Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 8 Important Question Answer 8 Marks क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 1.जुलाई, 1985 में राजीव गाँधी- लोंगोवाल समझौते का मुख्य परिणाम क्या था?

अथवा

राजीव गाँधी- लोंगोवाल समझौते पर एक टिप्पणी लिखो।
उत्तर : जुलाई, 1985 में राजीव गाँधी- लोंगोवाल समझौते के मुख्य परिणाम निम्नलिखित थे :
(i) 1984 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में सत्ता में आने पर नए प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत की शुरुआत की। अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष जुलाई, 1985 में राजीव गाँधी- लोंगोवाल समझौते के मुख्य परिणाम निम्नलिखित थे :
(ii) समझौता पंजाब में अमन कायम करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इस बात पर सहमति हुई कि चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा और पंजाब तथा हरियाणा के बीच सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी। समझौते में यह भी तय हुआ कि पंजाब-हरियाणा- राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे के बारे में फैसला करने के लिए एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) बैठाया जाएगा।
(iii) समझौते के अंतर्गत सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई। साथ ही, पंजाब से विशेष सुरक्षा वाले अधिनियम को वापस लेने की बात पर भी सहमति हुई।
(iv) जो भी हो, पंजाब में अमन न तो आसानी से कायम हुआ और न ही समझौते के तत्काल बाद । हिंसा का चक्र लगभग एक दशक तक चलता रहा। उग्रवादी हिंसा और इस हिंसा को दबाने के लिए की गई कार्यवाहियों में मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ। साथ ही, पुलिस की ओर से भी ज्यादती हुई। राजनीतिक रूप से देखें तो घटनाओं के इस चक्र में अकाली दल बिखर गया। केंद्र सरकार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। इससे राज्य में सामान्य राजनीतिक तथा चुनावी प्रक्रिया बाधित हुई। संशय और हिंसा से भरे माहौल में राजनीतिक प्रक्रिया को फिर से पटरी पर लाना आसान नहीं था।

प्रश्न 2. उन आंतरिक एवं बाह्य विवादों का वर्णन कीजिए जो जम्मू तथा कश्मीर की राजनीति को निरंतर विवादास्पद बनाए रखने के लिए उत्तरदायी हैं।
उत्तर : आंतरिक एवं बाह्य विवाद : जम्मू-कश्मीर समस्या के बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार के कारण हैं, जो कि निम्नलिखित हैं :
1.बाहरी कारण पाकिस्तान का दृष्टिकोण है जिसने हमेशा कश्मीर घाटी को पाकिस्तान का भाग होने का दावा किया है। इसलिए पाकिस्तान ने 1947 में कबायली हमला करवाया और कश्मीर के एक भाग पर नियंत्रण कर लिया। यह भाग आज भी तनाव का कारण है।
2.आंतरिक रूप से निम्नलिखित विवाद हैं :
धारा 370 के विषय में विवाद है। एक वर्ग इसे समाप्त करके जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों की तरह का दर्जा देना चाहता है, तो दूसरा वर्ग, जो कश्मीरियों का है, जहाँ जनमत संग्रह करवाना, राज्य को अधिक स्वायत्तता प्रदान करना और जम्मू-कश्मीर में अन्य राज्यों की तरह संस्थागत लोकतांत्रिक प्रणाली को लागू करवाना चाहता है। उनके अनुसार धारा 370 के अंतर्गत प्रदान किया गया दर्जा पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
इस प्रकार जम्मू-कश्मीर समस्या जटिल बनी हुई हैं और इसका समाधान करने के प्रयत्न असफल रहे हैं।

प्रश्न 3. ” भारत की स्वतंत्रता के छः दशकों के बाद भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याएँ अभी तक पूर्ण रूप से हल नहीं हुई हैं। इन समस्याओं को हल करने के लिए कोई तीन उपाय सुझाइए।

अथवा

” स्वतंत्रता प्राप्ति के 66 वर्ष बीत जाने के बाद भी राष्ट्रीय अखंडता से संबद्ध कुछ मुद्दे हल नहीं हो पा है” – ऐसे किन्हीं तीन मुद्दों को बताइए जो अभी तक हल नहीं हो पाए हैं।
उत्तर : भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याओं को हल करने के तीन उपाय निम्नलिखित हैं
(i) लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका सर्वश्रेष्ठ : हमारे देश भारत की क्षेत्रीय आकांक्षाओं के इतिहास का दूसरा अध्याय यह है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है। जरा अस्सी के दशक की तरफ नजर दौड़ाएँ, पंजाब में उग्रवाद का जोर था; पूर्वोत्तर में समस्याएँ बनी हुई थीं; असम के छात्र आंदोलन कर रहे थे और कश्मीर घाटी में माहौल अशांत था। इन मसलों को सरकार ने कानून-व्यवस्था की गड़बड़ी का साधारण मामला न मानकर पूरी गंभीरता दिखाई। बातचीत के जरिए सरकार ने क्षेत्रीय आंदोलनों के साथ समझौता किया। इससे सौहार्द का माहौल बना और कई क्षेत्रों में तनाव कम हुआ। मिजोरम के उदाहरण से पता चलता है कि राजनीतिक सुलह के जरिए अलगाववाद की समस्या से बड़े कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।(ii) राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों को वजन दिया जाए: क्षेत्रीय आकांक्षाओं के इतिहास से तीसरा सबक है सत्ता की साझेदारी के महत्त्व को समझना। सिर्फ लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना ही काफी नहीं है। इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केंद्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना भी जरूरी है। ठीक इसी तरह यह कहना भी नाकाफी है कि किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र को उसके मामलों में स्वायत्तता दी गई है। क्षेत्रों को मिलाकर ही पूरा देश बनता है। इसी कारण देश की नीति के निर्धारण में क्षेत्रों की बातों को वजन दिया जाना चाहिए। यदि राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों को वजन नहीं दिया गया तो उनमें अन्याय और अलगाव का बोध पनपेगा।
(iii) आर्थिक असमानता को प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र से शीघ्र समाप्त किया जाए: चौथा सबक यह है कि आर्थिक विकास के एतबार से अलग विभिन्न इलाकों के बीच असमानता हुई तो पिछड़े क्षेत्रों को लगेगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। भारत में आर्थिक विकास की प्रक्रिया का एक तथ्य क्षेत्रीय असंतुलन भी है। ऐसे में स्वाभाविक है कि पिछड़े प्रदेशों अथवा कुछ प्रदेशों के पिछड़े इलाकों को लगे कि उनके पिछड़ेपन को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए। वे यह भी कह सकते हैं कि भारत सरकार ने जो नीतियाँ अपनायी हैं, उसी के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय असंतुलन पैदा हुआ है। अगर कुछ राज्य गरीब रहें और बाकी तेजी से प्रगति करें तो क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा। साथ ही अंतःप्रांतीय अथवा अंतःक्षेत्रीय आप्रवास में भी बढ़ोत्तरी होगी।

