Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 3 Important Question Answer 3 Marks नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 1. विकास के दो मॉडल कौन से हैं? भारत ने कौन-से मॉडल को अपनाया ?
उत्तर : विकास के दो मॉडल : (i) उदार पूँजीवादी मॉडल | (ii) समाजवादी मॉडल।
भारत ने दोनों ही मॉडलों के बीच का रास्ता चुना अर्थात् “मिश्रित अर्थव्यवस्था”। मिश्रित अर्थव्यवस्था लागू करते हुए। सार्वजनिक तथा निजी दोनों क्षेत्रों को अपनाया गया। विकास के लिए नियोजन के साधन को अपनाया गया जिसके अंतर्गत सरकार द्वारा नियोजित रूप में विकास योजनाएँ लागू करके सामाजिक आर्थिक विकास प्राप्त करने के कदम उठाए गए। इससे ही आर्थिक वृद्धि तथा खुशहाली और समाज के सभी वर्गों को आर्थिक तथा सामाजिक न्याय की प्राप्ति संभव थी।

प्रश्न 2. “आठवीं” व “नौवीं” पंचवर्षीय योजनाओं का संबंध किन क्षेत्रों से था ?
उत्तर : आठवीं पंचवर्षीय योजना : यह योजना अप्रैल 1992 को शुरू हुई। इस योजना के अंतर्गत 5.6 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य रखा गया था। इस योजना के अंतर्गत निम्न क्षेत्रों पर सुझाव का लक्ष्य रखा गया :

  1. देश में पर्याप्त रोजगार के अवसर मुहैया कराना।
  2. जनसंख्या वृद्धि दर को कम करना ।
  3. प्रारम्भिक शिक्षा का अभियान |
  4. कृषि क्षेत्र में विविधता को बढ़ावा ।
  5. यातायात, संचार, सिंचाई के क्षेत्रों के निर्माण को बढ़ावा देना।

नौवीं पंचवर्षीय योजना : यह योजना 1997 में शुरू हुई। इस योजना के अंतर्गत निम्न क्षेत्रों में सुझाव को प्राथमिकता प्रदान की गई :

  1. कीमतों को स्थिर रखा जाए।
  2. आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करना।
  3. विकास की दर में तीव्रता लाना।
  4. बचत दर को बढ़ावा।
  5. जनसंख्या वृद्धि दर को कम करना।

प्रश्न 3. विकास के लक्ष्य के रूप में आधुनिकीकरण तथा पश्चिमीकरण में अंतर लिखिए।
उत्तर : विकास के लक्ष्य के रूप में आधुनिकीकरण का अर्थ है-कृषि, उद्योग और व्यापार का तीव्रता से विकास। उनके विकास में नवीनतम प्रौद्योगिकी और विज्ञान का उपयोग हो लेकिन कृषि, उद्योग और व्यापार को पूरी तरह क्रमश: बड़े-बड़े किसानों या भूमिपतियों, उद्योगपतियों और व्यापारियों की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि आधुनिकीकरण विकास के क्षेत्र में तब तक अधूरा माना जाएगा जब तक विकास का प्रतिफल सामाजिक-आर्थिक न्याय से नहीं जुड़ता।
दूसरी ओर पश्चिमीकरण के नजरिए से विकास का लक्ष्य है-कृषि, उद्योग-धंधों और व्यापार जैसी प्रमुख आर्थिक गतिविधियों और विकास कार्यों को पूर्णतया किसानों, उद्योगपतियों, व्यापारियों की मनमानी पर छोड़ देना और बाजार शक्तियाँ (अर्थात् माँग और पूर्ति) ही कीमतों का निर्धारण करें ऐसी विकास संबंधी अवधारणा और लक्ष्य को पश्चिमीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 4. “वर्गीज़ कूरियन” को “मिल्कमैन ऑफ इंडिया” के उपनाम से क्यों जाना जाता है? उनका अमूल नाम का सहकारी आंदोलन अपने आप में एक अनूठा और कारगर मॉडल कैसे बना ?
उत्तर : I. मशहूर वर्गीज कूरियन ने गुजरात सहकारी दुग्ध एवं विपणन परिसंघ की विकास कथा में केन्द्रीय भूमिका निभायी और ‘अमूल’ की शुरुआत की, इसलिए उन्हें “मिल्कमैन ऑफ इंडिया” के उपनाम से जाना जाता है।
II. एक अनूठा और कारगर मॉडल बनाने के कारण : 1. गुजरात का एक शहर है ‘आणंद’। सहकारी दूध उत्पादन का आंदोलन अमूल इसी शहर में कायम है। इससे गुजरात के 25 लाख दूध उत्पादक जुड़े हैं। ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन के लिहाज से ‘अमूल’ नाम का यह सहकारी आंदोलन अपने आप में एक अनूठा और कारगर मॉडल है। इस ‘मॉडल’ के विस्तार को श्वेत क्रांति के नाम से जाना जाता है।
2.1970 में ‘आपरेशन फ्लड’ के नाम से एक ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरू हुआ था। ‘ऑपरेशन, फ्लड’ के अंतर्गत सहकारी दूध उत्पादकों को उत्पादन और विपणन के एक राष्ट्रव्यापी तंत्र से जोड़ा गया । बहरहाल ‘ऑपरेशन फ्लड’ सिर्फ डेयरी-कार्यक्रम नहीं था। इस कार्यक्रम में डेयरी के काम को विकास के एक माध्यम से अपनाया गया था ताकि ग्रामीण लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हों, उनकी आमदनी बढ़े तथा गरीबी दूर हो । सहकारी दूध-उत्पादकों की सदस्य संख्या लगातार बढ़ रही है। सदस्यों में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। महिला सहकारी डेयरी के जमातों में भी इजाफा हुआ है।

