Class 10 Geography Chapter 7 राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ

Index

Class 12th Geography

1. मानव भूगोल

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

2. विश्व जनसँख्या

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. जनसँख्या संघटन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. मानव विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

5. प्राथमिक क्रियाएं

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

6. द्वितीयक क्रियाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. तृतीयक तथा चतुर्थक क्रियाकलाप

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. परिवहन एवं संचार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

9. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

सारांश

1. स्थल परिवहन:- भारत विश्व के सर्वाधिक सड़क जाल वाले देशेां में से एक हैं सड़क मार्ग निम्न कारणों में से अधिक महत्वपूर्ण है।

  • रेल की अपेक्षा स्थल परिवहन के निर्माण लागत कम है।
  • उबड़ खाबड़ भागों पर भी सड़के बनाई जा सकती हैं।
  • अधिक ढाल प्रवणता में सड़के निर्मित की जा सकती है।
  • काम दूरी, कम वस्तुओं, कम व्यक्तियों के परिवहन में मतव्ययी।
  • घर पर सुविधाएँ उपलब्ध करवाता है।
  • अन्य परिवहन के साधनों में एक कड़ी के रूप में।

स्वर्णिम चतुर्भुज महाराजमार्ग:- भारत सरकार ने दिल्ली-कोलकता, चेन्नई, मुंबई व दिल्ली को जोडने वाली 6 लेन वाली महाराजमार्ग की परियोजना आरम्भ की है। इस परियोजना में दो गलियारे प्रस्तावित है। उत्तर दक्षिण गलियारा जो श्री नगर को कन्याकुमारी से जोड़ता है। पूर्व-पश्चिम गलियारा जो सिलचर (असम) तथा पोरबंदर (गुजरात) को जोड़ता है। ऐसे माँ मार्ग चार से छह लेन तक के होते हैं।

भारत में सड़क परिवहन की समस्याएं 

भारत में सड़क पहले बहन की समस्याएं कई प्रकार के हैं चाहे सड़क परिवहन परिवहन के साधनों में से एक महत्वपूर्ण साधन है परंतु इसके सामने अनेक समस्या नहीं है जिनमें से कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं:–

१. भारत में ही यात्रियों की संख्या अधिक और मॉल की अधिक मात्रा को ध्यान में रखने से इस बात का आभास हो जाता है कि सड़कों का जाल अपेक्षाकृत कम है।

२. भारत में लगभग पचास प्रतिशत सड़कें अच्छी हैं जो वर्षा के दिनों में कीचड से भर जाती है।

३. राष्ट्रीय राजमार्ग भी अपर्याप्त है और मुख्य रूप से वे बड़े नगरों तक ही सीमित है।

૪. इन सड़कों पर बने हुए बहुत से पुल और पुलिया न केवल संकरी है वरण वह पुरानी होने के कारण टूटी होती अवस्था में है और किसी भी समय बैठ सकते हैं। सड़क परिवहन में एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें आवश्यक सुविधाओं का प्रायः अभाव रहता है। इनमें टेलीफोन, स्वास्थ सुविधाओं का प्रायः अभाव रहता है।

५. बसों ट्रकों में पुलिस संरक्षण की भी कोई व्यवस्था नहीं होती इसलिए इन पर सफर करना खतरे से खाली नहीं होता।

भारत में सड़कों का सामान वितरण 

भारत में सड़कों का वितरण एक सामान नहीं है जिसके अनेक कारण हैं:–

१. पहला कारण भारत के धरातल से सम्बंधित है जिस कारण मैदानों में सड़कें बनाना आसान है पर तो पहाड़ी जंगली और दलदली भूमि में सड़के बनाना बहुत कठिन होता है।

२. इसके अतिरिक्त भारत मैं अनेक एक प्रकार की छोटी बड़ी सड़कें हैं। एक और जहाँ स्वर्णिम महाराज मार्ग है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग, जिला राजमार्ग और क्षेत्रीय राजमार्ग हैं। जिन्हें बनाने में अलग सामग्री और अलग प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है।

३. इन सड़कों का नियंत्रण भी अलग अलग लोगों के हाथों में होता है। राष्ट्रीय राजमार्ग तथा सामान सड़कों का निर्माण भारत सरकार द्वारा करवाया जाता है। जबकि अनेक अन्य सड़कों का निर्माण राज्य जिला जिला एवं स्थानीय अधिकारियों द्वारा करवाया जाता है।

