Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 8 Important Question Answer 3 Marks क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 1. क्षेत्रीय असंतुलन का क्या अर्थ है ?
उत्तर : क्षेत्रीय असंतुलन का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों का विकास एक जैसा नहीं है। कुछ राज्यों का आर्थिक विकास बहुत अधिक हुआ है और वहाँ के लोगों का जीवन स्तर भी ऊँचा है जबकि कुछ राज्यों का विकास बहुत कम हुआ है तथा वहाँ के लोगों का जीवन स्तर भी बहुत निम्न स्तर का है। भारत के भिन्न क्षेत्रों के विकास स्तर और लोगों के जीवन स्तर में पाए जाने वाले अंतर को क्षेत्रीय असंतुलन का नाम दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल आदि राज्य अत्यधिक विकसित हैं जबकि बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि अति पिछड़े हुए क्षेत्र हैं। भारत की भौगोलिक विषमताओं ने क्षेत्रीय असंतुलन पैदा किया है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत में एक ओर राजस्थान जैसा मरुस्थल है जो कम उपजाऊ है तो दूसरी ओर पंजाब जैसे उपजाऊ क्षेत्र हैं। भाषा की विभिन्नता भी क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 2. ‘क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रति भारत सरकार का नजरिया’ विषय पर एक टिप्पणी लिखिए।

अथवा

क्षेत्रवाद के प्रति भारत सरकार के दृष्टिकोण पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर : क्षेत्रीय आकांक्षाओं अथवा क्षेत्रवाद के प्रति भारत सरकार का नजरिया (या दृष्टिकोण) (Outlook of Government of India about Regional Aspirations or Regionalism) : भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक . दृष्टिकोण अपनाया। लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति की अनुमति है और लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता। इसके अतिरिक्त लोकतांत्रिक राजनीति में इस बात के पूरे अवसर होते हैं कि विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों की भावनाओं की नुमाइंदगी करें। इस तरह लोकतांत्रिक राजनीति की प्रक्रिया में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और बलवती होती हैं। साथ ही लोकतांत्रिक राजनीति का एक अर्थ यह भी है कि क्षेत्रीय मुद्दों और समस्याओं पर नीति निर्माण की प्रक्रिया में समुचित ध्यान दिया जाएगा और उन्हें इसमें भागीदारी दी जाएगी। ऐसी व्यवस्था में कभी-कभी तनाव या परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। कभी ऐसा भी हो सकता है कि राष्ट्रीय एकता के सरोकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं और ज़रूरतों पर भारी पड़ें। कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है कि क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूँद ले। जो राष्ट्र चाहते हैं कि विविधताओं का सम्मान हो साथ ही राष्ट्र की एकता भी बनी रहे। वहाँ क्षेत्रीय ताकतों, उनके अधिकार और अलग अस्तित्व के मामले पर राजनीतिक संघर्ष का होना एक आम बात है।

प्रश्न 3. भारतीय संविधान के कौन से कदम एवं व्यवस्थाएँ क्षेत्रीय आकांक्षाओं को शांत करने एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता को बनाए रखने के अनुकूल बनाती हैं?
उत्तर : 1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं के मामलों से हमें अपने संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि का पता चलता है। वे विभिन्नताओं से निपटने को लेकर अत्यंत सजग थे। हमारे संविधान के प्रावधान इस बात के साक्ष्य हैं। भारत ने जो संघीय प्रणाली अपनायी है वह बहुत लचीली है। अगर अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं तो जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए हैं।
2.संविधान की छठी अनुसूची में विभिन्न जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियमों को संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता दी गई है। पूर्वोत्तर की कुछ जटिल राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने में ये प्रावधान बड़े निर्णायक साबित हुए। भारत का संवैधानिक ढाँचा ज्यादा लचीला और सर्वसमावेशी है। जिस तरह से चुनौतियाँ भारत में आयीं वैसी कुछ दूसरे देशों में भी आयी लेकिन भारत का संवैधानिक ढाँचा अन्य देशों के मुकाबले भारत को विशिष्ट बनाता है।
क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला। भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।