प्रश्न 6. हरित क्रांति का एक सकारात्मक एवं एक नकारात्मक प्रभाव लिखिए।
उत्तर : सकारात्मक प्रभाव : (i) हरित क्रांति का दोहन सबसे अधिक धनी जमींदारों और बड़े किसानों ने किया था। गेहूँ का उत्पादन प्रति हैक्टेयर अधिक तीव्र गति से बढ़ना आरम्भ हो गया था। भारत ने अगले डेढ़ दशक तक खाद्यान्न उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त की थी।
(ii) सरकार का सहयोग और प्रोत्साहन मिलने के कारण ही इतने बड़े पैमाने पर खाद्यान्न उत्पादन संभव हो पाया था। उर्वरकों, उच्च उत्पादकता वाली बीज किस्मों, नकद प्रतिकर सहायता (CCS), किसानों के अनुकूल उचित उत्पादन मूल्यों, सिंचाई सुविधा और विद्युत उपभोग एवं कृषि औजारों की दरों में छूट आदि के रूप में यह प्रोत्साहन दिया गया था। इसके कारण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में रहने वाले किसानों के जीवनस्तर में सुधार हुआ। वे सभी अत्यधिक धनाढ्य बने तथा विधानसभा और संसद में अपनी सीटों की दावेदारी लगे। इस प्रकार सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से इन राज्यों के किसानों की परिस्थिति आश्चर्यजनक रूप से उन्नत हो गई थी।प्रस्ताव तैयार किया। इसे ‘बॉम्बे प्लान’ कहा जाता है। ‘बॉम्बे प्लान’ की मंशा थी कि सरकार औद्योगिक तथा अन्य आर्थिक निवेश के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए। इस तरह चाहे दक्षिणपंथी हों अथवा वामपंथी, उस वक्त सभी चाहते थे कि देश नियोजित अर्थव्यवस्था. की राह पर चले। भारत के आजाद होते ही योजना आयोग अस्तित्व में आया। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष बने। भारत अपने विकास के लिए कौन-सा रास्ता और रणनीति अपनाएगा यह फैसला करने में इस संस्था ने केन्द्रीय और सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई।

प्रश्न 8. आप इस बात से कहाँ तक सहमत हैं कि उड़ीसा के लौह-अयस्क के विशाल भंडार, जन कल्याण के दृष्टिकोण से, निवेश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान हैं? इस संदर्भ में, जनजातीय लोगों के भय तथा पर्यावरणविदों के संदेहों के आधार का परीक्षण कीजिए।
उत्तर : उड़ीसा में लौह-इस्पात उद्योग की स्थापना का विरोध आदिवासियों ने इसलिए किया क्योंकि वे डरते थे कि अगर यहाँ उद्योग लग गए तो उन्हें अपने घरों से विस्थापित होना पड़ेगा और उनकी आजीविका भी चली जाएगी जबकि पर्यावरणविदों का विरोध इस बात को लेकर था कि खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होगा। उड़ीसा में इस्पात उद्योग में निवेश के पक्ष और विपक्ष में भी तर्क प्रस्तुत हुए।
पक्ष में तर्क : (i) उड़ीसा में लौह-इस्पात का विशाल भंडार है और इसका दोहन राज्य के लिए लाभदायक है।
(ii) उड़ीसा सरकार ने अपनी नीति के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय इस्पात निर्माताओं और राष्ट्रीय इस्पात निर्माताओं के साथ सहमति पर हस्ताक्षर किए ताकि इसमें पूँजी-निवेश हो सके और उड़ीसा के लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हों।
विपक्ष में तर्क : (i) लौह-इस्पात के भंडार सर्वाधिक अविकसित क्षेत्रों या आदिवासी बहुल जिलों में है। अतः आदिवासियों को भय है कि उन्हें विस्थापित कर दिया जाएगा।
(ii) खनन और उद्योग से पर्यावरण प्रदूषित होता है।

