शासक और इतिवृत > मुग़ल शासक और साम्राज्य

स्त्रोत - क्रोनिकल्स (इतिवृत/इतिहास)

  • नियुक्त शासक होने की दृष्टि के प्रसार प्रचार का तरीका
  • दरबारी इतिहासकारों को विवरण लेखन का कार्य सौंपा गया
  • बादशाह के समय की घटनाओं का लेखा जोखा दिया गया
  • शासन में मदद के लिए ढेरों जानकारियां इक्कट्ठा की गयीं
  • घटनाओं का अनवरत कालानुक्रमिक विवरण
  • अपरिहार्य स्त्रोत
  • तथ्यात्मक सूचनाओं का खजाना
  • मूल-पाठों का उद्देश्य – उन आशयों को संप्रेषित करना था जिन्हें मुग़ल शासक अपने क्षेत्र में लागू करना चाहते थे
  • इनसे झलक मिलती है – कैसे शाही विचारधाराएँ रची और प्रचारित की जाती थीं.

मुग़ल शासक और साम्राज्य

  • मुग़ल और तैमूर नाम
  • पहला तैमूर शासक बाबर चंगेज खान का सम्बन्धी था
  • 16वीं शताब्दी में यूरोपियों ने शासकों का वर्णन करने के लिए मुग़ल शब्द का प्रयोग किया  | 
  • रडयार्ड किपलिंग की पुस्तक में युवा नायक मोगली

ज़हीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ बाबर की उपलब्धियां

  • महज़ 12 वर्ष की आयु में फ़रगना घाटी का शासक बन गया।
  • बाबर कुषाणों के बाद ऐसा पहला शासक हुआ जिसने काबुल एवं कंधार को अपने पूर्ण नियंत्रण में रख सका।
  • भारत में अफ़ग़ान एवं राजपूत शक्ति को समाप्त कर ‘मुगल साम्राज्य’ की स्थापना की, जो लगभग 330 सालों तक चलता रहा।
  • हिंदुस्तान में पहली बार तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग बाबर ने किया।
  • हिंदुस्तान में पहली बार तोपखाने का प्रयोग बाबर ने किया
  • सड़कों की माप के लिए बाबर ने ‘गज़-ए-बाबरी’ के प्रयोग का शुभारम्भ किया।

नसीरुद्दीन हुमायूँ (1530-40, 1555-56)

हुमायूँ एक मुगल शासक था। प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर का पुत्र नसीरुद्दीन हुमायूँ था। यद्यपि उन के पास साम्राज्य बहुत साल तक नही रहा, पर मुग़ल साम्राज्य की नींव में हुमायूँ का योगदान है।

  • जन्म की तारीख और समय: 6 मार्च 1508, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान
  • मृत्यु की जगह और तारीख: 27 जनवरी 1556, दिल्ली
  • दफ़नाने की जगह: हुमायूँ का मकबरा, नई दिल्ली
  • बच्चे: अकबर, बख्शी बानो बेगम, ज़्यादा
  • पत्नी: माह चुचक बेगम (विवा. 1546), हमीदा बानो बेगम (विवा. 1541–1556), बेगा बेगम (विवा. 1527–1556)
  • माता-पिता: बाबर, महम बेगम
  • भाई: कामरान मिर्ज़ा, गुलबदन बेगम, ज़्यादा

जलालुद्दीन अकबर (1556-1605)

  • साम्राज्य का विस्तार, सुदृढीकरण किया
  • हिन्दुकुश पर्वत तक सीमाओं का विस्तार किया
  • सफाविओं और उज्बेकों की विस्तारवादी योजनाओं पर लगाम लगाया

जहाँगीर (1605-27)

  • शाह जहाँ पाँचवे मुग़ल शहंशाह था। शाह जहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज़ बेगम के लिए विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत ताज महल बनाने का यत्न किया।
  • जन्म की तारीख और समय: 5 जनवरी 1592, लाहौर, पाकिस्तान
  • मृत्यु की जगह और तारीख: 22 जनवरी 1666, आगरा फोर्ट, आगरा
  • दफ़नाने की जगह: ताज महल, आगरा
  • पत्नी: इज़्ज़-उन-निस्सा (विवा. 1617–1666), ज़्यादा
    बच्चे: औरंगज़ेब, जहाँनारा बेग़म, दारा सिकोह, ज़्यादा
  • दादा या नाना: अकबर, मरियम उज़-ज़मानी, मारवाड़ के उदय सिंह,

