8 अंकीय प्रश्न उत्तर – लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट Class12th Political Science Chapter 6

Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 6 Important Question Answer 8 Marks लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 1. आपातकाल लगने से पूर्व भारत की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन करें।
उत्तर : I. आपातकाल लगने से पूर्व भारत की राजनीतिक स्थिति :
(क) सरकार के मतानुसार चुनी हुई सरकार को लोकतंत्र में विपक्षी दल उसकी नीतियों के अनुसार शासन नहीं चलाने दे रहे थे। वे बार-बार धरना-प्रदर्शन पैदा करने की कोशिश कर रहे थे जिसके कारण प्रशासन विकास के कार्यों पर पूरा ध्यान नहीं दे सकता था। सारी ताकत कानून और व्यवस्था की बहाली पर लगानी पड़ी थी । इंदिरा गाँधी ने शाह आयोग की चिट्ठी में लिखा कि षड्यंत्रकारी ताकतें सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रमों में अड़ंगे डाल रही थी और मुझे गैर-संवैधानिक साधनों के बूते सत्ता से बेदखल करना चाहती थीं।
(ख) 1960 के दशक से ही छात्रों के बीच विरोध के स्वर उठने लगे थे। ये स्वर इस अवधि में और ज्यादा प्रबल हो उठे। संसदीय राजनीति में विश्वास न रखने वाले कुछ मार्क्सवादी समूहों की सक्रियता भी इस अवधि में बढ़ी। इन समूहों ने मौजूदा राजनीतिक प्रणाली और पूँजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के लिए हथियार उठाया तथा राज्य विरोधी तकनीकी का सहारा लिया। ये समूह मार्क्सवादी लेनिनवादी अथवा नक्सलवादी के नाम से जाने गए ऐसे समूह पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सक्रिय थे। पश्चिम बंगाल की सरकार ने इन्हें दबाने के लिए कठोर कदम उठाए।
II. आर्थिक परिस्थिति :
( क ) खाद्य संकट (Food Crisis): 1972-73 में मानसून असफल रहा। इससे कृषि की पैदावार में भारी गिरावट आई। खाद्यान्न का उत्पादन 8 प्रतिशत कम हो गया। आर्थिक स्थिति की बदहाली को लेकर पूरे देश में असंतोष का वातावरण था। संकट की इस स्थिति को देखते हुए विपक्षी दलों ने जन-आन्दोलन को राष्ट्रव्यापी रूप दिया।
( ख ) मुद्रास्फीति (Inflation) : 1973 में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल संकट पैदा हो गया। उस साल तेल निर्यातक देशों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात मनवाने के लिए तेल का उत्पादन कम कर दिया। इसे ‘तेल कूटनीति’ के नाम से भी जाना जाता है। इस तेल संकट के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ गई। तेल की कीमतें बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी उसका प्रभाव देखा जाने लगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और खराब हो गई। इससे विभिन्न चीजों की कीमतें भी तेजी से बढ़ीं। 1973 में चीजों के मूल्य में 23 फीसदी और 1974 में 30 फीसदी वृद्धि हुई। इस तीव्र मूल्यवृद्धि से लोगों को भारी आर्थिक कठिनाई

(ग) बेरोजगारी (Unemployment) : औद्योगिक विकास की दर बहुत कम थी और बेरोजगारी बहुत बढ़ गई। ग्रामीण क्षेत्रों में बेतहाशा बेरोजगारी बढ़ी। खर्चे को कम करने के लिए सरकार ने अपने कर्मचारियों के वेतन को रोक लिया। इससे सरकारी कर्मचारियों में बहुत असंतोष पनपा।
III. 1971 का युद्ध (War of 1971) : 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत को बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ा। इसके अतिरिक्त पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों का भार भारत पर पड़ा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था चरमरा गई। श्रीमती गाँधी का नारा “गरीबी हटाओ” धन के अभाव के कारण असफल हो गया। इससे लोगों में असंतोष फैल गया। 1971 भारत-पाक के युद्ध के बाद अमरीका ने भारत को हर तरह की सहायता देना बंद कर दिया।

प्रश्न 2. 25 जून, 1975 को घोषित आपातकाल के किन्हीं चार परिणामों की व्याख्या कीजिये।

