8 अंकीय प्रश्न उत्तर – एक दल के प्रभुत्व का दौर – Class 12th Political Science Chapter 2

Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 2 Important Question Answer 8 Marks एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 1. भारत में 1967 तक कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारकों का वर्णन कीजिए।
अथवा
पहले तीन आम चुनावों में कांग्रेस के प्रभुत्व के किन्हीं चार कारणों को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
भारत में एक दल की प्रधानता के किन्हीं चार कारणों का वर्णन करें।
उत्तर : (i) कांग्रेस की अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ विभिन्न गुटों को मिलाकर बनी थीं। ये गुट अलग-अलग विचारधारात्मक रुख अपनाते थे और कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आती थी। दूसरी पार्टियाँ मुख्यतः कांग्रेस के इस या उस गुट को प्रभावित करने की कोशिश करती थीं।
(ii) भारत में विपक्षी पार्टियाँ नहीं थी। कई पार्टियाँ 1952 के आम चुनावों से कहीं पहले बन चुकी थीं। इनमें से कुछ ने ‘साठ और सत्तर’ के दशक में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1950 के दशक में इन सभी विपक्षी दलों को लोकसभा अथवा विधानसभा में कहने भर को प्रतिनिधित्व मिल पाया। शुरुआती सालों में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं के बीच पारस्परिक सम्मान का गहरा भाव था।
(iii) हमारे देश की चुनाव प्रणाली में ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ के तरीके को अपनाया गया है। ऐसे में अगर कोई पार्टी बाकियों की अपेक्षा थोड़े ज्यादा वोट हासिल करती है तो | दूसरी पार्टियों को प्राप्त वोटों के अनुपात की तुलना में उसे कहीं ज्यादा सीटें हासिल होती हैं। यही चीज कांग्रेस पार्टी के पक्ष में साबित हुई।
(iv) अगर हम सभी गैर-कांग्रेसी उम्मीदवारों के वोट जोड़ दें तो वह कांग्रेस पार्टी को हासिल कुल वोट से कहीं ज्यादा होंगे। लेकिन गैर-कांग्रेसी वोट विभिन्न प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बँट गए। इस तरह कांग्रेस बाकी पार्टियों की तुलना में आगे रही और उसने ज्यादा सीटें जीतीं।

प्रश्न 2. लोकतंत्र में विपक्षी दलों की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर : विपक्षी दलों की भूमिका : लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था में चुनावों में जिस दल को बहुमत मिलता है वह शासन का कार्यभार सम्भालता है और अन्य दल विरोधी या विपक्षी दल की भूमिका निभाते हैं। विपक्षी दल का कर्तव्य केवल सरकार की आलोचना करना ही नहीं है। सरकार का विरोध करना, जनमत को अपने पक्ष में करना, सरकार की गलत नीतियों का आकलन आदि विरोधी दल की नकारात्मक भूमिका के संकेत हैं। बहुमत के समर्थन के कारण सरकार कई बार मनमाने कानून व नीतियाँ लागू करने का प्रयास करती है। विरोधी-दल उसकी मनमानी पर अकुंश लगाते हैं। लोकतंत्र में विरोधी दल का मजबूत होना उसकी पार्टी की मजबूती को प्रकट करता है।
विपक्षी दल के कार्य :
1.सत्तारूढ़ दल द्वारा जनहित विरोधी नीतियों या कार्यक्रमों के विरुद्ध विरोधी दल विरोध प्रकट करते हैं।
2.विपक्षी दल सरकार की तीव्र आलोचना करते हैं और जनमत तैयार करते हैं।
3.विरोधी दल सत्तारूढ़ दल व साधारण जनता के मध्य कड़ी का काम करते हैं।
4. विभिन्न विषयों पर जनता की भावनाओं, इच्छाओं व प्रतिक्रियाओं को संसद तक पहुँचाते हैं।
5.विरोधी दल विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर जनमत जागृत करके अपने मत को प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में उनका मत ही जनमत की अभिव्यक्ति होती है।
प्रमुख विपक्षी पार्टियाँ : हमारे यहाँ स्वाधीनता के पहले से ही विपक्षी पार्टियाँ थीं। इनमें से कई पार्टियाँ 1952 के आम चुनावों से कहीं पहले बन चुकी थीं। इनमें से कुछ ने साठ और सत्तर के दशक में देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज की लगभग सभी गैर कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी-न-किसी विपक्षी पार्टी में खोजी जा सकती हैं। आजादी के बाद कई विपक्षी पार्टियाँ प्रमुखता से उभरीं जिनका संबंध अतीत में कांग्रेस से रहा था। इनमें चार पार्टियाँ प्रमुख 1. सोशलिस्ट पार्टी, 2. कम्युनिस्ट पार्टी, 3. भारतीय जनसंघ तथा 4. स्वतंत्र पार्टी।

