Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 6 Important Question Answer 3 Marks लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 1. आपातकाल लागू करने के सिवाय इन्दिरा । गाँधी के पास कोई भी विकल्प नहीं बचा था। स्पष्ट करो

अथवा

इन्दिरा गाँधी द्वारा आपातकाल को जरूरी ठहराते हुए जो कारण बताए गए, उनका संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर : श्रीमती गाँधी ने आपातकाल को जरूरी मानते हुए, इसके निम्न कारण बताए :
(i) विपक्षी दलों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठप्प करने की कोशिश की ।
(ii) विपक्षी दलों ने सेना और पुलिस को विद्रोह के लिए उकसाया।
(iii) पूँजीवादी ताकतों का सरकार के विरुद्ध होना, जिससे संपूर्ण समाज के अधिकार खतरे में पड़ सकते थे।

प्रश्न 2. 1971 में हुए बांग्लादेश युद्ध के किन्हीं चार परिणामों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : (i) 1971 के बांग्लादेश युद्ध के कारण पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश या पूर्वी पाकिस्तान को जन और धन की भारी हानि उठानी पड़ी।
(ii) पाकिस्तान का विभाजन हो गया और बांग्लादेश के रूप में एक नया प्रभुत्व सम्पन्न राष्ट्र अस्तित्व में आया।
(iii) पाकिस्तान ने बांग्लादेश के मामले में पूरी जिम्मेदारी भारत पर डाल दी। भारत और पाकिस्तान में युद्ध चला।
(iv) बांग्लादेश के लाखों लोग भारत में शरणार्थी बनकर आ गए। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी बुरा प्रभाव पड़ा।
(v) कालांतर में 3 जुलाई, 1972 को इंदिरा गाँधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच शिमला- समझौते पर दस्तखत हुए और इससे अमन की बहाली हुई।

प्रश्न 3. 25 जून, 1975 को भारत में आपातकाल की घोषणा क्यों की गई ?
उत्तर : 1. तत्कालीन इंदिरा कांग्रेस की सरकार के मतानुसार चुनी हुई सरकार को लोकतंत्र में विपक्षी दल उसकी नीतियों के अनुसार शासन नहीं चलाने दे रहे। वे बार-बार धरना-प्रदर्शन, सामूहिक कार्यवाही, राष्ट्रव्यापी आंदोलन की धमकियाँ देकर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं जिसके कारण प्रशासन विकास के कार्यों पर पूरा ध्यान नहीं दे सकता।
2.आपातकाल की घोषणा के औचित्य को सही ठहराते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने शाह आयोग को एक चिट्ठी में लिखा कि षड्यंत्रकारी ताकतें सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रमों में अडंगे डाल रही थीं और उन्हें गैर-संवैधानिक साधनों के बूते सत्ता से बेदखल करना चाहती थीं। इसका विवरण कुछ इस प्रकार था : “लोकतंत्र के नाम पर खुद लोकतंत्र की राह रोकने की कोशिश की जा रही है। वैधानिक रूप से निर्वाचित सरकार को काम नहीं करने दिया जा रहा। आंदोलनों से माहौल सरगर्म है और इसके नतीजतन हिंसक घटनाएँ हो रही हैं। एक आदमी तो इस हद तक आगे बढ़ गया है कि वह हमारी सेना को विद्रोह और पुलिस को बगावत के लिए उकसा रहा है। विघटनकारी ताकतों का खुला खेल जारी है और सांप्रदायिक उन्माद को हवा दी जा रही है जिससे हमारी एकता पर खतरा मँडरा रहा है। अगर सचमुच कोई सरकार है, तो वह कैसे हाथ बाँधकर खड़ी रहे और देश की स्थिरता को खतरे में पड़ता देखती रहे? चंद लोगों की कारस्तानी से विशाल आबादी के अधिकारों को खतरा पहुँच रहा है।”
आपातकाल की घोषणा के उपरोक्त तर्क को विपक्ष ने झूठ का पुलिंदा बताया। विपक्ष ने सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार आपातकाल लगाकर विपक्षी एकता को कुचलने की कोशिश कर रही है। शाह आयोग भी सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं था।

