2 अंकीय प्रश्न उत्तर – बंधुत्व जाति और समाज – Class 12 History Chapter 3

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. “महाभारत का ग्रंथ के रूप में विश्लेषण करते समय इतिहासकार अनेक पहलुओं पर विचार करते हैं।” स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (i) इतिहास और महाभारत : महाभारत के स्रोतों की ओर गौर करें तो आप पायेंगे कि इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय अनेक पहलुओं पर विचार करते तथा इस बात का परीक्षण करते हैं कि ग्रंथ किस भाषा में लिखा गया। पालि, प्राकृत अथवा तमिल, जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी. अथवा संस्कृत जो विशिष्ट रूप से पुरोहितों और खास वर्ग द्वारा प्रयोग में लाई जाती थी। इतिहासकार ग्रंथ के प्रकार पर भी ध्यान देते हैं। क्या यह ग्रंथ ‘मंत्र’ थे जो अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े और उच्चरित किये जाते थे अथवा ये ‘कथा’ ग्रंथो थे जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे तथा दिलचस्प होने पर जिन्हें दुबारा सुनाया जा सकता था? इसके अलावा इतिहासकार लेखक (कों) के बारे में भी जानने का प्रयास करते हैं जिनके दृष्टिकोण और विचारों ने ग्रंथों को रूप दिया। इन ग्रंथों के श्रोताओं का भी इतिहासकार परीक्षण करते हैं क्योंकि लेखकों ने अपनी रचना करते समय श्रोताओं की अभिरुचि पर ध्यान दिया होगा। इतिहासकार ग्रंथ के संभावित संकलन रचना काल और उसकी रचनाभूमि का भी विश्लेषण करते हैं। महाभारत जैसे विशाल और जटिल ग्रंथ के संदर्भ में, आप कल्पना कर सकते हैं कि यह कार्य कितना कठिन होगा।
(ii) भाषा एवं विषयवस्तु : महाभारत का जो पाठ हम इस्तेमाल कर रहे हैं वह संस्कृत में है (यद्यपि अन्य भाषाओं में भी इसके संस्करण मिलते हैं)। किन्तु महाभारत में प्रयुक्त संस्कृत वेदों अथवा प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है अतः यह संभव है कि इस ग्रंथ को व्यापक स्तर पर समझा जाता था।
(iii) लेखक (कों) और तिथियाँ : यह ग्रंथ किसने लिखा? इस प्रश्न के कई उत्तर हैं। संभवत: मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय व उपलब्धियों के बारे में कविताएँ लिखते थे। इन रचनाओं का प्रेषण मौखिक रूप में हुआ। पाँचवीं शताब्दी ई.पू. ब्राह्मणों ने इस कथा परम्परा पर अपना अधिकार कर लिया और इसे लिखा। यह वह काल था जब कुरु और पांचाल जिनके इर्द-गिर्द महाभारत की कथा घूमती है, मात्र सरदारी से राजतंत्र के रूप में उभर रहे थे। क्या नये राजा अपने इतिहास को अधिक नियमित रूप से लिखना चाहते थे। यह भी संभव है कि नये राज्यों की स्थापना के समय होने वाली उथल-पुथल के कारण पुराने सामाजिक मूल्यों के स्थान पर नवीन मानदंडों की स्थापना हुई जिनका इस कहानी के कुछ भागों में वर्णन मिलता है।
(iv) एक गतिशील ग्रंथ : महाभारत का विकास संस्कृत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हो गया। शताब्दियों से इस महाकाव्य के अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गये। ये सब उस संवाद को दर्शाते थे जो इनके लेखकों, अन्य लोगों और समुदायों के बीच कायम हुए। अनेक कहानियाँ, जिनका उद्भव एक क्षेत्र विशेष में हुआ और जिनका खास लोगों के बीच प्रसार हुआ, वे सब इस महाकाव्य में समाहित कर ली गई। साथ ही इस महाकाव्य की मुख्य कथा की अनेक पुनर्व्याख्याएँ की गई। इसके प्रसंगों को मूर्तिकला और चित्रों में भी दर्शाया गया। इस महाकाव्य ने नाटकों और नृत्य कलाओं के लिए भी विषय-वस्तु प्रदान की।

प्रश्न 2. “साहित्यिक परंपराएँ परिवर्तन प्रक्रियाओं को समझने के लिए प्रमुख स्रोतों में से एक है।” लगभग 100 शब्दों में इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : बंधुत्व जाति प्रथा तथा वर्ग या वर्ण व्यवस्था आदि आरंभिक सामाजिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए इतिहासकार साहित्यिक परंपराओं का उपयोग करते हैं। कुछ ग्रंथ सामाजिक व्यवहार के मानदंड तय करते थे। अन्य ग्रंथ समाज का चित्रण करते थे और कभी-कभी समाज में मौजूद विभिन्न रिवाज़ों पर अपनी टिप्पणी भी प्रस्तुत करते थे। अभिलेखों से हमें समाज के कुछ ऐतिहासिक अभिनायकों की झलक मिलती है। हम देखेंगे कि प्रत्येक ग्रंथ (और अभिलेख) एक समुदाय विशेष के दृष्टिकोण से लिखा जाता था। अत: यह याद रखना ज़रूरी हो जाता है कि ये ग्रंथ किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई। इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि इन ग्रंथों की रचना में किस भाषा का प्रयोग हुआ तथा इनका प्रचार-प्रसार किस तरह हुआ। यदि हम इन ग्रंथों का प्रयोग सावधानी से करें तो समाज में प्रचलित आचार-व्यवहार और रिवाजों का इतिहास लिखा जा सकता है।

