Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 3 Important Question Answer 8 Marks नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 1. दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान औद्योगिक विकास तथा कृषि विकास के पक्ष में दिए गए तीन-तीन मुख्य तर्कों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : दूसरी पचवर्षीय योजना और औद्योगिक विकास बनाम कृषि विकास का विवाद :
(i) स्वतंत्रता के बाद भारत जैसे पिछड़ी अर्थव्यवस्था के देश में विवाद खड़ा हुआ कि उद्योग और कृषि में से किस क्षेत्र में ज्यादा संसाधन लगाए जाएँ।
(ii) अनेक लोगों का मानना था कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में कृषि के विकास की रणनीति का अभाव था और इस योजना के दौरान उद्योगों पर जोर देने के कारण खेती और ग्रामीण इलाकों को चोट पहुँची।
(iii) जे.सी. कुमारप्पा जैसे गाँधीवादी अर्थशास्त्रियों ने एक वैकल्पिक योजना का खाका प्रस्तुत किया था जिसमें ग्रामीण औद्योगीकरण पर ज्यादा जोर था। चौधरी चरण सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में कृषि को केंद्र में रखने की बात बड़े सुविचारित और दमदार ढंग से उठायी थी।
(iv) चौधरी चरण सिंह कांग्रेस पार्टी में थे और बाद में उससे अलग होकर इन्होंने भारतीय लोकदल नामक पार्टी बनाई। उन्होंने कहा कि नियोजन से शहरी और औद्योगिक तबके समृद्ध हो रहे हैं और इसकी कीमत किसानों और ग्रामीण जनता को चुकानी पड़ रही है।
(v) कई अन्य लोगों का सोचना था कि औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर को तेज किए बगैर गरीबी के मकड़जाल से छुटकारा नहीं मिल सकता। इन लोगों का तर्क था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के नियोजन में खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ाने की रणनीति अवश्य ही अपनायी गई थी। राज्य ने भूमि सुधार और ग्रामीण निर्धनों के बीच संसाधन के बंटवारे के लिए कानून बनाए।
(vi) नियोजन में सामुदायिक विकास के कार्यक्रम तथा सिंचाई परियोजनाओं पर बड़ी रकम खर्च करने की बात मानी गई थी। नियोजन की नीतियाँ असफल नहीं हुईं। दरअसल, इनका कार्यान्वयन ठीक नहीं हुआ क्योंकि भूमि-संपन्न तबके के पास सामाजिक और राजनीतिक ताकत ज्यादा थी। इसके अतिरिक्त,ऐसे लोगों की एक दलील यह भी थी कि यदि सरकार कृषि पर ज्यादा धनराशि खर्च करती तब भी ग्रामीण गरीबी की विकराल समस्या का समाधान न कर पाती।