प्रश्न 4. इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व के दौरा संसद तथा न्यायपालिका में आपसी विवाद के प्रमुख मुद्दे क्या थे?
उत्तर : इंदिरा गाँधी के नेतृत्व के दौरान संसद तथा न्यायपालिका आपसी विवाद के प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित थे :
(i) न्यायपालिका के साथ इस दौर में सरकार और शासक दल के गहरे मतभेद पैदा हुए। इस क्रम में तीन संवैधानिक मसले उठे थे : क्या संसद मौलिक अधिकारों में कटौती कर सकती है? सर्वोच्च न्यायालय का जवाब था कि संसद ऐसा नहीं कर सकती।
(ii) दूसरा यह कि क्या संसद संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? इस मसले पर भी सर्वोच्च न्यायालय का यही कहना था कि सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए।
(iiii) तीसरे, संसद ने यह कहते हुए संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया।
इससे सरकार और न्यायपालिका के बीच संबंधों में तनाव आया। 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन.रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। वह निर्णय राजनीतिक रूप से विवादास्पद बन गया क्योंकि सरकार ने जिन तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी इस मामले में की थी, उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फैसला दिया।

प्रश्न 5. शाह जाँच आयोग क्या था? इसके प्रति सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर : I. शाह जाँच आयोग : जनता पार्टी ने 1977 में शाह आयोग को नियुक्त किया था। इस आयोग की नियुक्ति श्रीमती इन्दिरा गाँधी की सरकार द्वारा आपातकाल में किए अत्याचारों की जाँच करने के लिए की गई थी।
II. सरकार की प्रतिक्रिया : जनता सरकार यह चाहती थी कि देश में हमेशा के लिए लोकतंत्र को कैसे बचाए रखा जा सके और इसकी धज्जियाँ प्रधानमंत्री या कोई नेता मनमाने ढंग से भविष्य में न उड़ा सके। जो लोग आपातकाल के लिए दोषी थे, उनकी यथासंभव घोर निंदा की जानी चाहिए।

प्रश्न 6. गुजरात में छात्र आंदोलन के क्या परिणाम हुए?
उत्तर : गुजरात आंदोलन के परिणाम : 1974 के जनवरी मास में गुजरात के छात्रों के खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों तथा उच्च पदों पर जारी -भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। छात्र आंदोलन में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हो गई और इस आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया। ऐसे में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। विपक्षी दलों ने राज्य की विधानसभा के लिए दोबारा चुनाव कराने की माँग की। कांग्रेस (ओ.) के प्रमुख नेता मोरारजी देसाई ने कहा कि अगर राज्य में नए सिरे से चुनाव नहीं करवाए गए तो मैं अनियतकालीन भूख हड़ताल पर बैठ जाऊँगा। मोरारजी अपने कांग्रेस के दिनों में इंदिरा गाँधी के मुख्य विरोधी रहे थे।
विपक्षी दलों द्वारा समर्पित आंदोलन के गहरे दबाव में 1975 जून में विधानसभा के चुनाव हुए। कांग्रेस इस चुनाव में हार के गई। गुजरात आंदोलन ने क्षेत्रीय राजनीति पर गहरा असर तो डाला ही राष्ट्रीय राजनीति पर भी इसके दूरगामी प्रभाव हुए।

प्रश्न 7. 1977 तथा 1980 के चुनावों के बीच भारत की दलगत राजनीति में नाटकीय बदलाव कैसे आए ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : लोकसभा के चुनाव 1977 : 1. 18 महीने के आपातकाल के बाद 1977 के जनवरी माह में सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया इसी के अनुसार सभी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जेल से रिहा कर दिया गया। 1977 के मार्च में चुनाव हुए। ऐसे में विपक्ष को चुनावी तैयारी का बड़ा कम समय मिला, लेकिन राजनीतिक बदलाव की गति बड़ी तेज थी।
2.आपातकाल लागू होने के पहले ही बड़ी विपक्षी पार्टियाँ एक-दूसरे के नजदीक आ रही थीं। चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियो ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम के नेतृत्व में एक नयी पार्टी बनाई। इस पार्टी का नाम “कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी” था ओर बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गईं।
3.1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया। इस पार्टी ने चुनाव प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर जोर दिया। हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरूद्ध था। जनता पार्टी के गठन के कारण यह सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेगें।
4.कांग्रेस को लोकसभा की मात्र 154 सीटें मिली थी। उसे 35 प्रतिशत से भी कम वोट हासिल हुए। जनता पार्टी और उसके साथी दलों को लोकसभा को कुल 542 सीटों में से 330 सीटें मिलीं। खुद जनता पार्टी अकेले 295 सीटों पर जीत गई थी और उसे स्पष्ट बहुमत मिला था।

