Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 5 Important Question Answer 8 Marks कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 1. “1971 के चुनाव में केंद्र तथा राज्यों में, कांग्रेस की उत्तरोत्तर जीत ही नहीं हुई अपितु कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व का जीर्णोद्धार भी हुआ।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के पक्ष में किन्हीं तीन तर्कों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

*1971 में केन्द्र तथा राज्य दोनों स्तरों पर लगातार चुनाव में विजय प्राप्त करने के पश्चात्, कांग्रेस पार्टी ने अपने प्रभुत्व को पुनः स्थापित कर लिया।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में किन्हीं तीन तर्कों का उल्लेख कीजिए।

अथवा

1971 के चुनावों के बाद, कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व की पुनर्स्थापना के लिए उठाए गए किन्हीं छह कदमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 1971 के चुनाव में केन्द्र तथा राज्यों में कांग्रेस की उत्तरोत्तर जीत ही नहीं हुई अपितु कांग्रेस प्रभुत्व का जीर्णोद्धार भी हुआ। इस कथन का विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है
(i) इंदिरा गाँधी ने दिसंबर, 1970 में लोकसभा भंग करने की सिफारिश राष्ट्रपति को की। वह अपनी सरकार के लिए जनता का पुनः आदेश प्राप्त करना चाहती थी। फरवरी, 1971 में पाँचवीं लोकसभा का आम चुनाव हुआ। चुनावी मुकाबला कांग्रेस (आर.) के विपरीत जान पड़ रहा था। आखिर नई कांग्रेस एक जर्जर होती हुई पार्टी का हिस्सा भर थी। हर किसी को विश्वास था कि कांग्रेस पार्टी की असली सांगठनिक ताकत कांग्रेस (ओ.) के नियंत्रण में है। इसके अतिरिक्त, सभी बड़ी गैर-साम्यवादी और गैर-कांग्रेसी विपक्षी पार्टियों ने एक चुनावी गठबंधन बना लिया था। इसे ‘ग्रैंड अलायंस’ कहा गया। इससे इंदिरा गाँधी के लिए स्थिति और कठिन हो गई। एसएसपी, पीएसपी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और, भारतीय क्रांतिदल, चुनाव में एक छतरी के नीचे आ गए। शासक दल ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठजोड़ किया।
(ii) 1971 के लोकसभा चुनावों के नतीजे उतने ही नाटकीय थे, जितना इन चुनावों को करवाने का फैसला। कांग्रेस (आर.) और सीपीआई के गठबंधन को इस बार जितने वोट या सीटें मिलीं, उतनी कांग्रेस पिछले चार आम चुनावों में कभी हासिल न कर सकी थी। इस गठबंधन को लोकसभा की 375 सीटें मिलीं और इसने कुल 48.4 प्रतिशत वोट हासिल किए। अकेले इंदिरा गाँधी की कांग्रेस (आर.) ने 352 सीटें और 44 प्रतिशत वोट हासिल किए थे।
अब जरा इस तस्वीर की तुलना कांग्रेस (ओ.) के उजाड़ से करें : इस पार्टी में बड़े-बड़े महारथी थे, लेकिन इंदिरा गाँधी की पार्टी को जितने वोट मिले थे, उसके एक-चौथाई वोट ही इसकी झोली में आए। इस पार्टी को महज 16 सीटें मिलीं। अपनी भारी-भरकम जीत के साथ इंदिरा गाँधी की अगुआई वाली कांग्रेस ने अपने दावे को साबित कर दिया कि वही ‘असली कांग्रेस’ है और उसे भारतीय राजनीति में फिर से प्रभुत्व स्थान पर पुनर्स्थापित किया। विपक्षी ‘ग्रैंड अलायंस’ धराशायी हो गया था। इस ‘महाजोट’ को 40 से भी कम सीटें मिली थीं।
(iii) 1972 के राज्य विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को व्यापक सफलता मिली। इंदिरा गाँधी को गरीबों और वंचितों रक्षक और एक मजबूत राष्ट्रवादी नेता के रूप में देखा गया। पार्टी के अंदर अथवा बाहर उनके विरोध की कोई गुंजाइश न बची। कांग्रेस लोकसभा के चुनावों में जीती थी और राज्य स्तर के चुनावों में भी। इन दो लगातार जीतों के साथ कांग्रेस का दबदबा एक बार फिर कायम हुआ। कांग्रेस अब लगभग सभी राज्यों में सत्ता में थी। समाज के विभिन्न वर्गों में यह लोकप्रिय भी थी। महज चार साल की अवधि में इंदिरा गाँधी ने अपने नेतृत्व और कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व के सामने खड़ी चुनौतियों को धूल चटा दी थी।