शाहजहाँ (1628-58)

  • शाह जहाँ पाँचवे मुग़ल शहंशाह था। शाह जहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभवविलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। किन्तु इतिहास में उनका नाम केवल इस कारण नहीं लिया जाता। शाहजहाँ का नाम एक ऐसे आशिक के तौर पर लिया जाता है जिसने अपनी बेग़म मुमताज़ बेगम के लिए विश्व की सबसे ख़ूबसूरत इमारत ताज महल बनाने का यत्न किया।
  • जन्म की तारीख और समय: 5 जनवरी 1592, लाहौर, पाकिस्तान
  • मृत्यु की जगह और तारीख: 22 जनवरी 1666, आगरा फोर्ट, आगरा
  • दफ़नाने की जगह: ताज महल, आगरा
  • पत्नी: इज़्ज़-उन-निस्सा (विवा. 1617–1666), ज़्यादा
  • बच्चे: औरंगज़ेब, जहाँनारा बेग़म, दारा सिकोह, ज़्यादा
    दादा या नाना: अकबर, मरियम उज़-ज़मानी, मारवाड़ के उदय सिंह,

औरंगजेब (1658-1707)

  • मुहिउद्दीन मोहम्मद, जिन्हें आम तौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर के नाम से जाना जाता था, भारत पर राज करने वाला छठा मुग़ल शासक था। उसका शासन 1658 से लेकर 1707 में उनकी मृत्यु तक चला। औरंगज़ेब ने भारतीय उपमहाद्वीप पर आधी सदी के लगभग समय तक राज किया। वो अकबर के बाद सबसे अधिक समय तक शासन करने वाला मुग़ल शासक था।
  • जन्म की तारीख और समय: 3 नवंबर 1618, दाहोद
  • मृत्यु की जगह और तारीख: 3 मार्च 1707, भिंगर, अहमदनगर
  • दफ़नाने की जगह: टॉम्ब ऑफ़ मुघल एम्पेरोर औरंगज़ेब आलमगीर, खुल्दाबाद
  • बच्चे: बहादुर शाह प्रथम, मुहम्मद अकबर, ज़्यादा
  • पत्नी: नवाब बाई (विवा. 1638–1691), ज़्यादा
  • किताबें: फ़तवा-ए-आलमगीरी
  • माता-पिता: शाह जहाँ, मुमताज़ महल

औरंगजेब की मृत्यु के बाद

  • 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई
  • राजनीतिक शक्तियां घटने लगीं
  • राजधानी नगरों से नियंत्रित विशाल साम्राज्य की जगह क्षेत्रीय शक्तियों ने अधिक स्वायतत्ता अर्जित की
  • अंतिम वंशज बहादुर शाह जफ़र 1857

Class 12th History Chapter 3 Important Question Answer 8 Marks बंधुत्व, जाति तथा वर्ग (आरंभिक समाज)

