Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 5 Important Question Answer 3 Marks कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 1. भारत में चौथे आम चुनावों (1967) ने भारतीय राजनीति की गति को किस प्रकार बदला?

अथवा

भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में 1967 के वर्ष को अत्यंत महत्त्वपूर्ण पड़ाव क्यों माना जाता है? व्याख्या कीजिए ।

अथवा

1967 के चौथे आम चुनावों से पहले, गंभीर आर्थिक संकट के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारकों को उजागर कीजिए।
उत्तर : 1967 के आम चुनावों से पहले गंभीर आर्थिक संकट के लिए उत्तरदायी चार कारक निम्नलिखित हैं :
(i) 1967 के आम चुनाव एवं उससे पूर्व देश के समक्ष आर्थिक समस्याएँ एवं चुनौतियाँ : चौथे आम चुनावों के आने तक देश में बड़े बदलाव हो चुके थे। दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हुआ और नए प्रधानमंत्री को पद संभाले हुए अभी पूरा एक साल का अरसा भी नहीं गुजरा था। साथ ही, इस प्रधानमंत्री को राजनीति के लिहाज से कम अनुभवी माना जा रहा था।
(ii) चुनाव से पूर्व आर्थिक संकट/समस्याएँ एवं स्थिति : 1967 के चुनाव से पूर्व देश गंभीर आर्थिक संकट में था। मानसून की असफलता, व्यापक सूखा, खेती की पैदावार में गिरावट, गंभीर खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट के साथ ही साथ सैन्य खर्चे में भारी बढ़ोत्तरी हुई थी। नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य मद में लगाना पड़ा। इन सारी बातों से देश की आर्थिक • स्थिति विकट हो गई थी। आर्थिक स्थिति की विकटता के कारण कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ। लोग आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, खाद्यान्न की कमी, बढ़ती हुई बेरोजगारी और देश की दयनीय आर्थिक स्थिति को लेकर विरोध पर उतर आए।
(iii) रुपये का अवमूल्यन : इंदिरा गाँधी की सरकार के शुरुआती फैसलो में एक था- रुपये का अवमूल्यन करना। माना गया कि रुपये का अवमूल्यन अमेरिका के दबाव में किया गया। पहले के वक्त में 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 5 रुपये थी, तो अब बढ़कर 7 रुपये हो गई।
(iv) जन आक्रोश : देश में अक्सर ‘बंद’ और ‘हड़ताल’ की स्थिति रहने लगी। सरकार ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या माना, न कि जनता की बदहाली की अभिव्यक्ति। इससे लोगों की नाराजगी बढ़ी और जन विरोध ने ज्यादा उग्र रूप धारण किया।

प्रश्न 2. 1960 के दशक को “खतरनाक दशक” क्यों कहा जाता है ?

अथवा

भारतीय राजनीति के सन्दर्भ में खतरनाक दशक का अर्थ क्या है ?
उत्तर : (i) यद्यपि भारत ने पंचवर्षीय योजनाएँ 1951 से ही अपना ली थीं लेकिन 1960 के दशक में कृषि की दशा बद से बदतर होती गई। 1940 और 1950 के दशक में ही खाद्यान्न के उत्पादन की वृद्धि दर, जनसंख्या की वृद्धि दर से जैसे-तैसे अपने को ऊपर रख पाई थी। 1965 व 1967 के बीच देश के अनेक हिस्सों में सूखा पड़ा। इसी अवधि में भारत ने दो युद्धों का सामना किया और उसे विदेशी मुद्रा के संकट को झेलना पड़ा। भारत की खाद्यान्न सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होना अनिवार्य था। भारत के इस खाद्यान्न ने देश के विकासवादी दृष्टिकोण में अलग प्रकार के पूर्ण बदलाव को जन्म दिया।
(ii) बिहार में खाद्यान्न संकट सबसे ज्यादा विकराल था। यहाँ स्थिति लगभग अकाल जैसी हो गई थी। बिहार के सभी जिलों में खाद्यान्न का अभाव बड़े पैमाने पर था। इस राज्य के 9 जिलों में अनाज की पैदावार सामान्य स्थिति की तुलना में आधी से भी कम थी। इनमें से पाँच जिले अपनी पैदावार की तुलना में महज एक-तिहाई ही अनाज उपजा रहे थे।

