Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 4 Important Question Answer 8 Marks भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 1. विदेश नीति से क्या अभिप्राय है ? भारत की विदेश नीति के मूलभूत सिद्धान्तों का विवेचन कीजिए।

अथवा

भारतीय विदेश नीति के मूल सिद्धान्त क्या हैं ? व्याख्या कीजिए।

अथवा

भारतीय विदेश नीति के किन्हीं चार सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : विदेश नीति (Foreign Policy) : साधारण शब्दों में विदेश नीति से तात्पर्य उस नीति से है जो एक राज्य द्वारा दूसरे राज्यों के प्रति अपनाई जाती है। वर्तमान युग में कोई भी स्वतंत्र देश संसार के अन्य देशों से अलग नहीं रह सकता। उसे राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। इस संबंध को स्थापित करने के लिए वह जिन नीतियों का प्रयोग करता है, उन नीतियों को उस राज्य की विदेश नीति कहते हैं।

भारत की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धांत (Main principles of India’s foreign policy):
(i) गुटनिरपेक्षता की नीति : भारत की नीति गुटनिरपेक्षता की रही है। यद्यपि आज सोवियत संघ के विघटन के पश्चात अमरीका का वर्चस्व है परंतु गुटनिरपेक्षता आज भी प्रासंगिक है। भारत विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय विवादों का समर्थन गुणात्मक आधार पर करता है। इस प्रकार भारत सभी देशों से आर्थिक व अन्य प्रकार की सहायता प्राप्त करने में सफल हुआ है।
(ii) अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा : भारत की नीति विश्व में शान्ति व सुरक्षा की स्थापना करना है। भारत सभी विवादों का हल •बातचीत द्वारा करने के पक्ष में है। इसीलिए वह पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी अपने मतभेदों को बातचीत के द्वारा सुलझाने के लिए प्रयत्नशील है। 1954 में पंचशील पर हस्ताक्षर भी इसी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।
(iii) संयुक्त राष्ट्र संघ का समर्थन : विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति की स्थापना में भारत ने सदा संयुक्त राष्ट्र संघ की गतिविधियों का समर्थन किया है और अपना योगदान दिया है। आवश्यकता पड़ने पर अपनी सेना भी कई क्षेत्रों में भेजी है।
(iv) निशस्त्रीकरण : शीतयुद्ध के दौरान शस्त्रों की होड़ का भारत ने विरोध किया। भारत ने प्रारम्भ से ही परमाणु हथियारों के प्रयोग और निर्माण का विरोध किया। भारत एक व्यापक और समानता के आधार पर बिना किसी भेदभाव के निशस्त्रीकरण के पक्ष में है ताकि विश्व में स्थायी शान्ति की स्थापना हो सके।

प्रश्न 2. भारतीय परमाणु नीति की किन्हीं दो विशेषताओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : भारतीय परमाणु नीति की दो विशेषताएँ :
(i) भारत की परमाणु नीति की जड़ें उसकी विदेश नीति में समाई हुई हैं अर्थात् भारत की विदेश नीति पंचशील और निर्गुट नीति का संश्लिष्ट रूप है। हम इन दोनों प्रेरणास्रोतों से प्रेरणा लेकर ही परमाणु नीति के सकारात्मक पहलुओं पर जोर देते हैं।
इस नीति के दो पहलुओं के दृढ़तापूर्वक अनुपालन और अनुसरण में भारत ने केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा करने की सीमा तक ही नाभिकीय परीक्षणों को संपन्न किया है। उसका आशय इन परमाणु हथियारों का प्रयोग उस दशा तक न करने का जब तक कोई आकस्मिक संकट की दशाएँ उत्पन्न नहीं कर दी जाती हैं। भारत युद्ध में पहले इन हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा। भारत जानता है कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के नियम विकसित देशों का पक्षपात करते हैं इसीलिए उसने इसमें अपने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण मई, 1974 में किया।
(ii) भारत ने बार-बार घोषित किया है कि वह केवल शांतिपूर्ण और विकास-मूलक परियोजनाओं में नाभिकीय शक्ति का प्रयोग करना चाहता है। इसमें संदेह नहीं कि राजनैतिक दलों के बीच भारत की विदेश नीति पर किंचित मतभेद है, लेकिन देश की अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा की प्रतिरक्षा तथा राष्ट्रहित के मुद्दों पर हमेशा सर्वसम्मति बनी रहती है। भारत एशिया की महाशक्ति बनने की इच्छा नहीं रखता है तथा पंचशील और निर्गुट नीति से समर्थित शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आस्था रखता है।

