Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 4 Important Question Answer 3 Marks भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 1. अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के प्रोत्साहन हेतु भारत के संविधान में दिए गए किन्हीं चार राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को सूचीबद्ध कीजिए ।
उत्तर : अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए संविधान में निम्नलिखित चार राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों को सूचीबद्ध किया गया है :
(1) भारत अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।
(2) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखेगा।
(3) संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का प्रयत्न करेगा।
(4) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थ की सहायता से निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

प्रश्न 2. भारत की विदेश नीति की प्रकृति बताने वाले संवैधानिक प्रावधान क्या हैं ?
उत्तर : भारत की विदेश नीति की प्रकृति बताने वाले संवैधानिक प्रावधान निम्नलिखित हैं :
(i) राष्ट्रीय हित (National Interests) : प्रत्येक देश की विदेश नीति के निर्माण में इस तथ्य ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। समय की गति के साथ-साथ नई परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जिनके कारण राष्ट्रीय हितों को विकसित करने वाले तथ्यों में भी परिवर्तन आता रहता है।
(ii) भौगोलिक स्थिति (Geographical Position) : भारत की विदेश नीति इसकी भौगोलिक स्थिति से भी प्रभावित होती है। भारत स्थल बद्ध देश है। हमारी सीमाएँ पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और भूटान से मिलती हैं। भारत कोई भी ऐसी नीति नहीं अपना सकता जो साम्यवादी चीन, अन्य दक्षिण एशियाई और पश्चिम एशियाई देशों के लिए हानिकारक सिद्ध हो भारत का दक्षिणी क्षेत्र समुद्री तट के निकट है और हिन्द महासागर भारत के लिए अत्यंत महत्त्व रखता है। यही कारण है कि भारत ने सदैव इस बात पर बल दिया है कि हिन्द महासागर को शांति का क्षेत्र घोषित किया जाए और कोई भी बड़ी शक्ति हिन्द महासागर पर अपनी सैनिक प्रभुसत्ता स्थापित करने का प्रयत्न न करे ।
(iii) आर्थिक विकास : जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो उस समय हमारे देश की अर्थव्यवस्था बहुत कमजोर थी। भारत का आर्थिक विकास विदेशी सहायता के बिना संभव नहीं था। स्वतंत्र भारत शक्तिशाली देशों से सैनिक समझौते करके अपनी सुरक्षा कों एक सीमा तक विश्वनीय बना सकता था परंतु ऐसा साधन अपनाने का अभिप्राय अमेरिका या रूसी गुट में सम्मिलित होना था। इस सत्यता से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गुटबंदी की नीति हमारे देश के आर्थिक विकास के लिए हानिकारक सिद्ध होती। अन्य तत्त्वों के अतिरिक्त आर्थिक विकास की आवश्यकता ने भी हमारे नेताओं को गुटनिरपेक्षता की नीति ग्रहण करने के लिए बढ़ावा दिया ।

प्रश्न 3. पंचशील से क्या अभिप्राय है?
उत्तर : ‘पंचशील’ का अर्थ है. पाँच सिद्धांत। ये सिद्धांत हमारी विदेश नीति के मूल आधार हैं। इन पाँच सिद्धांतों के लिए “पंचशील” शब्द का प्रयोग सबसे पहले 24 अप्रैल, 1954 ई. को किया गया था। ये ऐसे सिद्धांत हैं कि यदि इन पर विश्व के सब देश चलें तो विश्व में शांति स्थापित हो सकती है। ये पाँच सिद्धांत निम्नलिखित हैं :
1.एक-दूसरे की अखंडता और प्रभुसत्ता को बनाए रखना।
2. एक-दूसरे पर आक्रमण न करना ।
3.एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
4.शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत को मानना ।
5.आपस में समानता और मित्रता की भावना को बनाए रखना।