प्रश्न 4. “ क्षेत्रीय आंदोलन भारतीय लोकतंत्र” पर सफल प्रभाव डालते है, कैसे ? अपने उत्तर की पुष्टि के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर : भारत में संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई है। भारत में 28 राज्य और 7 संघीय क्षेत्र हैं। क्षेत्रीय असंतुलन का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों का विकास एक जैसा नहीं है। कुछ राज्यों का आर्थिक विकास बहुत अधिक हुआ हैं और वहाँ के लोगों का जीवन स्तर भी बहुत ऊँचा है जबकि कुछ राज्यों का विकास बहुत कम हुआ है तथा वहाँ के लोगों का जीवन स्तर भी निम्न स्तर का है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के विकास स्तर और लोगों के जीवन स्तर में पाये जाने वाले अन्तर को क्षेत्रीय असन्तुलन का नाम दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल आदि राज्य अत्यधिक विकसित हैं जबकि बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि अति पिछड़े हुए क्षेत्र हैं। क्षेत्रीय असंतुलन भारतीय लोकतन्त्र की भावना पर मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रभाव डाल रहा है:
(1) पिछड़े क्षेत्रों के लोगों में असन्तुष्टता की भावना बड़ी तेजी से बढ़ रही है और ऐसे क्षेत्रों के लोगों का यह सोचना है कि उनके पिछड़ेपन के लिए सरकार जिम्मेदार है। यह काफी हद तक उचित प्रतीत होता है।
(2) क्षेत्रीय असंतुलन से लोगों में क्षेत्रवाद की भावना उत्पन्न हो रही है। क्षेत्रवाद ने पृथकतावाद की भावना को जन्म दिया है।
(3) क्षेत्रीय असन्तुलन ने अनेक क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया है और ये दल राष्ट्र की अपेक्षा अपने क्षेत्र के हित को अधिक महत्त्व देते हैं।
(4) क्षेत्रीय असंतुलन के कारण कई क्षेत्रों में आतंकवाद का उदय हुआ है। आतंकवाद ने हमारे लोकतंत्र को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

प्रश्न 5. भारत की स्वतंत्रता से लेकर सिक्किम के भारत में विलय तक की कहानी का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. आजादी के समय सिक्किम को भारत की ‘शरणागति’ प्राप्त थी। इसका मतलब यह कि तब सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था लेकिन वह पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था। सिक्किम की रक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा भारत सरकार का था जबकि सिक्किम के आंतरिक प्रशासन की बागडोर यहाँ के राजा चोग्याल के हाथों में थी। यह व्यवस्था कारगर साबित नहीं हो पायी क्योंकि सिक्किम के राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके।
2.सिक्किम की आबादी में एक बड़ा हिस्सा नेपालियों का था । नेपाली मूल की जनता के मन में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेपचां-भूटिया के एक छोटे-से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। चोग्याल विरोधी दोनों समुदाय के नेताओं ने भारत सरकार से मदद माँगी और भारत सरकार का समर्थन हासिल किया।
3.सिक्किम विधानसभा के लिए पहला लोकतांत्रिक चुनाव 1974 में हुआ और इसमें सिक्किम कांग्रेस को भारी विजय मिली। यह पार्टी सिक्किम को भारत के साथ जोड़ने के पक्ष में थीं सिक्किम विधानसभा ने पहले भारत के ‘सह-प्रांत’ बनने की कोशिश की और इसके बाद 1975 के अप्रैल में एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में भारत के साथ सिक्किम के पूर्ण विलय की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव के तुरंत बाद सिक्किम में जनमत संग्रह कराय गया और जनमत संग्रह में जनता ने विधानसभा के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी ।
4.भारत सरकार ने सिक्किम विधानसभा के अनुरोध को तत्काल मान लिया और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया। चोग्याल ने इस फैसले को नहीं माना और उसके समर्थकों ने भार सरकार पर साजिश रचने तथा बल प्रयोग करने का आरोप लगाया। बहरहाल, भारत संघ में सिक्किम के विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था। इस कारण यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदीकारी मुद्दा न बन सका।

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