Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 3 Important Question Answer 3 Marks बंधुत्व, जाति तथा वर्ग (आरंभिक समाज)

प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्त्वपूर्ण रही होगी?
उत्तर : पितृवंशिकता से अभिप्राय ऐसी वंश परंपरा से है जो पिता के पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है। विशिष्ट परिवारों में शासक परिवार तथा धनी लोगों के परिवार शामिल हैं। इन परिवारों में पितृवंशिकता निम्नलिखित दो कारणों से अनिवार्य रही होगी
1.वंश परंपरा को चलाने के लिए : धर्म सूत्रों के अनुसार वंश को पुत्र ही आगे पढ़ाते हैं, पुत्रियाँ नहीं। इसलिए प्रायः सभी परिवारों में उत्तम पुत्रों की प्राप्ति की कामना की जाती थी। यह बात ऋग्वेद के एक मंत्र से स्पष्ट हो जाती है। इसमें पुत्री के विवाह के समय पिता कामना करता है कि इंद्र के अनुग्रह से उसकी पुत्री को उत्तम मृत्यु की प्राप्ति हो।
2.उत्तराधिकार संबंधी झगड़ों से बचने के लिए : माता-पिता नहीं चाहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार में संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए कोई झगड़ा हो। राज परिवारों के संदर्भ में उत्तराधिकार में राजगद्दी भी शामिल थी। राजा की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र राजगद्दी का उत्तराधिकारी बन जाता था। इसी प्रकार माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति को उनके पुत्रों में बाँट दिया जाता था अतः अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई. पू. से ही पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण रहे थे हालांकि इस प्रथा में विभिन्नता थी।
(i) पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बन जाता था।
(ii) कभी-कभी सगे-संबंधी सिंहासन पर अपना अधिकार जमा लेते थे।
(iii) कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं। प्रभावती गुप्त इसका उदाहरण है।

प्रश्न 2. क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय होते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर : धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के मुताबिक सिर्फ क्षत्रिय ही शासक हो सकते थे, परंतु ऐसे कई उदाहरण है जहाँ इस परंपरा को नहीं माना गया और राजवंशों की उत्पत्ति उन्य वर्णों से हुई है। मौर्य शासक सम्भवतः क्षत्रिय वर्ण से नहीं थे। ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार वे ‘निम्न’ कुल से आते हैं। हालाँकि बौद्ध ग्रंथों में उन्हें क्षत्रिय कहा गया है। इसी प्रकार, शुंग और कण्व शासक ब्राह्मण थे। शक शासकों को मलेच्छ माना जाता था। सातवाहन कुल के सबसे शक्तिशाली शासक गौतमी-पुत्र-सिरी सातकनि ने स्वयं को एक ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि शासक सिर्फ क्षत्रिय वर्ण के ही नहीं थे बल्कि वे अन्य वर्गों से भी आते थे।

