Class 12th Political Science Chapter 1 Important Question Answer 3 Marks शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 1. भारत की गुट निरपेक्षता की नीति क्या है ?
उत्तर : भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति का आशय है कि शान्ति स्थापना के लिए सक्रिय रूप से प्रयत्न किया जाए तथा जहाँ तक सम्भव हो सके शान्ति को सुदृढ़ आधार प्रदान किया जाए। शीत युद्ध के दौरान भारत की अमरीका व सोवियत संघ के प्रति विदेशी नीति दोनों गुटों शामिल न होने की रही थी जिसके कारण भारत की विदेश नीति को गुट निरपेक्षता की नीति कहा जाता है। इस समय भारत की नीति न तो नकारात्मक थी और न ही निष्क्रियता की। पं. जवाहरलाल नेहरू ने विश्व को बताया थ कि गुट-निरपेक्षता कोई पलायन की नीति नहीं है। इसके विपरीत भारत ने दोनों गुटों के बीच मौजूदा मतभेदों को कम करने के प्रयास किए। इस तरह भारत ने इन दोनों देशों के बीच मतभेदों को पूर्ण युद्ध का रूप लेने से रोका। भारत के राजनयिकों ने हमेशा शीतयुद्ध के दौरान इन प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद कायम करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 2. क्या आप मानते हैं कि गुटनिरपेक्षता की नीति पलायन की नीति नहीं है? स्पष्ट करें।
उत्तर : गुटनिरपेक्षता की नीति का संबंध पलायन से नहीं है। गुटनिरपेक्षता का संबंध विभिन्न सैन्य संगठनों से अलग रहते हुए प्रत्येक प्रश्न का निर्णय अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उसके गुण-दोष के आधार पर करना है। गुटनिरपेक्षता की नीति मुख्यतः किसी देश अथवा राष्ट्र को अन्य बहुत से देशों द्वारा बनाए गए सैनिक गुटों में सम्मिलित नहीं होने देती तथा किसी भी गुट या राष्ट्र के कार्य की सराहना या निंदा आँख बंद करके बिना सोचे-समझे नहीं करती। जब कोई राष्ट्र अथवा देश किसी गुट में सम्मिलित हो जाता है तो उस गुट की प्रत्येक कार्यवाही को उचित बताना पड़ता है चाहे वह वास्तव में उचित हो या न हो । वास्तविकता यह है कि गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने वाला राष्ट्र अपने लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करता है। वह राष्ट्र अच्छाई या बुराई, उचित व अनुचित का निर्णय स्वविवेक से करता है न कि किसी गुट अथवा राष्ट्र के दबाव में आकर करता है ।

प्रश्न 3. शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् गुट-निरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता क्या है?
उत्तर : शीत युद्ध दिसंबर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ समाप्त हो गया। इस आंदोलन के आलोचकों का कहना है जब गुट नहीं रहे तो गुट-निरपेक्ष आंदोलन की क्या आवश्यकता और औचित्य है। पर अधिकांश सदस्य इसे अभी भी प्रासंगिक और उपयोगी मानते हैं। वे अपने पक्ष में निम्न तर्क देते हैं :
1.नवोदित राष्ट्रों का संगठन होने के कारण इसकी प्रासंगिकता अभी भी है। इन राष्ट्रों का आर्थिक और राजनीतिक विकास भी परस्पर सहयोग पर निर्भर है।
2.वर्तमान महाशक्ति अमेरिका के प्रभाव से मुक्त रहने के लिए निर्गुट राष्ट्रों का आपसी सहयोग और भी अधिक आवश्यक है।
3.गुटनिरपेक्ष आंदोलन अमेरिका, यूरोप तथा जापान जैसे पूँजीवादी देशों से उनकी रक्षा के लिए आवश्यक है।
4.गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से निशस्त्रीकरण की आवाज उठाई जा रही है जो गुटनिरपेक्ष देशों को सुरक्षा प्रदान करती है।
5.अधिकतर गुट निरपेक्ष देश विकासशील या अविकसित हैं। सभी की आर्थिक समस्याएँ समान हैं। अतः आपसी सहयोग से ही आर्थिक उन्नति की जा सकती है।