प्रश्न 3. 1969 में राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार का इंदिरा गाँधी द्वारा विरोध करने का निर्णय कहाँ तक उचित था ?
उत्तर : गुजरे वक्त में भी कांग्रेस के भीतर इस तरह के मतभेद उठ चुके थे, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग ही था। दोनों गुट चाहते थे कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में ताकत को आजमा ही लिया जाए। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजीलिंगप्पा ने “व्हिप” जारी किया कि सभी “कांग्रेसी सांसद और विधायक पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी को वोट डालें”। इंदिरा गाँधी के समर्थक गुट ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की विशेष बैठक आयोजित करने की याचना की, लेकिन उनकी यह याचना स्वीकार नहीं की गई। वी. पी. गिरि का छुपे तौर पर समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने खुलेआम अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने को कहा। इसका मतलब यह था कि कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी मनमर्जी से किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते थे। आखिरकार राष्ट्रपति पद के चुनाव में वी. पी. गिरि ही विजयी हुए। वे स्वतंत्र उम्मीदवार थे, जबकि एन संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवार थे।

प्रश्न 4. ‘ग्रैंड अलायंस’ किसे कहा गया? 1971 के चुनावों में इसका प्रदर्शन कैसा था ?
उत्तर : ग्रैंड अलायंस का गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था क्योंकि चुनावी मुकाबला कांग्रेस (आई) के विरुद्ध जान पड़ रहा था। हर किसी को विश्वास था कि कांग्रेस पार्टी की असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ) के नियंत्रण में है। ग्रैंड अलायंस संगठन में स्वतंत्र पार्टी, भारतीय जनसंघ, भारतीय क्रांति दल और समाजवादी पार्टियाँ भी इंदिरा गाँधी के खिलाफ एकजुट हो गई थीं।
1971 के चुनावों में ग्रैंड अलायंस का प्रदर्शन : 1971 के लोकसभा चुनावों के नतीजे उतने ही नाटकीय थे जितना इन चुनावों को कराने का फैसला। विरोधी दलों का कार्यक्रम और उनकी नीतियाँ नकारात्मक थीं। उसमें केवल ‘इंदिरा हटाओ’ की बात कही गई थी। इसलिए मतदाताओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा। 1971 के चुनावों ने सबको आश्चर्य में डाल दिया। इंदिरा के नेतृत्व वाली सरकार को दो तिहाई से ज्यादा सीटें मिलीं अर्थात् नई कांग्रेस को 352 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस संगठन को केवल 16 सीटें मिलीं। एक तरह से कांग्रेस संगठन का पत्ता साफ हो गया। जनसंघ 22 स्थानों पर विजयी रहा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने, जिसका इंदिरा गाँधी के साथ गठजोड़ था, 23 सीटों पर विजय प्राप्त की। इस कारण लोकसभा की 68 प्रतिशत सीटों पर इंदिरा गाँधी का कब्जा हो गया।

प्रश्न 5. 1971-72 के पश्चात् भारत सरकार के समक्ष आने वाली किन्हीं दो समस्याओं को सूचीबद्ध कीजिए ।
उत्तर : 1971-1972 के पश्चात् भारत सरकार के समक्ष आने वाली दो समस्याएँ निम्न थीं :
1.बिगड़ी हुई आर्थिक दशा : इंदिरा गाँधी का ‘गरीबी ‘हटाओ’ का नारा खोखला साबित हुआ। बांग्लादेश के संकट से देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ा। अमेरिकी आर्थिक सहायता की समाप्ति तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोत्तरी तथा चीजों की कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी ।
2.देश में सामाजिक दशा भी खराब हो गई। विकास दर में कमी तथा बढ़ती बेरोजगारी ने नौजवानों में असंतोष पैदा किया तथा कर्मचारियों को अपना वेतन बहुत कम नजर आने लगा। देश में मार्क्सवादी समूहों, नक्सलवादी आंदोलनों तथा गुजरात एवं बिहार के विद्यार्थियों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। संपूर्ण क्रांति का नारा केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया।

प्रश्न 6. भारत की राजनीति में “आया राम, गया का क्या तात्पर्य है ?