प्रश्न 3. भारत में 1952 के आम चुनाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र के इतिहास के लिए किस प्रकार “मील का पत्थर” साबित हुए? व्याख्या कीजिए।

अथवा

भारत के चुनाव आयोग के सामने, पहले आम चुनाव करवाने से पूर्व आई किन्ही चार समस्याओं की व्याख्या कीजिए ।

अथवा

भारत में पहले आम चुनाव करवाने के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों का वर्णन कीजिए। ये चुनाव किस सीमा तक सफल रहे?
उत्तर : भारत के चुनाव आयोग का गठन 1950 के जनवरी में हुआ। सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने। भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए एक सफल व निष्पक्ष चुनाव कराना संभव न था। चुनाव आयोग के सामने प्रमुख समस्याएँ थी जो कि चुनौती का रूप धारण किए हुए थीं। ये समस्याएँ निम्न थीं
(i) चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन करना
(ii) मतदाता सूची तैयार करना
(iii) साक्षरता की कमी
(iv) 3200 विधायक और 489 सासंदों का चुनाव
(v) चुनावकर्मियों की नियुक्ति व प्रशिक्षण देना
(vi) देश का विशाल आकार
(i) चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन करना : विशाल जनसंख्या के लिए अलग-अलग क्षेत्रों का सीमांकन करना तथा लोगों को उस क्षेत्र से अवगत कराना जितना आसान समझा गया वह असंभव कार्य था।
(ii) मतदाता सूची तैयार करना : मतदाता सूची यानी मताधिकार प्राप्त वयस्क व्यक्तियों की सूची बनाना भी आवश्यक था। इन दोनों कार्यों में अधिक समय लगा। मतदाता सूची का पहला प्रकाशित प्रारूप तैयार हुआ जिसमें पता चला कि 40 लाख महिलाओं का नाम दर्ज नहीं था। इन महिलाओं को “अला दी बेटी”, “फला दी बीबी” के रूप में दर्ज किया गया। चुनाव आयोग ने इन प्रविष्टियों को मानने से इन्कार कर दिया।
(iii) मतदान का तरीका : पहले आम चुनाव में मतपत्र पर मतदाताओं के नाम तथा चुनाव चिह्न नहीं थे क्योंकि 85 प्रतिशत मतदाता अनपढ़ थे अतः प्रत्येक उम्मीदवार के लिए मतपेटी की व्यवस्था की गई थी। प्रथम आम चुनाव में जितने प्रत्याशी (उम्मीदवार) थे उतनी ही मत पेटी को रखा गया था। उन पर उस उम्मीदवार का नाम बड़े-बड़े अक्षर में चुनाव चिह्न के साथ लिखा हुआ था। मतपेटी पर अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू व पंजाबी तथा क्षेत्रीय भाषा में भी लिखा हुआ था।
(iv) सार्वभौम मताधिकार : सार्वभौम मताधिकार की शुरुआत इस देश के लिए जोखिम का सौदा माना जा रहा था।”टाइम्स ऑफ इंडिया” में लिखा गया उन लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया जो इसे जोखिम मान रहे थे।इन सब समस्याओं के बावजूद 1952 का चुनाव इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ तथा यह बात साबित हुई कि दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र पर अमल किया जा सकता है।हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी लिखा “यह बात हर जगह मानी जा रही है कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया “।