प्रश्न 3. द्रोण, हिडिंबा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : द्रोण : द्रोण एक ब्राह्मण थे जो कुरु वंश के राजकुमारों को धनुर्विद्या की शिक्षा देते थे। धर्मसूत्रों के अनुसार शिक्षा देना ब्राह्मण का कर्म था। इस प्रकार द्रोण अपने धर्म का पालन कर रहे थे। उस समय निषाद शिक्षा नहीं पा सकते थे। इसलिए उन्होंने एकलव्य को अपना शिष्य नहीं बनाया परंतु उससे गुरुदक्षिणा में दायें हाथ का अंगूठा ले लेना धर्म के विपरीत था। इसका अर्थ यह हुआ कि उन्होंने आखिर उसे अपना शिष्य मान लिया। वास्तव में यह उनका स्वार्थ था। उन्होंने अर्जुन को दिए गए अपने वचन को निभाने के लिए ऐसा तुच्छ काम किया। वह नहीं चाहते थे कि संसार में अर्जुन से बढ़कर कोई धनुर्धारी हो।
हिडिंबा : हिडिंबा एक राक्षसिनी थी। राक्षसों को नरभक्षी बताया गया है। उसके भाई ने उसे पांडवों को पकड़कर लाने का आदेश दिया था, ताकि वह उन्हें अपना आहार बना सके परंतु उसने अपने धर्म का पालन नहीं किया। उसने पांडवों को पकड़ कर लाने की बजाय भीम से विवाह कर लिया और एक पुत्र को जन्म दिया। इस प्रकार उसने राक्षस कुल की मर्यादा को भंग किया।मातंग : मातंग बोधिसत्व थे जिन्होंने एक चांडाल के घर जन्म लिया था। उनका विवाह एक व्यापारी की पुत्री दिथ्य से हुआ था। उनके यहाँ एक पुत्र हुआ जिसका नाम मांडव्यकुमार था। मांडव्य बड़ा होने पर तीन वेदों का ज्ञाता बना। वह प्रतिदिन 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था परंतु एक दिन जब उसका पिता (मातंग) फटे-पुराने वस्त्रों में उसके द्वार पर आया और उससे भोजन माँगा, तो उसने भोजन देने से इंकार कर दिया। उसने मातंग को पतित कहकर उसे अपमानित किया। अतः मातंग आकाश में अदृश्य हो गए। इस घटना का पता जब दिथ्य को चला, तो मातंग से माफी मांगने के लिए उसके पीछे आई। इस प्रकार उसने अपना पत्नी-धर्म निभाया परंतु मांडव्य के व्यवहार से घमंड झलकता है। दानी व्यक्ति तो उदार होता है, परंतु मांडव्य ने उदारता की मर्यादा अथवा धर्म का पालन नहीं किया।

प्रश्न 4. किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था ?
उत्तर : ऋग्वेद के ‘पुरुषसूक्त’ के अनुसार समाज में चार वर्णों की उत्पत्ति आदि मानव ‘पुरुष’ की बलि से हुई थी। ये वर्ण थे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। इन वर्णों के अलग-अलग कार्य थे। ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। वे धर्मशास्त्रों के अध्ययन तथा शिक्षण का कार्य करते थे। क्षत्रिय वीर योद्धा थे। वे. शासन चलाते थे वैश्य व्यापार करते थे। शूद्रों का काम अन्य तीन वर्णों की सेवा करना था। इस प्रकार समाज में विषमता व्याप्त थी। इस व्यवस्था में सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार जन्म था।
बौद्ध अवधारणा इस सामाजिक अनुबंध के विपरीत थी। उन्होंने इस बात को तो स्वीकार किया कि समाज में विषमता विद्यमान थी परंतु उनके अनुसार यह विषमा न तो प्राकृतिक थी और न ही स्थायी। उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को भी अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 5. निम्नलिखित अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए
निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं :
संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ… मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं. सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पलियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”… मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिाएगा… सुंदर, सुगंधित, सुवैशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिए गा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा…

इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए -उम्र, लिंग, भेद व बंधुत्व के संदर्भ में । क्या कोई अन्य आधार भा है? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?
उत्तर : उम्र, लिंग, भेद तथा बंधुत्व के अतिरिक्त इस सूची को बनाने के कई अन्य आधार भी हैं: जैसे–गुरुजनों के प्रति सम्मान, वीर योद्धाओं, दासियों यहाँ तक कि दासी-पुत्रों के प्रात सम्मान आदि। इस सभी को सूची में उनके सामाजिक स्तर को ध्यान में रखते हुए उन्हें एक विशेष क्रम में रखा गया है। () सर्वप्रथम समाज में सबसे अधिक प्र तिष्ठित ब्राह्मणों, पुरोहित तथा गुरुजनों के प्रति सम्मान दर्शाया गया है।
(i) दूसरे स्थान पर माता-पिता समान वृद्ध बांधवों के प्रति आदर व्यक्त किया गया है।
(ii) इसके बाद अपने से छोटे अथवा एक समान आयु क बंधु-बांधवों को स्थान दिया गया है। (iv) इसी क्रम में युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन किया गया है।
(v) तत्पश्चात् नारी वर्ग को स्थान दिया गया है। इस क्रम में माताएँ, पलियाँ, कुलवधुएँ तथा पुत्रियाँ आती हैं। नारी वर्ग में अंतिम स्थान पर सुंदर-सुगंधित गणिकाओं, दासियों तथा उनकी संतानों को रखा गया है।
(v) अपाहिजों तथा विकलांगों की भी उपेक्षा नहीं की गई है। युधिष्ठिर उन्हें भी नमस्कार करते हैं