प्रश्न 3.”महाभारत प्राचीनकाल के सामाजिक मानदंडों का अध्ययन करने का एक अच्छा स्रोत है।” इस कथन की उचित तर्कों के साथ व्याख्या कीजिए।”महाभारत की मुख्य कथा पारिवारिक संबंधों का विश्लेषण करती है।” प्रमाणों सहित इस कथन को न्यायसंगत ठहराइए।
उत्तर : यह कथन उचित है कि महाभारत प्राचीनकाल के सामाजिक मानदंडों के अध्ययन का एक अच्छा स्रोत है। महाभारत दो परिवारों के बीच युद्ध का चित्रण है। इसके मुख्य पात्र सामाजिक मानदंडों का अनुसरण करते हैं और कभी-कभी इनकी अवहेलना की जाती है जो कि निम्नलिखित वर्णन से स्पष्ट होता है :
(i) बंधुता के रिश्ते में परिवर्तन : महाभारत के समय बंधुता के रिश्ते में परिवर्तन आया। इसमें बांधवों के दो दलों-कौरवों और पांडवों-के बीच भूमि और सत्ता के प्रश्न पर संघर्ष हुआ जिसमें पांडव विजयी हुए। यह संबंधियों में आपसी संघर्ष का उदाहरण है।
(ii) पितृवंशिक उत्तराधिकार का सुदृढ़ होना : यद्यपि पितृवंशिक उत्तराधिकार पहले से लागू था परंतु पांडवों की विजय के पश्चात् यह आदर्श अधिक सुदृढ़ हो गया।
(iii) विवाह के नियम: कन्याओं का विवाह उचित समय और उचित व्यक्ति से किया जाता था। उस समय बहुपति विवाह युद्ध या संकट की स्थिति में होते थे। द्रौपदी विवाह बहुपति विवाह का उदाहरण है। उस समय अंतर्विवाह, बहिर्विवाह, बहुपत्नी प्रथा भी प्रचलित थी।
(iv) स्त्री-का स्थान : स्त्री का स्थान महत्त्वपूर्ण था। द्रौपदी का अपमान महाभारत का कारण बना। कुंती का चरित्र और सम्मानजनक स्थिति स्त्रियों की अच्छी दशा का उदाहरण है। गांधारी ने भी दुर्योधन को युद्ध न करने का परामर्श दिया था परंतु उसके द्वारा न मानने के कारण अंत में वह युद्ध में लड़ा और हार गया।
(v) द्यूत क्रीड़ा : राजाओं में द्यूत क्रीड़ा का प्रचलन यह प्रदर्शित करता है कि उनमें बुराइयाँ आ गई थीं। कौरवों द्वारा छल-कपट का प्रयोग उनके नैतिक पतन को प्रदर्शित करता है।

प्रश्न 4. जाति पर आधारित सामाजिक वर्गीकरण क्या था ? श्रेणियाँ क्या थीं ?
उत्तर : समाज का वर्गीकरण शास्त्रों में प्रयुक्त शब्द जाति के आधार पर भी किया गया था। ब्राह्मणीय सिद्धांत में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी परंतु वर्गों की संख्या जहाँ मात्र चार थी, वहीं जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। ऐसे सभी नए समुदायों को जिन्हें चार वर्णों वाली ब्राह्मणीय व्यवस्था में शामिल करना संभव नहीं था, जाति में वर्गीकरण कर दिया गया। एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी जातियों को कभी-कभी श्रेणियों (गिल्ड्स) में भी संगठित किया जाता था। श्रेणी की सदस्यता शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी। कुछ सदस्य अन्य व्यवसाय भी अपना लेते थे। मध्य प्रदेश के मंदसोर अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि श्रेणी के सदस्य एक व्यवसाय क अतिरिक्त अन्य कई चीजों में भी सहभागी होते थे। उदाहरण के लिए रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी ने अपने काम से सामूहिक रूप से अर्जित धन को सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया।

प्रश्न 5. उन कानूनों तथा आदर्शों पर विचार-विमर्श कीजिए जिन्होंने हिंदू धार्मिक पुस्तकों ने व्यवसायों के बारे में निर्णय लिए थे।
उत्तर : धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका’ से जुड़े कई नियम मिलते हैं
(i) ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और दक्षिणा लेना था।
(ii) क्षत्रियों का कर्म युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना था।
(iii) अंतिम तीन कार्य वैश्यों के लिए भी थे साथ ही उनसे कृषि, गोपालन और व्यापार का कर्म भी अपेक्षित था। (iv) शूद्रों के लिए मात्र एक ही जीविका थी-तीनों ‘उच्च’ वर्गों की सेवा करना।

प्रश्न 6. उन प्रमाणों का वर्णन कीजिए जो यह सुझाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का महाभारत के काल में सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।

उत्तर : उन साक्ष्यों की चर्चा जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था, नीचे की गई है :
(i) महाभारत काल में राज्य परिवारों में बंधुत्व संबंधों में बड़ा भारी परिवर्तन आया। यह बांधवों के दो दलों, कौरव और पांडव के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष का परिणाम था। दोनों ही दल कुरू वंश से संबंधित थे जिनका एक जनपद पर शासन था।
(ii) युद्ध में पांडव विजयी हुए। इसके उपरांत पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर अधिकार जमा सकते थे। (iii) कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी जाता था तो कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अपना अधिकार माते थे। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियों जैसे वाकाटक हिषी प्रभावती गुप्त सत्ता का उपयोग करती थी।
(iv) नये नगरों के उद्भव सामाजिक जीवन अधिक जटिल हुआ। इस चुनौती के जवाब में ब्राह्मणों ने समाज के लिए विस्तृत आचार संहिताएँ तैयार की। ब्राह्मणों को इन आचार संहिताओं का विशेष पालन करना होता था किंतु बाकी समाज को भी इसका अनुसरण करना पड़ता था।
(v) यह सत्य है कि इन ग्रंथों के ब्राह्मण लेखकों का दृष्टिकोण सार्वभौमिक था और उनके बनाये नियमों का सबके द्वारा पालन होना चाहिए था। लेकिन उपमहाद्वीप में क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं की वजह से ब्राह्मणों का प्रभावं सार्वभौमिक कदापि नहीं था।

प्रश्न 7. “जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरूद्ध थी।” भारतीय जाति प्रथा पर अल-बिरूनी के इस कथन की समीक्षा कीजिए।

