Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 7 Important Question Answer 8 Marks जन-आंदोलनों का उदय

प्रश्न 1. जन आंदोलनों ने लोकतंत्र को बाधा पहुँचाने की अपेक्षा उसका विस्तार किस प्रकार किया?

अथवा

जन आंदोलन क्या है? जन आंदोलनों के चार लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : जन आंदोलनों ने लोकतंत्र को बाधा पहुँचाने की अपेक्षा उसका विस्तार निम्नलिखित प्रकार से किया :
वे आंदोलन जो जन-हित या लोगों की किसी सामान्य समस्या या समस्याओं में प्रायः दलगत राजनीति से अलग रहकर चलाये जाते हैं। उदाहरणार्थ चिपको आंदोलन, दलित पैंथर्स आंदोलन, भारतीय किसान यूनियन आंदोलन आदि ।
1.जन आंदोलन तथा भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता : (i) जन आंदोलनों ने लोगों को लोकतंत्र को ज्यादा बढ़िया ढंग से समझने में सहायता दी है। जो लोग जन आंदोलन आयोजित करते रहे हैं, वे नेता और जन साधारण- ग-स्त्री-पुरुष, छात्र-छात्राएँ, ग्रामीण-शहरी, किसान, मजदूर, गैर-सरकारी संगठनों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता आदि थे। वे भली-भाँति इन आंदोलनों के कारण सीख गए कि लोकतंत्र में अंतिम सत्ता जनता में निहित होती है। लोग धरनों, प्रदर्शनों, विरोध मोर्चा, सत्याग्रह, अनशन आदि के द्वारा जिद्दी से जिद्दी व्यक्ति और सरकार को झुका सकते हैं।
(ii) जन आंदोलनों के इतिहास से हमें यह भी शिक्षा मिलती है ये आंदोलन अनियमित ढंग से तुरंत खड़े नहीं हो जाते। इसलिए इन्हें समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
(iii) लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है जो दलीय प्रणाली पर आधारित होती है लेकिन जन आंदोलनों का उद्देश्य दलीय राजनीति की कमियों और दोषों को दूर करना होता है। इसीलिए चाहे सत्ताधारी दल हो या सभी विरोधी दल हों, वे जन आंदोलनों के स्वरूप, विकास, प्रगति से जुड़े समाचारों को प्रेस और दूरदर्शन पर बड़े ध्यान से पढ़ते, सुनते और देखते हैं। इसलिए यह लोकतंत्र और दलगत राजनीति के अहम हिस्से माने जाते हैं।
2.जन या सामाजिक आंदोलनों द्वारा समस्याओं की अभिव्यक्ति अथवा सामाजिक आंदोलनों के सबक :(i) जन आंदोलन सामाजिक आंदोलनों के रूप में जब प्रगति की सीढ़ियों पर चढ़ते हैं तो उनके द्वारा समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति मिलती है जो अपनी दिक्कतों को चुनावी राजनीति के माध्यम से हल नहीं करा पाते। इसीलिए विभिन्न सामाजिक समूहों, दलितों, अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों, अन्य पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त माफियाओं एवं बाहुबलियों को रोकने में सहायक माध्यम के रूप से इन आंदोलनों को उपयोग में लाना ज्यादा आसान है।
(ii) समाज के गहरे तनावों और जनता के क्षोभ को एक सार्थक दिशा देकर इन आंदोलनों ने एक तरह से लोकतंत्र की रक्षा की है। सक्रिय भागीदारी के नए रूपों के प्रयोग ने भारतीय लोकतंत्र के जनाधार को है।
(iii) इन आंदोलनों के आलोचक अक्सर यह दलील देते हैं कि हड़ताल, धरना और रैली जैसी सामूहिक कार्रवाईयों से सरकार के कामकाज पर बुरा असर पड़ता है। उनके अनुसार इस तरह की गतिविधियों से सरकार की निर्णय प्रक्रिया बाधित होती है तथा रोजमर्रा की लोकतांत्रिक व्यवस्था भंग होती है।
3.जन आंदोलनों की सीमाएँ : (i) जन आंदोलनों द्वारा लामबंद की जाने वाली जनता सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तथा अधिकारहीन वर्गों से संबंध रखती है। जन-आंदोलनों द्वारा अपनाए गए तौर-तरीकों से मालूम होता है कि रोजमर्रा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इन वंचित समूहों को अपनी बात कहने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता था।
(ii) किंतु कुल मिलाकर सार्वजनिक नीतियों पर इन आंदोलनों का असर काफी सीमित रहा है। इसका एक कारण तो यह है कि समकालीन सामाजिक आंदोलन किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द ही जनता को लामबंद करते हैं। इस तरह वे समाज के किसी एक वर्ग का ही प्रतिनिधित्व कर पाते हैं। इसी सीमा के चलते सरकार इन आंदोलनों की जायज माँगों को ठुकराने का साहस कर पाती है। लोकतांत्रिक राजनीति वंचित वर्गों के व्यापक गठबंधन को लेकर ही चलती है जबकि जन आंदोलन के नेतृत्व में यह बात संभव नहीं हो पाती।
(iii) राजनीतिक दलों को जनता के विभिन्न वर्गों के बीच सामंजस्य बैठाना पड़ता है, जन-आंदोलनों का नेतृत्व इस वर्गीय हित के प्रश्नों को कायदे से नहीं संभाल पाता। राजनैतिक दलों ने समाज के वंचित और अधिकारहीन लोगों के मुद्दों पर ध्यान देना छोड़ दिया है। पर जन आंदोलन का नेतृत्व भी ऐसे मुद्दों को सीमित ढंग से ही उठा पाता है।
(iv) विगत वर्षों में राजनीतिक दलों और जन आंदोलनों का आपसी संबंध कमजोर होता गया है। इससे राजनीति में एक सूनेपन का माहौल पनपा है। हाल के वर्षों में, भारत की राजनीति में यह एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है।