इन सभी कारणों से सड़कों का वितरण समान नहीं हो पाता 2007-2008 के अनुसार सड़कों का घनत्व  जहां जम्मू कश्मीर में 10.04 प्रति सौ वर्ग किलोमीटर था वहीं उत्तर प्रदेश में इनका घनत्व 532.27 प्रति सौ वर्ग किलोमीटर था और राष्ट्रीय घनत्व 425.02 प्रति सौ वर्ग किलोमीटर था।

2. रेल परिवहन:- भारत में रेल परिवहन वस्तुओं तथा यात्रियों के परिवहन का प्रमुख साधन है । रेल परिवहन कुछ पहाड़ी और वन्य क्षेत्रों को छोड़कर बाकी सभी स्थानों पर अत्यधिक सुविधाजनक साधन है निम्नलिखित कारणों से अधिक सुविधाजनक परिवहन साधन माना जाता है:–

१. परिवहन के अन्य सभी साधनों की तुलना में रेलों में सफर करना बहुत सुविधाजनक रहता है। इसमें यात्री सो कर यात्रा कर सकते हैं।

२. विशेष रूप से भारी सामान लाने व ले जाने में रेलवे बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं।

३. अन्य यातायात साधनों की अपेक्षा रेलवे भारी सामान को अधिक दूरस्थ क्षेत्रों तक ले जा सकती हैं।

૪.1980 ई. में रेल मार्ग की कुल लंबाई 61,000 किलोमीटर के लगभग थी।

५. रेलों की सामान ढोने की क्षमता यातायात के अन्य सभी साधनों से बहुत अधिक है। देश के अंदर ढोए जाने वाले कुल सामान कमाल का 4/5 भाग रेलो द्वारा ही ढोया जाता है।

भारतीय रेल की समस्याएं 

भारत में रेल परिवहन के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों में भू-आकृतिक, आर्थिक व प्रशासकीय कारक प्रमुख हैं।

  • उत्तरी मैदानों में रेल परिवहन का विकास हुआ है। नदियों पर पुलों के निर्माण में कुछ कठिनायां आई है।
  • निर्माण के समय रेल लोन के लिए विशाल धनराशि की आवश्यकता पड़ती है।
  • रेलों की देखभाल रख रखाव पर बहुत खर्च आता है 
  • विषम और उनके नीचे क्षेत्रों में जहां ढलान की प्रवणता अधिक होती है रेल मार्ग आसानी से नहीं बनाए जा सकते।
  • फलों जैसे कर जल्दी खराब हो जाने वाले सामान को लेकर जाने में रियली विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं होतीं। 
  • कई बार यात्री भी रेलों के लिए कई समस्याएं पैदा कर देते हैं। उनमें से कुछ बिना टिकट के यात्रा करने का प्रयत्न करते हैं, जबकि कुछ अन्य चेन खींचकर गाड़ी को व्यर्थ में ही रोकने का प्रयत्न करते हैं। परंतु ऐसी कार्रवाई से रेल के आने जाने में देरी हो जाती है।
  • हिमालय पर्वतीय क्षेत्र भी दुर्लभ उच्चावचविरल जनसंख्या रेलवे लाइन के निर्माण में प्रतिकुल परिस्थितियां पैदा करती है।

भौतिक या भू आकृति कारक :– बहुत एक या भू आकृति कारक जैसे मैदान पर्वत, मरुस्थल आदि भारतीय रेल जाल के वितरण को काफी प्रभावित करते हैं। यदि भूमि मैदान और समतल होगी जैसे उत्तरी भारत के मैदान है तो वहां रेल बिछाना काफी आसान होगा। अभी अगर इसके विपरीत भूमि पहाड़ि या ऊबड खाबड होगी जैसे कि हिमालय के भाग हैं,वहां भी रेल लाइन बिछाना काफी कठिन होता है। इसी प्रकार जिन भागों मैं वर्षा अधिक होती है जैसे भारत के उत्तर पूर्वी राज्य तो वहां भी रेल लाइनें बिछाना कठिन होता है।राजस्थान जैसे मरुस्थलीय भागों में रेल लाइनें बिछाना कोई इतना आसान कार्य नहीं होता। इस प्रकार भारतीय रेंट जाल के वितरण पर बहुत कारकों का काफी प्रभाव रहता है।

आर्थिक कारक :–आर्थिक कारक भी जैसे जनसंख्या का घनत्व अधिक होना कृषि कार्य उन्नत होना तथा औद्योगिक गतिविधि अच्छा होना आदि भी भारतीय रेल जाल के वितरण को काफी प्रभावित करते हैं क्योंकि ऐसे भागों में रेलों की आवश्यकता अधिक पड़ती है।

