Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 7 Important Question Answer 1 Marks जन-आंदोलनों का उदय

प्रश्न 1. क्या भारत में आंदोलन तथा विरोध की कार्यवाइयाँ लोकतंत्र को मजबूत करती हैं ? अपने उत्तर की पुष्टि में कोई एक उपयुक्त उदाहरण दीजिए।
उत्तर : हाँ, भारत में आंदोलन तथा विरोध की कार्यवाइयाँ लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करती हैं। ये आंदोलन किसी न किसी मुद्दे पर केंद्रित होते हैं। इनसे समाज के अभिवंचित एवं बेसहारा लोगों की प्रजातांत्रिक धारा में लाने में बड़ी सहायता मिलती है। सामाजिक समूह एकजुट होकर स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते हैं। जन आंदोलन और विरोध की कार्यवाहियों से लोकतांत्रिक राजनीति को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। इन आंदोलनों का उद्देश्य दलीय राजनीति की खामियों को दूर करना होता है। इस प्रकार की सक्रिय भागीदारी लोकतंत्र के जनाधार को आगे बढ़ाती है। जैसे-दलित आंदोलन ने अपने हितों की रक्षा की है और उनमें जागरूकता पैदा की है।

प्रश्न 2. जन आंदोलनों के महत्त्व को उजागर कीजिए ।
उत्तर : जन आंदोलनों का महत्त्व : जन आंदोलनों का लोकतंत्र में विशेष महत्त्व होता है। ये आंदोलन किसी न किसी मुद्दे पर केंद्रित होते हैं। इनसे समाज के अभिवंचित एवं बेसहारा लोगों को प्रजातांत्रिक धारा में लाने में बड़ी सहायता मिलती है। सामाजिक समूह एकजुट होकर स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए आगे आते हैं।
जन-आंदोलन और विरोध की कार्यवाहियों से लोकतांत्रिक राजनीति को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। इन आंदोलनों का उद्देश्य दलीय राजनीति की खामियों को दूर करना होता है । इस प्रकार की सक्रिय भागीदारी लोकतंत्र के जनाधार को आगे बढ़ाती है जैसे- दलित आंदोलन ने अपने हितों की रक्षा की है और उनमें जागरूकता पैदा की है।

प्रश्न 3. जन आंदोलन क्या है? महिलाओं से संबंधित किन्हीं तीन मुद्दों की व्याख्या कीजिए जिनसे उनमें सामाजिक जागरूकता पैदा हुई ।
उत्तर : I. जन आंदोलन का अर्थ : वे आंदोलन जो जनहित या लोगों की किसी सामान्य समस्या या समस्याओं के हल के लिए प्रायः दलगत राजनीति से अलग रहकर चलाए जाते हैं। उदाहरणार्थ चिपको आन्दोलन, दलित पैंथर्स आंदोलन, भारतीय किसान यूनियन आंदोलन आदि ।
II. (a) ताड़ी विरोधी आंदोलन : आंध्र के गाँवों में महिलाओं द्वारा नेतृत्व एवं उन्हें प्राप्त सफलता।
(b) संविधान के 73वें तथा 74वें संशोधन के द्वारा महिलाओं को स्थानीय निकायों में आरक्षण प्राप्त हुआ।
(c) महिलाओं को संसद एवं विधायिकाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण के लिए आंदोलन चल रहा है जो अभी लोकसभा में पास नहीं हुआ। (हालांकि संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में यह पास हो चुका है।)
(d) महिलाओं को दहेज की कुप्रथा तथा आसान तलाक से सुरक्षा के साथ-साथ पैतृक संपत्ति में भागीदारी की व्यवस्था।