प्रश्न 2. चिपको आंदोलन से क्या अभिप्राय है? यह आंदोलन कब और कहाँ शुरू हुआ? पर्यावरण के संरक्षण में इसका क्या योगदान है?
उत्तर : 1. चिपको आंदोलन (Chipko Movement) : इस आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के दो-तीन गाँवों से सन् 1973 में हुई थी। इसके पीछे एक कहानी है। गाँव वालों ने वन विभाग से कहा कि खेती-बाड़ी के औजार बनाने के लिए हमें Ash tree काटने की अनुमति दी जाए। वन विभाग ने अनुमति देने से इंकार कर दिया। जो भी हो, विभाग ने खेल-सामग्री के एक विनिर्माता को जमीन का यही टुकड़ा व्यावसायिक प्रयोग के लिए आबंटित कर दिया। इससे गाँव वालों में रोष पैदा हुआ और उन्होंने सरकार के इस कदम का विरोध किया। यह विरोध बड़ी जल्दी .उत्तराखंड के अन्य इलाकों में भी फैल गया। क्षेत्र की पारिस्थितिकी और आर्थिक शोषण के कहीं बड़े सवाल उठने लगे।
2.यह आंदोलन 1973 में उत्तराखंड में शुरू हुआ।
3.पर्यावरण संरक्षण में चिपको आंदोलन का योगदान: (i) चिपको आंदोलन के कारण वनों की अनावश्यक कटाई रुकी और पेड़-पौधों को अधिक लंबा जीवन और सरकार द्वारा, स्थानीय लोगों द्वारा और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा संरक्षण मिला।
(ii) नए वृक्षारोपण कार्यक्रम शुरू किए गए। इससे लोगों को यह प्रेरणा मिली कि ज्यादा पेड़ लगाने से वायु शुद्ध होती है और भूमि का कटाव रुकने में मदद मिलती है। पेड़ अधिक होने से और वनों के बने रहने से बादल या मानसून आकर्षित होता है जिससे वृष्टि की मात्रा बढ़ती है और भूमिगत जल-स्तर ऊँचा होता है।
(iii) वनों और पेड़ों के कारण मरुस्थल का प्रसार रुकता है और पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु अधिक अनुकूल या शीतल और सुहावनी बनती है। इन क्षेत्रों में वन प्राणी और पशुधन को भी प्राकृतिक वातावरण प्राप्त होता है जो उन्हें अच्छा लगता है और उनके लिए अनुकूल है।
(iv) आदिवासियों की यह माँग कि जल, जमीन और जंगलों पर उनका अधिकार हो और विकास के नाम पर विदेशी कम्पनियों और लोगों को अंधाधुंध वृक्षों की कटाई की अनुमति न दी जाए, इससे पर्यावरण संरक्षण में बहुत मदद मिली है। चिपको आंदोलन इन सब सकारात्मक प्रभाव और बिंदुओं से जुड़ा हुआ आंदोलन था।