प्रश्न 8. 25 जून, 1975 के “नई दुनिया” अखबार के संपादकीय की जगह खाली क्यों छोड़ दी गई थी?
उत्तर : आपातकालीन प्रावधानों के अन्तर्गत सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी कि वे कुछ भी छापने से पहले सरकार की स्वीकृति लें। बहुत से समाचार पत्रों ने उन समाचारों में लेखों की जगह जिन्हें छापे जाने से रोका गया था कुछ अन्य समाचार छापने की बजाय काले हाशिए के साथ वह जगह खाली छोड़ दी गई। यह प्रेस की स्वतन्त्रता पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध का एक तरीका था। दिल्ली के लेफ्टिनेट गवर्नर के आदेश पर दिल्ली बिजली आपूर्ति निगम के महाप्रबन्धक द्वारा भी अखबारों की बिजली आपूर्ति दो-तीन दिन तक के लिए काट दी गई ।

प्रश्न 9. भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों को आपातकाल (1975-1977) ने कैसे प्रभावित किया ? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर : संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन भारत के राष्ट्रपति द्वारा उद्घोषित आपातकाल के दौरान, प्रशासन की संपूर्ण शक्ति सिमट कर केन्द्र सरकार के हाथों में आ जाती है। आपातकाल के समय भारतीय लोकतंत्र का एकात्मक स्वरूप उभर कर आता है। इस उद्घोषणा के तुरंत बाद देश के सभी राज्यों की विधानसभाएँ भंग कर दी जाती हैं।
1975-77 का आपातकाल आम जनता पर अत्याचार करने के एक हथियार के रूप में प्रयोग हुआ। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं पर जाँच बैठा दी गई और विपुल मात्रा में निवारक नजरबंदी का प्रयोग हुआ तथा दोषसिद्ध होने और सुनवाई की प्रक्रिया का ध्यान रखे बिना ही लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। कई गणमान्य विपक्षी नेताओं को जेल की यातना झेलनी पड़ी। आपातकाल के पश्चात् नियुक्त किए गए शाह आयोग ने तत्कालीन सरकार द्वारा लोगों पर ढाए गए जुल्मों और दमनकारी क्रियाकलापों का अनावरित विवरण प्रस्तुत किया था ।

प्रश्न 10. 1967 के बाद भारतीय राजनीति में आए दो बदलावों का उल्लेख करो।
उत्तर : 1967 के चौथे आम चुनाव के बाद भारत की राजनीति में कई प्रकार के बदलाव आए
(1) केन्द्र में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिलने के बावजूद उसकी लोकप्रियता घटी।
(2) राज्य विधानसभाओं में विपक्षी पार्टियों का दबदबा कायम हुआ लेकिन विपक्षी पार्टियों की एकजुटता ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी और मध्यावधि चुनाव के बाद पुन: कांग्रेस पार्टी सभी जगह सत्ता में आ गई।

प्रश्न 11. बांग्लादेश संकट का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर : बांग्लादेश संकट का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव : 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत को बहुत अधिक खर्च करना पड़ा। इसके अतिरिक्त पूर्वी पाकिस्तान से आए 80 लाख शरणार्थियों का भार भी भारत पर पड़ा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था खराब हो गई। श्रीमती गाँधी का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा धन के अभाव के कारण पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, जिससे लोगों में असंतोष फैला। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई। मूल्यों में वृद्धि, कृषि की पैदावार में गिरावट हुईं जिससे देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गई।

प्रश्न 12. आपातकाल भारतीय राजनीति का सर्वाधिक विवादास्पद प्रकरण है। कैसे?