प्रश्न 2. मिश्रित अर्थव्यवस्था से क्या अभिप्राय है? क्या आप इस बात से सहमत हैं कि यह अर्थव्यवस्था सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था से बेहतर है? अपने उत्तर की उपयुक्त तर्कों द्वारा पुष्टि करो ।
उत्तर : मिश्रित अर्थव्यवस्था का अभिप्राय : विकास की दो प्रमुख व्यवस्थाएँ हैं-(i) पूँजीवादी व्यवस्था, (ii) समाजवादी व्यवस्था ।
पूँजीवादी व्यवस्था के तहत विकास की तमाम योजनाएँ तथा कार्यक्रम निजी क्षेत्र के हाथों में होता है जबकि समाजवादी व्यवस्था में निजी संपत्ति की अवधारणा का कोई स्थान नहीं होता है तथा उत्पादन के समस्त साधनों पर राज्य का अधिकार होता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कृषि, व्यापार तथा उद्योगों का ज्यादातर भाग निजी हाथों में है। राज्य के द्वारा भारी उद्योगों तथा अन्य औद्योगिक संरचनाओं को नियंत्रित किया जाता है।
मिश्रित अर्थव्यवस्था की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था से तुलना : पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था के अपने-अपने गुण-दोष हैं। आजादी के समय भारत के नियोजकों के समक्ष अर्थव्यवस्था के दोनों मॉडल मौजूद थे। नियोजकों द्वारा भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक ‘मिश्रित नियोजन’ की व्यवस्था को अपनाया गया। इसमें कृषि, व्यापार तथा उद्योग (भारी उद्योग के अलावा) निजी हाथों में होते हैं। दूसरी तरफ, भारी उद्योग तथा भारी पूँजी निवेश के उपक्रमों पर राज्य का नियंत्रण कायम रखा गया । वास्तव में राज्य के द्वारा उन क्षेत्रों में निवेश किया गया जहाँ निजी उद्यमी निवेश के लिए तैयार नहीं थे।
जहाँ तक मिश्रित, पूँजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं में तुलना का प्रश्न है, प्रत्येक अर्थव्यवस्था के अपने-अपने गुण-दोष होते हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था की सफलता तथा असफलता उसके समुचित क्रियान्वयन पर निर्भर है। कोई भी अर्थव्यवस्था पूर्णरूपेण दोषमुक्त नहीं हो सकती।यदि हम भारत के प्रारंभिक नियोजन पर प्रकाश डालते हैं। तो पाएँगे कि भारत के आर्थिक विकास में बड़े-बड़े बाँधों जैसे- भाखड़ा नांगल तथा हीराकुण्ड का निर्माण सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन के लिए किया गया। इसके अलावा, भारी इस्पात उद्योग, तेल परिष्करणशालाएँ, उत्पादन इकाइयाँ तथा रक्षा उत्पादन राज्य के नियंत्रण में रखे गए। कुल मिलाकर, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि राज्य द्वारा अर्थव्यवस्था की जिस नींव की आधारशिला रखी गई थी, उसी पर विकास की सीढ़ियाँ बनीं ।

प्रश्न 3. हरित क्रांति क्या थी ? इसने कौन से क्षेत्रों को सर्वाधिक प्रभावित किया ? हरित क्रांति के दो सार्थक और दो निरर्थक नकारात्मक प्रभावों को लिखिए।