प्रश्न 4. जम्मू-कश्मीर की 1948 से 1986 के मध्य राजनीति से जुड़ी प्रमुख घटनाओं की चर्चा कीजिए |

अथवा

जम्मू-कश्मीर राज्य की राजनैतिक घटना पर शेख अब्दुल्ला की भूमिका पर प्रकाश डालो।
उत्तर : जम्मू-कश्मीर में 1948 के उपरांत तथा 1952 तक की राजनीति : प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार की बड़ी मुहिम चलायी। उन्होंने इसके साथ-साथ जन-कल्याण की कुछ नीतियाँ भी लागू कीं। इन सबसे यहाँ की जनता को फायदा हुआ। बहरहाल कश्मीर की हैसियत को लेकर शेख अब्दुल्ला के विचार केंद्र सरकार से मेल नहीं खाते थे। इससे दोनों के बीच मतभेद पैदा हुआ।
शेख अब्दुल्ला की बर्खास्तगी एवं चुनाव : 1953 में शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त कर दिया गया। एक साल तक उन्हें नजरबंद रखा गया। शेख अब्दुल्ला के बाद जो नेता सत्तासीन हुए, वे शेख की तरह लोकप्रिय नहीं थे। केंद्र के समर्थन के दम पर ही वे राज्य शासन चला सके। राज्य में हुए विभिन्न चुनावों में धाँधली और गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगे।
जम्मू-कश्मीर में 1953 से 1977 तक की राजनीतिक घटनाएँ :
(क) 1953 से लेकर 1974 के बीच अधिकांश समय इस राज्य की राजनीति पर कांग्रेस का असर रहा। विभाजित हो चुकी नेशनल कांफ्रेंस (शेख अब्दुल्ला के बिना) कांग्रेस के समर्थन से राज्य में कुछ समय तक सत्तासीन रही लेकिन बाद में वह कांग्रेस में मिल गई। इस तरह राज्य की सत्ता सीधे कांग्रेस के नियंत्रण में आ गई। इस बीच शेख अब्दुल्ला और भारत सरकार के बीच सुलह की कोशिश जारी रही।
(ख) अंतत: 1974 में इंदिरा गाँधी के साथ शेख अब्दुल्ला ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और वे राज्य के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने नेशनल कांफ्रेंस को फिर से खड़ा किया और 1977 के राज्य विधानसभा के चुनाव में बहुमत से निर्वाचित हुए।
जम्मू-कश्मीर फारुख अब्दुल्ला के प्रथम कार्यकाल में (1982-1986 ) : सन् 1982 में शेख अब्दुल्ला की मृत्यु हो गई। और नेशनल कांफ्रेंस के नेतृत्व की कमान उनके पुत्र फारुख अब्दुल्ला ने संभाली। फारुख अब्दुल्ला भी मुख्यमंत्री बने। बहरहाल, राज्यपाल ने जल्दी ही उन्हें बर्खास्त कर दिया और नेशनल कांफ्रेंस से एक टूटे हुए गुट ने थोड़े समय के लिए राज्य की सत्ता संभाली।
केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से फारुख अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त किया गया था। इससे कश्मीर में नाराजगी का भाव पैदा हुआ। शेख अब्दुल्ला और इंदिरा गाँधी के बीच हुए समझौते से राज्य के लोगों का लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास जमा था। फारूख अब्दुल्ला की सरकार की बर्खास्तगी से इस विश्वास को धक्का लगा। 1986 में नेशनल कांफ्रेंस ने केंद्र में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया। इससे भी लोगों को लगा कि केंद्र राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है।