अथवा

“आपातकाल” और इसके इर्द-गिर्द के समय को संवैधानिक संकट का काल क्यों कहा जाता है? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : ‘आपातकाल” और इसके इर्द-गिर्द के समय को निम्नलिखित परिणामों को देखते हुए संवैधानिक संकट का काल कहा गया :
5 जून 1975 को घोषित आपातकाल के चार परिणामः
(i) राजनैतिक वातावरण पर प्रभाव : इंदिरा सरकार के इस फैसले से विरोध आंदोलन एकबारगी रुक गया, हड़तालों पर रोक लगा दी गई। अनेक विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। राजनीतिक माहौल में तनाव भरा एक गहरा सन्नाटा छा गया।
1976 के अप्रैल माह में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को उलट दिया और सरकार की दलील मान ली। इसका आशय यह था कि सरकार आपातकाल के दौरान नागरिक से जीवन और आजादी का अधिकार वापस ले सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से नागरिकों के लिए अदालत के दरवाजे बंद हो गए।
(ii) प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रभाव : आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों पर अमल करते हुए सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचारपत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेनी जरूरी है। इसे ‘प्रेस सेंसरशिप’ के नाम से जाना जाता है।
(iii) मौलिक अधिकारों पर प्रभाव : सबसे बड़ी बात यह हुई कि आपातकालीन प्रावधानों के अंतर्गत नागरिकों के विभिन्न मौलिक अधिकार निष्प्रभावी हो गए। उनके पास अब यह अधिकार भी नहीं रहा कि मौलिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएँ। सरकार ने निवारक नजरबंदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया जाता कि उन्होंने कोई अपराध किया है बल्कि इसके विपरीत, इस प्रावधान के अंतर्गत लोगों को इस आशंका से गिरफ्तार किया जाता है कि वे कोई अपराध कर सकते हैं।
(iv) संवैधानिक उपचारों का अधिकार एवं न्यायालय द्वारा सरकार विरोधी घोषणाएँ : जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया वे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का सहारा लेकर अपनी गिरफ्तारी को चुनौती भी नहीं दे सकते थे। गिरफ्तार लोगों अथवा उनके पक्ष से किन्हीं और ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में कई मामले दायर किए, लेकिन सरकार का कहना था कि गिरफ्तार लोगों को गिरफ्तारी का कारण बताना कतई जरूरी नहीं है। अनेक उच्च न्यायालयों ने फैसला दिया कि आपातकाल की घोषणा के बावजूद अदालत किसी व्यक्ति द्वारा दायर की गई ऐसी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को विचार के लिए स्वीकार कर सकती है जिसमें उसने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी हो ।

प्रश्न 3. “1977 के चुनाव के बाद पहली बार केन्द्र में विपक्षी दलों की सरकार बनी “। इस बदलाव के किन्हीं छः कारणों का परीक्षण कीजिए।

अथवा

1977 में जनता पार्टी के विजय होने के कोई दो कारण लिखें।

अथवा

1977 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की पराजय के लिए उत्तरदायी किन्हीं छह कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 1977 के चुनाव के बाद पहली बार केन्द्र में विपक्षी दलों की सरकार बनने अथवा इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार के लिए निम्न कारण उत्तरदायी थे :
(i) आपातकालीन स्थिति समाप्त होने के बाद लोकसभा के चुनावों की घोषणा की गई। वस्तुतः ये ऐतिहासिक चुनाव ‘आपातकालीन स्थिति’ के बारे में एक प्रकार से जनमत संग्रह थे। उत्तर भारत में विशेष तौर पर आपातकाल का प्रभाव अधिक महसूस किया गया। विरोधी दलों ने “लोकतंत्र बचाओ” के नारे पर चुनाव लड़ा। लोगों का निर्णय निश्चित तौर पर ‘आपातकाल’ के खिलाफ था।
(ii) आपातकाल लागू होने के पहले ही बड़ी विपक्षी पार्टियाँ एक-दूसरे के नजदीक आ रही थीं। चुनाव के ऐन पहले इन पार्टियों ने एकजुट होकर जनता पार्टी नाम से एक नया दल बनाया। नयी पार्टी ने जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व स्वीकार किया। कांग्रेस के कुछ नेता भी जो आपातकाल के खिलाफ थे, इस पार्टी में शामिल हुए।
(iii) कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने जगजीवन राम नेतृत्व में एक नयी पार्टी बनाई। इस पार्टी का नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ था और बाद में यह पार्टी भी जनता पार्टी में शामिल हो गई।
(iv) 1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया। इस पार्टी ने चुनाव प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर जोर दिया।
(v) हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था। जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। बात बिल्कुल साफ थी कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।
(vi) जैसा कि उम्मीद की जाती थी वही हुआ। चुनावी परिणामों से स्पष्ट हो गया कि मतदाताओं ने कांग्रेस को नकार दिया था। उसे मात्र 184 सीटें मिलीं। जनता पार्टी और उसके सा दलों ने 330 सीटें जीत ली। इस प्रकार केन्द्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार या विपक्षी सरकार या जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ।