प्रश्न 4. ‘नेशनल फिशवर्कर्स फोरम’ क्या था? 20वीं शताब्दी के आठवें तथा नवें दशकों में, फिशवर्कर्स ने किस प्रकार न केवल सफलतापूर्वक कानूनी लड़ाई जीती, अप सार्वजनिक संघर्ष भी किया? इनके लिए आप कैसे भविष्य की कल्पना करते हैं?
उत्तर : 1. एन.एफ.एफ (N.EE) अथवा नेशनल फिशवर्कर्स फोरम : यह संगठन 1980 के मध्य के बाद से शुरू होने वाली उदारवादी नीति के अन्तर्गत विदेशी कंपनियों को भारत में पूर्वी तथा पश्चिमी तट पर लाइसेंस देकर देशी मछुआरों की जीविका के लिए उत्पन्न खतरों से ‘बॉटम ट्राऊलिंग’ जैसे प्रौद्योगिकी के उपयोग की केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमति के विरुद्ध गठित किया गया।
2.एन.एफ.एफ. की गतिविधियाँ : (i) केरल के ने अपने साथी मछुआरों तथा विशेष तौर पर दूसरे राज्यों के महिला वर्कर्स को साथ लेकर अपने संगठन को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व लिया।
एन.एफ.एफ. ने 1991 में केंद्रीय सरकार से कानूनी लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी।
(ii) यह कानूनी लड़ाई सरकार की गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की नीति के खिलाफ थी। इस नीति के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियों को व्यापारिक स्तर भारतीय समुद्र में मछली पकड़ने की अनुमति दे दी गई थी। 20वीं शताब्दी के 8वें तथा 9वें दशकों में एन. एफ.एफ. ने सरकार के साथ अनेक कानूनी तथा सार्वजनिक लड़ाइयाँ लड़ीं। एन.एफ.एफ. ने उन वर्कर्स के लिए संघर्ष किया जिनकी जीविका का आधार ही मछली पकड़ना था। जुलाई, 2002 में, एन.एफ.एफ. ने राष्ट्रीय स्तर पर विदेशी ट्रॉलर्स को लाइसेंस देने के मुद्दे पर हड़ताल की।
3.एन. एफ. एफ. ने इस संघर्ष में विश्व के उन तमाम संगठनों से हाथ मिलाया जो पर्यावरण के संरक्षण तथा मछुआरों के जीवन की रक्षा हेतु कार्य कर रहे थे। एन.एफ.एफ. के संघर्ष तथा सफलता के आधार पर इनके बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है।

प्रश्न 5. जन आंदोलनों की कमियों एवं त्रुटियों को संक्षेप में लिखिए |
उत्तर : (i) जन-आंदोलनों द्वारा लामबंद की जाने वाली जनता सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तथा अधिकारहीन वर्गों से संबंध रखती है। जन-आंदोलनों द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों से मालूम होता है कि रोजमर्रा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इन वचित समूहों को अपनी बात कहने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता था।
(ii) किंतु कुल मिलाकर सार्वजनिक नीतियों पर इन आंदोलनों का कुल असर काफी सीमित रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि समकालीन सामाजिक आंदोलन किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द ही जनता को लामबंद करते हैं। इस तरह वे समाज के किसी एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर पाते हैं। इसी सीमा के चलते सरकार इन आंदोलनों की जायज माँगों को ठुकराने का साहस कर पाती है। लोकतांत्रिक राजनीति वंचित वर्गों के व्यापक गठबंधन को लेकर ही चलती है जबकि जन-आंदोलनों के नेतृत्व में यह बात संभव नहीं हो पाती।
(iii) राजनीतिक दलों को जनता के विभिन्न वर्गों के बीच सामंजस्य बैठाना पड़ता है, जन-आंदोलनों के नेतृत्व इस वर्गीय हित के प्रश्नों को कायदे से नहीं संभाल पाता। राजनैतिक दलों ने समाज के वंचित और अधिकारहीन लोगों के मुद्दों पर ध्यान देना छोड़ दिया है। पर जन-आंदोलन का नेतृत्व भी ऐसे मुद्दों को सीमित ढंग से ही उठा पाता है।
(iv) विगत वर्षों में राजनीतिक दलों और जन-आंदोलनों का आपसी संबंध कमज़ोर होता गया है। इससे राजनीति में एक सूनेपन का माहौल पनपा है। हाल के वर्षों में, भारत की राजनीति में यह एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है।

प्रश्न 6. “लोकतंत्र का प्रतिनिध्यात्मक होना काफी नहीं है। लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए जन आंदोलन में सक्रिय भाग लेना आवश्यक है। ” क्या आप इस विचार से सहमत हैं? क्यों ?
उत्तर : लोकतंत्र का प्रतिनिध्यात्मक होना पर्याप्त नहीं है। बल्कि सफल बनाने के लिए जन आंदोलन (Popular movement) का सक्रिय होना जरूरी है। मैं इस कथन से पूर्णतया सहमत हूँ और निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करता हूँ। :
(i) चिपको आंदोलन अहिंसक, शांतिपूर्ण चलाया गया एक व्यापक जन आंदोलन था। इससे पेड़ों की कटाई, वनों का उजड़ना रुका। पशु-पक्षियों, गिरिजनों को जल, जंगल, जमीन और स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिला। सरकार लोकतांत्रिक माँगों के सामने झुकी।
(ii) वामपंथियों द्वारा शांतिपूर्ण चलाए गए किसान और मजदूर आंदोलन द्वारा जन-साधारण में जागृति, राष्ट्रीय कार्यों में भागीदारी और सर्वहारा वर्ग की उचित माँगों के लिए सरकार को जगाने में सफलता मिली।
(iii) दलित पैंथर्स के नेताओं द्वारा चलाए गए आंदोलनों, सरकार विरोधी साहित्यकारों की कविताओं और रचनाओं ने आदिवासी, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों में चेतना पैदा की। दलित पैंथर्स जैसे राजनैतिक दल और संगठन बने। जाति भेद-भाव और छुआछूत को धक्का लगा।
समाज में समानता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, राजनैतिक न्याय को सुदृढ़ता मिली।
(iv) ताड़ी विरोधी आंदोलन ने नशाबंदी और मद्य निषेध के मुद्दे पर वातावरण तैयार किया। महिलाओं से संबंधित अनेक समस्याएँ (यौन उत्पीड़न, घरेलू समस्या, दहेज प्रथा और महिलाओं को विधायिकाओं में आरक्षण दिए जाने) उठीं। संविधान में कुछ संशोधन हुए और कानून बनाए गए।