अथवा

“आया राम, गया राम” का मुहावरा किस अवधारणा का द्योतक है? भारतीय राजनैतिक व्यवस्था पर इसके प्रभाव की व्याख्या कीजिए ।

अथवा

“आया राम और गया राम” पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : विधायकों या सांसदों द्वारा अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी-तीसरी पार्टी में शामिल होने की घटना से भारत के राजनीतिक शब्दकोश में आया राम, गया राम’ का मुहावरा शामिल हुआ। इस मुहावरे की प्रसिद्धि के साथ एक घटना जुड़ी है। 1967 के चुनावों के बाद हरियाणा के एक विधायक-गया लाल ने राजनीतिक निष्ठा बदलने का जैसे एक कीर्तिमान ही स्थापित कर दिया था। उन्होंने एक पखवाड़े के अंदर तीन बार अपनी पार्टी बदली। पहले वे कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट में गए, फिर वापस कांग्रेस में आए और फिर यूनाइटेड फ्रंट में चले गए।
कहा जाता है कि जब गया लाल ने यूनाइटेड फ्रंट छोड़कर कांग्रेस में आने की इच्छा प्रकट की तो कांग्रेस के नेता राव वीरेन्द्र सिंह उन्हें लेकर चंडीगढ़ प्रेस के सामने घोषणा की – “गया राम था अब आया राम है”। गया लाल की इस हड़बड़ी को ‘आया राम गया राम’ के मुहावरे में हमेशा के लिए दर्ज कर लिया गया। लोकतंत्र के साथ दल-बदल या ‘आया राम, गया राम’ एक निंदनीय और भद्दा मजाक है।

प्रश्न 7. 1971 के चुनाव परिणामों ने किस प्रकार कांग्रेस की पुनः स्थापना में सहायता की ?
उत्तर : (i) इन चुनावों में कांग्रेस (आर.) या नई कांग्रेस ने 352 सीटें और 44 प्रतिशत वोट हासिल किए। सी.पी.आई. के गठबंधन सहित कांग्रेस को कुल 375 सीटें मिली तथा इस तरह कुल मतों के 48.4 प्रतिशत वोट हासिल किए।
(ii) इन चुनावों में इंदिरा गाँधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर.) के चुनावी मुद्दे जनता की तात्कालिक आवश्यकता वाले थे। शहरी संपत्ति के परिसीमन, प्रिवीपर्स की समाप्ति, आय और अवसरों की समानता और गाँवों की कृषि पर कृषकों के स्वामित्व को लाकर “गरीबी हटाने” का नारा देना एक अति संगठित चुनावी कार्यक्रम था।
(iii) चालीस राजनीतिक दलों के महाजोट (गठबंधन) का चुनावी घोषणापत्र तात्कालिक लोकतांत्रिक आवश्यकता के अनुकूल नहीं था और उनमें केंद्रीय नेतृत्व का अभाव था।
(iv) पुरानी कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेता (सिंडिकेट) समूह) 1967 के चुनाव में हार गए थे लेकिन फिर भी अपने को किंगमेकर मानते थे। इस चुनाव ने उनकी इस खोखली और गर्वीली मानसिकता को धूल चटा दी ।

प्रश्न 8. ‘प्रिवीपर्स’ का क्या अर्थ है ? 1970 में इंदिरा गांधी उन्हें क्यों समाप्त कर देना चाहती थी ?
उत्तर : 1. प्रिवीपर्स का अर्थ : देशी रियासतों के भारतीय संघ में विलय के समय रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी संपदा रखने का अधिकार दिया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिए जाएँगे। यह भत्ते आदि राज्य के विस्तार, राजस्व और क्षमता पर आधारित थे। इस व्यवस्था को “प्रिवीपर्स” कहा गया।
2.1970 में इंदिरा गांधी द्वारा प्रिवीपर्स समाप्ति की घोषणा : “प्रिवीपर्स” भारतीय संविधान में वर्णित समानता और सामाजिक-आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध थे। इसलिए इंदिरा गाँधी इसको समाप्त करने के पक्ष में थी। 1971 के चुनावों में मुद्दा बनाकर जन-समर्थन प्राप्त करके इंदिरा गाँधी ने भारी विजय प्राप्त करने के पश्चात् संविधान में संशोधन करके प्रिवीपर्स की व्यवस्था को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 9. 1971 के चुनाव के परिणामस्वरूप बदली हुई कांग्रेस व्यवस्था की प्रकृति कैसी थी?
उत्तर : (i) इंदिरा गाँधी ने आर्थिक नीति को राजनीति का प्रमुख विषय बनाया।
(ii) उन्होंने कांग्रेस को अपने सर्वोच्च नेता (वह स्वयं) पर निर्भर रहने वाली बना दिया। यहाँ से उसके आदेश सर्वोपरि बनने शुरू हुए। सिंडिकेट जैसे अनौपचारिक प्रभावशाली नेताओं का समूह राजनीतिक मंच से गायब हो गया।
(iii) 1971 के बाद कांग्रेस का संगठन भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले समूहों के समावेशी किस्म का नहीं रहा। अब यह अनन्य एकाधिकारिता वाला बन गया था।
(iv) इंदिरा की कांग्रेस को निर्धनों, महिलाओं, दलित समूहों, जनजाति समूहों के लोगों ने जिताया था। यह धनी उद्योगपतियों, सौदागरों और राजनीतिज्ञों के समूह या सिंडिकेट के हाथों की कठपुतली अब नहीं रही। वस्तुतः यह पहले की कांग्रेस पार्टी का पूर्णत: बदला हुआ स्वरूप था।

