राजा किसान और नगर – याद रखने योग्य बातें

  1. हडप्पा सभ्यता के बाद लगभग 1500 वर्षों के दौरान उपमहाद्वीप के विभिन भागों में कई प्रकार के विकास हुर. सी-वेद का तन-कार्य, कृपक बेटियों का उदय अंतिम संस्कार के नए तरीके नए नगरों का उदय आदि।
  2. इस काल में हुए विकास (इतिहास) को जानने के मुख्य स्रोत अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के तथा चित्र है।
  3. अंक के अभिलेख को ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेमा प्रिसेप ने पढ़ा जिससे भारतीय इतिहास को एक नई दिशा मिली।
  4. बौद्ध और जैन धर्म के आरपिक अथों में महाजनपद नाम से सोलह राज्यों का उल्लेख मिलता है। बन्ना मगध, कौशल, कुरु, पांचाल,गाधार और अति प्रमुख महाजनपद से।
  5. टी में चौथी शताब्दी ई०पू० में मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपदबनकार उभरा। इसके पीछे कई कारण थे। उद्याहरण के लिए लोडे के विशाल मंडार, डाथियों की उपलब्धता सताया सुपनम आवागमन तथा राज्यों की महत्वाका।
    चद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की। उसका रान्य परिच्मीतर में अफगानिस्तान और बलोचिस्तान तक फैला हुआ था।
  6. अशोक मौर्य वश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसने मौर्य सामान्य में कलिंग का प्रदेश जोड़ा।
  7. मौर्य साम्राज्य के पाँच राजनीतिक केंद्र थे-राजधानी पाटलिपुत्र तथा चार प्रांतीय केंद्र-तक्षशिला, उन्नथिनी, टोसति और
  8. मेगस्थनीज के अनुसार मौर्यों की सैनिक गतिविधियों का संचालन एक समिति तथा छ: उप सामितिया करनी थीं। इनमें से दूसरी उप-समिति सबसे महत्वपूर्ण थी।
  9. आरभिक अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिये जाते थे प्राकृत जन-साधारण की भाषाएँ होती थीं।
  10. उत्तर मौर्यकाल में राजा अपनी उच्च स्थिति को दर्शाने के लिए स्वयं देवी रूप प्रस्तुत करने लगे। इसी उद्देश्य से कुषाण शासकों ने अपनी विशालकाय मूर्तियाँ बनवाई और अपने नाम के साथ ‘देवपुत्र’ की उपाधि का प्रयोग किया।
  11. हरिषेण द्वारा लिखित इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का बखान करता है। इसमें उसे बहुत ही शक्तिशाली सम्राट बताया गया है।
  12. उत्तर मौर्यकाल में लोहे के हलों तथा कृत्रिम सिंचाई के प्रयोग से कृषि उत्पादन में काफी वृद्धि हुई जिससे राजाओं की आय बढ़ी। अभिलेखों से भूमिदान के प्रमाण मिले हैं। ऐसे दान प्रायः राजाओं तथा सरदारों द्वारा ब्राह्मणों तथा धार्मिक संस्थाओं को दिए जाते थे।
  13. ग्रामीण प्रजा अधिकतर किसान थी। राजा किसानों से बड़े-यडे करों की माँग करते थे कर भी बड़ी कठोरता से वसूल किए जाते थे। इसी कारण राजा तथा ग्रामीण प्रजा के बीच संबंध प्रायः तनावपूर्ण रहते थे।
  14. मनुस्मृति आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधि ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में है जिसकी रचना 200 ई० पू० से 200 ई० के बीच हुई थी।
  15. उत्पादकों तथा व्यापारियों के संघ को ‘ श्रेणी’ कहा जाता था। ये श्रेणियाँ कच्चा माल खरीदती थीं और उससे सामान करके बाजार में वेचती थीं।
  16. सोने के सबसे पहले सिक्के प्रथम शताब्दी ई० में कुषाण शासकों ने जारी किए थे। इन सिक्कों का आकार और भार तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा ईरान के पार्थियन शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बिल्कुल समान था।
  17. असोक ने ‘देवानापिय’ तथा ‘पियदस्सी ‘ की उपाधियाँ धारण की। ‘देवानांपिय’ का अर्थ है-देवताओं का प्रिय और का अर्थ है-देखने में सुंदर।

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