प्रश्न 5. भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय माँगों से ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क दीजिए।
उत्तर : यह कथन कि भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय माँगों से ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है, उचित है।
(i) भारतीय संविधान द्वारा विविधता के बुनियादी सिद्धांत को स्वीकार किया गया है कि भारत में विभिन्न क्षेत्र और भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का अधिकार होगा। भारत में सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र के लिए खतरा नहीं माना गया। इसलिए क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है।
(ii) लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र विरोधी नहीं मानता। इसलिए भारत में विभिन्न दल और समूह क्षेत्रीय पहचान, आकांक्षा अथवा किसी खास क्षेत्रीय समस्या को आधार बनाकर लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत में क्षेत्रीय माँगों में जम्मू-कश्मीर बहुलवादी समाज और राजनीति का जीवंत उदाहरण है।
(iii) राज्य में विभिन्नताओं और उसके अनुकूल राजनीतिक आकांक्षाओं के मध्य राज्य की बहुलतावादी धर्मनिरपेक्ष संस्कृति अधिकांशतः अक्षुण्ण बनी हुई है।
(iv) पंजाब में भी यद्यपि धार्मिक पहचान जनता के लिए प्रमुख है परंतु राजनीति धर्मनिरपेक्षता की राह पर चल रही है।
(v) इसके अतिरिक्त संविधान में एक लचीली संघीय प्रणाली अपनाकर कुछ राज्यों, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विशेष प्रावधान है जिसके फलस्वरूप विभिन्न क्षेत्रीय मांगों को पूरा करने का प्रयत्न किया गया है; जैसे असम के करबी, दिमसा समुदायों के लिए जिला परिषद् और बोडो जनजाति के स्वायत्त परिषद् का प्रावधान किया गया है। यह सब विविधता में एकता के प्रमाण हैं।

प्रश्न 6. भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में बढ़ती राजनीतिक हिंसा की व्याख्या कीजिए।

अथवा

पूर्वोत्तर राज्यों-मिजोरम और नागालैंड में अलगाववादी आंदोलन का वर्णन कीजिए।
उत्तर : भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में राजनीतिक हिंसा के कारण :
(क) स्वायत्तता की माँग :
(i) आजादी के वक्त मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़ दें तो यह पूरा इलाका असम कहलाता था।
(ii) गैर-असमी लोगों को जब लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस इलाके से राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठी। पूरे राज्य में असमी भाषा को लादने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए।
(iii) बोड़ो जनजाति समुदाय के नेता असम से अलग होना चाहते थे। इन लोगों ने ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ का गठन किया जो 1960 में कहीं ज्यादा व्यापक ‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ में तबदील हो गया। इन नेताओं की माँग थी कि असम से अलग एक जनजातीय राज्य बनाया जाए।
(iv) आखिरकार एक जनजातीय राज्य की जगह असम को काटकर कई जनजातीय राज्य बने।
(ख) अलगाववादी आंदोलन :
(i) आजादी के बाद मिजो पर्वतीय क्षेत्र को असम के भीतर ही एक स्वायत्त जिला बना दिया गया था। 1959 में मिजो पर्वतीय इलाके में भारी अकाल पड़ा। असम की सरकार इस अकाल में समुचित प्रबंध करने में नाकाम रही।
(ii) मिजो लोगों ने लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट बनाया। 1966 में मिजो नेशनल फ्रंट ने आजादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया। दो दशकों तक चली बगावत में हर पक्ष को हानि उठानी पड़ी। इसी बात को भाँपकर दोनों पक्ष के नेतृत्व ने समझदारी से काम लिया।
(iii) पाकिस्तान में निर्वासित जीवन जी रहे लालडेंगा भारत आए और उन्होंने भारत सरकार के साथ बातचीत शुरू की। राजीव गाँधी ने इस बातचीत को एक सकारात्मक समाधान तक पहुँचाया।
(iv) नागालैंड की कहानी भी मिजोरम की तरह है लेकिन नागालैंड का अलगाववादी आंदोलन ज्यादा पुराना है और अभी इसका मिजोरम की तरह खुशगवार हल नहीं निकल पाया है।
(ग) बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन : पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर अप्रवासी आए हैं। इससे एक खास समस्या पैदा हुई है। स्थानीय जनता इन्हें ‘बाहरी’ समझती है और ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ उसके मन में गुस्सा है। भारत के दूसरे राज्यों अथवा किसी अन्य देश से आए लोगों को यहाँ की जनता रोजगार के अवसरों और राजनीतिक सत्ता के एतबार से एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती है। स्थानीय लोग बाहर से आए लोगों के बारे में मानते हैं लोग यहाँ की जमीन हथिया रहे हैं। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इस मसले ने राजनीतिक रंग ले लिया है और कभी-कभी इन बातों के कारण हिंसक घटनाएँ भी होती हैं।