प्रश्न 4. भारतीय जनसंघ की स्थापना किसने और कब की ? यह दल अन्य राजनैतिक दलों से किस प्रकार भिन्न था।
उत्तर : भारतीय जनसंघ का गठन (स्थापना) :
1.1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके संस्थापक अध्यक्ष थे।
2.जनसंघ अपनी विचारधारा और कार्यक्रमों के लिहाज से बाकी दलों से भिन्न है। जनसंघ ने “एक देश और संस्कृति और एक राष्ट्र” के विचार पर जोर दिया। इनका मानना था कि देश भारतीय संस्कृति और परंपरा के आधार पर आधुनिक प्रगतिशील और ताकतवर बन सकता है।
3.जनसंघ ने भारत और पाकिस्तान को एक करके ” अखंड भारत” बनाने की बात कही।
4.अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को राजभाषा बनाने के आंदोलन में यह पार्टी सबसे आगे थी। इसने धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियात देने की बात का विरोध किया। चीन ने 1964 में अपना आण्विक परीक्षण किया था इसके बाद से जनसंघ ने लगातार इस बात की पैरोकारी की कि भारत भी अपने आण्विक हथियार तैयार करे ।

प्रश्न 5. ऐसे किन्हीं तीन घटकों को लिखिए जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस का वर्चस्व भारत के राजनैतिक परिदृश्य में लगातार तीन दशकों तक कायम रखने में सहायता दी।

अथवा

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में लगभग तीन दशकों तक कांग्रेस का प्रभुत्व बनाए रखने में सहायक किन्ही तीन कारकों का मूल्यांकन कीजिए ।

अथवा

” लम्बे समय तक कांग्रेस पार्टी, एक सामाजिक तथा विचारात्मक गठबंधन के रूप में बनी रही।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : (i) स्थापना और चमत्कारिक नेतृत्व : 1885 में बनाई गई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस थी जिसने जन आंदोलन का मंच तैयार किया तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के चमत्कारिक नेतृत्व में भारत को स्वतंत्रता प्रदान की। यही एकमात्र कारण है कि कांग्रेस (ओ.), कांग्रेस (आर.), उत्कल कांग्रेस, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा कांग्रेस (आई.) आदि सभी राजनैतिक दल “कांग्रेस” ब्राण्ड नाम को ही धारण करते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ केवल स्वरूप दर्शन को सत्य ज्ञान समझने की भ्रांति है और युग-युगों से कोरी मूर्तिपूजा का बोलबाला है-वहाँ की राजनीति में “कांग्रेस” और “गाँधी” जैसे दो शब्दों का चमत्कार प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना स्वाभाविक ही है। वस्तुतः यह एक सतही परिज्ञान है जो इस देश की आम जनता को आरम्भ से ही भ्रमित करता रहता है। जो भी हो, कांग्रेस की लोकप्रियता का कारण इसका कुशल तथा चमत्कारी नेतृत्व भी रहा। अकेले नेहरू का सम्मोहन ही कांग्रेस को 17 वर्ष तक शीर्ष पर बनाए रहा।
(ii) कांग्रेस को जनता की कमजोरियों का बेहतर ज्ञान रहना : दीर्घकालिक अनुभव के कारण कांग्रेस की भाव-भंगिमा हर बार नए-नए रूप में जनता के समक्ष अपना चुनावी घोषणा पत्र प्रस्तुत करने की रहती है। यह रूप प्रत्येक बार यहाँ की जनता को मनोहारी और संभ्रमित करने वाला दिखाई पड़ता है। ऐसा इसलिए है कि यह पार्टी स्वयं में आरंभ से ही शांत, उग्र, रूढ़िग्रस्त, वामपंथी, दक्षिणपंथी, क्रांतिकारी, सक्रिय और निष्क्रिय नीति या धारणा वाले जन न-समूहों का गठजोड़ है। इसके पास राजनीति में आने वाले लोगों की मनोदशा और उसमें आने वाले
(iii) जन-जागरूकता और कार्यक्षम विपक्ष का अभाव : कांग्रेस ने के. कामराज, एस.के. पाटिल, के.एस. निजलिंगप्पा, संजीव रेड्डी और अतुल्य घोष जैसे भौतिक और धनबल धारी महाशयों को इंग्लैण्ड के कुलीन वर्ग की तरह प्रत्येक राज्य में अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए अपने साथ मिलाकर एक सिंडिकेट बनाया था। ये कांग्रेस के लिए वोट जुटाने में अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना बखूबी जानते थे। दूसरा यह कि उक्त 30 वर्षों में राजनीतिक गोपनीयता ‘भारत की आम जनता समझ नहीं पाई थी। वह नहीं जानती थी कि वयस्क मताधिकार का क्या अर्थ है। इस दौरान वह क्रमश: अंग्रेजों द्वारा थोपी गई जी हजूरी या दब्बूपन की मानसिकता से उबरने का प्रयास कर रही थी। उसके लिए कांग्रेस को अंग्रेजों की गुलामी से बचाने वाली संस्था मान लेना ही पर्याप्त था। हम देखते हैं कि 1952 के आम चुनावों में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी केवल भारतीय साम्यवादी दल बना लेकिन उसको मात्र 16 सीटें मिली थीं। जहाँ तक कांग्रेस की बात है, उसने लोकसभा की 469 सीटों में से 364 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में स्वतंत्र पार्टी, भारतीय जनसंघ, समाजवादी पार्टी जैसे अन्य दल अपने लिए कोई जगह नहीं बना पाए।