अथवा

भारत में 1975 में आपातकाल की घोषणा के सम्बन्ध में उठे विवादों का आकलन कीजिये।
उत्तर : भारत में 1975 के आपातकाल की घोषणा के सम्बन्ध में उठे विवाद : आपातकाल के बाद शाह आयोग ने अपनी जाँच में पाया कि इस अवधि में बहुत सारी ‘अति’ हुई। इसके अतिरिक्त भारत में लोकतंत्र पर अमल के लिहाज से आपातकाल से क्या-क्या सबक सीखे जा सकते हैं। इस पर भी अलग-अलग राय मिलती है।
क्या ‘आपातकाल’ जरूरी था? : सरकार का तर्क था कि भारत में लोकतंत्र और इसके अनुकूल विपक्षी दलों को चाहिए कि वे निर्वाचित शासक दल को अपनी नीतियों के अनुसार शासन चलाने दें। देश में लगातार गैर-संसदीय राजनीति का सहारा नहीं लिया जा सकता। इससे अस्थिरता पैदा होती है और प्रशासन का ध्यान विकास के कामों से भंग हो जाता है। सारी ताकत कानून-व्यवस्था की बहाली पर लगानी पड़ती है। इंदिरा गाँधी ने शाह आयोग को चिट्ठी में लिखा कि षड्यंत्रकारी ताकतें सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रमों में अड़ंगे डाल रही थीं। आपातकाल के आलोचकों का तर्क था कि आजादी के आंदोलन से लेकर लगातार भारत में जन-आंदोलन का एक सिलसिला रहा है। जे. पी. सहित विपक्ष के अन्य नेताओं का विचार था कि लोकतंत्र में लोगों को सार्वजनिक तौर पर सरकार के विरोध का अधिकार होना चाहिए। लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ठप्प करके ‘आपातकाल’ लागू करने जैसे अतिचारी कदम उठाने की जरूरत कतई न थी ।
दरअसल खतरा देश की एकता और अखंडता को नहीं, बल्कि शासक दल और स्वयं प्रधानमंत्री को था। आलोचक कहते हैं कि देश को बचाने के लिए बनाए गए संवैधानिक प्रावधान का दुरुपयोग इंदिरा गाँधी ने निजी ताकत को बचाने के लिए किया।

प्रश्न 13. मार्च, 1974 में प्रारंभ किए गए बिहार के छात्र-आंदोलन का वर्णन कीजिए ।

अथवा

1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने किन मुद्दों पर राजनीति छेड़ी?
उत्तर : 1974 के जनवरी माह में गुजरात के छात्रों ने खाद्यान्न, खाद्य तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती हुई कीमतों तथा उच्च पदों पर जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। छात्र आंदोलन में बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ भी शरीक हो गईं। इस आंदोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया। ऐसी स्थिति में गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। इस आंदोलन में प्रमुख नेता मोरारजी देसाई ने भाग लिया। विपक्षी दलों द्वारा समर्थित छात्र आंदोलन के गहरे दबाव में 1975 के जून में विधान सभा के चुनाव हुए। कांग्रेस इस चुनाव में हार गई ।

प्रश्न 14. 1975 की आंतरिक आपातकालीन घोषणा के संदर्भ में संविधान में किए गए किन्हीं चार संशोधनों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : 1975 की आन्तरिक आपातकालीन घोषणा के संदर्भ में संविधान में निम्नलिखित चार संशोधन किये गये :
(i) संसद ने संविधान के सामने कई नई चुनौतियाँ खड़ी कीं। इंदिरा गाँधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से बचाव के लिए इस आशय का संशोधन कराया कि प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के निर्वाचन को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
(ii) आपातकाल के दौरान ही संविधान का 42वाँ संशोधन पारित हुआ। इस संशोधन के जरिए देश की विधायिका के कार्यकाल को 5 से बढ़ाकर 6 साल किया गया। इसे आगे के दिनों में भी स्थायी रूप से लागू किया जाना था।
(iii) इसके अतिरिक्त अब आपातकाल के दौरान चुनाव को एक साल के लिए स्थगित किया जा सकता था। इस तरह 1971 के बाद 1978 में ही चुनाव कराए जा सकते थे।
(iv) राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का मूल अधिकारों से अधिक कानूनी बल देने का संशोधन किया गया। इस संशोधन में नागरिकों के मूल कर्त्तव्य नामक एक नया अध्याय अंत: स्थापित किया गया और व्यष्टि या समूहों के राष्ट्र-विरोधी कार्यों के लिए दंड के नए उपबंध प्रविष्ट किए गये।

प्रश्न 15. “1967 के बाद देश की कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के संबंधों में आए तनावों ने आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार की थी।” इस कथन को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1967 के बाद इंदिरा गाँधी एक कद्दावर नेता के रूप में उभरी थीं और 1973-74 तक उनकी लोकप्रियता अपनी चरम सीमा पर थी लेकिन इस दौर में दलगत प्रतिस्पर्धा कहीं ज्यादा तीखी और ध्रुवीकृत हो चली थी। इस अवधि में न्यायपालिका और सरकार के संबंधों में भी तनाव आए। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की कई पहलकदमियों को संविधान के विरुद्ध माना। कांग्रेस पार्टी का मानना था कि अदालत का यह रवैया लोकतंत्र के सिद्धांतों और संसद की सर्वोच्चता के विरुद्ध है। कांग्रेस ने यह आरोप भ लगाया कि अदालत एक यथास्थितिवादी संस्था है और यह संस्था गरीबों को लाभ पहुँचाने वाले कल्याण-कार्यक्रमों को लागू करने की राह में रोड़े अटका रही है।