प्रश्न 6. भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि “चूँकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं” (वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।” चर्चा कीजिए।निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि सम्मान का अधिकारी समाज का प्रत्येक व्यक्ति होता है क्योंकि समाज के निर्माण में सभी का योगदान होता है।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है और तत्कालीन भारतीय समाज तथा जनजीवन के सभी पक्षों की एक सुंदर झाँकी प्रस्तुत करते है।

इसमें भारतीयों की आत्मा की गहराइयों तक बसी प्रत्येक बात तथा सोच का वर्णन मिलता है। यह महाकाव्य भारतीयों के जीवन कपर निम्नलिखित प्रकाश डालता है

1.सामाजिक जीवन

1.चार वर्ण : समाज चार वर्गों में बँटा हुआ था। वर्ण-व्यवस्था अधिक कठोर नहीं थी। लोगों के लिए अपना पैतृक व्यवसाय अपनाना आवश्यक नहीं था। उदाहरण के लिए परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय कहलाए। उस समय के समाज में ब्राह्मणों को सर्वोच्च स्थान भी प्राप्त नहीं था।
2.स्त्रियों की दशा : स्त्रियों की दशा अच्छी थी। समाज में उनका बड़ा आदर था। ‘स्वयंवर’ की प्रथा के अनुसार उन्हें अपना वर स्वयं चुनने का अधिकार था।
3.वीरता का युग : महाभारत का काल वीरता का युग था। युद्ध में वीरगति प्राप्त करना गर्व का विषय समझा जाता था। लोगों का विश्वास था कि युद्ध में मरने वाला व्यक्ति सीधा स्वर्ग में जाता है। उस समय निर्बल की रक्षा करना भी बड़ी वीरता का कार्य समझा जाता था।
4.सामाजिक बुराइयाँ : इस काल के समाज में कुछ बुराइयाँ भी थीं। इनमें से जुआ खेलना, बहु-विवाह, शत्रुओं से धोखा करना आदि बातें प्रमुख थीं।

2.राजनीतिक जीवन

1.विशाल साम्राज्य : इस काल में अनेक विशाल साम्राज्य स्थापित हो चुके थे। इन राज्यों में पाँडु, कौशल, पांचाल आदि राज्य प्रमुख थे।
2.राजा की शक्तियाँ : ‘उस समय राज्य का मुखिया राजा होता था। राज्य की सभी शक्तियाँ उसी के हाथ में थीं। इन शक्तियों पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं थी। भले ही शासन कार्यों में राजा को सलाह देने के लिए अनेक मंत्री थे, फिर भी उनकी सलाह मानना राजा के लिए आवश्यक नहीं था।
3.राजा का जीवन : और काल में राजा बड़े ठाठ-बाठ रहते थे। उनके महल बड़े शानदार होते थे। वे अनेक उपाधियाँ धारण करते थे। चक्रवर्ती सम्राट बनना उनकी बहुत बड़ी इच्छा होती थी। इस उद्देश्य से वे अश्वमेध यज्ञ रचाया करते थे। उन राजाओं में अनेक अवगुण भी थे। उनके दरबार में अनेक नाचने-गाने वाली नर्तकियाँ होती थीं। शराब पीना और जुआ खेलना आदि बुराइयाँ भी उनके चरित्र में शामिल थीं।