प्रश्न 4. भारत की परमाणु नीति के विकास के दो प्रभाव बताइए।
उत्तर : भारत की परमाणु नीति के विकास के दो प्रभाव निम्नलिखित हैं :
1.भारत ने 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की।
2. भारत ने 1974 एवं 1998 में परमाणु परीक्षण किए। इन परीक्षणों द्वारा भारत ने परमाणु कार्यक्रम को आगे जारी रखने के लिए आवश्यक तथ्य और आँकड़े दिए ।

प्रश्न 5. भारत ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सी.टी.बी.टी.) पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए ?
उत्तर : (i) भारत ने व्यापक परमाणु प्रतिबंध परीक्षण (Comprehensive Test Ban Treaty CTBT) पर हस्ताक्षर नहीं किए। भारत के नजरिए से यह संधि पक्षपातपूर्ण है।
(ii) भारत का मानना है कि यह उचित नहीं है कि गैर-परमाणु शक्ति वाले देशों पर इस संधि को लागू किया जाए तथा 5 परमाणु शस्त्रों वाली शक्तियों पर नाभिकीय अस्त्र-शस्त्र रखने पर कोई प्रतिबंध न लगाए जाए।

प्रश्न 6. “कारगिल संघर्ष” क्या था ?
उत्तर : (i) 1999 के शुरुआती महीनों में भारतीय क्षेत्र की नियंत्रण सीमा रेखा के कई ठिकानों जैसे द्रास, माश्कोह, काकसर और बतालिक पर अपने को मुजाहिद्दीन बताने वालों ने कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना की इसमें मिलीभगत भाँपकर भारतीय सेना इस कब्जे के खिलाफ हरकत में आई। इससे दोनों देशों के बीच संघर्ष छिड़ गया। इसे ‘कारगिल की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है।
(ii) 1999 के मई-जून में यह लड़ाई जारी रही। 26 जुलाई, 1999 तक भारत अपने अधिकतर ठिकानों पर पुनः अधिकार कर चुका था।

प्रश्न 7. गुट-निरपेक्षता की रणनीति के माध्यम से जवाहरलाल नेहरू किन दो लक्ष्यों को प्राप्त कर लेना चाहते थे?
उत्तर : (i) गुट–निरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अंतर्राष्ट्रीय निर्णय और पक्ष ले सका, जिससे उसका हित सधता था।
(ii) भारत हमेशा इस स्थिति में रहा कि एक मह उसके विरुद्ध जाए तो वह दूसरी महाशक्ति के निकट आने का प्रयत्न करे। अगर भारत को महसूस होता कि महाशक्तियों में से कोई उसकी अनदेखी कर रही है या अनुचित दबाव डाल रही है तो वह दूसरी महाशक्ति की ओर रूख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोई भी भारत की ओर से न तो बेफ्रिक हो सकता था और न ही रौब जमा सकता था।

प्रश्न 8. भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने वाले किसी एक घरेलू कारक तथा किन्हीं तीन अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : I. आंतरिक या घरेलू कारक :
1.सुरक्षा तथा तीव्रता से आर्थिक हितों की रक्षा एवं विकास की गति को बनाये रखना।
II. अंतर्राष्ट्रीय कारक :
1.विश्व का स्पष्ट रूप से दो शक्ति-शिविरों में विभाजन ।
2.गुटेनिरपेक्ष आन्दोलन का गठन एवं विकास।
3.शीत युद्ध का शुरू होना तथा उसका लगभग 45 वर्षों तक (1945 से 1990) जारी रहना।