प्रश्न 1. प्राचीन भारत में विशेषकर लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक बंधुत्व से संबंधित कानूनों एवं परंपराओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : कानूनों और परंपराओं के अनुसार भारतीय समाज में बंधुत्व का संबंध विशेष रूप से दूसरे वर्ण अर्थात् श्रमिक से अधिक संबंधित रहा है क्योंकि ऐतिहासिक स्रोत विशिष्ट वर्गों विशेषकर राजनैतिक सत्ताधारियों से संबंधित रहे हैं। महाकाव्यों, साहित्यिक कृतियों, अभिलेखों, विशाल प्रतिमाओं आदि द्वारा क्षत्रियों के विषय में ही अधिक विस्तृत और क्रमिक जानकारी उपलब्ध है। प्रायः अन्य वर्णों विशेषकर साधारण जनता के विषय में प्रायः साहित्यिक स्रोत कम जानकारी देते हैं। क्षत्रिय वर्ण के लोग युद्ध करने, लोगों की रक्षा करने, न्याय देने और प्रशासन चलाने में व्यस्त रहते थे।
(i) क्षत्रियों के अनुसार समाज में वर्ण व्यवस्था ईश्वर के द्वारा निर्मित है। वे नरेशों की प्रशंसा करते थे और उन्हें परामर्श देते थे कि वह समाज में वर्ण व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने के लिए कानूनों और परंपराओं का पालन करें। ब्राह्मण सभी वणों के लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि उनकी सामाजिक स्थिति जन्म से ही निर्धारित हो जाती है। जिस वर्ण में वह पैदा हुए हैं वह वर्ण हो उनकी सामाजिक श्रेणी को तय करता है लेकिन समाज में बधुत्व को हमेशा निर्धारित करने के लिए जाति तथा वर्ण निर्धारण के लिए लोग स्वत: ही इसका अनुसरण नहीं करते थे। कई बार लिंग के आधार पर विषमताएँ, जाति तथा वर्ण के आधार पर निर्धारित व्यवस्थाओं को जबर्दस्ती लागू किया जाता था इससे संबंधित अनेक कहानियाँ या कथाएँ महाभारत में उल्लेखित हैं।
(ii) महाभारत में जो कुछ क्षेत्र के मैदान में लड़ा गया, उसका आधार या उसकी मुख्य कथा दो परिवारों के बीच हुए युद्ध का चित्रण है। इस ग्रंथ के कुछ भाग विभिन्न सामाजिक समुदायों के आचार-व्यवहार के मानदंड तय करते हैं। यदा-कदा (किन्तु हमेशा नहीं) इस ग्रंथ के मुख्य पात्र इन सामाजिक मानदंडों का अनुसरण करते हुए दिखाई पड़ते हैं।
(iii) प्रायः पारिवारिक जीवन को सहज ही स्वीकार कर लेते हैं किन्तु आपने देखा होगा कि सभी परिवार एक जैसे नहीं होते। पारिवारिक जनों की गिनती, एक-दूसरे से उनका रिश्ता और उनके क्रियाकलापों में भी भिन्नता होती है। कई बार एक ही परिवार के लोग भोजन और अन्य संसाधनों का आपस में मिल-बाँटकर इस्तेमाल करते हैं, एक साथ रहते और काम करते हैं और अनुष्ठानों को साथ ही संपादित करते हैं। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करें तो हम संबंधियों को जाति समूह कह सकते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘”नैसर्गिक’ और रक्त सम्बद्ध माने जाते हैं किन्तु इन संबंधों की परिभाषा अलग-अलग तरीके से की जाती है। कुछ समाजों में भाई-बहन (चचेरे, मौसेरे आदि) से खून का रिश्ता माना जाता है किन्तु अन्य समाज ऐसा नहीं मानते।
(iv) महाभारत का संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि बंधुत्व में संबंध राजनीतिक सत्ता का भूख, लालच और ईर्ष्या के कारण हिल जाते थे।

प्रश्न 2. महाभारत की सहृदयता की खोज पर एक लेख लिखिए। इस संदर्भ में बी. बी. लाल के योगदान का उल्लेख कीजिए।

अथवा

महाभारत काल के द्वितीय चरण में (बारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी ई.पू.) में मिलने वाले घरों के बारे में बी. बी. लाल ने क्या लिखा ? स्पष्ट कीजिए।
महाभारत की सदृश्यता की खोज में बी०बी० लाल के प्रयासों की चर्चा कीजिए।
उत्तर : अन्य प्रमुख महाकाव्यों की भाँति महाभारत में भी युद्धों, वनों, राजमहलों और बस्तियों का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। 1951-52 में पुरातत्ववेता बी०बी० लाल ने मेरठ जिले (उ० प्र०) के हस्तिनापुर नामक एक गाँव में खुदाई की। कोई नहीं कर सकता था कि यह गाँव महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर ही था या नहीं। फिर भी नामों की समानता मात्र एक संयोग हो सकता है परंतु गंगा के ऊपरी दोआब वाले क्षेत्र में इस पुरास्थल का होना, जहाँ कुरु राज्य भी स्थित था, इस ओर संकेत करता है कि संभवत: यही पुरास्थल कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो जिसका उल्लेख महाभारत में आता है।
आबादी के साक्ष्य : बी०बी० लाल को यहाँ आबादी के पाँच स्तरों के साक्ष्य मिले थे। इनमें से दूसरा और तीसरा स्तर हमारे विश्लेशण के लिए महत्त्वपूर्ण है। दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई० पू०) पर मिलने वाले घरों के बारे में लाल कहते हैं : “जिस सीमित क्षेत्र का उत्खनन हुआ वहाँ से घरों की कोई निश्चित परियोजना नहीं मिलती है। बस मिट्टी की बनी दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें ही मिलती हैं। सरकंडे की छाप वाले मिट्टी के पलस्तर की खोज इस बात की ओर संकेत करती है कि कुछ घेरों की दीवारें सरकंडों की बनी थीं जिन पर मिट्टी का पलस्तर चढ़ा दिया जाता था “
तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई० पू०) के लिए लाल कहते हैं कि तृतीय काल के घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने हुए थे। इनमें गंदे पानी के निकास के लिए सोखने वाले जार तथा ईंटों के नाले प्रयोग में लाए जाते थे वलय -कूपों का प्रयोग, कुओं और मल की निकासी वाले गतो दोनों ही रूपों में किया जाता था।
महाभारत के ‘आदिपर्वन’ में हस्तिनापुर का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है। यहाँ तक कि इसकी तुलना इंद्र की नगरी से की गई है। परंतु लगता है कि नगर का यह चित्रण महाकाव्य के मुख्य कथानक में बाद में उस समय जोड़ा गया होगा, जब इस क्षेत्र में नगरों का विकास हुआ यह भी संभव है कि यह मात्र कवियों की कल्पना की उड़ान थी जिसे अन्य किसी भी साक्ष्य द्वारा प्रमाणित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 3. उपमहाद्वीप में दो परस्पर भिन्न विशेषताएँ चार वर्णों से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं-प्रथम चार वर्णों के परे 1. एकीकरण और चार वर्णों के परे-अधीनता और संघर्ष दिखाई देता है। समझाइए।