प्रश्न 16. 1975 के आपातकाल ने किस प्रकार भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को लाभान्वित किया ?
उत्तर : (i) सरकार की ज्यादतियों के कारण सरकारी कर्मचारियों और मशीनरियों में सक्रियता आ गई। कुछ समय के लिए थोपा गया अनुशासन दिखाई दिया लेकिन 18 मास के संकटकाल की समाप्ति की घोषणा कर दी गई। विरोधी दलों और मतदाताओं ने जितनी अपनी राजनीतिक जागृति दिखाई, इससे साबित हो गया कि बड़े-से-बड़ा तानाशाही नेता भी भारत से लोकतंत्र विदा नहीं कर सकता।
(ii) आपातकाल के बाद संविधान में अच्छे सुधार किए गए।अब आपातकाल सशस्त्र स्थिति में लगाया जा सकता है। ऐसा तभी हो सकता है जब मंत्रिमंडल लिखित रूप से राष्ट्रपति को ऐसा परामर्श दे।
(iii) आपातकाल में भी न्यायालयों में व्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की भूमिका सक्रिय रहेगी और नागरिक अधिकारों की रक्षा तत्परता से होने लगी।

प्रश्न 17. ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ से क्या अभिप्राय है? 1970 के दशक में भारत में कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका के बीच किन्हीं चार संघर्षो का विश्लेषण कीजिए ।
उत्तर : ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ का अभिप्राय : ‘प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ से अभिप्राय है कि न्यायपालिका शासक दल और उसकी नीतियों के प्रति निष्ठावान रहे ।
1970 के दशक में भारत में कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका के बीच संघर्ष :
(i) कार्यकारिणी तथा न्यायपालिका के बीच पहला संघर्ष संसद के मौलिक अधिकारों को सीमित करने के अधिकार के बारे में हुआ। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं कर सकती।
(ii) दूसरा यह कि क्या संसद संविधान में संशोधन करके संपत्ति के अधिकार में काट-छाँट कर सकती है? इस मसले पर भी सर्वोच्च न्यायालय का यही कहना था कि सरकार, संविधान में इस तरह संशोधन नहीं कर सकती कि अधिकारों की कटौती हो जाए।
(iii) तीसरे, संसद ने यह कहते हुए संविधान में संशोधन किया कि वह नीति-निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावकारी बनाने के लिए मौलिक अधिकारों में कमी कर सकती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रावधान को भी निरस्त कर दिया।
(iv) इससे सरकार और न्यायपालिका के बीच संबंधों में तनाव आया। 1973 में सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके न्यायमूर्ति ए.एन.रे. को मुख्य न्यायधीश नियुक्त किया। यह निर्णय राजनीतिक रूप से विवादास्पद बन गया क्योंकि सरकार ने जिन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी इस मामले में की थी, उन्होंने सरकार के इस कदम के विरुद्ध फैसला दिया।

प्रश्न 18. ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ क्या है ? भारतीय राजनीति में इसकी भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर : नक्सलवादी आंदोलन से अभिप्राय : पश्चिम बंगाल के पर्वतीय जिले दाजिलिंग के नक्सलवाड़ी पुलिस थाने के क्षेत्र में 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में शुरू हुए किसान विद्रोह का आंदोलन नक्सलवादी आंदोलन कहलाता है।
नक्सलवादी आंदोलन की भूमिका : भारतीय राजनीति में नक्सलवादी आंदोलन की भूमिका नकारात्मक रही है। 1960 में नक्सलवादी सी.पी.आई. (एम.) से अलग हो गए और इन्होंने सी. पी.आई. (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) नाम से एक नई पार्टी चारू मजूमदार के नेतृत्व में बनायी। इस आंदोलन के समर्थक अपने राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसक साधनों के प्रयोग के पक्ष में हैं। इस आंदोलन से अब 9 राज्यों के लगभग 75 जिले प्रभावित हैं। इसमें अधिकतर बहुत पिछड़े क्षेत्र हैं। सरकार ने नक्सलवादी आंदोलनों का दमन करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। मानवाधिकार समूह ने सरकार के इन कदमों की आलोचना करते हुए कहा है कि वह नक्सलवादियों से निपटने के क्रम में संवैधानिक मानकों का उल्लंघन कर रही है। नक्सलवादी हिंसा और नक्सल विरोधी सरकारी कारवाईयों में अब तक हजारों लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।

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