3.आर्थिक जीवन

1.कृषि : इस काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि करना था। यहाँ तक कि स्वयं राजा लोग भी हल चलाया करते थे। उस समय भूमि बड़ी उपजाऊ थी।
2.पशु-पालन : पशु-पालन लोगो का दूसरा मुख्य व्यवसाय था। उस समय के पालतू पशुओं में गाय, बैल, घोड़े तथा हाथी मुख्य थे।
3.व्यापार : इस काल में व्यापार काफी उन्नत था। व्यापारियों ने अपने संघ (गिल्ड्स) बनाए हुए थे। उन्हें राज्य की ओर से अनेक सुविधाएँ प्राप्त थीं।
4.अन्य व्यवसाय : पीछे दिए गए व्यवसायों के अतिरिक्त कुछ लोग बढ़ई, लुहार, सुनार तथा रंगसाजी आदि का कार्य भी करते थे।

4.धार्मिक जीवन

1.नए देवी-देवताओं की पूजा : महाभारत काल में वैदिक आर्यों के देवी-देवताओं के साथ-साथ कुछ नए देवी-देवताओं की पूजा भी की जाने लगी। इनमें से पार्वती, दुर्गा, विष्णु ब्रह्मा आदि प्रमुख थे।
2.अवतारवाद में विश्वास : इस काल में लोग अवतारवाद में विश्वास रखने लगे थे। राम, कृष्ण आदि को विष्णु का अवतार मानकर उसकी पूजा की जाने लगी।
3.कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म : इस काल में लोग कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म में बड़ा विश्वास रखते थे। उनका विश्वास था कि प्रत्येक मनुष्य को अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल अगले जन्म में अवश्य भोगना पड़ता है।
4.यज्ञों पर बल : महाकाव्य काल में लोग यज्ञों पर बड़ा बल देते थे। यज्ञों की अनेक विधियाँ आरंभ हो गई थीं। राजा लोग यज्ञों के अवसर पर दिल खोलकर दान देते थे।सच तो यह है कि महाभारत में अन्य महाकाव्यों की भाँति युद्धों, वनों, राजमहलों तथा बस्तियों का बहुत ही सजीव चित्रण है। महाभारत का सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्व है। इस ग्रंथ ने मूर्तिकारों, नाटकों तथा कलाओं के लिए विषय-वस्तु प्रदान की।

प्रश्न 7. क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था ? चर्चा कीजिए।
उत्तर : संभवत: महाभारत के मूल कथा के रचयिता भार सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था। ये क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय तथा उपलब्धियों के बारे में कविताएँ लिखा करते थे। इन रचनाओं का प्रेषण मौखिक रूप में हुआ। पाँचवीं शताब्दी ई. पू. से ब्राह्मणों द्वारा इस कथा परंपरा पर अपना अधिकार कर लिया गया और इसे लिखा गया। यह वह काल था जब कुरू और पांचाल जिनके इर्द-गिर्द महाभारत की कथा घूमती है, मात्र सरदारी से राजतंत्र के रूप में उभर रहे थे। ऐसा हो सकता है कि नए-नए राज्यों की स्थापना के समय होने वाली उथल-पुथल के कारण पुराने सामाजिक मूल्यों की जगह नवीन मानदंडों की स्थापना हुई जिनका इस कहानी के कुछ भागों में वर्णन किया गया है। लगभग 200 ई. पू. से 200 ईसवी के बीच इस ग्रंथ के रचनाकाल का एक और चरण देखते हैं। यह वह काल था जब विष्णु देवता की आराधना प्रभावी हो रही थी तथा श्रीकृष्ण को जो इस महाकाव्य के महत्त्वपूर्ण नायकों में से हैं, उन्हें विष्णु का रूप बताया जा रहा था। लग 200-400 ईसवी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते वृहत उपदेशात्मक प्रकरण को महाभारत में जोड़ा गया। इन सब परिवर्धनों के कारण जो ग्रंथ अपने प्रारंभिक रूप में शायद 10,000 श्लाकों से भी कम का था, बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा के अनुसार इस बृहत रचना के रचयिता ऋषि व्यास को माना गया है।

