Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 1 Important Question Answer 8 Marks राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 1. भारत की स्वतंत्रता के समय विकास के प्रश्न पर प्रमुख मतभेद क्या थे? इन मतभेदों को कैसे सुलझाया गया है ?
उत्तर : I. प्रमुख मतभेद : आजादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद निम्नलिखित थे :
विकास के क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि हो और सामाजिक न्याय भी मिले-इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार कौन-सी भूमिका. निभाए? इस सवाल पर मतभेद थे। क्या कोई ऐसा केंद्रीय संगठन जरूरी है जो पूरे देश के लिए योजना बनाए? क्या सरकार को कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग और व्यवसाय खुद चलाने चाहिए? अगर सामाजिक न्याय आर्थिक संवृद्धि की जरूरतों के आड़े आता हो तो ऐसी सूरत में सामाजिक न्याय पर कितना जोर देना उचित होगा?
II. उपर्युक्त में से कुछ प्रश्न आंशिक तौर पर सुलझा लिए गए हैं लेकिन कुछ अभी भी बाकी हैं।
(i) सभी विचारधारा के नेतागण और राजनीतिक दल आर्थिक समृद्धि और आर्थिक-सामाजिक दोनों तरह के न्याय की बात करते हैं।
(ii) सभी इस बात पर आज भी सहमत हैं कि देश के व्यापार, उद्योगों और कृषि को क्रमशः व्यापारियों, उद्योगपतियों और किसानों के भरोसे पूरी तरह नहीं छोड़ा जा सकता।
(iii) सरकार ने सन् 1947 से लेकर 1990 के दशक के शुरू होने से पहले आर्थिक विकास में प्रमुख भूमिका निभाई लेकिन 1990 के दशक से लेकर वर्ष 2012 तक हम यह कह सकते हैं कि मिश्रित नीति छोड़ दी गई है और देश में नई आर्थिक नीति अपनाई जा रही है लेकिन नियोजन की नीति को छोड़ा नहीं गया। अब भी उसके उद्योगों में सरकार का एकाधिकार है; जैसे रेलवे उद्योग, लेकिन धीरे-धीरे अनेक उद्योगों में सहकारी हिस्सों को बेचा जा रहा है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के अन्तर्गत देशी और विदेशी पूँजीपतियों, कंपनियों के हिस्से और निवेश को निरंतर बढ़ाया जा रहा है।

प्रश्न 2. स्वतंत्रता के समय, भारत को किन चार मुख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा ? स्पष्ट कीजिए।

अथवा

भारत एक नए राष्ट्र के रूप में निर्माण हेतु किन तीन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वतंत्रता के बाद बाध्य हुआ ? उनका विवरण दीजिए |