प्रश्न 9. भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल की आलोचना का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर : 1. आलोचकों का कहना था कि योजनाकारों ने निजी क्षेत्र को पर्याप्त जगह नहीं दी है और न ही निजी क्षेत्र के बढ़वार के लिए कोई उपाय किया गया है।
2.विशाल सार्वजनिक क्षेत्र ने ताकतवर निहित स्वार्थों को खड़ा किया है और इन न्यस्त हितों ने निवेश के लिए लाइसेंस तथा परमिट की प्रणाली खड़ी करके निजी पूँजी की राह में रोड़े अटकाए हैं।
3.इसके अतिरिक्त सरकार ने ऐसी चीजों के आयात पर बाधा आयद की है जिन्हें घरेलू बाजार में बनाया जा सकता हो । ऐसी चीजों के उत्पादन का बाजार एक तरह से प्रतिस्पर्धाविहीन है। इसकी वजह से निजी क्षेत्र के पास अपने उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने अथवा उन्हें सस्ता करने की कोई हड़बड़ी नही रही। सरकार ने अपने नियंत्रण में जरूरत से ज्यादा चीजें रखी हैं।

प्रश्न 10. उदारवादी और समाजवादी विचारधारा में कोई दो अन्तर बताइये ।
उत्तर : उदारवादी (Liberalist)
1. इसमें अर्थव्यवस्था पर सरकार का नियंत्रण कम से कम रखा जाता था।
2.यह प्रणाली मुक्त व्यापार, खुली प्रतियोगिता, निजी क्षेत्र और निजी सम्पत्ति के सिद्धांतों पर आधारित थी।
3.इसे पूँजीवादी प्रारूप या बाजार प्रारूप भी कहा जाता है।
समाजवादी (Socialist)
1. समाजवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन तथा वितरण के सभी साधनों पर राज्य का नियंत्रण था।
2.सरकार ही उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ता, वस्तुओं की कीमतें निश्चित करती थी।
3.निजी क्षेत्र, निजी व्यापार व निजी सम्पत्ति का कोई स्थान नहीं था बल्कि सामाजिक हित को ध्यान में रखकर सरकार उत्पादन की क्रियाएँ निश्चित करेगी।
नोट : समाजवाद में समस्त मनुष्यों को समान विकास के लिए समान अवसर प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 11. भारतीय संदर्भ में आर्थिक नियोजन का अर्थ तथा महत्त्व लिखिए।

अथवा

नियोजित विकास से क्या अभिप्राय है?
उत्तर : (i) नियोजित विकास से अभिप्राय यह है कि विकास का कार्य योजनाबद्ध तरीके से सरकार द्वारा किया जाना चाहिए। तथा गरीबी हटाने, आर्थिक और सामाजिक विकास के बिना भौतिक उन्नति सम्भव नहीं है।
(ii) गरीबी तथा सामाजिक न्याय के कार्य का मुख्य उत्तरदायित्व सरकार का है।

प्रश्न 12. प्रथम तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं के प्रमुख उद्देश्यों में अंतर स्पष्ट कीजिए |
उत्तर : प्रथम तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं के प्रमुख उद्देश्यों में अंतर :
(i) पहली पंचवर्षीय योजना में लोगों को गरीबी के जाल से निकालने का लक्ष्य था और इस योजना में ज्यादा जोर कृषि क्षेत्र पर दिया गया। इसी योजना के अंतर्गत बाँध और सिंचाई के क्षेत्र में निवेश किया गया। विभाजन के कारण कृषि क्षेत्र को गहरी मार लगी थी और इस क्षेत्र पर तुरंत ध्यान देना जरूरी था। भाखड़ा-नांगल जैसी विशाल परियोजनाओं के लिए बड़ी धनराशि आबंटित की गई। इस पंचवर्षीय योजना में माना गया था कि देश में भूमि के वितरण का जो ढर्रा मौजूद है उससे कृषि के विकास को सबसे बड़ी बाधा पहुँचती है। इस योजना में भूमि सुधार पर जोर दिया गया और उसे देश के विकास की बुनियादी चीज़ माना गया।
(ii) दूसरी पंचवर्षीय योजना पहली पंचवर्षीय योजना से निम्न अर्थों में अलग थी। दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। पहली योजना का मूलमंत्र था धीरज, लेकिन दूसरी योजना की कोशिश तेज़ गति से संरचनात्मक बदलाव करने की थी। इसके लिए हरसंभव दिशा में बदलाव की बात तय की गई थी। सरकार ने देसी उद्योगों को संरक्षण देने के लिए आयात पर भारी शुल्क लगाया। संरक्षण की इस नीति से निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को आगे बढ़ने में मदद मिली।

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