प्रश्न 2. भारत में राष्ट्रपति का चुनाव उसके कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व 1969 में क्यों हुआ? राष्ट्रपति के पद के लिए कौन-से दो प्रमुख उम्मीदवार थे? विजयी उम्मीदवार की सफलता के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारकों का विश्लेषण कीजिए ।
उत्तर : 1. भारत में राष्ट्रपति का चुनाव उसके कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व 1969 में होने के कारण : राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् भारत में राष्ट्रपति का चुनाव उनके कार्यकाल के समाप्त होने से पूर्व 1969 में हुआ।
2.राष्ट्रपति के पद के लिए दो (i) एन. संजीव रेड्डी, (ii) वी.वी. गिरि | प्रमुख उम्मीदवार :
3.विजयी उम्मीदवार की सफलता के लिए चार कारण : (i) प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की इच्छा के विपरीत ‘सिंडिकेट’ ने उनके विरोधी तथा लोकसभा के अध्यक्ष एन. संजीव रेड्डी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित कर दिया। उन्हें राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस का अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया गया।
(ii) इंदिरा गाँधी ने उप-राष्ट्रपति वी. वी. गिरि को एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भरने के लिए प्रोत्साहित किया।
(iii) उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने एन. संजीव रेड्डी के पक्ष में मतदान करने के लिए कांग्रेस के सभी सांसदों तथा विधायकों के लिए ‘व्हिप’ जारी किया।
(iv) इंदिरा गाँधी के समर्थकों ने ए.आई.सी.सी. की मीटिंग बुलाई। इंदिरा गाँधी ने ‘अंतरात्मा की आवाज पर’ वी.वी. गिरि के पक्ष में कांग्रेस के सांसदों तथा विधायकों को मतदान करने का आह्वान किया। इस चुनाव का परिणाम वी.वी. गिरि के पक्ष में गया। इस प्रकार कांग्रेस के अधिकारिक प्रत्याशी की पराजय तथा स्वतंत्र प्रत्याशी की विजय ने कांग्रेस का आंतरिक संतुलन बदल दिया।

प्रश्न 3. भारत में 1971 में कांग्रेस पार्टी के पुनरुत्थान (Revival) के लिए उत्तरदायी कारक कौन से थे?