प्रश्न 7. ताड़ी-विरोधी आंदोलन की किन्हीं दो मुख्य माँगों को उजागर कीजिए।
उत्तर : ताड़ी-विरोधी आंदोलन की दो मुख्य माँगें:
(i) ताड़ी की बिक्री बंद करो : आंध्र प्रदेश में शराब-विरोधी या ताड़ी-विरोधी आंदोलन का नारा बहुत साधारण था-‘ताड़ी की बिक्री बंद करो।’ इस साधारण नारे ने क्षेत्र में व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया। दूसरी तरफ राज्य सरकार ताड़ी बिक्री पर राजस्व प्राप्त कर रही थी। इसलिए इस आंदोलन पर प्रतिबंध लगाना सरकार के लिए सबसे बड़ा नुकसान साबित हो रहा था ।
(ii) घरेलू हिंसा तथा लैंगिक अपराध पर प्रतिबंध : ताड़ी-विरोधी आंदोलन के बाद दूसरा बड़ा हिस्सा जिसे घरेलू हिंसा तथा लैंगिंक अपराध का नाम दिया गया जो कि पूरे आंध्र प्रदेश में व्यापक स्तर पर फैला। इस आंदोलन ने पूरे राज्य की महिलाओं को एकजुटता प्रदान करके अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए मनोबल प्रदान किया।

प्रश्न 8. भारतीय किसान यूनियन की किन्हीं दो माँगों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : भारतीय किसान यूनियन द्वारा उठाए गए मुद्दे :
(i) बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी का विरोध करना। (ii) 1980 के दशक के उत्तरार्ध से भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के प्रयास हुए और इस क्रम में नगदी फसलों के बाजार को संकट का सामना करना पड़ा। भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ की सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोत्तरी करने, कृषि उत्पादों की अंतर्राज्यीय आवाजाही पर लगी पाबंदियाँ हटाने, समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने तथा किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की माँग की।

प्रश्न 9. सरदार सरोवर परियोजना जैसी विकास परियोजनाओं से संबद्ध चिंता के किन्हीं दो मुद्दों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : 1. नर्मदा बचाओ आंदोलन : नर्मदा बाँध परियोजना के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाया गया। पर्यावरण संरक्षण से संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण आंदोलन नर्मदा बचाओ आंदोलन को माना जाता है। इस आंदोलन को चलाने में मेधा पाटेकर, बाबा आमटे तथा सुन्दर लाल बहुगुणा शामिल हैं। आंदोलन के समर्थकों की माँग है कि बाँध परियोजना के पूर्ण होने पर कई लाख लोग बेघर हो जाएँगे। अतः सरकार इनके पुनर्वास की पूर्ण व्यवस्था करे।
2.टिहरी बाँध परियोजना के विरुद्ध चलने वाला आंदोलन : यह भारत का सबसे लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन था। टिहरी बाँध परियोजना का विरोध करने के लिए लोगों ने स्वतंत्रता सेनानी वीरेन्द्र दत्त सखलानी के नेतृत्व में टिहरी बाँध परियोजना विरोधी संघर्ष समिति का निर्माण किया। टिहरी बाँध से टिहरी शहर के पानी में डूबने का खतरा था। समाजसेवी सुन्दर लाल बहुगुणा ने इस परियोजना का विरोध करने के लिए आमरण अनशन किया तथा प्रधानमंत्री द्वारा इस योजना की समीक्षा के आश्वासन पर ही उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ा था।

प्रश्न 10. नवीन किसान आन्दोलन की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर : पिछले 20 वर्षों में नवीन किसानों का आंदोलन विकसित हुआ है। यह अर्थव्यवस्था को राज्य के सभी प्रकार के दखलों से स्वतंत्र करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं: 1. आंदोलन का रूप आर्थिक हो गया है। 2. यह धर्मनिरपेक्ष है। 3. यह देखने में चरागाही नहीं लगता। 4. इसके सकारात्मक उदारवाद पर आधारित विश्व पर स्पष्ट विचार हैं ।

