सिलिंडरिकल प्रेस बना लिया था। इस प्रेस से एक घंटे में 8,000 पेज छापे जा सकते थे। उन्नीसवीं सदी के अंत में ऑफसेट प्रिंटिंग विकसित हो चुका था। ऑफसेट प्रिंटिंग से एक ही बार में छ: रंगों में छपाई की जा सकती थी। बीसवीं सदी के आते ही बिजली से चलने वाले प्रेस भी इस्तेमाल में आने लगे। इससे छपाई के काम में तेजी आ गई। इसके अलावा प्रिंट की टेक्नॉलोजी में कई अन्य सुधार भी हुए। सभी सुधारों का सामूहिक सार हुआ जिससे छपी हुई सामग्री का रूप ही बदल गया।

किताबें बेचने के नये गुर

  • उन्नीसवीं सदी में कई पत्रिकाओं में उपन्यासों को धारावाहिक की शक्ल में छापा जाता था।
  • 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय साहित्य को शिलिंग सीरीज के नाम से सस्ते दर पर बेचा जाता था।
  • किताब के ऊपर लगने वाली जिल्द का प्रचलन बीसवीं सदी में शुरु हुआ।
  • 1930 के दशक की महा मंदी के प्रभाव से पार पाने के लिए पेपरबैक संस्करण निकाला गया जो कि सस्ता हुआ करता था।

प्रिंट कल्चर और आधुनिक दुनिया

भारत में प्रिंटिंग की दुनिया : भारत प्रिंटिंग प्रेस को सबसे पहले सोलहवीं सदी के मध्य में पुर्तगाली धर्मप्रचारकों द्वारा लाया गया था। भारत में छपने वाली पहली किताबें कोंकणी भाषा में थी। 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं। तमिल भाषा की पहली पुस्तक को कैथोलिक पादरियों ने कोचीन में 1759 में छापा था। उन्होंने मलयालय भाषा की पहली पुस्तक को 1713 में छापा था।

1780 से बंगाल गैजेट को जेम्स ऑगस्टस हिकी ने संपादित करना शुरु किया। यह एक साप्ताहिक पत्रिका थी। हिकी ने कम्पनी के बड़े अधिकारियों के बारे में गॉशिप भी छापे। गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने हिकी को इसके लिये सजा भी दी। उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत की छवि को अच्छा बनाने के लिए वारेन हेस्टिंग्स ने सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अखबारों को प्रोत्साहन दिया।

बंगाल गैजेट ही पहला भारतीय अखबार था; जिसे गंगाधर भट्टाचार्य ने प्रकाशित करना शुरु किया था।

प्रिंट संस्कृति ने भारत में धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर बहस शुरु करने में मदद की। कई धार्मिक रिवाजों के प्रचलन की आलोचना होने लगी। 1821 से राममोहन राय ने संबाद कौमुदी प्रकाशित करना शुरु किया जिसमें हिंदू धर्म के रूढ़िवादी विचारों की आलोचना होती थी। ऐसी आलोचना को काटने के लिए हिंदू रूढ़ीवादियों ने समाचार चंद्रिका नामक पत्रिका निकालना शुरु किया। 1822 में फारसी में दो अखबार शुरु हुए जिनके नाम थे जाम-ए-जहाँ-नामा और शम्सुल अखबार। उसी साल एक गुजराती अखबार भी शुरु हुआ जिसका नाम था बम्बई समाचार।

उत्तरी भारत के उलेमाओं ने सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथों के उर्दू और फारसी अनुवाद छापने शुरु किये। उन्होंने धार्मिक अखबार और गुटके भी निकाले। देवबंद सेमिनरी की स्थापना 1867 में हुई। इस सेमिनरी ने एक मुसलमान के जीवन में सही आचार विचार को लेकर हजारों हजार फतवे छापने शुरु किये।

1810 में कलकत्ता में तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस को छापा गया। 1880 के दशक से लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बम्बई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस ने आम बोलचाल की भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों को छापना शुरु किया।