प्रश्न 9. बांडुंग सम्मेलन क्या था? इसके परिणामों का वर्णन कीजिए |
उत्तर : I. बांडुंग सम्मेलन का अभिप्राय : गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों का पहला शिखर सम्मेलन यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में सितम्बर, 1961 में हुआ। इसमें 25 देशों के राज्याध्यक्षों ने भाग लिया। इसमें यूरोप के यूगोस्लाविया और अमेरिकी महाद्वीप से क्यूबा को छोड़कर शेष सभी देश एशिया और अफ्रीका के थे। तीन अन्य देशों ने प्रेक्षकों के रूप में भाग लिया।
II. परिणाम :
1.भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत ने गुटनिरपेक्षता को विश्व की एक प्रमुख शक्ति बनाने में अग्रणीय भूमिका निभाई। उनके देहान्त के उपरान्त आने वाले भारत के प्रमुख नेताओं तथा देश ने गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को सबल बनाने में वर्षों तक अग्रणी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2.गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में प्रमुख भूमिकाएँ निभाने वाले दूसरे नेता थे-इन्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो।
3.बेलग्रेड के शिखर सम्मेलन के अन्त में जारी बयान में गुट निरपेक्षता के मूलभूत सिद्धान्तों की घोषणा की गई थी। ये सिद्धान्त हैं-स्थायी शान्ति, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के सभी रूपों का खात्मा, राष्ट्रों के मध्य शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, नस्ली भेदभाव की निन्दा, सैनिक गुटों का विरोध, निरस्त्रीकरण, मानवीय अधिकारों के प्रति सम्मान, राष्ट्रों के मध्य समानता के आधार पर शोषण मुक्त आर्थिक सम्बन्धों की स्थापना आदि।

प्रश्न 10. शिमला समझौते पर कब और किनके बीच हस्ताक्षर किए गए ?

अथवा

शिमला समझौता क्या था? इस पर हस्ताक्षर करने वालों के नाम लिखिए।
उत्तर : 1. 1971 के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के उपरांत शिमला (हिमाचल प्रदेश) में 3 जुलाई, 1972 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और पाकिस्तान के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ। इसमें दोनों देशों के बीच शांति की बहाली हुई। यह शिमला समझौता कहलाया।
2.इंदिरा गाँधी तथा जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

प्रश्न 11. “संयुक्त राष्ट्र एक अपरिहार्य संस्था है। ” इस कथन को किन्हीं दो उपयुक्त तर्कों द्वारा सत्यापित कीजिए।
उत्तर : यह कथन सही है कि अपने जीवन काल के लगभग 65 वर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व के अनेक भागों में छिड़े अनेक राष्ट्रों के मध्य संघर्षों, झड़पों और युद्धों को पूरी तरह नहीं रोक सका। यह भी सत्य है कि प्रत्येक युद्ध का दुष्परिणाम प्रभावित लोगों को जान-माल और सम्मान की हानि के रूप में झेलना पड़ता है। इसे भी संयुक्त राष्ट्र संघ नहीं रोक सका लेकिन यह भी सत्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी पूर्ववर्ती संस्था राष्ट्र संघ (League of Nations) की तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद असफल नहीं हुआ और तीसरे विश्व युद्ध को साकार रूप नहीं होने दिया। अनेक असफलताओं के बावजूद संयुक्त राष्ट्र संघ को बनाए रखना बहुत जरूरी है क्योंकि :
(i) आज संयुक्त राष्ट्र संघ में 192 देश इसके सदस्य बन चुके हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा प्रभावशाली अंतर्राष्ट्रीय मंच है। यहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर खुले मस्तिष्क से वाद-विवाद और विचार-विमर्श होता है। निःसंदेह इससे अंतर्राष्ट्रीय वातावरण को सौहार्दपूर्ण बनाये रखने में प्रशंसनीय मदद मिली है।
(ii) यह सही है कि कुछ राष्ट्रों के पास अणु और परमाणु बम हैं लेकिन यह भी सही है कि बड़ी शक्तियों के प्रभाव के कारण पर्याप्त सीमा तक सर्वाधिक भयंकर हथियारों के निर्माण और रासायनिक व जैविक हथियारों के प्रयोग और निर्माण को रोकने में इस संस्था को सफलता मिली है।
(iii) आज साम्यवादी विचारधारा लगभग शांत है। सोवियत संघ और चीन सहित अनेक पूर्व साम्यवादी यूरोपीय देश वैश्वीकरण, उदारीकरण और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक नीति और अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 12. “भारत की विदेश नीति जातिवाद व रंगभेद का विरोध करती है । ” स्पष्ट करो ।
उत्तर : जातिवाद व रंगभेद (Racial discrimination) : भारत की विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता जाति भेद व रंगभेद का विरोध है। भारत ने सदा ही जातिभेद व रंगभेद का विरोध किया है। यूरोप की श्वेत जातियों ने अन्य जातियों के साथ दुर्व्यवहार किया है। उन्हें हेय समझा है। उन्हें हीन बता कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया है। भारत में भी अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ बड़े अत्याचार किए थे। भारत ने स्वतंत्र होने के पश्चात् अफ्रीका के अश्वेत लोगों के साथ यूरोप की श्वेत जातियों द्वारा किये जाने वाले भेदभाव का कड़ा विरोध किया। रोडेशिया (जिम्बाब्वे) तथा दक्षिण अफ्रीका के गोरे शासन की नीतियों का भारत ने खुलकर निरंतर विरोध किया और अफ्रीकी जनता के स्वतंत्रता आन्दोलन में सहयोग दिया है। इतना ही नहीं अफ्रीकी देशों में और विशेषत: दक्षिण अफ्रीका में गोरी अल्पसंख्यक सरकार ही अश्वेतों के विरुद्ध रंगभेद नीति के संबंध में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ से कठोर रुख अपनाने का आग्रह किया। भारत के प्रयासों के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने रंगभेद की नीति के विरुद्ध अनेक प्रस्ताव पारित किए हैं।