अथवा

1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गाँधी को भारी बहुमत मिलने के लिए उत्तरदायी किन्हीं तीन कारकों का मूल्यांकन कीजिए ।
उत्तर : (i) इंदिरा गाँधी का प्रभावशाली नेतृत्व और उनके द्वारा दिया गया ‘गरीबी हटाओ’ का नारा : कांग्रेस के संगठनात्मक बड़े गुट (Grand Alliance) के पास कोई जादू देने वाला राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था जबकि इंदिरा कांग्रेस के नाम से प्रसिद्ध गुट की नेता इंदिरा गाँधी का व्यक्तित्व, नेहरू-गाँधी परिवार से उनका संबंध आदि के साथ-साथ इनके द्वारा पूरे देश का भ्रमण करना और लोगों से ये कहना कि विपक्षी गठबंधन के पास बस एक ही कार्यक्रम है : ‘इंदिरा हटाओ’। इसके विपरीत उन्होंने लोगों के सामने एक सकारात्मक कार्यक्रम रखा और इसे अपने मशहूर नारे ‘गरीबी हटाओ’ के जरिए एक शक्ल प्रदान की। इंदिरा गाँधी ने सार्वजनिक क्षेत्र की संवृद्धि, ग्रामीण भू-स्वामित्व और शहरी संपदा के परिसीमन, आय और अवसरों की असमानता की समाप्ति तथा ‘प्रिवीपर्स’ की समाप्ति पर अपने चुनाव अभियान में जोर दिया। ‘गरीबी हटाओ’ के नारे से इंदिरा गाँधी ने वंचित तबकों खासकर भूमिहीन किसान, दलित और आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला और बेरोजगार नौजवानों के बीच अपने समर्थन का आधार तैयार करने की कोशिश की। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा और इससे जुड़ा हुआ कार्यक्रम इंदिरा गाँधी की राजनीतिक रणनीति थी। इसके सहारे वे अपने लिए विश्वव्यापी राजनीतिक समर्थन की बुनियाद तैयार करना चाहती थीं।
(ii) चुनाव के परिणाम (Results of Election): 1971 के लोकसभा चुनावों के नतीजे उतने ही नाटकीय थे, जितना इन चुनावों को करवाने का फैसला। कांग्रेस (आर) और सीपीआई के गठबंधन को इस बार जितने वोट या सीटें मिलीं, उतनी कांग्रेस पिछले चार आम चुनावों में कभी हासिल न कर सकी थी। इस गठबंधन को लोकसभा की 375 सीटें मिलीं और इसने कुल 48.4 प्रतिशत वोट हासिल किए। अकेले इंदिरा गाँधी कांग्रेस (आर.) ने 352 सीटें और 44 प्रतिशत वोट हासिल किए थे।
अब जरा इस तस्वीर की तुलना कांग्रेस (ओ.) के उजाड़ से करें। इस पार्टी में बड़े-बड़े महारथी थे, लेकिन इंदिरा गाँधी की पार्टी को जितने वोट मिले थे, उसके एक-चौथाई वोट ही इसकी झोली में आए। इस पार्टी को महज 16 सीटें मिलीं। अपनी भारी-भरकम जीत के साथ इंदिरा गाँधी की अगुआई वाली कांग्रेस ने अपने दावे को साबित कर दिया कि वही ‘असली कांग्रेस’ है और उसे भारतीय राजनीति में फिर से प्रभुत्व के स्थान पर पुनर्स्थापित किया। विपक्षी ‘ग्रैंड अलायंस’ धराशायी हो गया था। इस ‘महाजोट’ को 40 से भी कम सीटें मिली थीं।
(iii) बांग्लादेश का निर्माण और भारत-पाक युद्ध : 1971 के लोकसभा चुनावों के तुरंत बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में एक बड़ा राजनीतिक और सैन्य संकट उठ खड़ा हुआ। 1971 के चुनावों के बाद पूर्वी पाकिस्तान में संकट पैदा हुआ और भारत-पाक के बीच युद्ध छिड़ गया। इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश बना। इन घटनाओं से इंदिरा गाँधी की लोकप्रियता में चार चाँद लग गए। विपक्ष के नेताओं तक ने उनके राज्यकौशल की प्रशंसा की ।

