8 अंकीय प्रश्न उत्तर – भारतीय राजनीति : नए बदलाव Class12th Political Science Chapter 9

Class 12th Political Science भाग-2 Chapter 9 Important Question Answer 8 Marks भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 1. गठबंधन की राजनीति किसे कहते हैं ? इसने भारत की राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया?

अथवा

गठबंधन की राजनीति का हमारे लोकतन्त्र पर क्या असर हुआ ?
उत्तर : गठबंधन की राजनीति : वह राजनीति जिसमें चुनाव के पहले अथवा बाद में आवश्यकतानुसार दलों में सरकार के गठन या किसी अन्य मामले (जैसे राष्ट्रपति चुनाव) में आपसी सहमति बन जाए और वे सामान्यतः एक स्वीकृत न्यूनतम साझे कार्यक्रम के अनुसार देश में राजनीति चलाएँ (विरोधी दल के रूप में या सत्ताधारी गुट के रूप में) तो इसे गठबंधन की राजनीति कहते हैं।
(i) वी.पी. सिंह एवं चंद्रशेखर द्वारा संयुक्त मोर्चा सरकारें गठबंधन राजनीति के अच्छे उदाहरण हैं।
(ii) अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठित राजग तथा सोनिया गाँधी के नेतृत्व में गठित यू.पी.ए. गुट गठबंधन की राजनीति को स्पष्ट करते हैं ।
भारत की राजनीति पर गठबंधन की राजनीति का प्रभाव : (i) 1989 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार हुई थी पर कांग्रेस अब भी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन बहुमत में न होने के कारण उसने विपक्ष में बैठने का फैसला किया। राष्ट्रीय मोर्चा (National Front) (यह मोर्चा जनता दल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बनाया गया) को परस्पर विरुद्ध दो राजनीतिक समूहों-भाजपा और वाम मोर्चे-ने समर्थन दिया।
(ii) कांग्रेस की हार के साथ भारत के इस प्रमुख दल के प्रभुत्व का युग समाप्त हो गया। इस दौर में बहुदलीय शा प्रणाली का युग शुरू हुआ। 1989 के बाद लोकसभा के चुनावों में कभी भी किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इस बदलाव के साथ केन्द्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ और
क्षेत्रीय पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(iii) गठबंधन की राजनीति में साझे कार्यक्रम के प्रति आ सहमति देखी गई है। नब्बे का दशक ताकतवर पार्टियों और आन्दोलन के उभार का साक्षी रहा। इन पार्टियों और आन्दोलनों ने दलित तथा पिछड़ा वर्ग (अन्य पिछड़ा वर्ग या ओबीसी) की नुमाइंदगी की। इन दलों में से अनेक ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं की भी दमदार दावेदारी की। 1999 में बने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार में इन पार्टियों ने अहम किरदार निभाया।
(iv) गठबंधन की राजनीति अब भारत की राजनीतिक प्रणाली का अहम अंग बन चुकी है। केन्द्र के साथ-साथ अब राज्यों में भी गठबंधन सरकारें काम कर रही हैं। क्षेत्रीय पार्टियों के उभरने से अब किसी भी बड़ी राष्ट्रीय पाटी को अकेले बहुमत प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। अतः गठबंधन करना राजनीतिक विवशता बन गई है। इसके कई नकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। गठबंधन में शामिल एक-दो सदस्यों वाले दल भी सत्तासीन दल को अपने हितों की पूर्ति के लिए ब्लैकमेल करते रहते हैं।