प्रश्न 13. गुटनिरपेक्षता का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा तटस्थता से उसका भेद कीजिए ।
उत्तर : I. गुटनिरपेक्षता का अर्थ है- किसी भी गुट में सम्मिलित न होना और किसी भी गुट या राष्ट्र के कार्य की सराहना या निंदा आँख बन्द करके, बिना सोचे-समझे न करना । वास्तव में गुट निरपेक्षता की नीति अपनाने वाला राष्ट्र अपने लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करता है। वह राष्ट्र अच्छाई या बुराई, उचित या अनुचित का निर्णय स्व-विवेक से करता है। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व दो गुटों में विभाजित हो गया। इसमें से एक पश्चिमी देशों का गुट था और दूसरा साम्यवादी देशों का। दोनों महाशक्तियों ने भारत को अपने पीछे लगाने के काफी प्रयास किए, परंतु भारत ने दोनों ही प्रकार के सैनिक गुटों से अलग रहने का निश्चय किया। इस कारण ही भारत एक गुट निरपेक्ष राष्ट्र कहलाता है। भारत ने यह निश्चय किया कि वह किसी सैनिक गठबंधन का सदस्य नहीं बनेगा, स्वतंत्र विदेश नीति अपनाएगा तथा निष्पक्ष रूप से विचार करेगा।
II. गुटनिरपेक्षता तथा तटस्थता में भेद : गुटनिरपेक्षता और तटस्थता में अंतर है। गुटनिरपेक्ष देश युद्ध तथा शांति में तटस्थ नहीं रहते। अंतर्राष्ट्रीय कानून गुट निरपेक्षता को मान्यता नहीं देता जबकि यह तटस्थता को मान्यता देता है। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार तटस्थ देश के कुछ अधिकार व कर्तव्य होते हैं। दूसरी ओर गुट-निरपेक्ष देश के अंतर्राष्ट्रीय कानून के कोई अधिकार व कर्तव्य निश्चित नहीं किए जाते।

प्रश्न 14. भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई है ?
उत्तर : 15 अगस्त, 1947 ई. को स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1.भारत ने अपने को गुट संघर्ष में सम्मिलित करने की अपेक्षा देश की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति की ओर ध्यान देने में अधिक लाभ समझा क्योंकि हमारे सामने अपनी प्रगति अधिक आवश्यक है।
2.सरकार द्वारा किसी भी गुट के साथ मिलने से यहाँ की जनता में विभाजनकारी प्रवृत्ति उत्पन्न होने का भय था और उससे राष्ट्रीय एकता को धक्का लगता।
3.किसी भी गुट के साथ मिलने और उसका पिछलग्गू बनने की स्वतंत्रता कुछ अंश तक अवश्य प्रभावित होती है।
4.भारत स्वयं एक महान देश है और इसे अपने क्षेत्र में अपनी स्थिति को महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं थी।