प्रश्न 3. नेहरू की विदेश नीति के उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए। वह किस रणनीति के द्वारा इन उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहते थे?

अथवा

भारत की विदेश नीति में जवाहर लाल नेहरू द्वारा दिए गए योगदान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : नेहरू की विदेश नीति के प्रमुख उद्देश्य : 1. “पंचशील” अर्थात् पाँच संकल्पों या सिद्धान्तों ( पंच सदाचार) का दृढ़ता से अनुपालन करना : यह शब्द सर्वप्रथम 29 अप्रैल, 1954 को प्रतिपादित हुआ। इसमें अंतर्निहित पाँच सिद्धांत हैं :
(i) विश्व के प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे की अखंडता और संप्रभुता को परस्पर व्यवहार-विनिमय करते समय अक्षुण्ण बनाए रखेंगे।
(ii) विश्व के राष्ट्र परस्पर युद्ध की संभावना से परहेज करें। (iii) प्रत्येक दो राष्ट्र अपने आंतरिक मुद्दों पर परस्पर हस्तक्षेप करने से बचें।
(iv) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत का दृढ़ता ‘सुनिश्चित करना । से पालन
(v) मैत्री और समानता की भावना का संपोषण किया जाए और इसको प्रत्येक स्थिति में कायम रखा जाए।
2.गुट निरपेक्ष नीति की प्रतिबद्धता और समर्थन को जुटाना : यह नीति या विदेश नीति भारत को विश्व के दो सर्वाधिक सशक्त गुटों के बीच पिसने से बचाने हेतु बनाई गई थी। इसमें एक गुट पश्चात्य देशों का था और दूसरा साम्यवादी देशों का।
भारत की विदेश नीति के संचालन के संदर्भ में नेहरू (Nehru’s outlook to run the foreign policy of India) : भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एजेंडा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई। वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के रूप में 1946 से 1964 तक उन्होंने भारत की विदेश नीति की रचना और क्रियान्वयन पर गहरा प्रभाव डाला। नेहरू की विदेश नीति के तीन बड़े उद्देश्य थे-कठिन संघर्ष से प्राप्त संप्रभुता को बचाए रखना, क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखना और तेज रफ्तार से आर्थिक विकास करना। नेहरू इन उद्देश्यों को गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर हासिल करना चाहते थे।
रणनीति :
(i) भारत दोनों गुटों से अलग रहकर दोनों देशों से सहायता प्राप्त करना चाहता था ताकि देश का जल्दी से जल्दी विकास हो सके। नेहरू जी ने गुट निरपेक्ष आंदोलन के जनक-समूह के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।
(ii) भारत स्वतंत्र विदेश नीति को इसलिए अनिवार्य मानता था ताकि देश में लोकतंत्र, कल्याणकारी राज्य के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपनिवेशवाद, जातीय भेद-भाव, रंग-भेदभाव का मुकाबला डटकर किया जा सके। नेहरू जी ने एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में भाग लिया। इंडोनेशिया की स्वतन्त्रता का समर्थन किया। चीन के तिब्बत आधिपत्य को स्वीकार किया। चीन की सुरक्षा परिषद में सदस्यता का समर्थन किया। सोवियत संघ ने हंगरी पर जब आक्रमण किया तो उसकी निंदा की।