प्रश्न 4. 1970 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इंदिरा गाँधी की सरकार को लोकप्रिय बनाने में सहायक किन्हीं छः कारकों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1970 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इन्दिरा गाँधी की सरकार को लोकप्रिय बनाने में सहायक छः कारक :
(i) सिंडिकेट के साथ टकराने का साहस : इंदिरा गाँधी ने कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा द्वारा जारी किए गए, ह्विप (whip) को चुनौती देने का साहस जुटाया और अति गोपनीय तरीके से नीलम संजीव रेड्डी के स्थान पर वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति मनोनीत कराने में सफल रहीं। उनके इस कदम से उनकी नई राजनीतिक शैली की झलक मिली। इसका जनता ने स्वागत किया।
(ii) मतदाताओं के आधार में परिवर्तन : स्वानुभव से इंदिरा गाँधी ने समझ लिया कि उनका सुदृढ़ मत-बैंक समाज का निर्धन वर्ग, दलित वर्ग, पिछड़ा वर्ग और भारत के निरक्षर लोगों का वर्ग है। यही कारण था कि उन्होंने संपन्न और धनी वर्ग को दर-किनार कर दिया। उनका बीस सूत्री कार्यक्रम उनके इस निश्चय का खुला दर्पण है। उनके ‘गरीबी हटाओ’ नारे ने इन सभी वर्गों की सहानुभूति जीत ली।
(iii) भारत के संविधान में 26वाँ संशोधन लाने के लिए उन्होंने 1971 में संविधान संशोधन (26वाँ संशोधन) अधिनियम पारित कराया। इस संशोधन के अनुसार रजवाड़ों के भूतपूर्व शासकों के विशेषाधिकार ‘प्रिवीपर्स’ को समाप्त कर दिया गया। यह कदम भी उन्हें इन शासकों से शोषित ग्रामीण भारत के लाखों मतदाताओं के अधिक नजदीक लाया।
(iv) बैंकों का राष्ट्रीयकरण : समूचे देश में बैंककारी क्रियाकलापों की लगातार वृद्धि को नियंत्रित करने तथा काले धन को सफेद करने के क्रियाकलापों पर अंकुश लगाने के लिए इंदिरा गाँधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके इस कार्य को भी भारत की संपूर्ण जनता ने सराहा।
(v) भूमि सुधार : इंदिरा गाँधी ने जब यह देखा कि भूमि का असमान वितरण हुआ है तथा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 1960-61 की रिपोर्ट के अनुसार देश के 80 लाख से अधिक लोग भूमिहीन कृषि दास बने हुए हैं तो उन्होंने भूमि सुधारों को सर्वाधिक वरीयता दी। इस कार्य ने भी मतदाताओं की एक बड़ी संख्या को उनका समर्थक बना दिया।
(vi) ‘गरीबी हटाओ’ का नारा : इंदिरा गाँधी के द्वारा दिए गए ‘गरीबी हटाओ’ के नारे ने जादुई चमत्कार किया। विशेष तौर पर भूमिहीन श्रमिकों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों तथा बेरोजगार युवकों में उनका जनाधार अप्रत्याशित रूप से बढ़ा।

प्रश्न 5. 1969 में कांग्रेस पार्टी के औपचारिक विभाजन के लिए उत्तरदायी प्रमुख मुद्दों की व्याख्या कीजिए ।

अथवा

किन कारणों के आधार पर 1969 में कांग्रेस विभाजन का शिकार हुई ?
उत्तर : कांग्रेस पार्टी में 1969 टूट कारण या मुद्दे इस प्रकार थें के कारण : प्रमुख
(i) 1969 के राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के विरुद्ध इंदिरा गाँधी और उनके समर्थकों द्वारा उपराष्ट्रपति वी. वी. गिरि को कहा गया कि वे एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद के लिए अपना नामांकन भरें। यह कांग्रेस पार्टी में फूट का प्रमुख कारण था।
(ii) इंदिरा गाँधी ने चौदह अग्रणी बैंकों के राष्ट्रीयकरण और भूतपूर्व राजा-महाराजाओं को प्राप्त विशेषाधिकार यानी ‘प्रिवीपर्स’ को समाप्त करने जैसी कुछ बड़ी और जनप्रिय नीतियों की घोषणा की। उस वक्त मोरारजी देसाई देश के उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री थे। उपर्युक्त दोनों मुद्दों पर प्रधानमंत्री और उनके बीच गहरे मतभेद उभरे और इसके परिणामस्वरूप मोरारजी ने सरकार से किनारा कर लिया।
(iii) कुछ पत्रकार कांग्रेस के बड़े नेताओं में अहम् का टकराव (Clash of ego) भी इस विभाजन का कारण मानते हैं। मोरारजी देसाई उस समय सबसे वरिष्ठ और योग्य नेता थे। इंदिरा गाँधी का कद उनके सामने बौना था परंतु नेहरू-गाँधी खेमे की सदस्य होने के नाते पार्टी पर इंदिरा गाँधी का वर्चस्व कायम था। इस स्थिति से संतुष्ट नहीं थे। अंततः कांग्रेस में टूट पड़ गई।