इस तरह से प्रिंट के कारण धार्मिक ग्रंथ आम लोगों की पहुँच में आ गये। इससे नई राजनैतिक बहस की रूपरेखा निर्धारित होने लगी। प्रिंट के कारण भारत के एक हिस्से का समाचार दूसरे हिस्से के लोगों तक भी पहुँचने लगा। इससे लोग एक दूसरे के करीब भी आने लगे।

प्रकाशन के नये रूप: शुरु शुरु में लोगों को यूरोप के लेखकों के उपन्यास ही पढ़ने को मिलते थे। वे उपन्यास यूरोप के परिवेश में लिखे होते थे। इसलिए लोग उन उपन्यासों से तारतम्य नहीं बिठा पाते थे। बाद में भारतीय परिवेश पर लिखने वाले लेखक भी उदित हुए। ऐसे उपन्यासों के चरित्र और भाव से पाठक बेहतर ढ़ंग से अपने आप को जोड़ सकते थे। लेखन की नई नई विधाएँ भी सामने आने लगीं; जैसे कि गीत, लघु कहानियाँ, राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर निबंध, आदि।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक एक नई तरह की दृश्य संस्कृति भी रूप ले रही थी। कई प्रिंटिंग प्रेस चित्रों की नकलें भी भारी संख्या में छापने लगे। राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों की कलाकृतियों को अब जन समुदाय के लिये प्रिंट किया जाने लगा।

1870 आते आते पत्रिकाओं और अखबारों में कार्टून भी छपने लगे। ऐसे कार्टून तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर कटाक्ष करते थे।

प्रिंट और महिलाएँ: महिलाओं के जीवन और संवेदनाओं पर कई लेखकों ने लिखना शुरु किया। इसके कारण मध्यम वर्ग की महिलाओं में पढ़ने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। कई ऐसे पिता या पति आगे आये जो स्त्री शिक्षा पर जोर देते थे। कुछ महिलाओं ने घर पर रहकर ही शिक्षा प्राप्त की, जबकि कुछ अन्य महिलाओं ने स्कूल जाना भी शुरु किया।

लेकिन पुरातनपंथी हिंदू और मुसलमान अभी भी स्त्री शिक्षा के खिलाफ थे। उनका मानना था कि शिक्षा से लड़कियों के दिमाग पर बुरे प्रभाव पड़ेंगे। लोग चाहते थे कि उनकी बेटियाँ धार्मिक ग्रंथ पढ़ें लेकिन उसके अलावा और कुछ न पढ़ें।

उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी में प्रिंट संस्कृति का विकास पहले ही हो चुका था, लेकिन हिंदी में ठीक तरीके से प्रिंटिंग की शुरुआत 1870 के दशक में ही हो पाई थी।

प्रिंट और गरीब लोग: मद्रास के शहरों में उन्नीसवीं सदी में सस्ती और छोटी किताबें आ चुकी थीं। इन किताबों को चौराहों पर बेचा जाता था ताकि गरीब लोग भी उन्हें खरीद सकें। बीसवीं सदी के शुरुआत से सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना शुरु हुई जिसके कारण लोगों तक किताबों की पहुँच बढ़ने लगी। कई अमीर लोग अपने क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से पुस्तकालय बनाने लगे।

प्रिंट और सेंसर: 1798 के पहले तक उपनिवेशी शासक सेंसर को लेकर बहुत गंभीर नहीं थे। शुरु में जो भी थोड़े बहुत नियंत्रण लगाये जाते थे वे भारत में रहने वाले ऐसे अंग्रेजों पर लगाये जाते थे जो कम्पनी के कुशासन की आलोचना करते थे।

1857 के विद्रोह के बाद प्रेस की स्वतंत्रत के प्रति रवैया बदलने लगा। वर्नाकुलर प्रेस एक्ट को 1878 में पारित किया गया। इस कानून ने सरकार को वर्नाकुलर प्रेस में समाचार और संपादकीय पर सेंसर लगाने के लिए अकूत शक्ति प्रदान की। राजद्रोही रिपोर्ट छपने पर अखबार को चेतावनी दी जाती थी। यदि उस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हा तो फिर ऐसी भी संभावना होती थी कि प्रेस को बंद कर दिया जाये और प्रिंटिंग मशीनों को जब्त कर लिया जाये।