प्रश्न 4. “जो सरकारें जनता को अलोकतंत्रीय वातावरण का अनुभव कराती हैं, वे ही समय आने पर मतदाताओं द्वारा बुरी तरह से दंडित की जाती हैं। ” 1975-1977 के आपातकाल के संदर्भ में इस कथन की पुष्टि किन्हीं तीन उपयुक्त तर्कों द्वारा कीजिए ।

अथवा

जिन सरकारों को लोकतंत्र-विरोधी माना जाता है, मतदाता उन्हें भारी दंड देते हैं। 1975-77 के काल की आपातकालीन स्थिति के संदर्भ में इस कथन की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : लोकतंत्र विरोधी सरकारों को मतदाताओं द्वारा दंडित किया जाता है। यह कथन पूर्णतया सत्य है । सन् 1975-77 के आपातकालीन स्थिति के संदर्भ में हम निम्न तथ्यों में इसकी व्याख्या कर सकते हैं।
उत्तर भारत में तो खासतौर पर क्योंकि यहाँ आपातकाल का असर सबसे ज्यादा महसूस किया गया था। विपक्ष ने ‘लोकतंत्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा। जनादेश निर्णायक तौर पर आपातकाल के विरुद्ध था। सबक एकदम साफ था और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में स्थिति यही रही। जिन सरकारों को जनता ने लोकतंत्र-विरोधी माना उसे मतदाता के रूप में उसने भारी दंड दिया ।
लोकसभा के चुनाव, 1977 : 18 महीने के आपातकाल के बाद 1977 के जनवरी माह में सरकार ने चुनाव कराने का फैसला किया। 1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया। इस पार्टी ने चुनाव प्रचार में कांग्रेस शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर जोर दिया। हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था। जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया। कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। बात बिल्कुल साफ थी। कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।
कांग्रेस को लोकसभा की मात्र 154 सीटें मिली थीं। उसे 35 प्रतिशत से भी कम वोट हासिल हुए। जनता पार्टी और उसके साथी दलों को लोकसभा की कुल 542 सीटों में से 330 सीटें मिलीं। खुद जनता पार्टी अकेले 295 सीटों पर जीत गई थी और उसे स्पष्ट बहुमत मिला था। उत्तर भारत में चुनावी माहौल कांग्रेस के एकदम खिलाफ था। कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली। इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए।

प्रश्न 5. 1975 में अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आपातकालीन घोषणा के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।