प्रश्न 6. चौथे आम चुनावों के परिणाम की पिछले तीन आम चुनावों के परिणामों से तुलना कीजिए और परिवर्तन के कारणों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर : चौथा आम चुनाव, 1967 : भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में 1967 के साल को अत्यंत महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
चुनावों का संदर्भ : चौथे आम चुनावों के आने तक देश में बड़े बदलाव हो चुके थे। दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हुआ और नए प्रधानमंत्री को पद सँभाले हुए अभी पूरे एक साल का अरसा भी नहीं गुजरा था। साथ ही इस प्रधानमंत्री को राजनीति के लिहाज से कम अनुभवी माना जा रहा था। मानसून की असफलता, व्यापक सूखा, खेती की पैदावार में गिरावट, गंभीर खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट के साथ ही साथ सैन्य खर्च में भारी बढ़ोत्तरी हुई थी। नियोजन और आर्थिक विकास के संसाधनों को सैन्य-मंद में लगाना पड़ा। इन सारी बात से देश की आर्थिक
गैर-कांग्रेसवाद : कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उसके वोट बँट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है जो दल अपने कार्यक्रम अथवा विचारधाराओं के धरातल पर एक-दूसरे से एकदम अलग थे, वे सभी दल एकजुट हुए और . उन्होंने कुछ राज्यों में एक कांग्रेस विरोधी मोर्चा बनाया तथा अन्य राज्यों में सीटों के मामले में चुनावी तालमेल किया। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इस रणनीति को “गैर-कांग्रेसवाद” का नाम दिया।
परिवर्तन के कारण : कांग्रेस को सात राज्यों में बहुमत नहीं मिला। दो अन्य राज्यों में दलबदल के कारण यह पार्टी सरकार नहीं बना सकी। जिन 9 राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकल गई थी वे देश के किसी एक भाग में कायम राज्य नहीं थे। वे राज्य पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में थे। कांग्रेस पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास और केरल में सरकार नहीं बना सकी। चुनावी इतिहास में यह पहली घटना थी जब किसी गैर-कांग्रेसी दल को किसी राज्य में पूर्ण बहुमत मिला। अन्य आठ राज्यों में विभिन्न गैर-कांग्रेसी दलों की गठबंधन सरकार बनी।