प्रश्न 4. 1990 के पश्चात् भारत में किन्हीं दो प्रमुख बदलावों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : भारतीय राजनीति में 1990 के बाद निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन आए हैं :
(i) केंद्रीय स्तर पर गठबंधन सरकारों का युग प्रारम्भ हुआ है।
(ii) अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर देश के अधिकांश दलों के मध्य आम सहमति उभर रही है।
(iii) आर्थिक क्षेत्र में वैश्वीकरण, उदारीकरण और नई आर्थिक नीति को अपनाने जैसे बदलाव बड़े पैमाने पर देखे जा रहे हैं।
1.गठबंधन राजनीति : वह राजनीति जिसमें चुनाव के पहले अथवा बाद में आवश्यकतानुसार दलों में सरकार के गठन या किसी अन्य मामले (जैसे राष्ट्रपति चुनाव में आपसी सहमति बन जाए और वे सामान्यतः एक स्वीकृत न्यूनतम साझे कार्यक्रम के अनुसार देश में राजनीति चलाएँ (विरोधी दल के रूप में या सत्ताधारी के गुट के रूप में) तो इसे गठबंधन की राजनीति कहते हैं।
1990 के बाद गठबंधन की राजनीति भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर छा गई। बाद के वर्षों में बड़े दलों ने स्वयं ही गठबंधन बनाए और सरकारें चलाईं। आज गठबंधन सरकारों का युग है। एक पार्टी के प्रभुत्व के दिन अब लद गए।
2.बढ़ती सहमति : एक अन्य महत्त्वपूर्ण बदलाव अनेक महत्त्वपूर्ण मसलों पर अधिकतर दलों के बीच एक व्यापक सहमति है। कड़े मुकाबले और बहुत से संघर्षों के बावजूद अधिकतर दलों के बीच एक सहमति उभरती सी जान पड़ रही है। इस सहमति में चार बातें हैं
(i) नई आर्थिक नीति पर सहमति |
(ii) पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे की स्वीकृति।
(iii) देश के शासन में प्रान्तीय दलों की भूमिका की स्वीकृति ।
(iv) विचारधारात्मक पक्ष की जगह कार्यसिद्धि पर जोर और विचाराधारा सहमति के बिना राजनीतिक गठजोड़

प्रश्न 5. 1989 में कठिन मुकाबले और अनेकों संघर्षो के बावजूद, मुख्य दलों के बीच एक सहमति उभरती जान पड़ रही है। इस सहमति के किन्हीं तीन बिंदुओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1989 में कठिन मुकाबले और अनेकों संघर्षों के बावजूद, मुख्य दलों के बीच एक सहमति उभरती जान पड़ रही। थी। इस सहमति के तीन बिन्दु निम्नलिखित हैं :
भारत के केन्द्र तथा लगभग सभी राज्यों से गठबंधन सरकार बनने का सहज पुनरावलोकन करने मात्र से यह संकेत मिल जाता है कि जनादेश के खण्डित अवस्था में प्राप्त होने पर भी राजनैतिक दलों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा और परस्पर तन-धन और युक्ति की टक्कर होती रहती है। यह टक्कर दलों के भीतर और बाहर दोनों परिवेशों में अबाध चलती रहती है। इतना होने पर भी लगभग सभी राजनैतिक दलों में आम सहमति सी बनती दिखाई देती है। हम इस सम्मति के बनने से संबंधित तीन घटक या कारणों का निम्नवत उल्लेख करना चाहेंगे-
(i) विचारधारा की असम्मति को दरकिनार करके राजनैतिक गठबंधन बनाना और प्रत्यक्ष लाभ / अनुलाभ पर विशेष ध्यान दिया जाना : हम देखते हैं कि गठबंधन के भागीदार या साझेदार धारणा, सिद्धांत और विचारधारा को तिलांजलि देकर सत्ता में हिस्सेदारी पाने की ओर विशेष लालायित रहते हैं। प्रत्येक दल या भागीदार अपने दलों के संकल्प और सिद्धान्तों को भी दर किनार करके सत्ता में किसी तरह अपना हिस्सा पाने को उतावला रहता है । दल भी इस बात को समझते हैं कि यदि उनके दो सदस्य भी सत्ता में हिस्सेदारी पा लेते हैं तो उस दशा की तुलना में वह अपने स्वार्थों को आसानी से भुना सकते हैं जब उनका कोई भी सदस्य सत्ता में भागीदार नहीं बन पाता। अतः प्रत्येक दल की सोच यह रहती है कि बाह्य रूप से वह अपने सत्ता सुख भोगने वाले सदस्यों की आलोचना करके जनता को भरमाए रखेगा कि वह अपने सिद्धांतों के लिए समर्पित है लेकिन अन्दर से सत्ताधारी दल में हिस्सा पाने वाले सदस्यों और उनके दलों के बीच मौन-सहमति रहती है।
झगड़ने के पश्चात् इन राजनीतिज्ञों को आपस में क्षमायाचना करते हुए देखना भी आमबात हो गई है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि यह आमसहमति केवल इन्द्रिय बोध का प्रतिबिम्ब है। किसी परम चेतना का नहीं- आज की राजनीति उस बनिए की तरह है जो अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए खाद्य पदार्थों में अपमिश्रण करता है परन्तु उसको यह चेतना नहीं रहती कि वह उसी समाज को बीमार बना रहा है जिसका वह स्वयं भी एक सदस्य (व्यष्टि) है।
(ii) वोट बैंक के अवस्थान की गहरी पहचान: राजनैतिक दलों के सिद्धान्त और संकल्प चाहे जो भी रहें, यह बात साफ है। कि उन्हें अपने-अपने वोट बैंक के अवस्थान की पूरी जानकारी रहती है। वे इस बात को भी जानते हैं कि उनके किस तरह के लम्बे और लोकलुभावन भाषण किस स्थान के कौन-से समुदाय को किस सीमा तक आकर्षित करके आत्म-विमोह में डाल सकते हैं। ये अपने भाषणों और क्रियाकलापों को ठीक उसी तरह व्यवस्थित करते हैं कि आम चुनावों के समय प्रत्येक बार मतदाताओं को बहला-फुसला सकें। चुनावी घोषणा-पत्र को तैयार करने से पहले वे इस बात का रास्ता खुला रखते हैं कि घोषणा-पत्र में किए गए दावे पूरा न करके वे अपनी विवशता को अगली बार के चुनाव में जनता के सामने कैसे साबित करेंगे। देखा गया है कि प्रत्येक दल पिछड़ी जातियों की ओर कुछ ज्यादा ही आकर्षित रहता है क्योंकि वे ही अधिसंख्यक हैं और उनके वोट पाने पर उन्हें सत्ता-सुख भोगने से कोई नहीं रोक सकता।
(iii) देश का शासन चलाने के लिए राज्य स्तरीय दलों के मामले में सर्वसम्मति : हमने यह देखा है कि भारत में 1970 के दशक में क्षेत्रीय / राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के बीच की दूरियाँ लगातार कम होती जा रही हैं। केन्द्र तथा राज्य में लगभग सभी जगह अब गठबंधनों के आधार पर ही सरकारें बन रही हैं। केन्द्र सरकारों को बनाने में क्षेत्रीय दलों का सहयोग लिया जा रहा है। पिछले दो दशकों से राज्य स्तरीय दलों के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार हो रहा है।