अथवा

एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में भारत को किन तीन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
उत्तर : स्वतंत्रता के समय भारत को निम्नलिखित चार चुनौतियों का सामना करना पड़ा :
(i) एकता के सूत्र में बाँधना : पहली और तात्कालिक चुनौती एकता के सूत्र में बँधे एक ऐसे भारत को गढ़ने की थी जिसमें भारतीय समाज की सारी विविधताओं के लिए स्थान हो । भारत अपने आकार और विविधता में किसी महादेश के बराबर था। यहाँ अलग-अलग बोली बोलने वाले लोग थे, उनकी संस्कृति अलग थी और वे अलग-अलग धर्मों के अनुयायी थे। उस वक्त आमतौर पर यही माना जा रहा था कि इतनी विविधताओं (diversities) से भरा कोई देश ज्यादा दिनों तक एकजुट नहीं रह सकता।
देश के विभाजन के साथ लोगों के मन में समाई यह आशंका एक तरह से सच प्रमाणित हुई थी। भारत के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े थे : क्या भारत एक रह पाएगा? क्या ऐसा करने के लिए भारत सिर्फ राष्ट्रीय एकता की बात पर सबसे ज्यादा जोर देगा और बाकी उद्देश्यों को तिलांजलि दे देगा? क्या ऐसे में हर क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय पहचान को खारिज कर दिया जाएगा? उस वक्त का सबसे तीखा और चुभता हुआ एक सवाल यह भी था कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता (Zonal Unity) को कैसे प्राप्त किया जाए?
(ii) लोकतंत्र की स्थापना करना : स्वतंत्र भारत के म दूसरी चुनौती लोकतंत्र को कायम करने की थी। भारत ने संसदीय शासन पर आधारित प्रतिनिधित्वमूलक लोकतंत्र (representative democracy) को अपनाया। लोकतंत्र में लोगों को मौलिक अधिकारों तथा मतदान आदि की गारंटी दी जाती है। इन विशेषताओं से यह बात सुनिश्चित हो गई कि लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर राजनीतिक मुकाबले होंगे। लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए लोकतांत्रिक संविधान आवश्यक होता है परंतु इतना भर ही काफी नहीं होता। चुनौती यह भी थी कि संविधान से TM लोकतांत्रिक व्यवहार- बर्ताव चलन में आएँ ।
(iii) समाजमूलक विकास : तीसरी चुनौती थी ऐसे विकास की जिससे समूचे समाज का भला होता हो, न कि कुछ एक वर्गों (Classes) का । इस मोर्चे पर भी संविधान में यह बात साफ कर दी गई थी कि सबके साथ समानता का बर्ताव (Treatment of equality) किया जाए और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों तथा धार्मिक-सांस्कृतिक अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष सुरक्षा दी जाए। संविधान ने ‘राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों’ (Directive Principles of State Policy) के अंतर्गत लोक-कल्याण के उन लक्ष्यों को भी स्पष्ट कर दिया था जिन्हें राजनीति को जरूर पूरा करना चाहिए। अब असली चुनौती आर्थिक विकास तथा गरीबी की समाप्ति के लिए कारगर नीतियों को तैयार करने की थी।
(iv) रजवाड़ों के विलय की समस्या : अगस्त, 1947 स्वतंत्रता के तुरंत पहले अंग्रेजी शासन ने घोषणा की कि भारत पर ब्रिटिश प्रभुत्व के साथ ही रजवाड़े भी ब्रिटिश अधीनता से आजाद हो जाएँगे। इसका मतलब यह था कि सभी रजवाड़े (रजवाड़ों की संख्या 565 थी) ब्रिटिश राज की समाप्ति के साथ ही कानूनी तौर पर आजाद हो जाएँगे। अंग्रेजी राज का नजरिया यह था कि रजवाड़े अपनी मर्जी से चाहें तो भारत या पाकिस्तान में शामिल हो जाएँ या फिर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखें। भारत अथवा पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र हैसियत बनाए रखने का फैसला रजवाड़ों की प्रजा को नहीं करना था। यह फैसला लेने का अधिकार राजाओं को दिया गया था। यह अपने आप में बड़ी गंभीर समस्या थी और इससे अखंड भारत के अस्तित्व पर ही खतरा मँडरा रहा था।

प्रश्न 3. 1947 में भारत के विभाजन के क्या परिणाम हुए ?

अथवा

1947 में हुए भारत के विभाजन के किन्हीं दो कारणों का आकलन कीजिए। इस विभाजन के किन्हीं चार परिणामों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

1947 में ब्रिटिश इंडिया के विभाजन के किन्ही तीन परिणामों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : भारत का विभाजन (Partition of India) : 14-15 अगस्त, 1947 को एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र भारत और पाकिस्तान-अस्तित्व में आए। ऐसा विभाजन के कारण हुआ, ब्रिटिश इंडिया को ‘भारत’ और ‘पाकिस्तान’ के रूप में बाँट दिया गया।