प्रश्न 6. कांग्रेस पार्टी तथ 1959 में बनी स्वतंत्र पार्टी की आर्थिक विचारधाराओं में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : स्थापना : 1959 के अगस्त में स्वतंत्र पार्टी अस्तित्व में आई। इस पार्टी का नेतृत्व सी. राज गोपालाचारी, के. एम. मुंशी, एन. जी. रंगा और मीनू भसानी जैसे पुराने कांग्रेस नेता कर रहे थे।यह पार्टी आर्थिक मसलों पर अपनी खास किस्म की पक्षधरता के कारण दूसरी पार्टियों से अलग थी।
नीतियाँ व कार्यक्रम : 1. स्वतंत्र पार्टी चाहती थी कि सरकार अर्थव्यवस्था में कम से कम हस्तक्षेप करे। इसका मानना था कि समृद्धि सिर्फ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के जरिए आ सकती है। स्वतंत्र पार्टी अर्थव्यवस्था में विकास के नजरिए से किए जा रहे राजकीय हस्तक्षेप, केंद्रीकृत नियोजन, राष्ट्रीयकरण और अर्थव्यवस्था के भीतर सार्वजनिक क्षेत्र की मौजूदगी की आलोचना की निगाह से देखती थी । 2. यह पार्टी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हित को ध्यान में रखकर किए जा रहे कराधान के भी खिलाफ थी। इस दल ने निजी क्षेत्र को खुली छूट देने की तरफदारी की। 3. स्वतंत्र पार्टी कृषि में जमीन की हदबंदी, सहकारी खेती और खाद्यान्न के व्यापार पर सरकारी नियंत्रण के विरुद्ध थी। 4. यह दल गुटनिरपेक्षता की नीति और सोवियत संघ से दोस्ताना रिश्ते कायम रखने को भी गलती मानती थी। 5. इसने संयुक्त राज्य अमेरिका से नजदीकी संबंध बनाने की वकालत की।

प्रश्न 7. स्वतन्त्रता के शुरू के वर्षों में विपक्षी दलों को यद्यपि कहने भर का प्रतिनिधित्व मिल पाया। फिर भी इन दलों ने हमारी शासन व्यवस्था के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने में किस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाई? कोई चार बिन्दु लिखो |