प्रश्न 4. ” भारत अपनी निर्गुट नीति को छोड़कर अमेरिका का पक्षधर बने ” । क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपने उत्तर के समर्थनकारी किन्हीं तीन तर्कों को लिखिए।
उत्तर : नहीं, मैं उपर्युक्त कथन से सहमत नहीं हूँ। इसके में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं। :
1.भारत ने अपनी विदेश नीति का लक्ष्य अपनी संप्रभुता की रक्षा, शांति स्थापित करना और जनता की भलाई व विकास रखा। अतः भारत के लिए एक स्वतन्त्र नीति आवश्यक है। इसी के परिणामस्वरूप वह सभी देशों से आर्थिक और अन्य प्रकार की सहायता प्राप्त कर सकता है। अगर अमेरिका के साथ वह मिल जाता है तो अन्य देशों जैसे रूस से सहायता प्राप्त करना कठिन हो जाएगा।
2.गुटनिरपेक्ष आंदोलन आज के एक-ध्रुवीय विश्व में भी प्रासंगिक है। शीतयुद्ध के अंत और सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रभाव कम हुआ है परंतु इसके कुछ आधारभूत मूल्य और विचार हैं। यह नव-स्वतंत्र देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव है। गुट निरपेक्ष आंदोलन के देश किसी एक देश के पिछलग्गू नहीं हैं बल्कि उनकी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है। भारत ने भी अपनी एक स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाई है। 1956 में ब्रिटेन द्वारा स्वेज नहर के प्रश्न पर मिस्र पर आक्रमण और बाद में रूस द्वारा हंगरी पर आक्रमण के दौरान भारत द्वारा विरोध इसके उदाहरण हैं। इसके विपरीत भारत अगर अमेरिका के साथ मिल जाता है तो वह ऐसी स्वतन्त्र नीति नहीं अपना पाएगा। इसलिए गुटनिरपेक्ष आंदोलन न केवल प्रासंगिक है अपितु भारत के लिए यह नीति लाभदायक भी है।
3.गुटनिरपेक्षता की नीति के अन्तर्गत तटस्थता की नीति नहीं अपनाई जाती बल्कि आवश्यकता पड़ने पर गुटनिरपेक्ष देश शांति व स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच मध्यस्थता भी करते हैं। इसी तरह गुटनिरपेक्ष देश आवश्यकता पड़ने पर युद्ध में भी शामिल हुए हैं और युद्ध को टालने का प्रयास भी करते रहे हैं।
उपर्युक्त तर्कों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत को गुटनिरपेक्षता की नीति को छोड़कर अमेरिका के साथ नहीं मिलना चाहिए।

प्रश्न 5. भारत के परमाणु कार्यक्रम की गतिविधियों के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर : (i) भारत ने बार-बार घोषित किया है कि वह केवल शांतिपूर्ण और विकास-मूलक परियोजनाओं में नाभिकीय शक्ति का प्रयोग करना चाहता है। इसमें संदेह नहीं कि राजनैतिक दलों के बीच भारत की विदेश नीति पर किंचित मतभेद है लेकिन देश की अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय सीमा की प्रतिरक्षा तथा राष्ट्रहित के मुद्दों पर हमेशा सर्वसम्मति बनी रहती है। भारत एशिया की महाशक्ति बनने की इच्छा नहीं रखता है तथा पंचशील और निर्गुट नीति से समर्थित शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर आस्था रखता है।
(ii). भारत ने 1974 के मई में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। तेज गति से आधुनिक भारत के निर्माण के लिए नेहरू जी ने हमेशा विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर अपना विश्वास जताया था। नेहरू की औद्योगीकरण की नीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक-परमाणु कार्यक्रम था। इसकी शुरुआत 1940 के दशक के अंतिम सालों में होमी जहाँगीर भाभा के निर्देशन में हो चुकी थी। भारत शांतिपूर्ण उद्देश्यों में इस्तेमाल के लिए अणु ऊर्जा बनाना चाहता था। नेहरू परमाणु हथियारों के खिलाफ थे। उन्होंने महाशक्तियों पर व्यापक परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए जोर दिया। बहरहाल, परमाणु आयुधों में बढ़ोत्तरी होती रही।
(iii) अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल (1998) में दूसरी बार परमाणु परीक्षण किए जाने पर जब अमेरिका तथा पाश्चात्य देशों ने भारत की आलोचना की थी और भारत पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाये तो अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका उत्तर देते हुए कहा था कि भारत भी पूर्ण निःशस्त्रीकरण के पक्ष में है और वह सी. टी. बी. टी. पर हस्ताक्षर करने को तैयार है परन्तु यह सब वह तभी करेगा जबकि इस संधि को पक्षपात रहित बनाया जाए अर्थात् सभी देशों को पहले अपने आणविक हथियार समाप्त करने चाहिए।
(iv) भारत ने N.P.I. तथा C.T.B.T. पर हस्ताक्षर करने से इसलिए इंकार कर दिया है क्योंकि ये संधियाँ पक्षपातपूर्ण हैं और यह उचित नहीं है कि कुछ देश तो अपने शस्त्र बनाए रखें और अन्य देशों पर शस्त्र रखने पर प्रतिबंध लगाया जाए। भारत का कहना है कि सभी देशों को अपने नाभिकीय अस्त्र-शस्त्र समाप्त करने चाहिए। उसी के बाद भारत भी स्वेच्छा से ही इन संधियों पर हस्ताक्षर कर देगा।