विभाजन के कारण :
(क) मुस्लिम लीग ने ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की बात की थी। इस सिद्धांत के अनुसार भारत किसी एक कौम का नहीं बल्कि हिंदू और मुसलमान नाम की दो कौमों का देश था और इसी कारण मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश यानी पाकिस्तान की माँग की।
(ख) भारत के विभाजन से पूर्व ही देश में दंगे फैल गए। अनेक जगह मार-काट मच गई। सर्वत्र अराजकता फैल रही थी। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के नेताओं ने भारत विभाजन की बात स्वीकार कर ली ।
भारत विभाजन के परिणाम (Results of India’s Partition):
1.देश के विभाजन से पूर्व ऐसे दो प्रमुख इलाके थे जहाँ मुसलमानों की आबादी ज्यादा थी। एक इलाका पश्चिम में था तो दूसरा इलाका पूर्व में ऐसा कोई तरीका न था कि इन दोनों इलाकों को जोड़कर एक जगह कर दिया जाए। इसे देखते हुए फैसला हुआ कि पाकिस्तान में दो इलाके शामिल होंगे यानी पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान तथा इनके बीच में भारतीय भू-भाग का एक बड़ा विस्तार रहेगा।
2.सन् 1947 में बड़े पैमाने पर एक जगह की आबादी दूसरी जगह जाने को मजबूर हुई थी। आबादी का यह स्थानांतरण आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा था। मानव इतिहास के अब तक ज्ञात सबसे बड़े स्थानांतरणों में से यह एक था। धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों को. बेरहमी से मारा। लाहौर, अमृतसर और कलकत्ता जैसे शहर सांप्रदायिक अखाड़े में तबदील हो गए। जिन इलाकों में ज्यादातर हिंदू अथवा सिख आबादी थी, उन इलाकों में मुसलमानों ने जाना छोड़ दिया। ठीक इसी तरह मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाकों से हिंदू और सिख भी नहीं गुजरते थे।
3.लोग अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर हुए। वे सीमा के एक तरफ से दूसरी तरफ गए और इस क्रम में लोगों को बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़ा।
4.भारत और पाकिस्तान के अनेक कवि तथा फिल्म निर्माताओं ने अपने उपन्यास, लघुकथा, कविता और फिल्मों में इस मारकाट की नृशंसता का जिक्र किया।
5.प्रशासनिक मुश्किल और वित्तीय कठिनाई के अतिरिक्त विभाजन के साथ कुछ और ज्यादा गहरे मुद्दे जुड़े हुए थे। भारत के नेता द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में यकीन नहीं करते थे। बहरहाल, विभाजन तो धर्म के आधार पर ही हुआ था। विभाजन के दौरान बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चली गई। इसके बावजूद 1951 के वक्त भारत की कुल आबादी में 12 फीसदी मुसलमान थे। ऐसे में सवाल यह था कि भारत अपने मुसलमान नागरिकों तथा दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों उदाहरणस्वरूप सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी और यहूदियों के साथ क्या बर्ताव करे? बँटवारे के कारण हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव पहले से ही कायम था।
6.इन संघर्षों के साथ राजनीतिक हित जुड़े थे। मुस्लिम लीग का गठन मुख्य रूप से औपनिवेशिक भारत में मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए हुआ था। भारत की नई सरकार के अधिकतर नेता सभी नागरिकों को समान दर्जा देने के हामी थे, चाहे नागरिक किसी भी धर्म का हो। वे मानते थे कि नागरिक चाहे जिस धर्म को माने उसका दर्जा बाकी नागरिकों के बराबर ही होना चाहिए। धर्म को नागरिकता की कसौटी नहीं बनाया जाना चाहिए। हमारे नेतागण धर्मनिरपेक्ष राज्य के आदर्श के हिमायती थे। उनके इस आदर्श की अभिव्यक्ति भारतीय संविधान में हुई।