मुद्रण क्रांति और उसका असर
1.
 छापेखाने के आने से एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ, कीमत गिरी, पाठक वर्ग बेहतर होता गया।
2. पढ़ने की एक नयी संस्कृति विकसित हुई। पढ़कर सुनाए जाते थे। ज्ञान का मौखिक लेन देन, छपाई क्रांति से पहले किताबें महंगी, छापना भी असंभव।
3. किताबें सिर्फ साक्षर ही पढ़ सकते थे – साक्षरता की दर सीमित थी। लोगों में दिलचस्पी बढ़ी, मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाखिल हुई, श्रोता और पाठक वर्ग का मेल मिलाप।

धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर
1.
 छापेखाने से विचारों का प्रसार
2. लोगों का अलग-अलग ढंग से सोचना, नए तरीको ने लोगों की जिंदगी बदली, सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से उनका रिश्ता ही बदल दिया।
3. लोगों की छपी किताब के व्यापक प्रसार और छपे शब्दों की सुगमता को लेकर आशंका, भय, लोगों में बागी और आधार्मिक विचार पनपने लगे।
4. ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता ही नष्ट हो जायेगी। धर्मगुरूओं और सम्राटों, लेखकों, कलाकारों को चिंता धर्म के क्षेत्रा में मार्टिन लूथर का योगदान।
5. नया बौद्धिक माहौल बनाया, धर्म सुधार आंदोलन के नए विचारों के प्रसार में मदद मिली।

मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति:-
1.
 किताबों के जरिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है। किताबें दुनिया बदल सकती है। निरकुंशवाद और आंतकी राजसत्ता का समाज को मुक्ति दिला सकती है।
2. विवेक और बुद्धि का राज, छापाखाना प्रगति का सबसे ताकतवार औज़ार। क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियां

1. छपाई के चलते ज्ञानोदय के चिंतकों के विचारों का प्रसार।
2. परंपरा अंधविश्वास और निरकुंशवाद की आलोचना विवेक का शासन, लेखन का व्यापक स्तर, एक नए आलोचनात्मक, सवालिया और तार्किक नजरिऐं से दुनियां देखना।
3. छपाई ने वाद-विवाद संवाद की नयी संस्कृति को जन्म दिया।
4. 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मजाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था।
5. छपाई ने विचारों को फैलाने में मदद की, विचारों को स्वीकारते थे तो कुछ को मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया नकारते भी थे। इससे मानव को अलग ढंग से सोचने की संभावनाएँ बढ़ी।

उन्नीसवीं सदी में महिलाएँ:-
1. 
यूरोप में औरतों की शिक्षा में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई। महिलाएँ पाठकों के रूप में। लेखकों के रूप में प्रसिद्ध हुई। पेनी पत्रिकाएँ औरतों के लिए ही छपती थी औरतों को शिक्षा देती थी जैसे उचित व्यवहार और घर में रख-रखाव का कार्य इत्यादि।
2. बडी संख्या में उपन्यास लिखे जाने लगे तो गरीब महिलाएँ, मघ्यमवर्गीय महिलाएँ अच्छी उपन्यास लेखिका बनी जैसे जेन-आस्टिन, ब्राण्ट बहन, जार्ज एलियट नारी की नयी परिभाषा दी।

प्रश्न:-
1.
 मुद्रण क्रांति क्या थी?
2. अठारहवीं सदी के यूरोप में ‘मुद्रण संस्कृति से निरकुंशवाद का अंत और ज्ञानोदय होगा। ऐसा लगता था क्यों?
3. कुछ लोग किताबों की छपाई से चिंतित क्यों थे? विवेचना कीजिए। यूरोप से कोई एक उदाहरण भी दीजिए।
4. मार्टिन लूथर मुद्रण के पक्ष में थे और उसने इसकी खुलेआम प्रशंसा की। कारण बताएं।
5. क्या कारण था कि रोमन कैथोलिक चर्च ने सोलहवी सदी के मध्य से प्रतिबैधित किताबों की सूची रखनी शुरू कर दी।
6. 19वीं शताब्दी के यूरोप में औरतों के साहित्य की बडी भारी वृद्धि हुई? यदि ऐसा हुआ तो संक्षेप में चर्चा कीजिए।

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