उत्तर : भारतीय जाति प्रथा पर अल-बिरूनी के कथन की समीक्षा निम्नवत् की जा सकती है :
(i) अल-बिरूनी ने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज के माध्यम से जाति व्यवस्था को समझने और व्याख्या करने का प्रयास किया। उसने लिखा कि प्राचीन फारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी : घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और में अत कृषक तथा शिल्पकार। दूसरे शब्दों में, वह दिखाना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक ही सीमित नहीं थे।
(ii) नि:संदेह जाति व्यवस्था के विषय में अल-बिरूनी का विवरण उसके नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से पूरी तरह से गहनता से प्रभावित था। इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था।
(iii) लेकिन उस समय भारतीय समाज के वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी। उदाहरण के लिए, अंत्यज नामक श्रेणियों से सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और जमींदारों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध करें।
(iv) फिर भी, जाति व्यवस्था के संबंध में ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद, अल-बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया। उसने लिखा कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है।(v) अल-बिरूनी ने उदाहरण देते हुए कहा कि सूर्य हवा का स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचात है। वह जोर देकर कहता है कि यदि ऐसा नहीं होता तो पृथ्वी प जीवन असंभव होता। उनके अनुसार जाति व्यवस्था में सन्निहा अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।

प्रश्न 8. परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने महाभारत की सभी पाण्डुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोकों की तुलना करने का क्या तरीका ढूँढ़ निकला ? संक्षेप में वर्णन कीजिए। उनकी खोज का क्या परिणाम निकला ?
उत्तर : 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी० एस० सुकथांकर के नेतृत्व में एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना आरंभ की गई। अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का निर्णय किया। सर्वप्रथम देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित किया गया।परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने सभी पांडुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोकों की तुलना करने का एक तरीका ढूँढ़ा। उन्होंने उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे। उन्होंने उनका प्रकाशन
13 ,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंडों में किया। इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे। इस पूरी प्रक्रिया में दो बातें विशेष रूप से सामने आईं
(1) पहली बात यह थी कि संस्कृत के पाठों के बहुत-से अंशों में समानता थी। यह समानता समूचे उपमहाद्वीप में उत्तर से कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में केरल तथा तमिलनाडु तक की सभी पांडुलिपियों में देखने में आई।
(2) दूसरी बात यह थी कि कई शताब्दियों के दौरान महाभारत के प्रेषण में हुए अनेक क्षेत्रीय क्षेत्रीय विभेद भी उभर कर सामने आए। इन विभेदों का संकलन मुख्य पाठ के फुटनोट्स तथा परिशिष्टों के रूप में किया गया| कुल 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक पृष्ठों में इन्हीं विभेदों का ब्यौरा दिया गया है। देखा जाए तो ये विभेद उन गूढ़ प्रक्रियाओं के प्रतीक हैं जिन्होंने प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचारों एवं आचरण के बीच संवाद के माध्यम से सामाजिक इतिहासों को रूप दिया था। ये संवाद विरोध तथा सहमति दोनों पर आधारित थे।

प्रश्न 9. सभी परिवार किस प्रकार एक जैसे नहीं होते? प्राचीन समय में हुए उनके वैविध्य के प्रकट स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी परिवार एक जैसे नहीं होते। सदस्यों की संख्या के आधार पर कुछ छोटे होते हैं, तो कुछ बड़े होते हैं। सदस्यों के बीच रिश्तों तथा अन्य गतिविधियों के आधार पर भी परिवारों में भिन्नता पाई जाती है। एक ही परिवार के सदस्य अपने संसाधनों का उपभोग मिल-बाँट कर करते हैं और एक साथ मिलकर अपने तीज-त्योहार मनाते हैं। वे अपने रीति-रिवाजों का निर्वाह मिल-जुल कर करते हैं। पारिवारिक संबंध प्रायः प्राकृतिक तथा रक्त आधारित माने जाते हैं। फिर भी इनकी परिभाषा अलग-अलग समाजों में अलग-अलग तरीके से की जाती है। उदाहरण के लिए कुछ समाजों में चचेरे तथा मौसेरे भाई-बहनों के साथ खून का रिश्ता माना जाता है परंतु कुछ समाज ऐसा नहीं मानते।

प्रश्न 10. “प्राचीनकाल में ब्राह्मणीय ग्रंथों के नियमों का सभी जगह पालन नहीं होता था।” पाँच प्रमाण देकर इसकी पुष्टि कीजिए।
उत्तर : (i) स्त्रियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे विवाह के पश्चात् अपने गोत्र का त्याग कर देंगी और अपने पति का गोत्र अपना लेंगी परंतु सातवाहन रानियों ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपने पिता के गौत्र को बनाए रखा।
(ii) ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही शासक हो सकते थे परंतु कई शासक परिवार ब्राह्मण अथवा वैश्य भी थे।
(iii) कई ऐसे वर्ग थे जिनका पेशा वर्ण-व्यवस्था से मेल नहीं खाता था; जैसे-निषाद तथा घुमक्कड़ पशुपालक आदि।
(iv) जाति से बाहर विवाह होते थे जिनकी ब्राह्मणीय ग्रंथ अनुमति नहीं देते थे।
(v) लिंग के आधार पर संपत्ति के अधिकारी पुरुष होते थे। परंतु “प्रभावती गुप्त” संपत्ति पर अधिकार का उपयोग करती थी।
(vi) चांडाल कहे जाने वाले कई लोगों ने शास्त्रों में उनके लिए वर्णित निम्न जीवन जीने से इन्कार कर दिया। (vii) ब्राह्मणों को धनी दर्शाया जाता था परंतु सुदामा जैसे अति निर्धन ब्राह्मणों का उल्लेख भी मिलता है।