प्रश्न 8. मंडल आयोग की सिफारिशों की घोषणा के क्या परिणाम थे?
उत्तर : मंडल आयोग की सिफारिशों की घोषणा के परिणाम : 8 अगस्त, 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने घोषणा की कि सरकार मंडल आयोग को रिपोर्ट लागू करेगी और सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करेगी। इस घोषणा ने भारतीय राजनीति को कई प्रकार से प्रभावित किया :
(i) इस घोषणा का तुरन्त परिणाम यह निकला कि सारे उत्तर भारत में इसका विरोध हुआ, युवकों विशेषकर छात्रों ने इसका घोर विरोध किया और कई दिनों तक जनसाधारण का सामान्य जीवन प्रभावित रहा। लगभग 200 लोगों ने इसके विरोध में आत्मदाह भी किया।
(ii) परन्तु यह विरोध अधिक दिन तक नहीं चला और 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी निर्णय दिया कि ऐसा करना संवैधानिक है।
(iii) इसके बाद लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अन्य पिछड़ी जातियों के कल्याण और उत्थान का मुद्दा अपनी नीतियों में अपनाया और अपने वोट बैंक का विस्तार करने का प्रयास किया। इससे राजनीति का मंडलीकरण हुआ।
(iv) इस घोषणा के बाद केन्द्र तथा राज्यों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। इससे समाज के इस वंचित समूह का सशक्तिकरण हुआ, राजनीतिक व्यवस्था में इनकी भागीदारी बढ़ी और सभी दल चुनाव में पिछड़ी जातियों से अधिक से अधिक उम्मीदवार खड़े करने लगे।
(v) अब कांग्रेस ने भी जिसने 1980 से 1989 तक इस रिपोर्ट की ओर देखा तक नहीं था, उच्च शिक्षा संस्थाओं में इन वर्गों के छात्रों के लिए स्थानों के आरक्षण का कानून बनाया। कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार निजी व्यापारिक संस्थाओं पर भी आरक्षण लागू करने के लिए दबाव बनाए हुए है।