प्रश्न 15. भारत तथा बांग्लादेश के बीच सहयोग और असहमति के किसी एक-एक क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 1. भारत तथा बांग्लादेश दो पड़ोसी देश हैं। बांग्लादेश द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करने में भारत ने काफी सहायता की थी। पूर्वी पाकिस्तान से 1971 में बांग्लादेश का निर्माण हुआ था। भारत और बांग्लादेश के बीच 1972 में 25 वर्षीय मैत्री, सहयोग तथा शां संधि हुई थी। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता भी हुआ। फलस्वरूप दोनों देशों में सहयोग तथा मित्रता बढ़ती गई।
2.परंतु शीघ्र ही दोनों देशों के बीच सीमा तथा फरक्का बाँध से संबंधित विवाद उत्पन्न हो गए। बांग्लादेश से शरणार्थी तथा घुसपैठिए निरंतर भारत आते रहते हैं। भारत में लाखों बांग्लादेशी किसी न किसी तरह से अनधिकृत ढंग से रह रहे हैं। बांग्लादेश ने अब तो अपने यहाँ आतंकवादियों को प्रशिक्षण देना भी शुरू कर रखा है। अनेक बांग्लादेशी अवैध तथा आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं।

प्रश्न 16. क्या भारत की विदेश नीति से ऐसा झलकता है कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महत्त्वपूर्ण शक्ति बनना चाहता है ? 1971 के बांग्लादेश के युद्ध के संदर्भ में अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए |
उत्तर : (i) भारत की गुटनिरपेक्ष और पंचशील सिद्धांत वाली विदेश नीति से यह बिल्कुल नहीं झलकता कि भारत क्षेत्रीय स्तर की महाशक्ति बनना चाहता है। 1971 का युद्ध इस बात को साबित नहीं करता। इस युद्ध के पीछे पूर्वी पाकिस्तान की उपेक्षापूर्ण नीतियाँ ही जिम्मेदार रही हैं। इस युद्ध में शिरकत करके यदि बांग्लादेश को भारत संघ में मिला लिया जाता तो उस दशा भारत की विदेश नीति पर आरोप लगाया जा सकता था। भारत ने केवल मानवीयता के आधार पर बांग्लादेश को सहयोग दिया।
(ii) बांग्लादेश के मामूली मतभेदों को छोड़कर भारत के साथ अच्छे संबंध बने हैं।
(iii) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, पंचशील, निशस्त्रीकरण, गुटनिरपेक्षता आदि सिद्धांतों पर टिकी हुई भारत की विदेश नीति पड़ोसी देशों पर वर्चस्व स्थापित करने की कदापि नहीं है।
(iv) भारत ने 1954 में चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए और उसके उपबंधों का अक्षरशः पालन किया। यह चीन ही था जिसने इसका उल्लंघन करके 1962 में भारत को युद्ध की आग में झोंक दिया था। पाकिस्तान के साथ भी संबंधों की पुनः बहाली के लिए भारत ने कई शिखरवार्ताएँ आयोजित की हैं, सीमा के नियमों को सरल बनाया है, विश्वास निर्माणी उपायों (CBMs) का आश्रय लिया है लेकिन पाकिस्तान की ओर से इन सभी प्रयत्नों को विफल कर दिया गया है। भारत का यू. एन.ओ. के सिद्धान्तों, पंचशील, गुटनिरपेक्षता, निशस्त्रीकरण, परमाणु शक्ति का शान्तिपूर्ण कार्यों में प्रयोग के प्रति दृढ़ विश्वास है।