अथवा

1952-67 के दौरान विपक्षी दलों द्वारा निभाई गई। भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर : 1952-1967 के दौरान विपक्षी दलों द्वारा निभाई गई भूमिका : (i) भारत में पहला आम चुनाव अक्टूबर, 1951 से फरवरी, 1952 के बीच हुआ। चूँकि इन आम चुनावों का ज्यादातर भाग 1952 में ही संपन्न हुआ, इसलिए इन्हें 1952 के आम चुनाव के नाम से ही जाना जाता है। इन चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी जबरदस्त थी। आधे से अधिक मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया।
(ii) जहाँ तक चुनावों के नतीजों का सवाल है, उनसे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। कांग्रेस को राष्ट्रीय स्वतंत्रता की विरासत मिली थी तथा यही एक ऐसा राजनीतिक दल था जिसका संगठन तमाम देश में फैला हुआ था।
(iii) प्रथम आम चुनावों में लोकसभा की 489 सीटों में से कांग्रेस को 364 स्थान हासिल हुए। निर्दलीय उम्मीदवारों के अलावा 6 राजनीतिक दलों ने भी इन चुनावों में भाग लिया था।
सी.पी.आई. (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) पहले तीन आम चुनावों में लोकसभा में तीसरे स्थान पर रही। कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व कायम रहा। सी.पी.आई. को प्रथम आम चुनावों में 16, दूसरे आम चुनावों में 27 तथा तीसरे आम चुनावों में हासिल हुईं। 20 सीटें
(iv) लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस 3/4 सीटें हासिल करती रही जबकि किसी भी अन्य राजनीतिक दल को कांग्रेस द्वारा जीती गईं सीटों का 1/10 भी हासिल नहीं हुआ। कांग्रेस को कभी 50% मत नहीं मिले। मतों के लिहाज से सोशलिस्ट पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी जिसे 10% मत मिले लेकिन यह पार्टी कुल सीटों का 3% भी नहीं जीत सकी ।
(v) यदि गैर-कांग्रेस दलों के कुल मतों के प्रतिशत को जोड़ा जाए तो यह कांग्रेस के मतों से अधिक है। गैर-कांग्रेसी मतों का विभिन्न राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों में विभाजन के कारण कांग्रेस को फायदा मिलता रहा लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि 1952 से 1967 के बीच भारत में विरोधी दल नहीं थे। कांग्रेस के अलावा अनेक राजनीतिक दलों ने चुनावों में भाग लिया था। कुछ राजनीतिक दल तो 1952 हुए पहले आम चुनावों से पहले ही अस्तित्व में आ गए थे।
(vi) आज के गैर-कांग्रेसी दलों की जड़ें 1950 के दशक में विद्यमान थीं। हालाँकि इस दौरान विरोधी दलों की राजनीतिक उपस्थिति प्रतीकात्मक ही रही। इसके बावजूद विरोधी दलों ने कांग्रेस की नीतियों का सैद्धांतिक विरोध किया। इससे सत्ताधारी दल (कांग्रेस) न केवल सतर्क रहा वरन् कांग्रेस के भीतर भी सत्ता संतुलन बदलता रहा। विरोधी दलों द्वारा अनेक प्रभावी नेताओं जैसे-सी. राजगोपालाचारी (स्वतंत्र पार्टी), श्यामा प्रसाद मुखर्जी (भारतीय जनसंघ), ए. के. गोपालन (सी.पी.आई.) तथा आचार्य नरेंद्र देव (सोशलिस्ट पार्टी) आदि को भारतीय राजनीति के लोकतांत्रिक पर्दे पर प्रस्तुत किया गया। इन नेताओं ने अपने-अपने प्रभावशाली, तार्किक तथा सैद्धांतिक वाद-विवादों से भारतीय लोकतंत्र को सजीव तथा गुंजनशील बनाए रखा।