प्रश्न 11. मनुस्मृति में दिए चांडालों के कर्तव्यों की समालोचना कीजिए।

अथवा

मनुस्मृति के अनुसार चांडालों की क्या विशेषताएँ और कार्य तथा ? कुछ चीनी यात्रियों ने उनके बारे में क्या लिखा है ?
उत्तर : (i) मनुस्मृति में चांडालों के कर्तव्यों की सूची मिलती है। उन्हें गाँव के बाहर रहना होता था। वे फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल करते थे, मरे हुए लोगों के वस्त्र तथा लोहे के आभूषण पहनते थे। रात्रि में वे गाँव और नगरों में चल-फिर नहीं सकते थे। संबंधियों से विहीन मृतकों की उन्हें अंत्येष्टि भी करनी पड़ती थी तथा बधिक के रूप में भी कार्य करना होता था।
(ii) चीन से आए बौद्ध भिक्षु फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) का कहना है कि अस्पृश्यों को सड़क पर चलते. हुए करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी जिससे अन्य जन उन्हें देखने के लिए दोष से बच जाएँ। एक और चीनी तीर्थयात्री श्वैन त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) कहता है कि बधिक और सफाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था।
(ii) अब्राह्मणीय ग्रंथों में चित्रित चांडालों के जीवन का विश्लेषण करके इतिहासकारों ने यह जानने का प्रयास किया है कि क्या चांडालों ने शास्त्रों में निर्धारित अपने हीन जीवन को स्वीकार कर लिया था। यदा-कदा इन ग्रंथों के चित्रण और ब्राह्मणीय ग्रंथों में हुए चित्रण में समानता है परंतु कभी-कभी हमें एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का भी संकेत मिलता है।

प्रश्न 12. प्राचीन काल में सम्पत्ति के स्वामित्व के संदर्भ में महिलाओं की स्थिति की व्याख्या कीजिए ।

अथवा

मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् पैतृक जायदाद का बँटवारा किस प्रकार किया जाता था ? विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- -मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का सभी पुत्रों में समान रूप से बँटवारा किया जाना चाहिए परंतु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन में भागीदारी की माँग नहीं कर सकती थीं परंतु विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व होता था। इसे स्त्रीधन (अर्थात् स्त्री का धन) कहा जाता था। इससे संपत्ति को उनकी संतान विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी। इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था परंतु मनुस्मृति स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना पारिवारिक संपत्ति अथवा स्वयं अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को गुप्त रूप से इकट्ठा करने से भी रोकती थी। कुछ साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यद्यपि उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर अपनी पहुँच रखती थीं, तो भी भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण था। दूसरे शब्दों में, स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक स्थिति की भिन्नता संसाधनों पर उनके नियंत्रण की भिन्नता के कारण ही व्यापक हुई थी।

प्रश्न 13. पुरुष और महिलाएँ धन कैसे पा सकती थीं ? मनुस्मृति के आधार पर संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर : पुरुषों के लिए मनुस्मृति कहती है कि सम्पत्ति अर्जित करने के सात तरीके हैं विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश व कार्य द्वारा तथा सज्जनों द्वारा दी गई भेंट को स्वीकार करके। स्त्रियों के लिए सम्पत्ति अर्जन के छ: तरीके हैं-वैवाहिक अग्नि के सामने तथा वधूगमन के समय मिली भेंट। स्नेह के प्रतीक के रूप में तथा भ्राता, माता और पिता द्वारा दिये गये उपहार। इसके अतिरिक्त परवर्ती काल में मिली भेंट तथा वह सब कुछ जो ” अनुरागी” पछि से उसे प्राप्त हो।

प्रश्न 14. प्राचीन युग के मूल्यों के अध्ययन के लिए महाभारत एक अच्छा स्रोत है। उचित तर्कों के साथ-साथ इस कथन का समर्थन कीजिए।

उत्तर : (1) स्वजनों के बीच की लड़ाई पर आधारित होने के कारण यह समाज के विभिन्न पक्षों के इर्द-गिर्द घूमती है।
(2) हमें पता चलता है कि उस समय राजवंश पितृ-वंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे। पैतृक संपत्ति पर पुत्रों का अधिकार होता था और पुत्रों की उत्पत्ति को महत्त्व दिया जाता था, उन्हें ही वंश चलाने वाला माना जाता था।
(3) पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर देना ही माता-पिता का आदर्श था। उसे बहिर्विवाह-पद्धति कहा जाता था। कन्यादान पिता का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य माना जाता था।
(4) उच्च परिवारों में बहुपति प्रथा प्रचलित थी। उदाहरण के लिए द्रौपदी के पाँच पति थे।
(5) परिवार पर वृद्ध पुरुष का आधिपत्य था। उदाहरण के लिए युधिष्ठिर ने द्यूत-क्रीड़ा में अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दाव पर लगा दिया था।
(6) महाभारत वर्णों तथा उनसे जुड़े व्यवसायों की जानकारी देता है।
(7) यह ग्रंथ विभिन्न सामाजिक समूहों के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए हिडिंबा का भीम से विवाह।
(8) इस ग्रंथ से माँ तथा पुत्रों के बीच आपसी संबंधों का पता चलता है। उदाहरण के लिए पांडवों ने अपनी माँ कुंती को पूरा सम्मान दिया परंतु कौरवों ने अपनी माँ की राय को नहीं माना। प्रश्न

15. “महाभारत एक गतिशील ग्रंथ है।” समझाइए।

अथवा

महाभारत का एक गतिशील ग्रंथ के रूप में वर्णन कीजिए।
उत्तर : महाभारत एक गतिशील ग्रंथ (Mahabharata as a dynamic text) : महाभारत का विकास संस्कृत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हो गया। शताब्दियों से इस महाकाव्य के अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गये। ये सब उस संवाद की दर्शाते थे जो इनके लेखकों, अन्य लोगों और समुदाय के बीच कायम हुए। अनेक कहानियाँ, जिनका उद्भव एक क्षेत्र विशेष में हुआ और जिनका खास लोगों के बीच प्रसार हुआ सब इस महाकाव्य में समाहित कर ली गई। साथ ही इस महाकाव्य की मुख्य कथा की अनेक पनुव्व्याख्याएँ की गई। इसके प्र प्रसंगों को मूर्तिकला और चित्रों में भी दर्शाया गया। इस महाकाव्य ने नाटकों और नृत्य कलाओं के लिए भी विषय-वस्तु प्रदान की।