प्रश्न 7. लालडेंगा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

अथवा

मिजोरम के नेता लालडेंगा का परिचय दीजिए।
उत्तर : लालडेंगा का जन्म 1937 में हुआ। वह मिजो नेशनल फ्रंट के संस्थापक और एक ख्याति प्राप्त नेता थे। 1959 में मिजोरम में पड़े भयंकर अकाल और उस समय की असम सरकार द्वारा उस समय के अकाल की समस्या के समाधान में विफल होने के कारण वे देश-विद्रोही बन गए। वे अनेक वर्षों तक भारत के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करते रहे। यह संघर्ष लगभग बीस वर्षों तक चला। वे पाकिस्तान में एक राज्य शरणार्थी के रूप में रहते हुए भी भारत विरोधी गतिविधियाँ चलाते रहे। अंत में वे प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के बुलाने पर स्वदेश लौटे और 1986 में राजीव गाँधी के साथ उन्होंने सुलह की और दोनों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और मिजोरम को नया राज्य बनाया गया। लालडेंगा नवनिर्मित मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री बने। 1990 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 8. कश्मीर में राजनीतिक संकट को और गंभीर बनाने में अलगाववादियों तथा बगावत के तेवर दिखने वालों की भूमिका का वर्णन कीजिए |
उत्तर : अलगाववादियों तथा बगावत के तेवर :
1.1989 से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों का एक तबका कश्मीर को अलग राष्ट्र बनाना चाहता है। यानी एक ऐसा कश्मीर जो न पाकिस्तान का हिस्सा हो और न भारत का ।
2. कुछ अलगाववादी समूह चाहते हैं कि कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो जाए, जिससे वह भारत से अलग कर दिया जाए।
3. अलगाववादी राजनीति की एक तीसरी धारा भी है। इस धारा समर्थक चाहते हैं कि कश्मीर भारत संघ का ही हिस्सा रहे लेकिन उसे और स्वायतत्ता दी जाये। स्वायतत्ता की बात जम्मू-और लद्दाख *लोगों को अलग-अलग ढंग से लुभाती है। इस क्षेत्र के लोगों की एक आम शिकायत उपेक्षा भरे बरताव और पिछड़ेपन को लेकर है। इस वजह से पूरे राज्य की स्वायतत्ता की माँग जितनी प्रबल है उतनी ही प्रबल माँग इस राज्य के विभिन्न भागों में अपनी-अपनी स्वायतत्ता को लेकर है।

प्रश्न 9. जम्मू तथा कश्मीर की सामाजिक तथा राजनीतिक संरचना क्या है ? जम्मू तथा कश्मीर की समस्या की उन मूल जड़ों का वर्णन कीजिए जिनके कारण भारत सरकार को यहाँ की स्वायत्तता बनाए रखने के लिए बाध्य होना पड़ा।
उत्तर : जम्मू तथा कश्मीर की सामाजिक तथा राजनीतिक संरचना : जम्मू एवं कश्मीर में तीन राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र शामिल हैं : जम्मू, कश्मीर और लद्दाख । कश्मीर घाटी को कश्मीर का दिल कहा जाता है तथा जम्मू क्षेत्र पहाड़ी तलहटी एवं मैदानी इलाकों का मिश्रण है। लद्दाख पर्वतीय इलाका है।
समस्या की मूल जड़ें : अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठियों को अपनी तरफ से कश्मीर पर कब्जा करने भेजा। ऐसे में कश्मीर के महाराजा भारतीय सेना से मदद माँगने को मजबूर हुए। भारत ने सैन्य मदद उपलब्ध कराई और कश्मीर घाटी से घुसपैठियों को खदेड़ा। इससे पहले भारत सरकार महाराजा से भारत संघ में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए। इस पर भी सहमति जताई गई कि स्थिति सामान्य होने पर जम्मू-कश्मीर की नियति का फैसला जनमत सर्वेक्षण के द्वारा होगा। मार्च 1948 में शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री बने (राज्य में सरकार के मुखिया को तब प्रधानमंत्री कहा जाता था)। भारत, जम्मू एवं कश्मीर की स्वायत्तता को बनाए रखने पर सहमत हो गया। इसे संविधान में धारा 370 का प्रावधान करके संवैधानिक दर्जा गया।

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