प्रश्न 3. चिपको आंदोलन क्या था? इस आंदोलन में महिलाओं ने क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर : 1. चिपको आंदोलन का तात्पर्य :(i) चिपको आंदोलन की घटना 1973 में घटी, जब उत्तराखंड के एक गाँव में स्त्री-पुरुष एकजुट हो गए तथा उन्होंने जंगलों की व्यावसायिक कटाई का विरोध किया। गाँवों के लोगों ने पेड़ों को अपनी बाहों में घेर लिया, जिससे उन्हें कटने से बचाया जा सके। विरोध का यह नूतन स्वरूप भारत के पर्यावरण आंदोलन के रूप में परिणत हुआ तथा तमाम दुनिया में ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
(ii) चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के दो-तीन गाँवों से हुई थी। गाँव वालों ने वन विभाग से खेती-बाड़ी के औजार बनाने के लिए पेड़ काटने की इजाजत माँगी । वन विभाग द्वारा इजाजत नहीं दी गई। दूसरी तरफ, वन विभाग द्वारा खेल सामग्री के एक निर्माता को जमीन का वही टुकड़ा व्यावसायिक प्रयोग के लिए दे दिया गया। गाँव वालों ने सरकार के इस कदम का विरोध किया। आंदोलन जंगल की आग की तरह उत्तराखंड के दूसरे इलाकों में भी फैल गया। अब इस तमाम क्षेत्र की पारिस्थितिकी तथा आर्थिक शोषण के गंभीर मुद्दे उठने लगे। गाँव वालों ने माँग की कि जंगल की कटाई का कोई भी ठेका बाहरी व्यक्ति को नहीं दिया जाए। इसके अलावा जल, जंगल तथा जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों का नियंत्रण होना चाहिए।
2.’चिपको आंदोलन’ में महिलाओं की भूमिका
(i) प्रारंभ से ही ‘चिपको आंदोलन में महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी की। यह आंदोलन का एकदम नया पहलू था। इलाके में सक्रिय जंगल कटाई के ठेकेदार यहाँ के पुरुषों को शराब की आपूर्ति का भी व्यवसाय करते थे। महिलाओं ने शराबखोरी की लत के विरुद्ध भी निरंतर आवाज उठाई। इससे आंदोलन का दायरा विस्तृत हुआ और उसमें कुछ और सामाजिक मसले आ जुड़े।
(ii) इस प्रकार चिपको आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की। अब यह लगने लगा कि पारिस्थितिक असंतुलन को समाप्त करने के लिए तथा सामाजिक बुराइयों का खात्मा करने में उनकी भूमिका भी महत्त्वपूर्ण रहेगी। इस प्रकार, चिपको आंदोलन भारत में लोकतंत्र के सशक्त आधार का प्रतीक बन गया।

प्रश्न 4. किन्हीं चार किसान आन्दोलनों का वर्णन करो।

अथवा

भारत में किसानों से संबंधित विभिन्न आंदोलनों का वर्णन करें।

उत्तर : भारत में किसानों से सम्बन्धित चार आंदोलन निम्नलिखित हैं :1.तेभागा आंदोलन (Tebhaga Movement) : भागा आंदोलन 1946-47 में बंगाल में आरंभ हुआ। यह आंदोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों एवं बटाईदारों का संयुक्त प्रयास था। इस आंदोलन का मुख्य कारण सन् 1943 में बंगाल में पड़ा भीषण अकाल था। इस आंदोलन के कारण कई गाँवों में किसान सभा का शासन स्थापित हो गया परन्तु औद्योगिक मजदूर वर्ग और मझोले किसानों के समर्थन के बिना यह शीघ्र ही समाप्त हो गया।
2.तेलंगाना आंदोलन (Telangana Movement) : तेलंगाना आंदोलन हैदराबाद राज्य में 1946 में जागीरदारों द्वारा की जा रही जबरन एवं अत्यधिक वसूली के विरोध में चलाया गया क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन था। यह एक ऐसा आन्दोलन था जिसमें बहुत से किसानों की जानें चली गईं और जिसे दबाने के लिए सेना तक की मदद ली गई। इस आंदोलन में किसानों ने माँग की कि उनके सभी ऋण माफ कर दिए जाएँ परन्तु जमींदारों ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। क्रान्तिकारी किसानों ने पाँच हजार गुरिल्ला सैनिक तैयार किए और जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर दिया। गुरिल्ला सैनिकों ने जमींदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें भगा दिया परन्तु भारत सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर यह आंदोलन समाप्त हो गया।
3.नक्सलवाड़ी आंदोलन (Naxalbari Movement) : सन् 1964 में साम्यवादी दल में फूट पड़ गई। दोनों दलों के संसदीय राजनीति में व्यस्त होने के कारण इन दलों के सक्रिय व संघर्षशील कार्यकर्ता दलों से अलग होकर जन कार्य करने लगे। सन् 1967 में बंगाल में साम्यवादी दल की सरकार बनी। इसी समय दार्जिलिंग में नक्सलवाड़ी नामक स्थान पर किसानों ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि पश्चिम बंगाल की सरकार ने इसे दबा दिया परन्तु इस आंदोलन की प्रतिक्रिया पंजाब, उत्तर प्रदेश और कश्मीर में भी हुई। इससे नक्सलवाड़ी आंदोलन का विरोध किया गया। फलस्वरूप मई, 1967 में भारी हिंसक घटनाएँ हुईं। यह आंदोलन तेजी से राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया। केन्द्र सरकार का ध्यान इस तरफ आकर्षित हुआ क्योंकि सन् 1968 के बाद यह किसानों का मुख्य हिंसक विद्रोह था।
4.आधुनिक आंदोलन (Modern Movement) : अपने हितों की रक्षा के लिए किसान समय-समय पर आंदोलन करते रहे हैं। पिछले कई वर्षों से कपास के दामों में कमी होने के कारण कपास उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब आदि के किसानों में असंतोष भर गया। मार्च, 1987 में गुजरात के किसानों ने अपनी माँगें मनवाने के लिए विधानसभा का घेराव करने की योजना बनाई। सरकार ने गुजरात विधानसभा (गाँधी नगर) की किलेबन्दी कर दी। पुलिस ने किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार किए और किसानों ने पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध ग्रामबंद की अपील की। इसके कारण गुजरात के अनेक शहरों में दूध और सब्जी की समस्या कई दिनों तक रही। इसी प्रकार बिहार एवं झारखंड में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) तथा आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) जैसे उग्रवादी संगठन हिंसक गतिविधियों में लिप्त हैं।