प्रश्न 16, महाभारत एक गतिशील ग्रंथ है। संक्षिप्त व्सयाख्या कीजिए।
उत्तर : महाभारत एक गतिशील ग्रंथ रहा है। इसका विकास संस्कृत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हो गया, बल्कि शताब्दियों से इस महाकाव्य के अनेक रूपांतरण भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे जाते रहे। ये सब उस संवाद को दर्शाते थे जो इनके लेखकों, अन्य लोगों और समुदायों के बीच हुए। अनेक कहानियाँ जिनका उद्भव एक क्षेत्र विशेष में हुआ और जिनका विशेष लोगों के बीच प्रसार हुआ, वे सभी इस महाकाव्य में शामिल कर ली गईं। साथ ही इस महाकाव्य की मुख्य कथा की अनेक पनुर्व्याख्याएँ की गईं। इसके प्रसंगों को मूर्तियों और चित्रों में भी दर्शाया गया। इस महाकाव्य ने नाटकों और नृत्य-कलाओं के लिए भी विषय-वस्तु प्रदान की।

अथवा

जातिगत ढाँचों में एकीकरण प्रायः एक जटिल प्रक्रिय कैसे थी ? उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए।
उत्तर : (1) धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक आदर्श व्यवस्था का उल्लेख किया गया था जो वर्ग आधारित थी। इसके अनुसार समाज में चार वर्ग अथवा वर्ण थे। इस व्यवस्था में ब्राह्मणों की पहला दर्जा प्राप्त था। शूद्रों को सबसे निचले स्तर पर रखा गया था।
(2) शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय ही राजा हो सकते थे परन्तु कई महत्त्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्गों से भी हुई ही थी। उदाहरण के लिए मौर्य वंश।
(3) ब्राह्मण लोग शकों को जो मध्य एशिया से भारत आए थे मलेच्छ तथा बर्बर मानते थे परन्तु संस्कृत के एक आरंभिक अभिलेख में प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन द्वारा सुदर्शन झील के पुनर्निर्माण (मरम्मरत) का वर्णन मिलता है। इससे यह ज्ञात होता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृत परंपरा से परिचित थे।
(4) समाज का वर्गीकरण शास्त्रों में प्रयुक्त शब्द जाति के आधार पर भी किया गया था। ब्राह्मणीय सिद्धांत में वर्ण की तरह য जाति भी जन्म पर आधारित थी परन्तु वर्गों की संख्या जहाँ मात्र कार चार थी, वहीं जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी।
(5) एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी जातियों को स कभी-कभी श्रेणियों (गिल्ड्स) में भी संगठित किया जाता था। श्रेणी की सदस्यता शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी।
(6) ब्राह्मण कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था वाली सामाजिक प्रणाली का अंत नहीं मानते थे। साथ ही उन्होंने समाज के कुछ वर्गों को ‘अस्पृश्य’ घोषित कर सामाजिक विषमता को और अधिक जटिल बना दिया।

अथवा

तिहासकारों ने महाभारत की भाषा तथा विषय-वस्तु (कथा-वस्तु) का वर्गीकरण किस आधार पर किया ? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

इतिहासकार महाभारत की वर्तमान विषयवस्तु का किस प्रकार वर्गीकरण करते है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : भाषा : महाभारत नामक महाकाव्य कई भाषाओं में मिलता है परंतु इसकी मूल भाषा संस्कृत है। इस ग्रंथ में प्रयुक्त संस्कृत वेदों अथवा प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है। अत: यह कहा जा सकता है कि इस ग्रंथ को व्यापक स्तर पर समझा जाता होगा।
विषय-वस्तु : इतिहासकार महाभारत की विषय-वस्तु को दो मुख्य शीर्षकों के अधीन रखते हैं-आख्यान तथा उपदेशात्मको आख्यान में कहानियों का संग्रह है जबकि उपदेशात्मक भाग में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का उल्लेख किया गया है परंतु यह विभाजन अपने आप में पूरी तरह स्पष्ट नहीं है क्योंकि उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं। इस प्रकार आख्यानों में समाज के लिए एक संदेश निहित होता है। जो भी हो, अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि मूल रूप से महाभारत नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।
आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत को ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया है। इसका शाब्दिक अर्थ है : ‘ऐसा ही था।’ महाभारत के युद्ध के बारे में भी इतिहासकार एकमत नहीं है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सगे-संबंधियों के बीच हुए युद्ध की स्मृति ही महाभारत का मुख्य कथानक है, परंतु कई अन्रू इतिहासकारों का कहना है कि युद्ध की पुष्टि किसी अन्य साक्ष्य से नहीं होती।

अथवा

साहित्यिक परंपराओं का अध्ययन ( ग्रंथों का विश्लेषण ) करते समय इतिहासकारों को कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए ? व्याख्या कीजिए।

उत्तर : साहित्यिक परंपराओं (स्रोतों) का अध्ययन करते समय इतिहासकारों की निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
(1) ग्रंथों की भाषा क्या है ? यह आम लोगों की भाषा थी; जैसे-पाली, प्राकृत, तमिल आदि अथवा पुरोहितों या किसी विशेष वर्ग की भाषा थी, जैसे-संस्कृत।
(2) ग्रंथ किस प्रकार का है-मंत्रों के रूप में अथवा कथा के रूप में ?
(3) ग्रंथ के लेखक की जानकारी प्राप्त करना जिसके दृष्टिकोण तथा विचारों से वह ग्रंथ लिखा गया था।
(4) ग्रंथ किनके लिए रचा गया था, क्योंकि लेखक ने उनकी अभिरुचि का ध्यान रखा होगा।
(5) ग्रंथ के संभावित संकलन/रचनाकाल की जानकारी प्राप्त करना और उसकी रचना भूमि का विश्लेषण करना।
(6) ग्रंथ की रचना का स्थान।

प्रश्न 17.”प्राचीन समय के सामाजिक मूल्यों को जानने के लिए महाभारत एक अच्छा स्रोत है।” उपर्युक्त कथन की मदद से उपयुक्त तर्क सत्यापित कीजिए।

उत्तर : निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि महाभारत तत्कालीन सामाजिक मूल्यों के अध्ययन का बेहतर स्रोत है।