प्रश्न 9. गठबंधन के युग से क्या अभिप्राय है ? 1989 के प्रारम्भ से गठबन्धन सरकारों के लम्बे दौर की किन्ही चार विशेषताओं को उजागर कीजिए ।
उत्तर : 1. गठबंधन के युग का अभिप्राय :
(i) 1989 में कांग्रेस की हार के बाद भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया, लेकिन कांग्रेस अभी भी लोकसभा में सबसे बड़ा राजनीतिक दल था। लेकिन लोकसभा में स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण उसने विपक्ष में बैठने का फैसला लिया। राष्ट्रीय मोर्चे को (जो जनता दल तथा कुछ दूसरे क्षेत्रीय दलों को मिलाकर बना था) परस्पर विरोधी राजनीतिक दलों भाजपा तथा वाम मोर्चे ने समर्थन दिया। इस समर्थन के आधार पर राष्ट्रीय मोर्चे द्वारा गठबंधन सरकार वी.पी. सिंह के नेतृत्व में बनाई गई। भाजपा तथा वाम मोर्च ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया।
(ii) कांग्रेस के राजनीतिक प्रभुत्व में कमी आने के कारण देश में बहु दलीय शासन प्रणाली का युग शुरू हो गया। 1989 के बाद किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ। इस राजनीतिक बदलाव से केन्द्र में गठबंधन सरकारों का एक लम्बा दौर शुरू हो गया। इसके अलावा, क्षेत्रीय दलों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2.1989 से प्रारम्भ गठबंधन सरकारों के लम्बे दौर की विशेषताएँ :
(i) 1989 के प्रारम्भ से गठबंधन सरकारों का दौर आज तक जारी है। इस दौरान केन्द्र में 9 सरकारें बनीं। ये तमाम सरकारें दूसरे दलों के समर्थन पर टिकी अल्पमत सरकारें थीं । क्षेत्रीय दलों की इन गठबंधन सरकारों में निर्णायक भूमिका रही।
(ii) गठबंधन सरकारों का यह लम्बा दौर पिछले 26 वर्षों से चल रहा था। इस दौरान 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, 1996 और 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार, 1998 तथा 1999 में राजग तथा 2004 एवं 2009 में संप्रग गठबंधन की सरकारें सत्ता में आयीं। इस दौरान देश को 8 प्रधानमंत्रियों का नेतृत्व प्राप्त हुआ। इनमें सबसे लम्बा कार्यकाल प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का था, जो संप्रग सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने राजग का नेतृत्व किया था।
(iii) 1989 से आज तक के राजनीतिक माहौल का विश्लेषण करने पर हम पायेंगे कि इस समय कुछ विशिष्ट राजनीतिक प्रवृत्तियों का उदय हुआ है। इन प्रवृत्तियों ने जहाँ एक तरफ राष्ट्रीय दलों का राजनीतिक प्रभुत्व तथा प्रसार कम किया है वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों का महत्त्व बढ़ा है।
(iv) 1990 के दशक से भारतीय राजनीति का परिदृश्य एक नया स्वरूप ले रहा है। वर्तमान समय में निम्नलिखित राजनीतिक विकल्प उभरकर सामने आये हैं :
1.कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल दल।
2. भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल दल।
3.वाम मोर्चा के दल ।
4.अन्य दल जो उपर्युक्त किसी भी राजनीतिक समीकरण का हिस्सा नहीं हैं।
(v) गठबंधन सरकारों में राजनीतिक सहमति बढ़ी है। अधिकांश दलों का मत है कि नई आर्थिक नीतियों से भारत एक समृद्ध देश होगा तथा विश्व की आर्थिक शक्ति बनेगा।
(vi) अब राजनीतिक दलों ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक और सामाजिक दावे को स्वीकृति दे दी है। राजनीतिक दल यह भी तय करने के लिए तैयार हैं कि “अन्य पिछड़ा वर्ग” को राजनीतिक सत्ता में समुचित भागीदारी हासिल हो ।
(vii) वर्तमान समय में राष्ट्रीय दलों तथा प्रान्तीय दलों में राजनीतिक भेद कम हो रहा है। प्रान्तीय दल राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। इस परिवर्तन से संभवतः उग्र क्षेत्रीयतावाद से मुक्ति मिल सकेगी।
(viii) गठबंधन की राजनीति के कारण राजनीतिक दलों के बीच विचारधारागत अन्तर पारस्परिक समायोजन तथा सहयोग के दायरे में सिमटते जा रहे हैं।