अथवा

दो प्रमुख दृष्टिकोण पर अपने विचार रखते हुए बताइए कि 1975 के आपातकाल की घोषणा आवश्यक थी अथवा अनावश्यक |
उत्तर : आपातकाल की घोषणा के संदर्भ में विद्वानों में विवाद अथवा मतभेद : राजनैतिक इतिहास के संदर्भ में जून, 1975 के आपातकाल की घोषणा भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा विवादास्पद प्रकरण (घटना) है। इसका कारण यह है कि दो विभिन्न प्रमुख दृष्टिकोणों वाले विद्वानों के समूह अथवा उनकी विचारधारा हमारे सामने आती है। इसका कारण यह भी है कि इंदिरा सरकार ने संविधान के अंतर्गत दिए गए अधिकारों का प्रयोग करके लोकतांत्रिक कामकाज को पूरी तरह ठप्प कर दिया था। दोनों दृष्टिकोणों पर निम्नलिखित अनुच्छेदों में विचार किया जा रहा है (i) आपातकाल की घोषणा के समर्थक : इंदिरा सरकार और उसके समर्थक विद्वानों का यह तर्क है कि जून, 1975 में आपातकाल लगाना बहुत जरूरी था। सरकार का तर्क था कि भारत में लोकतंत्र है और इसके अनुकूल विपक्षी दलों को चाहिए। कि वे निर्वाचित शासक दल को अपनी नीतियों के अनुसार शासन चलाने दें। सरकार का मानना था कि बार-बार का धरना प्रदर्शन और सामूहिक कार्रवाई लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इंदिरा गाँधी के समर्थक यह भी मानते थे कि लोकतंत्र में सरकार पर निशाना साधने के लिए लगातार गैर-संसदीय राजनीति का सहारा नहीं लिया जा सकता। इससे अस्थिरता पैदा होती है और प्रशासन का ध्यानं विकास के कामों से भंग हो जाता है। सारी ताकत कानून-व्यवस्था की बहाली पर लगानी पड़ती है। इंदिरा गाँधी ने शाह आयोग को चिट्ठी में लिखा कि षड्यंत्रकारी ताकतें सरकार के प्रगतिशील कार्यक्रमों में अडंगे डाल रही थीं और मुझे गैर-संवैधानिक साधनों के बूते सत्ता से बेदखल करना चाहती थीं
कुछ अन्य दलों, मसलन सीपीआई (इसने आपातकाल के दौरान कांग्रेस को समर्थन देना जारी रखा था) का विश्वास था कि भारत की एकता के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय साजिश की जा रही है। सी.पी.आई. का मानना था कि ऐसी हालत में विरोध पर एक हद तक प्रतिबंध लगाना उचित है।
(ii) आपातकाल घोषणा के विरोधी :
(क) जून, 1975 के दूसरी तरफ, आपातकाल के आलोचकों का तर्क था कि आजादी के आंदोलन से लेकर लगातार भारत में जन-आंदोलन का एक सिलसिला रहा है। जेपी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं का ख्याल था कि लोकतंत्र में लोगों को सार्वजनिक तौर पर सरकार के विरोध का अधिकार होना चाहिए।
(ख) बिहार और गुजरात में चले विरोध-आंदोलन ज्यादातर समय अहिंसक और शांतिपूर्ण रहे। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था, उन पर कभी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहने का मुकदमा नहीं चला। अधिकतर बंदियों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था। देश के अंदरूनी मामलों की देख-रेख का जिम्मा गृह मंत्रालय का होता है। गृह मंत्रालय ने भी कानून और व्यवस्था की बाबत कोई चिंता नहीं जतायी थी।
(ग) यदि देश में संकटकाल से पूर्व चल रहे कुछ आंदोलन अपनी हद से बाहर जा रहे थे, तो सरकार के पास अपनी रोजमर्रा की अमल में आने वाली इतनी शक्तियाँ थीं कि वह ऐसे आंदोलनों को हद में ला सकती थी। लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ठप्प करके ‘आपातकाल’ लागू करने जैसे अतिचारी कदम उठाने की कतई न थी। जरूरत
(घ) वे अंत में तर्क देते रहे हैं कि वस्तुतः खतरा देश की एकता अखंडता को नहीं, बल्कि शासक दल और स्वयं प्रधानमंत्री को था। आलोचक कहते हैं कि देश को बचाने के लिए बनाए गए संवैधानिक प्रावधान का दुरुपयोग इंदिरा गाँधी ने निजी ताकत को बचाने के लिए किया।

प्रश्न 6. 1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने किस प्रकार 1975 में लगाए गए आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दे दिया? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1977 के चुनावों को जनता पार्टी ने आपातकाल के ऊपर जनमत संग्रह का रूप दिया।
(i) इस पार्टी ने चुनाव प्रचार में शासन के अलोकतांत्रिक चरित्र और आपातकाल के दौरान की गई ज्यादतियों पर जोर दिया। हजारों लोगों की गिरफ्तारी और प्रेस की सेंसरशिप की पृष्ठभूमि में जनमत कांग्रेस के विरुद्ध था।
(ii) जनता पार्टी के गठन के कारण यह भी सुनिश्चित हो गया कि गैर-कांग्रेसी वोट एक ही जगह पड़ेंगे। बात बिलकुल साफ थी कि कांग्रेस के लिए अब बड़ी मुश्किल आ पड़ी थी।
(iii) लेकिन चुनाव के अंतिम नतीजों ने सबको चौंका दिया। आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव हार गई । कांग्रेस को लोकसभा की मात्र 154 सीटें मिली थीं। उसे 35% से भी कम वोट हासिल हुए। जनता पार्टी और उसके साथी दलों को लोकसभा की कुल 542 सीटों में से 330 सीटें मिलीं। खुद जनता पार्टी अकेले 295 सीटों पर जीत गई थी और उसे स्पष्ट बहुमत मिला था। उत्तर भारत में चुनावी माहौल कांग्रेस के एकदम खिलाफ था।
(iv) कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक भी सीट न पा सकी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसे महज एक-एक सीट मिली। इंदिरा गाँधी रायबरेली से और उनके पुत्र संजय गाँधी अमेठी से चुनाव हार गए।

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