  1. द्रौपदी का विवाह तत्कालीन बहुपति विवाह का उदाहरण है। यह उदाहरण महाभारत की कथा का एक महत्त्वपूर्ण तथा अभिन्न अंग है। इसके अलावा इतिहासकार इस बात पर एकमत है कि महाभारत वास्तव में एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक हिस्से बाद में जोड़े गये।
  2. वर्तमान इतिहासकारों का यह मत भी है कि लेखक या लेखकों द्वारा बहुपति विवाह का चित्रण इस बात की ओर संकेत करता है कि शायद यह प्रथा शासकों के किसी विशिष्ट वर्ग में किसी काल में विद्यमान थी।
  1. एकलव्य का प्रकरण तत्कालीन समाज में जाति पर आधारित पक्षपात की तरफ संकेत करता है। एकलव्य की अद्भुत तीरंदाजी को देखकर अर्जुन आश्चर्यचकित हो गए थे। द्रोण ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अंगूठा माँगकर उसके तीर-कौशल पर सवालिया निशान लगा दिया था।
  2. भीम से हिडिम्बा के विवाह ने यह संकेत दिया कि वैवाहिक परंपराएँ ब्राह्मणीय विचारों से भिन्न थीं। हिडिम्बा ने कुंती से कहा, “हे उत्तमदेवी, मैंने मित्र, बांधव और अपने धर्म का परित्याग कर दिया है और आपके बाघ सदृश्य पुत्र का अपने पति के रूप में चयन किया है। ”
  3. युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दाँव पर लगाना इस बात की तरफ संकेत करता है कि उस समय पत्नी पर पति का नियंत्रण रहता था तथा पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति समझा जाता था।

प्रश्न 18. “धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका से जुड़े नियम भी मिलते हैं।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
उत्तर : ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार वर्ण-व्यवस्था तथा व्यवसाय के बीच संबंध :

  1. ब्राह्मण : वेदों का पठन-पाठन, यज्ञ करना-करवाना तथा दान लेना-देना।
  2. क्षत्रिय : युद्ध करना, लोगों की सुरक्षा करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना।
  3. वैश्य : वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना, दान-दक्षिणा देना और कृषि, व्यापार एवं गौ-पालन करना।
  4. शूद्र : अन्य तीन वर्णों की सेवा करना।
  5. ब्राह्मणों ने इस व्यवस्था को लागू करने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए व्यवस्था की उत्पत्ति को दैवीय-व्यवस्था बताना।
    (i) वर्ण-व
    (ii) शासकों द्वारा इस व्यवस्था को लागू करवाना।
    (iii) लोगों को यह विश्वास दिलाना कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म पर आधारित है।

प्रश्न 19, सी, 600 ई. से 600 ई. के दौरान विवाह के नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. विवाह के नियम (Rules of Marriage): जहां पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्त्वपूर्ण थे वहाँ इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर देना ही वांछित था। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं और इसका तात्पर्य यह था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था जिससे ‘उचित’ समय और उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।

  1. पुत्रों का जन्म (By birth Sons) : प्राचीन भारत में विवाह को पुत्र प्राप्ति का एक महत्त्वपूर्ण साधन समझा जाता था। इसका प्राय: अर्थ लिया जाता था कि बड़ी सावधानी के साथ नौजवान लड़कियों और औरतों के जीवन को नियमबद्ध करना और ये सुदृढ़ कर लेना कि वह हर लड़की का विवाह ठीक उपम्र । पर ठीक गति के साथ हो जाये।
  2. विवाह के अवसर पर या विवाह के माध्यम से उचित व्यक्ति को कन्यादान या पुत्री को उपहार में देना पिता का पवित्र । कर्तव्य माना जाता था। यद्यपि पुत्र प्राप्ति पितृवंशिकता को जारी रखने का आवश्यक अंग था। यह सामाजिक रीति-रिवाज महाभारत. जैसे महाकाव्य की रचना से पहले भी भारत में मौजूद था।
  3. महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर (राजाओं के संदर्भ में सिंहासन भी) अधिकार जमा सकते थे। अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई. पू. से) पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे। हालांकि इस प्रथा में विभिन्नता थी-कभी पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी हो जाता था तो कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अपना अधिकार जमाते थे। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं लेकिन पुत्र की चाहत फिर भी रहती थी।
  4. उत्तम पुत्रों का प्रजनन सभी विवाहित दंपत्तियों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इच्छा थी। यहाँ ऋग्वेद से एक मंत्र का अंश उद्धृत है जो इस ग्रंथ में संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया था। विवाह संस्कार के दौरान यह मंत्र पुरोहित द्वारा पढ़ा जाता था। आज भी अनेक हिंदू विवाह संस्कारों में इसका प्रयोग होता है में इसे यहाँ से मुक्त करता हूँ किंतु वहाँ से नहीं। मैंने इसे वहाँ मज़बूती से स्थापित किया है जिससे इंद्र के अनुग्रह से इसके उत्तम पुत्र हों और पति के प्रेम का सौभाग्य इसे प्राप्त हो। इंद्र शौर्य, युद्ध और वर्षा के एक प्रमुख देवता थे। ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ से तात्पर्य पिता और पति के गृह से है
    ।I. व्यवसाय के नियम ( Rules of Occupations) : (i) उचित जीविका (The ‘right’ Occupation) : धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श ‘जीविका’ से जुड़े कई नियम मिलते हैं। ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और दक्षिणा लेना था। क्षत्रियों का कर्म युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना था। अंतिम तीन कार्य वैश्यों के लिए भी थे साथ ही उनसे कृषि, गोपालन और व्यापार का कर्म भी अपेक्षित था। शूद्रों के लिए मात्र एक ही जीविका थी-तीनों ‘उच्च’ वर्गों की सेवा करना। (ii) अक्षत्रिय राजा (Non-kshatriya Kings) : शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे किन्तु अनेक महत्त्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्णों से भी हुई थी। मौर्य, जिन्होंने एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया, के उद्भव पर गर्मजोशी से बहस होती रही है। बाद के बौद्ध ग्रंथों में यह इंगित किया गया है कि वे क्षत्रिय थे किंतु ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न कुल का मानते हैं। शुंग और कण्व जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे, ब्राह्मण थे। अन्य राजा जैसे शक जो मध्य एशिया से भारत आये, उन्हें ब्राह्मण, मलेच्छ, बर्बर अथवा अन्य देशीय मानते थे।
    (iii) जाति और सामाजिक गतिशीलता (Casts and Social Mobility) : ये जटिलताएँ समाज के वर्गीकरण के लिए शास्त्रों में प्रयुक्त एक और शब्द जाति से भी स्पष्ट होती हैं। ब्राह्मणीय अवधारणा में वर्ण की तरह जाति भी जन्म पर आधारित थी किंतु वर्ण जहाँ मात्र चार थे वहाँ जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। वस्तुतः जहाँ कहीं भी ब्राह्मणीय व्यवस्था का नये समुदायों से आमना-सामना हुआ-उदाहरणत: जंगल में रहने वाले निषाद या फिर व्यावसायिक वर्ग जैसे स्वर्णकार, जिन्हें चार वर्णों वाली व्यवस्था में समाहित करना संभव नहीं था उनका जाति में वर्गीकरण कर दिया गया। वे जातियाँ जो एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी थीं, उन्हें कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित किया जाता था।
    (iv) चार वर्णों के परे : एकीकरण (Beyond the four Varans : Integration) : उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली विविधताओं की वजह से यहाँ हमेशा से ऐसे समुदाय रहे हैं जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। संस्कृत साहित्य में जब ऐसे समदायों का उल्लेख आता है तो उन्हें कई बार विचित्र, असभ्य और पशुवत् चित्रित किया जाता है। ऐसे कुछ उदाहरण वन प्रांतर में बसने वाले लोगों के हैं जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह करना जीवन निर्वाह का महत्त्वपूर्ण साधन था। निषाद वर्ग, जिससे एकलव्य जुड़ा था, इसी का उदाहरण है। यायावर पशुपालकों के समुदाय को भी शंका की दृष्टि से देखा जाता था, क्योंकि उन्हें आसानी से बसे हुए कृषिकर्मियों के साँचे के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता था।