3. पाइप लाईन:- भारत के परिवहन मानचित्र पर पाइपलाईन एक नया परिवहन का साधन है। इसका प्रयोग कच्चा तेल, पैट्रोल उत्पाद तथा तेल से प्राप्त उत्पाद तथा गैस परिवहन के काम आता है। पाईपलाईन बिछाने की आरंभिक लागत अधिक है। लेकिन चलाने की लागत न्यूनतम है। देश में पाईपलाईन के तीन प्रमुख जाल है।

  • असम के तेल क्षेत्रों से गुवाहटी, बरौनी व इलाहाबाद से कानपुर तक।
  • गुजरात में सलाया से वीरम गांव, मथुरा, दिल्ली, पंजाब में जालन्धर तक।
  • गुजरात में हजीरा को उत्तरप्रदेश में जगदीशपुर तक मिलाती है।

4. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार:- देशों के बीच वस्तुओं का आदान प्रदान अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहलाता है यह राष्ट्र का आर्थिक बैरोमीटर है।

  • आयात तथा निर्यात व्यापार के घटक है।
  • अगर निर्यात मूल्य आयात मूल्य से अधिक हो तो उसे अनुकूल व्यापार सन्तुलन कहते है।
  • निर्यात की अपेक्षा अधिक आयात असंतुलित व्यापार।

5. पर्यटन एक व्यापार के रूप में:- भारत में पर्यटन उद्योग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

  • पर्यटन राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित करता है।
  • स्थानीय हस्तकला तथा सांस्कृतिक उद्यमों को बढ़ावा।
  • सांस्कृतिक विरासत की समझ विकसित करने में सहायक।
  • पर्यटन उद्योग विकास का एक उज्जवल भविष्य है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें:-
1. 
सड़क मार्ग रेलमार्ग से अधिक महत्वपूर्ण विवेचना करें।
2. महाराजमार्ग का आर्थिक विकास में क्या योगदान है?
3. रेलजाल को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना करें।
4. पाईप लाईन की क्या लाभ तथा क्या हानियां हैं?
5. भारत में तीन प्रमुख पाईप जालों का वर्णन करें।
6. व्यापार संतुलन से आप का क्या अभिप्राय है भारत के संदर्भ में व्याख्या करें।
7. भारत में पर्यटन उद्योग को बढावा देने के लिए प्रमुख सुझाव दें।

उत्तर :–

1. सड़क परिवहन के अपने विशेष गुण है जो रेल परिवहन से तुलना करने पर निखर कर सामने आते हैं :–

१. यह रेल परिवहन से कहीं बेहतर होता है क्योंकि यह बहुत अधिक लचीला होता है इसके द्वारा आप निर्माता के द्वार से उपभोक्ता के घर तक पहुंच सकते हैं।

२. हमारे देश के बहुत से पहाड़ी भाग ऐसे भी हैं जैसे कश्मीर, असम आदि जहाँ रेले अभी तक न के बराबर हैं ऐसे स्थानों पर सड़क परिवहन का महत्व और भी बढ़ जाता है।

३.  सडक परिवहन रेलवे द्वारा चलाए गए सामान को भी नियत स्थानों पर पहुंचता है।

2. महाराजमार्ग वह राष्ट्रीय महामार्ग है जो दिल्ली, मुंबई ,चेन्नई, कोलकाता को आपस में मिलता है और इसकी कुल लंबाई 5846 किलोमीटर है।परिवहन के बिना व्यापार का विकास संभव ही नहीं है और इस महाराज मार्ग ने इस कथन को सिद्ध कर के बताया है। इस राज महाराज मार्ग से कच्चे माल एवं निर्मित वस्तुओं  शीघ्र ही आदान प्रदान हो जाता है तथा दूसरे बड़े नगर में राजनीतिक एवं व्यापारी लोग भी शीघ्र आ जा सकते हैं शीघ्र और मुक्त आदान प्रदान से ना केवल आर्थिक लाभ में वृद्धि हुई है वरण महानगरों के लोग आपस में जल्दी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक आ जा सकते हैं।

3.  रेल जाल को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं:–

१. निर्माण के समय रेलों के लिए विशाल धनराशि की आवश्यकता पड़ती है।

२. रेलो की देखभाल और रख रखाव पर बहुत खर्चा आता है।

३. विषम और ऊंचे नीचे क्षेत्रों में जहां ढलान प्रवणता अधिक होती है रेल मार्ग आसानी से नहीं बनाए जा सकते।

૪. फलों जैसे जल्दी खराब हो जाने वाले सामान को ले जाने में रेलवे विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं होती।