प्रश्न 6. स्वतंत्र भारत की परमाणु नीति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :स्वतंत्र भारत की परमाणु नीति : भारत की परमाणु नीति की जड़ें उसकी विदेश नीति में समाई हुई हैं अर्थात् भारत की विदेश नीति, पंचशील और निर्गुट नीति का संश्लिष्ट रूप है। हम इन दोनों प्रेरणास्रोतों पर निम्नवत् परिचर्चा करना चाहेंगे :
1.पंचशील : पंचशील (पाँच सिद्धातों का एक पुंज) के सिद्धांत निम्नवत् हैं :
(i) प्रत्येक देश दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करे।
(ii) एक देश दूसरे देश के आंतरिक मामलात् पर किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगा।
(iii) एक देश दूसरे देश पर आक्रमण नहीं करेगा। यदि उनके बीच कदाचित् मतभेद या विवाद उत्पन्न होते हैं तो उनका निदान शक्ति प्रदर्शन में नहीं ढूँढा जाएगा बल्कि परस्पर वार्ता और विचार-विनिमय से किया जाएगा।
(iv) सभी देश एक-दूसरे को समान समझें और परस्पर सहकारिता तथा उपलब्धि की भावना और विचार से कार्य करें।
(v) सभी देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का अनुसरण करें और अपनी नीति का आधार ‘जिओ और जीने दो’ सिद्धांत को बनाएँ।
उल्लेखनीय है कि भारत-चीन समझौते की उद्देशिका के रूप में इन सिद्धांतों पर 1954 में दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए थे।
2.निर्गुट नीति : 1961 में इसकी स्थापना एक आंदोलन के रूप में की गई थी। इसकी पहली शिखर वार्ता यूगोस्लाविया के बेलग्रेड नगर में हुई। यह वार्ता 1-6 सितम्बर तक चली और इसमें विश्व के 25 देशों ने भाग लिया। इस आंदोलन के सिद्धांत निम्नलिखित हैं :
(i) विश्व में शांति और व्यवस्था स्थापित करना।
(ii) जाति/वंश भेद का विरोध करना।
(iii) सैन्य गुटों से तटस्थ रहना और उनका विरोध करना।
(iv) निःशस्त्रीकरण के प्रयास करना और आयुध विनिर्माण की अंधी दौड़ को रोकना।
(v) उपनिवेशवाद को समाप्त करना।
(vi) सह अस्तित्व की भावना (जिओ और जीने दो) को प्रोत्साहित करना ।
(vii) मानव अधिकारों पर गहन आस्था रखना। (viii) विश्व के देशों के बीच समानता के आधार पर आर्थिक संबंधों की सर्जना करना ।

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