प्रश्न 20. क्या आप जानते हैं कि महाश्वेता देवी जैसे आधुनिक लेखकों को महाभारत की कहानियों को फिर से लिखने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए ? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर : हम मानते हैं कि महाश्वेता देवी जैसे आधुनिक लेखकों को महाभारत की कहानियों को फिर से लिखने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। हम अपने उत्तर के लिए निम्न कारण दे रहे हैं-
1.भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ नागरिकों को छ: मौलिक अधिकार मिले हैं जिनमें विचारों की स्वतंत्रता भी है। लोकतंत्र लेखकों के विचारों की स्वतंत्रता को कम करने या समाप्त करने में विश्वास नहीं रखता।
2.कहानियाँ तो कहानियाँ ही हैं। कोई भी कहानीकार किसी भी विषय पर कहानी देश के आधार या विदेशों से लिखकर भेज सकता है। अब तो इंटरनेट, कंप्यूटर, जनसंपर्क माध्यमों (टीवी) का जमाना है। कहानियों को किसी न किसी तरह लोगों तक पहुँचाया ही जा सकता है।

  1. मनोविज्ञान हमें यह बताता है कि हम जिस भी रचना पर प्रतिबंध लगायेंगे, वह उतनी ही ज्यादा लोकप्रिय एवं ज्यादा से ज्यादा प्रचलित होगी।
  2. कोई भी लेखक यदि किसी देश/समाज की कुछ पुराना कुरीतियों को उजागर करता है तो वर्तमान पीढ़ियों को उन पर वैज्ञानिक, सकारात्मक तथा तार्किक दृष्टिकोण ही चाहिए। विचार करना
  3. हाँ, यहाँ एक बात अवश्य कहूँगा कि स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता में अंतर होता है। यह महादेवी जैसी विदूषी को भी ध्यान रखना होगा। कोई भी आधुनिक लेख करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं करें। अधिकार एवं कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं।

प्रश्न 21. “धर्म सूत्रों और धर्म शास्त्रों में वर्णों के चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका से जुड़े नियम भी मिलते हैं ।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

अथवा

धर्म सूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार आदर्श जीविका से जुड़े नियमों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर : (i)वर्ण व्यवस्था के दायरे में और उससे परे : धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक आदर्श व्यवस्था का उल्लेख किया गया था। ब्राह्मणों का यह मानना था कि यह व्यवस्था, जिसमें स्वय उन्हें पहला दर्जा प्राप्त है, एक दैवीय व्यवस्था है। शूद्रों और ‘अस्पृश्यों को सबसे निचले स्तर पर रखा जाता था। इस व्यवस्था में दर्जा संभवतः जन्म के अनुसार निर्धारित माना जाता था।
(ii) उचित जीविका : धर्म सूत्रों और धर्मशास्त्रों में चारों वर्गों के लिए आदर्श ‘जीविका’ से जुड़े कई नियम मिलते हैं। ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और दक्षिणा लेना था। क्षत्रियों का कर्म युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, न्याय करना, वेद पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना था। अतिम तीन कार्य वैश्यों के लिए भी थे। साथ ही उनसे कृषि, गोपालन और व्यापार का कर्म भी अपेक्षित था। शूद्रों के लिए मात्र एक ही जीविका थी-तीनों ‘उच्च’ वर्ण की सेवा करना।
(iii) ब्राह्मणनीति : इन नियमों का पालन करवाने के लिए मेज ब्राह्मणों ने दो-तीन नीतियों अपनाई। एक, यह बताया गया कि या व्यवस्था की उत्पत्ति एक दैवीय व्यवस्था है। दूसरा, वे शासकों को उपदेश देते थे कि इस व्यवस्था के नियमों का अपने राज्यों के अनुसरण करें। तीसरे, उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिलाने का प्रयल । किया कि उनकी प्रतिष्ठा जन्म पर आधारित है किन्तु ऐसा करना सरल बात नहीं थी। इसलिए इन मानदण्डों को बहुधा महाभारत जैसे अनेक ग्रंथों में वर्णित कहानियों के द्वारा बल प्रदान किया जाता था। यह