५. कई बार यात्री भी रेलों के लिए कई समस्याएं पैदा कर देते हैं। उनमें से कुछ बिना टिकट के यात्रा करने का अधिक प्रयत्न करते हैं जबकि कुछ अन्य चेन खेंच कर गाडी को व्यर्थ में ही रोकने का प्रयत्न करते हैं परन्तु ऐसी कार्यवाही से रेलों के आने जाने में देरी हो जाती है।

4. पाइप लाइनों के लाभ एवं हानियां:–

१. शुरू में पाइप लाइन बिछाने में काफी कर जाता है परंतु बाद में व्यय में काफी कमी आ जाती है।

२. पाइप लाइन द्वारा खनिज तेल और प्राकृतिक गैस को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में एक तो समय नेक्स्ट नहीं होता और दूसरे मार्ग में होने वाली चोरी और बर्बादी से भी बचा जा सकता है परंतु इसमें होने वाले रिसाव का जल्दी से पता नहीं चल पाता है।

३. इसके अतिरिक्त रेलवे पर चीजों के होने का बोझा भी बहुत कम हो जाता है।

5. 1,730 कि.मी. लंबी हजीरा-बीजापुर-जगदीशपुर(HBJ)  पाईप लाईन हजीरा से शुरू होकर (गुजरात में) बीजापुर (म.प्र.) में जाती है और वहाँ से जगदीशपुर (उ.प्र.) में आकर खत्म हो जाती है । बीजापुर से एक शाखा निकलकर सवाई माधोपुर (राजस्थान) जाती है ।

6. व्यापार संतुलन का अर्थ :–यदि निर्यात की गई वस्तुओं का मूल्य आयात की गई वस्तुओं के मूल्य से अधिक होता है तब इससे व्यापार का अनुकूल संतुलन कहा जाता है। इसके विपरीत जब निर्यात की गई वस्तुओं का मोल ले आयात की गई वस्तुओं के मूल्य से कम होता है तब उस व्यापार को व्यापार का प्रतिकूल संतुलन कहा जाता है।

भारत के विदेशी व्यापार का संतुलन:– इस बात से इकांर नहीं किया जा सकता, जैसा कि पिछली शताब्दी में के कुछ दशकों से पता चलता है कि भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन प्रतिकूल है। उदाहरण के तौर पर सर दो हजार दो हजार एक में भारत का कुल विदेशी व्यापार कोई 43 लाख करोड़ का हुआ कुल 47% का तो निर्यात हुआ परंतु हमें 53% आयात करना पड़ा।दूसरे शब्दों में, भारत में निर्यात से अधिक आयात था। इसलिए भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन प्रतिकूल था। परन्तु यह कोई अंतर इतना बड़ा नहीं है और हम इस व्यापारिक संतुलन को आसानी से अपने पक्ष में कर सकते हैं एक तो हमें निर्यात किया जाने वाला उत्तम श्रेणी का बनाना होगा और दूसरे हमें कच्चे माल की बजाय बना हुआ माल अधिक मात्रा में बाहर भेजना होगा। तीसरे हमें अपने आयात को कम करना होगा और स्वदेशी  चीजों पर अधिक जोर देना होगा।

7. भारत में पर्यटन को बढ़ावा  देने के लिए प्रमुख सुझाव निम्नलिखित हैं:–

  • पर्यटन को आर्थिक वृद्धि के प्रमुख तंत्र बनाना; 
     
  • रोजगार सृजन, आर्थिक विकास और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन में प्रत्‍यक्ष और बहु-आयामी प्रभावों को काम में लाना; 
     
  • पर्यटन वृद्धि के प्रमुख साधन के लिए घरेलू पर्यटन पर जोर देना; 
     
  • भारत को वैश्विक ब्रान्‍ड के रूप में स्‍थापित करने के लिए अंकुरित वैश्विक यात्रा व्‍यापार और स्‍थल के रूप में भारत की विशाल दोहन की गई संभावना का लाभ उठाना; 
     
  • सहायक सुविधा और उत्‍प्रेरक के रूप में निजी क्षेत्र में साथ सरकार की महत्‍वपूर्ण भूमिका को पहचानना; 
     
  • राज्‍यों, निजी क्षेत्र और अन्‍य एजेंसियों के साथ भागीदारी से भारत की अद्वितीय सभ्‍यता, विरासत और संस्‍कृति पर आधारित समेकित पर्यटन परिपथों का सृजन और विकास; 
     
  • यह सुनिश्चित करना कि भारत में पर्यटक शारीरिक रूप से शक्ति प्राप्‍त करें, मानसिक तौर पर नवजीवन प्राप्‍त करें। सांस्‍कृतिक तौर पर समृद्ध हों, आध्‍यात्मिक तौर पर उन्‍नत हों और भारत को अंदर से ‘अनुभव’ करें।

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