प्रश्न 5. सूचना के अधिकार से संबंधित आंदोलन की पूरी यात्रा का वर्णन कीजिए जिसका समापन एक अधिनियम के रूप में हुआ अर्थात् ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005’।उत्तर : सूचना के अधिकार का आंदोलन जन आंदोलनों की सफलता का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। यह आंदोलन सरकार से एक बड़ी माँग को पूरा कराने में सफल रहा है। इस आंदोलन की शुरुआत 1990 में हुई और इसका नेतृत्व किया मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने। राजस्थान में काम कर रहे इस संगठन ने सरकार के सामने यह माँग रखी कि अकाल राहत कार्य और मजदूरों को दी जाने वाली पगार के रिकॉर्ड का सार्वजनिक खुलासा किया जाए। यह माँग राजस्थान के एक बेहद पिछड़े इलाके -भीम तहसील में सबसे पहले उठाई गई थी। इस मुहिम के तहत ग्रामीणों ने प्रशासन से अपने वेतन और भुगतान के बिल उपलब्ध कराने को कहा। दरअसल, इन लोगों को लग रहा था कि स्कूलों, डिस्पेंसरी, छोटे बाँधों तथा सामुदायिक केंद्रों के निर्माण कार्य के दौरान उन्हें दी गई मजदूरी में भारी घपला हुआ है। कहने के लिए ये विकास परियोजनाएँ पूरी हो गई थीं लेकिन लोगों को मानना था कि सारे काम में धन की हेराफेरी हुई है। पहले 1994 और उसके बाद 1996 में मजदूर किसान शक्ति संगठन ने जन सुनवाई का आयोजन किया और प्रशासन को इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा।
आंदोलन के दबाव में सरकार को राजस्थान पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करना पड़ा। नए कानून के तहत जनता को पंचायत के दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने की अनुमति मिल गई। संशोधन के बाद पंचायतों के लिए बजट, लेखा, खर्च, नीतियों और लाभार्थियों के बारे में सार्वजनिक घोषणा करना अनिवार्य कर दिया गया। अब पंचायतों को इन मदों के बारे में नोटिस बोर्ड या अखबारों में सूचना देनी होती है। 1996 में एमकेएसएस ने दिल्ली में सूचना के अधिकार को लेकर राष्ट्रीय समिति का गठन किया। इस कार्रवाई का लक्ष्य सूचना के अधिकार को राष्ट्रीय अभियान का रूप देना था। इससे पहले, कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर (उपभोक्ता शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र), प्रेस काउंसिल तथा शौरी समिति ने सूचना के अधिकार का एक मसौदा तैयार किया था। 2002 में ‘सूचना की स्वतंत्रता’ नाम का एक विधेयक पारित हुआ था। यह एक कमजोर अधिनियम था और इसे अमल में नहीं लाया गया। सन् 2005 में अधिकार के विधेयक को सदन में रखा गया। जून 2005 में विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल हुई।

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