प्रश्न 4. भारतीय राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया और उसके आधार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : I. भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप विरासत के रूप में दूसरी बड़ी समस्या मिली, वह थी देशी रियासतों का स्वतंत्र भारत में विलय करना। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारत दो भागों में बंटा हुआ था- ब्रिटिश भारत एवं देशी राज्य। ब्रिटिश भारत का शासन तत्कालीन भारत सरकार के अधीन था जबकि देशी राज्यों का शासन देशी राजाओं के हाथों में था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के मार्ग में देसी रियासतें सदैव बाधा बनी रहीं। इन देसी रियासतों ने संवैधानिक गतिरोधों को बढ़ावा दिया। जब कभी भी भारत की संवैधानिक समस्या को हल करने का प्रयास किया जाता तो इन रियासतों के भविष्य की समस्या पैदा हो जाती थी। स्वतंत्र भारत के निर्माण के भावी ढाँचे मे देसी रियासतों के लिए व्यवस्था करना संविधान निर्माताओं के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहा। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारत में देसी रियासतों की संख्या 562 थी। इनके अंतर्गत भारत की जनसंख्या का 20% भाग तथा भारत के क्षेत्रफल का लगभग 45% भाग आता था। अतः इतनी बड़ी जनसंख्या एवं क्षेत्रफल को भारत से अलग नहीं किया जा सकता था। उस स्थिति में तो बिल्कुल नहीं, जब अधिकांश देसी रा भारत के आंतरिक हिस्सों में विद्यमान थीं। इन देसी रियासतों में जनसंख्या, क्षेत्र एवं आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर पर्याप्त अंतर पाए जाते थे।
II. जहाँ एक ओर कश्मीर, हैदराबाद तथा मैसूर जैसे ऐसे देशी राज्य थे जो कि कई यूरोपीय राज्यों से भी बड़े थे तो वहीं दूसरी ओर काठियावाड़ तथा पश्चिमी भारत के देसी राज्य नक्शे में सूई की नोक से अधिक बड़े नहीं थे। ये देसी राज्य भारत में विलय को तैयार नहीं थे जो कि भारत की कानून-व्यवस्था के लिए काफी हानिकारक स्थिति थी।
समस्या का समाधान: यद्यपि देशी रियासतों की भारत में विलय की समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी परंतु पं. नेहरू एवं तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने इस समस्या को बड़े ही सुनियोजित ढंग से सुलझाया। देसी रियासतों की समस्या के हल के लिए पं. नेहरू ने 27 जून, 1947 को एक विभाग की स्थापना की जिसे राज्य विभाग कहा जाता था।
पं. नेहरू ने सरदार पटेल को इस विभाग का मंत्री एवं वी. पी. मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया। देशी रियासतों का विलय भारत में तीन चरणों में संभव हो पाया।
1.प्रथम- एकीकरण,
2.द्वितीय- अधिमिलन,
3.तृतीय-प्रजातंत्रीकरण |
एकीकरण के अंतर्गत वे देसी रियासतें आती थीं जिन्होंने सरदार पटेल के परामर्श पर स्वयं ही भारत में विलय होना स्वीकार कर लिया। अधिकांश देसी रियासतें इसी आधार पर भारत में शामिल हो गई। द्वितीय अधिमिलन के अंतर्गत जूनागढ़ एवं हैदराबाद जैसी रियासतों को शामिल किया गया क्योंकि इन्होंने स्वेच्छा से भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था। सरदार पटेल की सूझ-बूझ ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वे भारत में विलय के लिए तैयार हो गई। तृतीय प्रजातंत्रीकरण के अंतर्गत देसी रियासतों को प्रजातान्त्रिक ढांचे में डालना भारत सरकार के लिए प्रमुख समस्या थी। इस समस्या के लिए प्रान्तों में प्रजातान्त्रिक एवं प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना की गई। इन प्रान्तों में भी संसदीय शासन प्रणाली लागू की गई तथा निर्वाचित विधानसभाओं की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 5. किन परिस्थितियों ने सरकार को दिसम्बर, 1952 में एक पृथक आंध्र राज्य बनाने की घोषणा करने के लिए विवश किया ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : केन्द्रीय नेतृत्व के इस फैसले को स्थानीय नेताओं और लोगों ने चुनौती दी। पुराने मद्रास प्रांत के तेलुगु भाषी क्षेत्रों में विरोध भड़क उठा। पुराने मद्रास प्राप्त में आज के तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश शामिल थे। इसके कुछ हिस्से मौजूद केरल एवं कर्नाटक में भी हैं। विशाल आंध्र आंदोलन (आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने के लिए चलाया गया आंदोलन) ने माँग की कि मद्रास प्रांत के तेलुगुभाषी इलाकों को अलग करके एक नया राज्य आंध्र प्रदेश बनाया जाए। तेलुगु भाषा क्षेत्र की लगभग सारी राजनीतिक शक्तियाँ मद्रास प्रांत के भाषाई पुनर्गठन के पक्ष में थीं।
2.केंद्र सरकार “हाँ-ना” की दुविधा में थी और उसकी इस मनोदशा से इस आंदोलन ने जोर पकड़ा। कांग्रेस के नेता और दिग्गज गाँधीवादी, ई. श्रीरामुलु अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इससे बड़ी अव्यवस्था फैली और आंध्र प्रदेश में जगह-जगह हिंसक घटनाएँ हुईं। लोग बड़ी संख्या में सड़को पर निकल आए। पुलिस फायरिंग में अनेक लोग घायल हुए या मारे गए। मद्रास में अनेक विधायकों ने विरोध जताते हुए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया। आखिरकार 1952 के दिसंबर में प्रधानमंत्री ने आंध्र प्रदेश नाम से अलग राज्य बनाने की घोषणा की ।