प्रश्न 12. भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में हुए किन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए ।

अथवा

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में भारतीय राजनीति में कौन-सी तीन प्रमुख घटनाएँ घटी? वर्णन कीजिए।
उत्तर : भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में हुए तीन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन :
(i) प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के पश्चात् 1984 में लोकसभा के चुनाव हुए। राजीव गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को जबरदस्त कामयाबी हासिल हुई। 1989 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 1984 के चुनावों में कांग्रेस ने प्रचण्ड बहुमत हासिल करते हुए लोकसभा की 415 सीटें जीती थीं, लेकिन 1989 के चुनावों में यह पार्टी केवल 197 सीटें ही हासिल कर सकी। लेकिन 1989 में उस परिघटना की समाप्ति हो गई जिसे राजनीति विज्ञानी अपनी विशिष्ट शब्दावली में ‘कांग्रेस प्रणाली’ की संज्ञा देते हैं।
(ii) यद्यपि 1989 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, तथापि किसी अन्य राजनीतिक दल को भी बहुमत नहीं मिल पाया। कांग्रेस अभी भी लोकसभा में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, लेकिन आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण उसने विपक्ष में बैठने का फैसला किया। जनता दल तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों ने मिलकर राष्ट्रीय मोर्चे का गठन किया । इस मोर्चे का समर्थन परस्पर विरोधी राजनीतिक विचारधारा वाले समूहों-भाजपा तथा वाम मोर्चे ने किया। इन दलों ने समर्थन के आधार पर राष्ट्रीय मोर्चा ने एक गठबंधन सरकार बनाई। लेकिन इस सरकार में भाजपा तथा वाम मोर्चे ने भागीदारी नहीं की। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चे के गठबंधन को बाहर से समर्थन दिया। कांग्रेस की पराजय के साथ-साथ भारत की दलीय व्यवस्था से उसका (कांग्रेस का) राजनीतिक प्रभुत्व खत्म हो गया। 1989 के बाद लोकसभा के चुनावों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ। इस राजनीतिक बदलाव का नतीजा यह हुआ कि केन्द्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ तथा क्षेत्रीय दलों ने गठबंधन सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।


(iii) 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में एक अहम मुद्दा जिसने भारतीय राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, वह था राष्ट्रीय राजनीति में ‘मंडल मुद्दे’ का उदय। इस मुद्दे ने 1989 के बाद की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया। इन सिफारिशों में प्रावधान किया गया कि केंद्र सरकार की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को आरक्षण प्रदान किया जायेगा। सरकार के इस निर्णय से देश के विभिन्न भागों में मंडल-विरोधी हिंसक प्रदर्शन किए गए। ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ को मिले आरक्षण के समर्थन तथा इसके विरोधियों के मध्य होने वाले विवाद को “मंडल मुद्दा” कहा जाता है। ” अन्य पिछड़ा वर्ग” ने अपनी • पहचान को लेकर सक्रियता दिखाई। इस दौर में अनेक राजनीतिक दल आगे आए, जिन्होंने रोजगार तथा शिक्षा के क्षेत्र में “अन्य पिछड़ा वर्ग” को बेहतर अवसर तथा सुविधाएँ उपलब्ध कराने की माँग की। इसके अलावा इन राजनीतिक दलों ने सत्ता में भी “अन्य पिछड़ा वर्ग” की हिस्सेदारी की भी हिमायत की। इन दलों का मानना है कि ” अन्य पिछड़ा वर्ग” का शासन में उचित प्रतिनिधित्व तथा • सत्ता में समुचित भागीदारी निश्चित करना लोकतांत्रिक कदम होगा।

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