प्रश्न 8, आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के सभी संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर : आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताओं के तीन मुख्य कारण थे-
(1) लैंगिक असमानता पितृवंशिक व्यवस्था
(2) स्त्री का गोत्र
(3) संपत्ति का अधिकार।

  1. लैंगिक असमानता : आरंभिक समाज पुरुष प्रधान था जो पितृवंशिक परंपरा के अनुसार चलता था। अतः सभी परिवारों में पुत्रों की ही कामना की जाती थी जो वंश परंपरा को आगे बढ़ाएँ। इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। यही अपेक्षा की जाती थी कि अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर दिया जाए। इस प्रथा को बहिर्विवाह-पद्धति कहते हैं। इसका तात्पर्य यह था कि प्रतिष्ठित परिवारों की युवा कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बड़ी सावधानी से नियमित किया जाता था ताकि ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इससे कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
  2. स्त्री का गोत्र : लगभग 1000 ई० पू० के बाद ब्राह्मणों ने (विशेष रूप से ब्राह्मणों को) गोत्र में वर्गीकृत किया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्त्वपूर्ण थे-
    (i)विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर अपने पति के गोत्र का माना जाता था।
    (ii) एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
    परंतु कुछ ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिनमें इन नियमों का पालन नहीं किया जाता था। उदाहरण के लिए कुछ सातवाहन राजाओं की एक से अधिक पलियाँ थीं। इन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनके नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से लिए गए थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे प्रतीत होता है कि इन रानियों ने विवाह के बाद अपने पति-कुल के गोत्र को ग्रहण करने की बजाय अपने पिता के गोत्र को ही बनाए रखा। यह भी पता चलता है कि कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं। यह तथ्य बहिर्विवाह-पद्धति के नियमों के विरुद्ध था। यह तथ्य वास्तव में एक वैकल्पिक प्रथा अंतर्विवाह-पद्धति अर्थात् बंधुओं में विवाह संबंध को दर्शाता है । इस विवाह-पद्धति का प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में आज भी है। ऐसे विवाह संबंधों से सुगठित समुदायों को बल मिलता था।
    सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम से चिह्नित किया जाता था। इससे तो यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्त्वपूर्ण थीं परंतु इस निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तरराधिकार प्रायः पितृवंशिक होता था।
  3. संपत्ति का अधिकार : मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का सभी पुत्रों में समान रूप से की बँटवारा किया जाना चाहिए। परंतु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन में भागीदारी की माँग नहीं कर सकती थीं परंतु विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व होता था। इसे स्त्रीधन (अर्थात् स्त्री का धन) कहा जाता था। इस संपत्ति को उनकी संतान. विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी। इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था। परंतु मनुस्मृति स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना पारिवारिक संपत्ति अथवा स्वयं अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को गुप्त रूप से इकट्ठा करने से भी रोकती थी। कुछ साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यद्धपि
  1. लैंगिक असमानता : आरंभिक समाज पुरुष प्रधान था जो पितृवंशिक परंपरा के अनुसार चलता था। अतः सभी परिवारों में पुत्रों की ही कामना की जाती थी जो वंश परंपरा को आगे बढ़ाएँ। इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। यही अपेक्षा की जाती थी कि अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर दिया जाए। इस प्रथा को बहिर्विवाह-पद्धति कहते हैं। इसका तात्पर्य यह था कि प्रतिष्ठित परिवारों की युवा कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बड़ी सावधानी से नियमित किया जाता था ताकि ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इससे कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
  2. स्त्री का गोत्र : लगभग 1000 ई० पू० के बाद ब्राह्मणों ने (विशेष रूप से ब्राह्मणों को) गोत्र में वर्गीकृत किया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्त्वपूर्ण थे-
    (i)विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर अपने पति के गोत्र का माना जाता था।
    (ii) एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