प्रश्न 17. नेहरू द्वारा प्रतिपादित विदेश नीति के किन्हीं दो सिद्धांतों को लिखिए।
उत्तर : नेहरू द्वारा प्रतिपादित विदेश नीति के दो सिद्धांत : (i) गुटनिरपेक्षता और (ii) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व थे। इनका विवरण निम्नलिखित है :
(i) गुटनिरपेक्षता : भारत गुटों से अलग रहकर दोनों देशों से सहायता प्राप्त करना चाहता था ताकि देश का जल्दी से जल्दी विकास हो सके। नेहरू जी ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जनक समूह के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
(ii) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व : भारतीय विदेश नीति का सार “शांतिपूर्ण सहअस्तित्व” है। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है : बिना किसी मनमुटाव के मैत्रीपूर्ण ढंग से एक देश का दूसरे देश के साथ रहना। यदि विभिन्न राष्ट्र एक-दूसरे के साथ पड़ोसियों की भाँति नहीं रहेंगे तो विश्व में शांति की स्थापना नहीं हो सकती। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व विदेश नीति का मात्र सिद्धांत ही नहीं है अपितु यह राज्यों के बीच व्यवहार का एक तरीका भी है।

प्रश्न 18. विदेशी संबंध के विषय में संविधान निर्माताओं ने राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अनुच्छेद 51 में क्या कहा है ? संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

अथवा

विदेश नीति से संबंधित किन्हीं दो नीति-निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए।

अथवा

किन्हीं दो राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए जो विदेशों के साथ संबंधों से संबंधित हैं।

अथवा

भारतीय संविधान में दिए गए विदेश नीति संबंधी किन्हीं दो राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के बढ़ावे’ के लिए राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत के हवाले से कहा गया है कि राज्य :
(क) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
(ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,
(ग) संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहार में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि-बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और (घ) अंतर्राष्ट्रीय विवादों को पारस्परिक बातचीत द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

प्रश्न 19. 1971 में भारत और सोवियत संघ द्वारा किस संधि पर हस्ताक्षर किए गए और क्यों? इससे भारत को क्या आश्वासन मिला था ?
उत्तर : (i) भारत और सोवियत संघ के बीच बीस वर्षीय “शांति और मित्रता की संधि” पर अगस्त, 1971 में हस्ताक्षर किए गए। (ii) इस संधि के तहत भारत पर किसी देश के आक्रमण की स्थिति में सोवियत संघ ने समर्थन का आश्वासन दिया था।
कारण : इसका मुख्य कारण पूर्वी पाकिस्तान के लोगों द्वारा स्वयं को पाकिस्तान से मुक्त करना था। चुनाव में मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग को पूर्वी पाकिस्तान में सफलता मिली परंतु पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने जनादेश की अवहेलना की जिससे वहाँ के लोगों ने संघर्ष प्रारंभ किया। उस समय अमेरिका-पाकिस्तान-चीन की धुरी बन रही थी । ऐसी परिस्थितियों में भारत ने रूस के साथ शांति और मित्रता की संधि की क्योंकि उस समय पूर्वी पाकिस्तान से लगभग 80 लाख शरणार्थी भारत आ चुके थे, और भारत तथा पाकिस्तान में तनावपूर्ण संबंध थे।

प्रश्न 20. भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 के तीन राजनैतिक प्रभाव लिखिए।

अथवा

1971 में हुए भारत-पाक संघर्ष के दो प्रमुख परिणाम कौन-से थे ?
उत्तर : 1. भारतीय सेना के समक्ष 90,000 सैनिकों के साथ पाकिस्तानी सेना को आत्म-समर्पण करना पड़ा।
2.बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय के साथ भारतीय सेना ने अपनी तरफ से एकतरफा युद्ध-विराम घोषित कर दिया। बाद में 3 जुलाई, 1972 को इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझौते पर हस्ताक्षर हुए और इससे अमन की बहाली हुई।

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