प्रश्न 8. लोकतंत्र में विपक्ष एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। क्या एक-दलीय शासन के युग में सरकार की त्रुटियों और भूलों को उघाड़कर जनता के सामने लाने की भूमिका का निर्वाह यहाँ का विपक्षी दल कर पाया ? अपने उत्तर के समर्थन में किन्हीं तीन तर्कों को लिखिए।
उत्तर : नहीं, विपक्ष उक्त एक-दलीय शासनकाल में सरकार की त्रुटियों एवं भूलों को उघाड़कर जनता के सामने लाने की भूमिका का निर्वाह नहीं कर पाया क्योंकि-
(i) विपक्ष के लिए यह शिक्षाकाल था या वह नौसिखिया था : अंग्रेजों द्वारा सुदीर्घकाल (लगभग 200 वर्ष) तक थोपी गई गुलामी के बाद ही भारत में लोकतंत्र की स्थापना हो पाई थी। यह कांग्रेस पार्टी ही थी जिसने वर्ष 1885 से लेकर स्वतंत्रता दिवस तक पूरे देश का नेतृत्व अपनी एकमात्र छत्रछाया में किया। कांग्रेस की घोर शत्रु बनने वाली मुस्लिम लीग पाकिस्तान बनने के साथ ही इससे दूर चली गई थी। यह सच है कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र लेबर पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डी.एम.के.) जैसी पार्टियाँ भारत की स्वतंत्रता से पहले ही बन चुकी थीं लेकिन ये सभी नौसिखिया और अनुभवहीन थीं। स्वतंत्रता के पश्चात् की प्रत्येक घटना एवं कार्य उनके लिए एकदम नया था तथा जनता का अनन्य और अटूट विश्वास केवल कांग्रेस को प्राप्त था। इन कारणों से विपक्ष अपनी भूमिका का सक्रिय निर्वाह नहीं कर पाया।
(ii) विपक्षी दलों में आंतरिक फूट एवं अनबन : हम देखते हैं कि इस दौरान सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियाँ टूटकर किसान मजदूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी जैसे कई दलों में बिखर गई थीं। सोशलिस्ट पार्टी का अक्ष ही आज की समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (यूनाइटेड) तथा जनता दल (सेक्यूलर) में भी दिखाई पड़ता सभी विपक्षी दलों की धारणाओं, मान्यताओं तथा कार्य करने के तौर-तरीकों में आमूल अन्तर था इसलिए वे एक-दलीय सरकार के विरुद्ध आलोचना के सशक्त स्वर नहीं उठा पाए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी 1964 में टूटकर दो पृथक दलों-(i) भारतीय साम्यवादी दल और (ii) भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) में बिखर गई थी ।
(iii) प्रतिकूल जनादेश या खंडित जनमत : यह भी सत्य है कि उक्त अवधि के दौरान विपक्षी दलों को कार्यक्षम जनादेश या जनमत भी प्राप्त नहीं हुआ। 1952 के पहले आम चुनाव में केवल एक विपक्षी दल बन पाया और वह भी केवल 16 सीट लेकर। कांग्रेस ने इन चुनावों में लोकसभा की कुल 489 सीटों में से 364 सीटें अकेले ही प्राप्त कर ली थीं। दूसरे और तीसरे आम चुनावों में भी कांग्रेस ने ही कुल सीटों के 75 प्रतिशत पर अपनी जीत बनाई थी। इतना दुर्बल विपक्ष सत्ताधारी दल की गलतियों और भूलों को जनता के सामने उघाड़कर लाने में पूर्णतः असमर्थ था क्योंकि भारत के संविधान की व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक प्रस्ताव, आपत्ति या अविश्वास प्रस्ताव को लाने के लिए दो तिहाई बहुमत का बनना नितांत आवश्यक है। उन्होंने मुद्दों को संसद में अवश्य उठाया था लेकिन शक्तिहीनता की दशा में एकदलीय सरकार सामने उनकी वही स्थिति रही जो किसी घमंडी सेठ से एक रुपया के माँगने वाले भिखारी की बनती है। जाहिर है कि कुछ कर पाना तो दूर-सेठ की मार और गाली ही पुरस्कार में मिलती है।

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