    परंतु कुछ ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिनमें इन नियमों का पालन नहीं किया जाता था। उदाहरण के लिए कुछ सातवाहन राजाओं की एक से अधिक पलियाँ थीं। इन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनके नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से लिए गए थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे प्रतीत होता है कि इन रानियों ने विवाह के बाद अपने पति-कुल के गोत्र को ग्रहण करने की बजाय अपने पिता के गोत्र को ही बनाए रखा। यह भी पता चलता है कि कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं। यह तथ्य बहिर्विवाह-पद्धति के नियमों के विरुद्ध था। यह तथ्य वास्तव में एक वैकल्पिक प्रथा अंतर्विवाह-पद्धति अर्थात् बंधुओं में विवाह संबंध को दर्शाता है । इस विवाह-पद्धति का प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में आज भी है। ऐसे विवाह संबंधों से सुगठित समुदायों को बल मिलता था।
    सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम से चिह्नित किया जाता था। इससे तो यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्त्वपूर्ण थीं परंतु इस निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तरराधिकार प्रायः पितृवंशिक होता था।
  3. संपत्ति का अधिकार : मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का सभी पुत्रों में समान रूप से की बँटवारा किया जाना चाहिए। परंतु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन में भागीदारी की माँग नहीं कर सकती थीं परंतु विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व होता था। इसे स्त्रीधन (अर्थात् स्त्री का धन) कहा जाता था। इस संपत्ति को उनकी संतान. विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी। इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था। परंतु मनुस्मृति स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना पारिवारिक संपत्ति अथवा स्वयं अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को गुप्त रूप से इकट्ठा करने से भी रोकती थी। कुछ साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यद्धपि
  1. लैंगिक असमानता : आरंभिक समाज पुरुष प्रधान था जो पितृवंशिक परंपरा के अनुसार चलता था। अतः सभी परिवारों में पुत्रों की ही कामना की जाती थी जो वंश परंपरा को आगे बढ़ाएँ। इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। यही अपेक्षा की जाती थी कि अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर दिया जाए। इस प्रथा को बहिर्विवाह-पद्धति कहते हैं। इसका तात्पर्य यह था कि प्रतिष्ठित परिवारों की युवा कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बड़ी सावधानी से नियमित किया जाता था ताकि ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इससे कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
  2. स्त्री का गोत्र : लगभग 1000 ई० पू० के बाद ब्राह्मणों ने (विशेष रूप से ब्राह्मणों को) गोत्र में वर्गीकृत किया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्त्वपूर्ण थे-
    (i)विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर अपने पति के गोत्र का माना जाता था।
    (ii) एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
    परंतु कुछ ऐसे साक्ष्य मिलते हैं जिनमें इन नियमों का पालन नहीं किया जाता था। उदाहरण के लिए कुछ सातवाहन राजाओं की एक से अधिक पलियाँ थीं। इन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनके नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से लिए गए थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे प्रतीत होता है कि इन रानियों ने विवाह के बाद अपने पति-कुल के गोत्र को ग्रहण करने की बजाय अपने पिता के गोत्र को ही बनाए रखा। यह भी पता चलता है कि कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं। यह तथ्य बहिर्विवाह-पद्धति के नियमों के विरुद्ध था। यह तथ्य वास्तव में एक वैकल्पिक प्रथा अंतर्विवाह-पद्धति अर्थात् बंधुओं में विवाह संबंध को दर्शाता है । इस विवाह-पद्धति का प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में आज भी है। ऐसे विवाह संबंधों से सुगठित समुदायों को बल मिलता था।
    सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम से चिह्नित किया जाता था। इससे तो यह प्रतीत होता है कि माताएँ महत्त्वपूर्ण थीं परंतु इस निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तरराधिकार प्रायः पितृवंशिक होता था।
  3. संपत्ति का अधिकार : मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का सभी पुत्रों में समान रूप से की बँटवारा किया जाना चाहिए। परंतु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन में भागीदारी की माँग नहीं कर सकती थीं परंतु विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व होता था। इसे स्त्रीधन (अर्थात् स्त्री का धन) कहा जाता था। इस संपत्ति को उनकी संतान. विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी। इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था। परंतु मनुस्मृति स्त्रियों को पति की अनुमति के बिना पारिवारिक संपत्ति अथवा स्वयं अपनी बहुमूल्य वस्तुओं को गुप्त रूप से इकट्ठा करने से भी रोकती थी। कुछ साक्ष्य इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यद्धपि उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर अपनी पहुँच रखती थी, तो भी भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था। दूसरे शब्द में, स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक स्थिति की भिन्नता संसाधन पर उनके नियंत्रण की भिन्नता के कारण ही व्यापाक हुई थी।