उत्तर : प्रस्तावना : प्राचीन भारत के चार वर्णों से संबंधित ऊपर प्रश्न में उल्लेखित विशेषताओं का विवरण निम्न दो अनुच्छेदों में प्रस्तुत है। :
(i) चार वर्णों के परे : एकीकरण (Integration beyond the four arnas) : उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली विविधताओं की वजह से यहाँ हमेशा से ऐसे समुदाय रहे हैं जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। संस्कृत साहित्य में जब ऐसे समुदायों का उल्लेख आता है तो उन्हें कई बार विचित्र. असभ्य और पशुवत् चित्रित किया जाता है। ऐसे कुछ उदाहरण वन प्रांतर में बसने वाले लोगों के हैं जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह करना जीवन निर्वाह का महत्त्वपूर्ण साधन था। निषाद वर्ग, जिससे एकलव्य जुड़ा था, इसी का उदाहरण है।
यायावर पशुपालकों के समुदाय को भी शंका की दृष्टि से देखा जाता था, क्योंकि उन्हें आसानी से बसे हुए कृषिकर्मियों के साँचे के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता था। यदा-कदा उन लोगों को. जो असंस्कृत भाषी थे. उन्हें मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था किन्तु इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान प्रदान होता था। उनके संबंधों के स्वरूप के बारे में हमें महाभारत की कथाओं से ज्ञात होता है।
(ii)चार वर्णों के परे अधीनता और संघर्ष : ब्राह्मण कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था वाली सामाजिक प्रणाली के बाहर मानते थे। साथ ही उन्होंने समाज के कुछ वर्गों को ‘अस्पृश्य’ घोषित कर सामाजिक वैषम्य को और अधिक प्रखर बनाया। ब्राह्मणों का यह मानना था कि कुछ कर्म खासतौर से वे जो अनुष्ठानों के संपादन से जुड़े थे पुनीत और ‘ पवित्र’ थे, अत: अपने को पवित्र मानने वाले लोग अस्पृश्यों से भोजन नहीं स्वीकार करते थे। पवित्रता के इस पहलू के ठीक विपरीत कुछ कार्य ऐसे थे जिन्हें खासतौर से ‘ दूषित माना जाता था। शवों की अंत्येष्टि और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा जाता था। उन्हें वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था। वे लोग जो स्वयं को समाज में सबसे श्रेष्ठ पद पर आसीन देखते थे, इन चाण्डालों का स्पर्श यहाँ तक कि उन्हें देखना भी अपवित्रकारी मानते थे।
1.वंश परंपरा को चलाने के लिए : धर्म सूत्रों के अनुसार वंश को पुत्र ही आगे बढ़ाते हैं, पुत्रियाँ नहीं। इसलिए प्राय: सभी परिवारों में उत्तम पुत्रों की प्राप्ति की कामना की जाती थी। यह बात ऋग्वेद के एक मंत्र से स्पष्ट हो जाती है। इसमें पुत्री के विवाह एक समय पिता कामना करता है कि इंद्र के अनुग्रह से उसकी पुत्री को उत्तम मृत्यु की प्राप्ति हो।