अथवा

हरित क्रांति के किन्हीं दो गुणों तथा दो अवगुणों को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : हरित क्रांति : यह कृषि प्राविधियों में सुधार लाकर कृषि उत्पादन में त्वरित वृद्धि करने के लिए सरकार के स्तर पर किया गया एक प्रयास था। सरल शब्दों में इसको खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भरता सुनिश्चित करने की एक सक्षम कृषि नीति कहा जा सकता है। यह तीसरी पंचवर्षीय योजना द्वारा संचालित कार्यक्रम का एक अभिन्न हिस्सा था। इस क्रांति के मुख्य तत्त्व थे–(i) रासायनिक खादों का प्रयोग, (ii) उच्च उत्पादकता वाले उन्नत बीजों का प्रयोग, (iii) सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, (iv) कृषि के उत्कृष्ट औजारों का प्रयोग। यह क्रांति हमारे देश को डेढ़-दशक तक खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सफल रही लेकिन इसके बाद प्रति हैक्टेयर पैदावार में पुन: गिरावट आने लगी है।
हरित क्रांति से प्रभावित दो क्षेत्र : हरित क्रांति से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र थे- हरियाणा तथा पंजाब। इन क्षेत्रों में खाद्यान्नों विशेषकर गेहूँ की पैदावार में भारी बढ़ोत्तरी हुई हरित क्रांति के फलस्वरूप पशुधन की मात्रा तथा उत्पादन में भी वृद्धि दर्ज की गई।
सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम :
सकारात्मक परिणाम : (i) हरित क्रांति का दोहन सबसे अधिक धनी जमींदारों और बड़े किसानों ने किया था। गेहूँ का उत्पादन प्रति हैक्टेयर अधिक तीव्र गति से बढ़ना आरम्भ हो गया था। भारत ने अगले डेढ़ दशक तक खाद्यान्न उत्पादन में आत्म निर्भरता प्राप्त की थी।
(ii) सरकार का सहयोग और प्रोत्साहन मिलने के कारण ही इतने बड़े पैमाने पर खाद्यान्न उत्पादन संभव हो पाया था। उर्वरकों, उच्च उत्पादकता वाली बीज किस्मों, नकद प्रतिकर सहायता (CCS), किसानों के अनुकूल उचित उत्पादन मूल्यों, सिंचाई सुविधा और विद्युत उपभोग एवं कृषि औजारों की दरों में छूट आदि के रूप में यह प्रोत्साहन दिया गया था। इसके कारण पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में रहने वाले किसानों के जीवनस्तर में सुधार हुआ। वे सभी अत्यधिक धनाढ्य बने तथा विधानसभा और संसद में अपनी सीटों की दावेदारी करने लगे । इस प्रकार सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से इन राज्यों के किसानों की प्रास्थिति आश्चर्यजनक रूप से उन्नत हो गई थी।
नकारात्मक परिणाम : (i) इस क्रांति ने निर्धन और छोटे किसानों तथा धनी जमींदारों के बीच की खाई को बहुत गहरा कर दिया, इस तरह धनी जमींदारों के हाथों छोटे किसानों का शोषण होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया जैसी बन गई। नीतियों की दृष्टि से वामपंथी दल इन निर्धन किसानों से चुनावी समर्थन प्राप्त करने और उत्तर भारत में संगठित होने का अवसर पाने लगे। हरित क्रांति के बाद से विधानसभा तथा संसद में उन्हें उत्तर भारत के प्रतिनिधि रूप में सीटें मिलने लगीं।
(ii) इससे समाज के विभिन्न वर्गों और देश के अलग-अलग इलाकों के बीच ध्रुवीकरण तेज हुआ। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाके कृषि के लिहाज से समृद्ध हो गए जबकि बाकी इलाके खेती के मामले में पिछड़े रहे।

प्रश्न 4. भारत में 1980 के पश्चात् नियोजन के महत्त्व को कम करने के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारणों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर : पहला, नयी आर्थिक नीति पर सहमति : कई समूह नयी आर्थिक नीति के खिलाफ हैं, लेकिन ज्यादतर राजनीति दल इन नीतियों के पक्ष में हैं। अधिकतर दलों का मानना है कि नई आर्थिक नीतियों से देश समृद्ध होगा और भारत विश्व की एक आर्थिक शक्ति बनेगा।
दूसरा, ,पिछड़ा जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति : राजनीतिक दलों ने पहचान किया है कि पिछड़ी जातियों के सामाजिक और राजनीति के दावे को स्वीकार करने की जरूरत है। इस कारण आज सभी राजनीतिक दल शिक्षा और रोजगार में पिछड़ी जातियों के लिए सीटों के आरक्षण के पक्ष में हैं। राजनीतिक दल यह भी सुनिश्चित करने के लिए तैयार है कि ” अन्य पिछड़ा पर्ग” को सत्ता में समुचित हिस्सेदार मिलें ।
तीसरा, देश के शासन में प्रांतीय दलों की भूमिका को स्वीकृति : प्रांतीय दल और राष्ट्रीय दल का भेद अब लगातार कम होता जा रहा है।
चौथा, विचारधारा की जगह कार्यसिद्धि पर जोर और विचारधारागत सहमति के बगैर राजनीति गठजोड़ : गठबंधन का राजनीति के इस दौर में राजनीति दल विचारधारागत अंतर की जगह सत्ता में हिस्सेदारी की बातों पर जोर दे रहे हैं, जो मिसाल के लिए अधिकतर दल भाजपा को हिंदुत्व की विचारधारा से सहमत नही हैं, लेकिन ये दल भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हुए और सरकार बनाई।

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