प्रश्न 6. भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने कैसे सिद्ध किया कि भारत में लोकतंत्र की धारणा, विचारों तथा जीवन पद्धतियों की बहुलता की धारणा से जुड़ी हुई है?
उत्तर : भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन तथा लोकतंत्रीय धारणाओं, विचारों एवं जीवन पद्धतियों की बहुलता :
(i) 1952 से लेकर वर्ष 2000 तक लगातार कई राज्यों के पुनर्गठन हुए हैं और पुनर्गठित राज्यों में पहले की तुलना में अधिक आंतरिक शांति का माहौल देखा जा सकता है।
(ii) विचार तथा जीवनशैली या पद्धति अलग-अलग होने के कारण ही अलग-अलग भाषा में उसकी अभिव्यक्ति होती है। ऐसी अभिव्यक्ति की सुनवाई भाषा के आधार पर गठित राज्य में ही बेहतर हो सकती है।
(iii) अलग-अलग विचार तथा जीवनशैली सत्ता की भागीदारी से ही निखर कर आती है। पुनर्गठित राज्यों के आर्थिक विकास का संदर्भ लिया जा सकता है।
(iv) क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सीधा संबंध क्षेत्र विशेष के लोगों की विचारधारा और जीवनशैली से है। भाषा के द्वारा इस विविधता को व्यक्त किया जाता है जो अपनी निश्चित आवश्यकताओं, साधनों और संसाधनों की माँग के रूप में रहती है तथा समुदाय, संगठन, समूह (दबाव समूह एवं हित समूह) से आगे बढ़कर राजनीतिक गठबंधन तक पहुँचकर जन-आंदोलनों को जन्म देती है। ऐसा जनाक्रोश बहुलता को विकसित होने का माहौल न दिए जाने के कारण क्रमशः बढ़ता जाता है तथा एक अलग राज्य बनते ही जनाक्रोश जिम्मेदारी में बदल जाता है। सत्ता की ऐसी भागीदारी करना आधुनिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक हो गया है।