2.उत्तराधिकार संबंधी झगड़ों से बचने के लिए : माता-पिता नहीं चाहते थे कि उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार में संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए कोई झगड़ा हो। राज परिवारों के संदर्भ में उत्तराधिकार में राजगद्दी भी शामिल थी। राजा की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र राजगद्दी का उत्तराधिकारी बन जाता था। इसी प्रकार माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति को उनके पुत्रों में बाँट दिया जाता था। अत: अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई. पू. से ही पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते आ रहे थे हालांकि इस प्रथा में निम्नलिखित विभिन्नताएँ भी थों :
(i) पुत्र के न होने पर एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बन जाता था।
(ii) कभी-कभी सगे-संबंधी सिंहासन पर अपना अधिकार जमा लेते थे।
(iii) कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं। प्रभावती गुप्त इसका उदाहरण है।
विवाह के नियम: जहाँ पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्त्वपूर्ण थे वहाँ इस व्यवस्था में पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था। पैतृक संसाधनों पर उनका कोई अधिकार नहीं था। अपने गोत्र से बाहर उनका विवाह कर देना ही वांछित था। इस प्रथा को बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं और इसका तात्पर्य यह था कि ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था जिससे ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह किया जा सके। इसका प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट को पिता का महत्त्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।

प्रश्न 5. महाभारत क्या है ? इसका समालोचनात्मक संस्करण कैसे तैयार हुआ ?
उत्तर : महाभारत उपमहाद्वीप के सबसे समृद्ध ग्रंथों (महाकाव्यों) में से एक है। इस महाकाव्य में अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से भी अधिक का संकलन है तथा विभिन्न सामाजिक श्रेणियों का लेखा-जोखा है। इस ग्रंथ की रचना लगभग 500 ई० पू० से एक हजार वर्ष तक होती रही। इसमें निहित कुछ कथाएँ तो इस काल से भी पहले प्रचलित थीं।महाभारत की मुख्य कथा का संबंध दो बांधव परिवारों के बीच हुआ युद्ध है। इस ग्रंथ के कुछ भाग विभिन्न सामाजिक समुदायों के आचार-व्यवहार के मानदंड तय करते हैं। इस ग्रंथ के मुख्य पात्र प्राय: इन सामाजिक मानदंडों का अनुसरण करते हुए दिखाई देते हैं।समालोचनात्मक संस्करण : 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी० एस० सुकथांकर के नेतृत्व में एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना आरंभ की गई। अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का निर्णय किया। सर्वप्रथम देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित किया गया।परियोजना पर काम करने वाले विद्वानों ने सभी पांडुलिपियों में पाए जाने वाले श्लोकों की तुलना करने का एक तरीका ढूँढ़ा। उन्होंने उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे। उन्होंने उनका प्रकाशन 13.009 पृष्ठों में फर्त अनेक ग्रंथ खंडों में किया। इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे। इस पूरी प्रक्रिया में दो बातें विशेष रूप से सामने आईं।
(1) पहली बात यह थी कि संस्कृत के पाठों के बहुत-से अंशों में समानता थी। यह समानता समूचे उपमहाद्वीप में उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में केरल तथा तमिलनाडु तक की सभी पांडुलिपियों में देखने में आई ।
(2) दूसरी बात यह थी कि कई शताब्दियों के दौरान महाभारत के प्रेषण में हुए अनेक क्षेत्रीय विभेद भी उभर कर सामने आए। इन विभेदों का संकलन मुख्य पाठ के फुटनोट्स तथा परिशिष्टों के रूप में किया गया| कुल 13 000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक पृष्ठों में इन्हीं विभेदों का ब्यौरा दिया गया है।देखा जाए तो ये विभेद उन गूढ प्रक्रियाओं के प्रतीक हैं जिन्होंने प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचारों एवं आचरण के बीच संवाद के माध्यम से सामाजिक इतिहासों को रूप दिया था। ये संवाद विरोध तथा सहमति दोनों को ही चित्रित करते हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं के बारे में हमारी जानकारी मुखतः उन संस्कृत ग्रंथों पर आधारित है जो ब्राह्मणों ने अपने लिए ही लिखे थे। 19वीं तथा 20वीं शताब्दी में इतिहासकारों ने पहली बार सामाजिक इतिहास के विभिन्न मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते समय इन ग्रंथों को ऊपरी तौर पर समझा। उनका विश्वास था कि इन ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा गया है, वास्तव में उसी तरह से उसे व्यवहार में लाया जाता रहा होगा।

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