प्रश्न 22. “शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे।” यह बात सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य नहीं, सिद्ध करने के लिए प्रमाण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर : धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के मुताबिक सिर्फ क्षत्रिय ही शासक हो सकते थे, परंतु ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ इस परंपरा को नहीं माना गया और राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्णों से हुई है। मौर्य शासक संभवतः क्षत्रिय वर्ण से नहीं थे। ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार वे ‘निम्न’ कुल से आते हैं। हालाँकि बौद्ध ग्रंथों में उन्हें क्षत्रिय कहा गया है। इसी प्रकार, शुंग और कण्व शासक ब्राह्मण थे। शक शासकों को मलेच्छ माना जाता था। सातवाहन कुल के सबसे शक्तिशाली शासक गौतमी-पुत्र-सिरी सातकनि ने स्वयं को एक ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि शासक सिर्फ क्षत्रिय वर्ण के ही नहीं थे बल्कि वे अन्य वर्णों से भी आते थे।

प्रश्न 23, “जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया” कैसे थी? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी। सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक गोतमी-पुत्र सिरी-सातकनि ने अपने आपको विशिष्ट ब्राह्मण तथा क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। (ii) गोतमी-पुत्र सिरी-सातकनि ने यह भी कहा था कि चार वर्णों के मध्य वैवाहिक संबंध होने पर उसने रोक लगाई।
(ii) लेकिन शक राजा रुद्रदामन के परिवार से गोतमी-पुत्र सिरी-सातकनि ने विवाह संबंध कायम किए।
(iii) यद्यपि सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का कहते थे तथापि ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए। () सातवाहन शासक चतुर्वर्णी व्यवस्था की मर्यादा को बनाए रखने की बात कहते थे लेकिन वे उन लोगों से वैवाहिक संबंध भी कायम करते थे जो इस वर्ण व्यवस्था

प्रश्न 27. पुरातत्त्ववेत्ता बी.बी. लाल द्वारा हस्तिनापुर (जिला मेरठ-उ.प्र. ) नामक गाँव में किए गए उत्खनन से प्राप्त जानकारी की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : (i) पुरातत्त्ववेत्ता बी.बी. लाल ने 1951-52 में मेरठ जिले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नामक गाँव का उत्खनन किया। यह पुरास्थल कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी। इसका उल्लेख महाभारत में मिलता है।
(ii) बी.बी. लाल को यहाँ आबादी के पाँच स्तरों के सबूत मिले थे। इनमें दूसरा तथा तीसरा स्तर हमारे विश्लेषण के लिए महत्त्वपूर्ण है।
(iii) लगभग 12वीं से 7वीं सदी ई.पू. के दूसरे स्तर पर मिलने वाले घरों के बारे में बी.बी. लाल का कहना है कि, “जिस सीमित. क्षेत्र का उत्खनन हुआ वहाँ से आवास गृहों की कोई निश्चित परियोजना नहीं मिलती किंतु मिट्टी की बनी दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटं अवश्य मिलती हैं। सरकंडे की छाप वाले मिट्टी के पलस्तर की खोज इस बात की ओर संकेत करती है कि कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की बनी थीं जिन पर मिट्टी का पलस्तर चढ़ा दिया जाता था।”
(iv) तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) के बारे में बी.बी. लाल का मत है कि, “तृतीय काल के घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने थे। “
(v) तीसरे स्तर के उत्खनन के बारे में लाल का कहना है कि “इनमें शोषक-घट और ईंटों के नाले गंदे पानी के निकास के लिए प्रयोग किए जाते थे तथा वलय-कूपों का प्रयोग, कुओं और मल 1. की निकासी वाले गत्तों, दोनों ही रूपों में किया जाता था।”

प्रश्न 28. ‘महाभारत’ बदलते रिश्तों की एक कहानी है। स्पष्ट कीजिए। इसने पितृवंशिकता के आदर्श को कैसे सुदृढ़ किया ?

अथवा

महाभारत के संदर्भ में बंधुता के रिश्तों में किस प्रकार परिवर्तन आया ? वर्णन कीजिए।
उत्तर : महाभारत वास्तव में ही बदलते रिश्तों की एक कहानी है। यह चचेरे भाइयों के दो दलों-कौरवों और पांडवों के बीच भूमि और सत्ता को लेकर हुए संघर्ष का वर्णन करती है दोनों ही दल कुरु वंश से संबंधित थे जिनका कुरु जनपद पर शासन था। उनके संघर्ष ने अंततः एक युद्ध का रूप ले लिया जिसमें पांडव विजयी हुए। इसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार की उद्घोषणा की गयी। भले ही पितृवंशिकता की परंपरा महाकाव्य की रचना से पहले भी प्रचलित थी, परंतु महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। पितृवंशिकता के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद उसके पुत्र उसके संसाधनों पर अधिकार जमा सकते थे। राजाओं के संदर्भ में राजसिंहासन भी शामिल था।

प्रश्न 29. परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने महाभारत की सभी पांडुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोकों की तुलना करने का क्या तरीका ढूँढ निकाला? संक्षेप में वर्णन कीजिए। उनकी खोज का क्या परिणाम निकला ?

उत्तर : महाभारत की पांडुलिपियों पर विद्वानों ने जो काम किया, उन्होंने पाया कि मौलिक महाभारत की पांडुलिपियाँ जिनका वे प्रयोग कर रहे हैं, संस्कृत में हैं किंतु महाभारत में प्रयुक्त संस्कृत वेदों अथवा प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है।
इतिहासकार इस ग्रंथ की विषयवस्तु को दो मुख्य शीर्षकों आख्यान तथा उपदेशात्मक के अंतर्गत रखते हैं। आख्यान में कहानियों का संग्रह है और उपदेशात्मक भाग में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण है। किंतु यह विभाजन पूरी तरह अपने में एकाकी नहीं है-उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं और बहुधा आख्यानों में समाज के लिए एक सबक निहित रहता है। अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुतः मूल भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।
आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत को ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया है। इस शब्द का अर्थ हैं : ‘ऐसा ही था’। क्या महाभारत में, सचमुच में हुए किसी युद्ध का स्मरण किया जा रहा था ? इस बारे में इस निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति ही महाभारत का मुख्य कथानक है। अन्य इस बात की ओर इंगित करते हैं कि हमें युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती।

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