    प्रश्न 9. उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते है कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्व अनुसरण नहीं होता था।

उत्तर : (क) बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण होता था, ऐसा नहीं था। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें संबंधी के नाम से जाना जाता है। इन्हें जाति समूह’ भी कहा जाता है। पारिवारिक संबंध स्वाभाविक और रक्त संबंध माने जाते हैं। कुछ समाजों में भाई -बहन (च्चेरे, मौसेर आदि) से खून का रिश्ता माना जाता है लेकिन अन्य समाज ऐसा नहीं मानते।
(ख) पितृवंशिकता में पुत्र का पिता की मृत्यु के पश्चात् उनके समस्त संसाधनों पर अधिकार हो जाता है। पुत्र के न होने की स्थिति में एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी हो जाता था। इसी प्रकार कभी-कभार बंधु-बांधव भी सिंहासन पर अपना अधिकार जमा लेते थे।
(ग) कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियां सत्ता का उपभोग करती थीं, जैसे-गुप्त साम्राज्य की प्रभावती गुप्त।
(घ) प्रतिष्ठित परिवार अपनी कन्याओं और स्त्रियों के जीवन पर विशेष ध्यान देते थे। आगे चलकर कन्यादान पिता का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य मान लिया गया। नगरीकरण के साथ विचारों का आदान-प्रदान तेज हो गया। परिणामस्वरूप आरम्भिक विश्वासों को मान्यता मिलनी कम हो गई और लोगों ने स्वयंवर प्रथा को अपना लिया।
(ङ) धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को अपनी स्वीकृति देते हैं। इनमें से प्रथम चार ‘उत्तम’ माने जाते थे और शेष चार को निंदित माना गया। संभवत: ये चार विवाह पद्धतियाँ उन लोगों में प्रचलित थी जो ब्राह्मणीय नियमों को नहीं मानते थे।
(च) ब्राह्मणीय नियमों के अनुसार स्त्रियाँ अपने पति का गोत्र धारण करती थीं, परंतु सातवाहन शासक की महारानियों ने अपने पिता के गोत्र को अपनाया था।

प्रश्न 11. अन्य भाषाओं में महाभारत की पुनर्व्याख्या के बारे में जानिये। इस अध्याय में वर्णित महाभारत के किन्हीं दो प्रसंगों का इन भिन्न भाषा वाले ग्रंथों में किस तरह निरूपण हुआ है उनकी चर्चा कीजिए । जो भी समानता और विभिन्नता आप इन वृत्तांत में देखते हैं उन्हें स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : स्वयं अध्ययन (Self study)।

प्रश्न 12. कल्पना कीजिए कि आप एक लेखक हैं और एकलव्य की कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखिए।
उत्तर : स्वयं अध्ययन (Self study)।

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