प्रश्न 7, क्या 1969 में हुई कांग्रेस की फूट को रोका जा सकता था? यदि कांग्रेस में फूट नहीं होती तो 1970 के दशक की घटनाओं पर इसका कैसा असर पड़ा होता ?
उत्तर : नहीं, कांग्रेस की फूट को रोकना संभव नहीं था। इसका कारण यह है कि कांग्रेस में उस समय दो गुट बन चुके थे। पहला गुट सिंडिकेट कांग्रेस का था और इसका नेतृत्व कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष, एस. निजलिंगप्पा कर रहे थे। दूसरा गुट इंडिकेट (इंदिरा) था जिसका नेतृत्व इंदिरा गाँधी के हाथ में था। आरंभ में इन्दिरा गाँधी ने प्रत्येक बार आयोजित आम चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए सिंडिकेट को विशेष सम्मान दिया था। इसका कारण था- सिंडिकेट में के. कामराज, एस. के. पाटिल, एन. संजीव रेड्डी तथा अतुल्य घोष जैसे जाने-माने बाहुबली और प्रभावशाली नेताओं का रहना। इन नेताओं के बल पर ही लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया जा सका और इन्दिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे भी इन्हीं नेताओं का हाथ था। ये नेता मद्रास प्रेसीडेंसी, बम्बई सिटी, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के धुरंधर नेता थे। इस समूह को उस समय ‘किंगमेकर’ का खिताब दिया जाता था।
जब इन्दिरा गाँधी ने अपने प्रधानमंत्री बनने पर भूतपूर्व रियासतों के राजपरिवारों का प्रिवीपर्स समाप्त करने, चौदह प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने और “गरीबी हटाओ” नारा देकर जन-समूह को अपने पक्ष में करने की नीति को अपनाया तो सिंडिकेट को इससे अपने हित प्रभावित होने का अंदेशा हुआ और इनके बीच अनबन होने लगी। तत्कालीन वित्त मंत्री और उप-प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने इंदिरा से नाराज होकर त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेस इस तरह दो हिस्सों-कांग्रेस (संगठित) और कांग्रेस (पुन:सर्जित) या पुरानी कांग्रेसी तथा नई कांग्रेस (कांग्रेस-आई) में बँट गई।
इसी बीच तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की अकस्मात् मृत्यु हो जाने के कारण राष्ट्रपति पद के चुनाव की जरूरत आन पड़ी। निजलिंगप्पा ने इस आशय का अनिवार्य आदेश (Whip) जारी किया कि सभी कांग्रेसी संजीव रेड्डी के पक्ष में मतदान करें लेकिन इन्दिरा गाँधी ने बड़ी चालाकी के साथ इस आदेश की अवहेलना करके वी.वी. गिरि के पक्ष में अधिक मत करा दिए और वे राष्ट्रपति बने। इससे संबंधों में कटुता बढ़ी और जब 1971 के आम चुनावों में इन्दिरा गाँधी की कांग्रेस (आई.) बहुमत से सत्ता में आई तो निजलिंगप्पा ने उनकी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता को समाप्त कर दिया। इससे उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कांग्रेस में फूट का पड़ना नैसर्गिक न्याय का अमिट प्रभाव या परिणाम था।
फूट न पड़ने की दशा में 1970 के दशक की घटनाओं में कांग्रेस का असर : प्रकृति जिन परिवर्तनों को लाना चाहती है-वे अमिट, प्रभावी और अवश्यंभावी होते हैं परन्तु प्रत्येक घटना के पीछे मानव मन अगर-मगर की संभावनाएँ या अनुमान बनाता-बिगाड़ता रहता है। इस दशा में हम कांग्रेस में फूट न पड़ने के 1970 के दशक की घटनाओं पर असर का निम्नवत् उल्लेख कर सकते हैं:
(i) इन्दिरा गाँधी अपनी स्वतंत्र प्रतिभा को जनता के सामने उजागर करने में विफल रहती, प्रिवीपर्स समाप्त करना, चौदह बैंकों का राष्ट्रीकरण करना जैसे अनेक प्रयासों और अति-युक्तिपूर्ण राजनीति का ही कमाल था कि उन्होंने वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति बनाकर दिखा दिया, भले ही पार्टी अध्यक्ष ने इसके लिए ह्विप जारी किया था। उनकी राजनीति का यह कमाल उस दशा में कदापि नहीं दिखाई देता जब कांग्रेस में फूट न पड़ी होती ।
(ii) 1971 के आम चुनावों में इन्दिरा गाँधी की कांग्रेस (आई.) पार्टी हार गई होती। उल्लेखनीय है कि फूट के कारण ही कांग्रेस (आई.) और भारतीय साम्यवादी दल का गठबंधन बना और अकेले कांग्रेस (आई.) ने लोकसभा की 240 सीटें जीती। गठबंधन सहित जीत का यह आँकड़ा 375 सीटों का था। चार वर्षों के चुनावों में यह सर्वाधिक सीटों वाली जीत थी। लोकसभा की कुल 545 सीटों की यह 44 प्रतिशत सीटों पर विजय थी। कांग्रेस (ओ.) का गठबंधन केवल 16 सीटों पर विजयी हुआ था ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कांग्रेस में फूट पड़ना इन्दिरा गाँधी के लिए बहुत अच्छा साबित हुआ।

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