प्रश्न 10. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् उन परिस्थितियों को स्पष्ट कीजिए जिनमें इंदिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बनी ।
उत्तर : शास्त्री के बाद इंदिरा गाँधी-
1.शास्त्री की मृत्यु के बाद मुकाबला मोराजी देसाई और इंदिरा गाँधी के बीच था। शास्त्री के मंत्रिमंडल में उन्होनें सूचना मंत्रालय का प्रभार संभाला था। इस दफा पार्टी के बड़े नेताओं ने इंदिरा गाँधी को समर्थन देने का मन बनाया लेकिन इंदिरा गाँधी के नाम पर सर्व सम्मति कायम नहीं की जा सकी। ऐसे में फैसले के लिए कांग्रेस के सांसदों ने गुप्त मतदान किया। इंदिरा गाँधी ने मोराराजी देसाई को हरा दिया। उन्हें कांग्रेस पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसदों ने अपना मत दिया था। नेतृत्व के लिए गहन प्रतिस्पर्धा के बावजूद पार्टी में सत्ता का हस्तांतरण बड़े शातिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो गया। इसे भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता के रूप में देखा गया।
2.नए प्रधानमंत्री को जमने में थोड़ा वक्त लगा। इंदिरा गाँधी यो तो बड़े लंबे समय से राजनीति में सक्रिय थीं, लेकिन लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में बड़े कम दिनों से मंत्री पद पर थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने संभवतया यह सोचकर उनका समर्थन किया होगा कि प्रशासनिक और राजनीतिक मामलों में खास अनुभव न होने के कारण समर्थन और दिशा-निर्देशन के लिए इंदिरा गाँधी उन पर निर्भर रहेंगी। प्रधानमंत्री बनने के एक साल के अंदर इंदिरा गाँधी को लोकसभा के चुनावों में पार्टी की अगुवाई करनी पड़ी। इस वक्त तक देश की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई थी। इससे इंदिरा की कठिनाइयाँ ज्यादा बढ़ गईं। इन कठिनाइयों के मद्देनजर उन्होंने पार्टी पर अपना नियंत्रण बढाने और अपने नेतृत्व कौशल को दिखाने की कोशिश की।

प्रश्न 11. 1964 में भारतीय साम्यवादी दल में विभाजन क्यों हुआ?
उत्तर : भारत-चीन संघर्ष (1962) का असर विपक्षी दलों पर भी हुआ। इस युद्ध से चीन- सोवियत संघ के बीच बढ़ते मतभेद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के अंदर बड़ी उठा-पटक मची। सोवियत संघ का पक्षधर खेमा भाकपा में ही रहा और उस कांग्रेस के साथ नजदीकी बढ़ाई। दूसरा खेमा कुछ समय के लिए चीन का पक्षधर रहा और यह खेमा कांग्रेस के साथ किसी भी तरह की नजदीकी के खिलाफ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में टूट गई। इस पार्टी के भीतर जो खेमा चीन का पक्षधर था उसने मार्क्सवादी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई.एम.-माकपा) बनाई। चीन युद्ध के क्रम में माकपा के कई नेताओं को चीन का पक्ष लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

प्रश्न 12. लाल बहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री पद से संबंधित उत्तराधिकार की प्रक्रिया किस प्रकार भिन्न थी?
उत्तर : 1. नेहरू जी की मृत्यु के पश्चात् लाल बहादुर शास्त्री कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए तथा देश के प्रधानमंत्री बने।
2.शास्त्री जी की मृत्यु के पश्चात् राजनीतिके उत्तराधिकार के सवाल पर इंदिरा गाँधी तथा मोरारजी देसाई के बीच कड़ा मुकाबला था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने संभवतः यह सोचकर इंदिरा गाँधी समर्थन किया था कि प्रशासनिक व राजनीतिक मामलों में उनका विशेष तजुर्बा नहीं है और वे (इंदिरा गाँधी) राजनीतिक समर्थन तथा दिशा-निर्देश के लिए उन पर निर्भर रहेंगी।

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