प्रश्न 7. विभाजन के दौरान भारत को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा ?
उत्तर : 1947 में देश के विभाजन में निम्न परेशानियों का सामना करना पड़ा :
(i) विशाल जनसंख्या का स्थानांतरण : विभाजन के कारण एक विशाल जनसंख्या का स्थानांतरण हुआ, जो कि आकस्मिक, अनियोजित और त्रासदी से भरा था। यह इतिहास का सबसे बड़ा स्थानांतरण था।
(ii) साम्प्रदायिकता के आधार पर मार-काट होना : विभाजन के कारण धर्म के नाम पर एक समुदाय ने दूसरे समुदाय के लोगों को मारा। जिन क्षेत्रों में ज्यादातर हिंदू या सिख थे वहाँ मुसलमानों ने जाना छोड़ दिया। इसी प्रकार मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिंदू और सिखों ने जाना बंद कर दिया।
(iii) शरणार्थी शिविरों में रहना : लोगों को अपना घर-बार छोड़ने के कारण शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ा। प्रायः लोगों को पैदल चलकर लंबी यात्राएँ करके सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। रास्ते में उन्हें कई प्रकार की विपत्तियों का सामना भी करना पड़ा जैसे स्त्रियों को अगवा करना, जबरदस्ती शादी करना, ‘कुल की इज्जत’ के नाम पर बहू-बेटियों को मारना। लोगों को शरणार्थी शिविरों में महीनों बिताने पड़े। इससे जन और धन की अपार हानि हुई।
(iv) हिंसक अलगाव : बंटवारे को ‘दिल के दो टुकड़े हो जाना’ कहा गया। विभाजन में दो समुदाय, जो वर्षों से पड़ोसियों की तरह रहते थे, हिंसक अलगाव का शिकार हुए।
(v) सरकारी संपत्ति का विभाजन : विभाजन के कारण सरकारी वित्तीय संपदा का भी बंटवारा किया गया। सरकारी और रेलवे कर्मचारियों का विभाजन हुआ।
(vi) अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार की समस्या : विभाजन का आधार धर्म था। ऐसे में भारत में अल्पसंख्यकों, जिनमें मुसलमान भी सम्मिलित थे, के साथ बर्ताव करने का महत्त्वपूर्ण प्रश्न जुड़ा था। कुछ संगठन भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के पक्ष में थे। भारत में अभी भी (1951 में) मुसलमानों की संख्या 12 प्रतिशत थी। इस समस्या का हल भारतीय नेताओं द्वारा भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का रूप देकर किया गया। इस प्रकार सभी धर्मों के अनुयायियों को समान नागरिक का दर्जा दिया गया।
(vii) हिंसक और भयावह : यह विभाजन एक हिंसक और भयावह विभाजन था। इसके कारण 80 लाख लोगों को अपना घर-बार छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा। विभाजन की हिंसा से लगभग पाँच से दस लाख लोगों ने अपनी जान गँवाई।

प्रश्न 8. “विस्थापन” और “पुनर्वास” को परिभाषित कीजिए।
उत्तर : विस्थापन और पुनर्वास :
(i) 14-15 अगस्त 1947 को एक नहीं बल्कि दो राष्ट्र भारत और पाकिस्तान अस्तित्व में आए। ऐसा विभाजन के कारण हुआ। ब्रिटिश इंडिया को भारत और पाकिस्तान के रूप में बाँट दिया गया।
(ii) विस्थापन और पुनर्वास के कारण भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा जैसेः (क) बहुसंख्यक मुस्लिम क्षेत्र का न होना। (ख) सीमांत गाँधी का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के विरुद्ध होना। (ग) अल्पसंख्यक समस्या।
(iii) सीमा के दोनों तरफ “अल्पसंख्यक” थे। जो इलाके अब पाकिस्तान में है, वहाँ लाखों की संख्या में हिंदू और सिख आबादी थी। ठीक इसी तरह पंजाब और बंगाल के भारतीय भू-भाग में भी लाखों की संख्या में मुस्लिम आबादी थी।
(iv) दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में भी मुस्लमानों की एक बड़ी आबादी थी। ये लोग एक तरह से साँसत में थे। इन लोगों ने पाया कि हम तो अपने ही घर में विदेशी बन गए। अपना घर-बार छोड़कर सीमा पार जाना पड़ा। विभाजन की हिंसा से लगभग पाँच से दस लाख लोगों ने अपनी जान गँवाई।

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