प्रश्न 11. दलित पैंथर्स कौन थे ? उनकी मुख्य गतिविधियों का वर्णन कीजिए |
उत्तर : 1972 में महाराष्ट्र में दलितों की दशा में सुधार करने के लिए एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत हुई और दलित युवाओं का एक संगठन “दलित पैंथर्स” बना। बीसवीं शताब्दी के सातवें दशक के शुरुआती सालों से शिक्षित दलितों की पहली पीढ़ी ने अनेक मंचों से अपने हक की आवाज उठायी। इनमें ज़्यादातर शहर की झुग्गी बस्तियों में पलकर बड़े हुए दलित थे। दलित हितों की दावेदारी के इसी क्रम में महाराष्ट्र में दलित युवाओं का एक संगठन ‘दलित पैंथर्स’ 1972 में बना।
मुद्दे (Issues) : (i) आज़ादी के बाद के सालों में दलित समूह मुख्यतया जाति आधारित असमानता और भौतिक साधनों के मामले में अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ रहे थे। वे इस बात को लेकर सचेत थे कि संविधान में जाति आधारित किसी भी तरह के भेदभाव के विरुद्ध गारंटी दी गई है। (ii) आरक्षण के कानून तथा सामाजिक न्याय की ऐसी ही नीतियों का कारगर क्रियान्वयन इनकी प्रमुख माँग थी। (iii) भारतीय संविधान में छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया गया है। सरकार ने इसके अंतर्गत साठ और सत्तर के दशक में कानून बनाए। इसके बावजूद पुराने जमाने में जिन जातियों को अछूत माना गया था, उनके साथ इस नए दौर में भी सामाजिक भेदभाव तथा हिंसा का बर्ताव कई रूपों में जारी रहा। (iv) दलितों की बस्तियाँ मुख्य गाँव से अब भी दूर होती थीं। दलित महिलाओं के साथ यौन अत्याचार होते थे। जातिगत प्रतिष्ठा की छोटी-मोटी बात को लेकर दलितों पर सामूहिक जुल्म ढाये जाते थे। दलितों के सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को रोक पाने में कानून की व्यवस्था नाकाफी साबित हो रही थी।

प्रश्न 12. महिला सशक्तिकरण के साधन के रूप में संसद और राज्य विधान सभाओं में सीटें आरक्षित करने की माँग का परीक्षण कीजिए।
उत्तर : (i) किसी भी देश के संपूर्ण विकास के लिए सभी क्षेत्रों में स्त्रियों और पुरुषों की अधिकतम भागीदारी होनी चाहिए। पुरुष और महिलाएँ दोनों ही कंधे से कंधा मिलाकर एक सुखी और सुव्यवस्थित निजी, पारिवारिक और सामाजिक जीवन व्यतीत करें। हमारे देश में जनसंख्या के लगभग आधे हिस्से की क्षमता का कम उपयोग सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए एक गंभीर बाधा है। 1952 से 1999 तक संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम रहा है।
(ii) महिला आंदोलन चुनावी संस्थाओं में महिलाओं के आरक्षण के लिए संघर्ष करता रहा है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के द्वारा महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त हुआ है। इस आंदोलन को केवल आंशिक सफलता मिली है। संसद और राज्य विधान सभाओं में ऐसे ही आरक्षण के लिए संघर्ष जारी है लेकिन जहाँ लगभग सभी राजनीतिक दल खुले तौर पर इस माँग का समर्थन करते हैं वहीं जब यह विधेयक संसद के समक्ष पेंश होता है तो किसी न किसी प्रकार इसे पारित नहीं होने दिया जाता है।

प्रश्न 13. किन्हीं चार प्रमुख नेताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने समाज के दलितों के कल्याण के लिए प्रयास किए।
उत्तर : (i) ज्योतिराव फुले ने भारतीय समाज के तथाकथित पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए आवाज उठाई, संगठन बनाए और लेख लिखे। वे ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी थे।
(ii) मोहनदास कर्मचंद गाँधी ने हरिजन संघ, ‘हरिजन’ नाम से पत्रिका और छुआछूत उन्मूलन और तथाकथित हरिजनों (जिन्हें प्राय: दलित कहा जाना अधिक सही माना जाता है) के कल्याण के लिए बहुत प्रयास किया।
(iii) डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन भर दलितों के उत्थान के लिए कार्य किए, संगठन बनाए और भारतीय संविधान की रचना के दौरान छुआछूत उन्मूलन के लिए व्यवस्था कराई। किसी भी रूप में छुआछूत का व्यवहार करने वाले लोगों को दोषी मानकर कानून के अंतर्गत कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था कराई।
(iv) कांशीराम ने डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान् समाज सुधारक को अपना आदर्श और प्रेरणास्रोत मानकर बहुजन समाज पार्टी की रचना की। यह दल उनके संपूर्ण जीवन में कार्यरत रहा। आज भी यह दल दलितों के कल्याण के लिए कार्यरत है।

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