प्रश्न 4. गुट निरपेक्षता किस प्रकार बराबर दूरी अथवा ‘तटस्थता’ से भिन्न है?
उत्तर: (i) ‘गुटनिरपेक्षता’ का अर्थ तटस्थता का धर्म निभाना नहीं है। तटस्थता का अर्थ होता है-मुख्यतः युद्ध में शामिल न होने की नीति का पालन करना। तटस्थता की नीति का पालन करने वाले देश के लिए यह जरूरी नहीं कि वह युद्ध को समाप्त करने में मदद करे। ऐसे देश युद्ध में संलग्न नहीं होते और न ही युद्ध के सही-गलत होने के बारे में उनका कोई पक्ष होता है। दरअसल कई कारणों से गुटनिरपेक्ष देश, जिसमें भारत भी शामिल है, युद्ध में शामिल हुए हैं। इन देशों ने दूसरे देशों के बीच युद्ध होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे युद्ध के अंत के लिए प्रयास किए हैं।
(ii) गुटनिरपेक्षता की नीति का अर्थ है- किसी देश अथवा राष्ट्र का अन्य बहुत से देशों द्वारा बनाए गए सैनिक गुटों में सम्मिलित न होना तथा किसी भी गुट या राष्ट्र के कार्य की सराहना या निंदा आँख बंद करके बिना सोचे-समझे न करना। जब कोई राष्ट्र अथवा देश किसी गुट में सम्मिलित हो जाता है तो उस गुट की प्रत्येक कार्यवाही को उचित ही बताना पड़ता है, चाहे वह वास्तव में उचित हो या न हो। वास्तविकता यह है कि गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने वाला राष्ट्र अपने लिए एक स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करता है। वह राष्ट्र अच्छाई या बुराई, उचित व अनुचित का निर्णय स्वविवेक से करता है, न कि किसी गुट अथवा दबाव में आकर करता है।

प्रश्न 5. भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति क्यों अपनाई ?
उत्तर : 15 अगस्त, 1947 ई. को स्वतंत्रता के पश्चात् भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया। भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
1.भारत ने अपने को गुट संघर्ष में सम्मिलित करने की अपेक्षा देश की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रगति की ओर ध्यान देने में अधिक लाभ समझा क्योंकि हमारे सामने अपनी प्रगति अधिक आवश्यक थी।
2.सरकार द्वारा किसी भी एक गुट के साथ मिलने से यहाँ की जनता में भी विभाजनकारी प्रवृत्ति उत्पन्न होने का भय था और उससे राष्ट्रीय एकता को धक्का लगता।
3.किसी भी गुट के साथ मिलने और उसका पिछलग्गू बनने से राष्ट्र की स्वतंत्रता कुछ अंश तक अवश्य प्रभावित होती है।
4.भारत स्वयं एक महान देश है और इसे अपने क्षेत्र में अपनी स्थिति को महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए किसी बाहरी शक्ति की आवश्यकता नहीं थी।

प्रश्न 6. महाशक्तियों को छोटे देशों के साथ सैनिक गुट बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर : छोटे देश निम्न कारणों से महाशक्तियों के बड़े काम के थे
(क) महत्त्वपूर्ण संसाधनों (जैसे तेल और खनिज), भू-क्षेत्र (ताकि यहाँ से महाशक्तियाँ अपने हथियार और सेना का संचालन कर सकें) की प्राप्ति ।
(ख) सैनिक ठिकाने (जहाँ से महाशक्तियाँ एक-दूसरे की जासूसी कर सकें) स्थापित करना ।
(ग) आर्थिक सहायता (जिसमें गठबंधन में शामिल बहुत से छोटे-छोटे देश सैन्य-खर्च वहन करने में मददगार हो सकते थे) प्राप्त करना ।
(घ) विचारधारा के कारण भी ये देश महत्त्वपूर्ण थे। गुटों में शामिल देशों की निष्ठा से यह संकेत मिलता था कि महाशक्तियाँ विचारों का पारस्परिक युद्ध भी जीत रही हैं। गुट में शामिल हो रहे देशों के आधार पर वे सोच सकती थीं कि उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद से कहीं बेहतर है अथवा समाजवाद और साम्यवाद, उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद की अपेक्षा बेहतर है।

प्रश्न 7. अधिकांश गुट निरपेक्ष देशों को न्यूनतम विकसित देशों की श्रेणी में क्यों रखा गया था?
उत्तर : अधिकांश गुट निरपेक्ष देशों को न्यूनतम विकसित देशों की श्रेणी में इसलिए रखा गया था क्योंकि इनमें अधिकतर देशों की बहुसंख्यक जनता न्यूनतम गुणवत्ता का जीवनयापन करती थी। इनकी कुल राष्ट्रीय आय, प्रति व्यक्ति आय, शैक्षणिक स्तर, प्रौद्योगिकी एवं वैज्ञानिक स्तर बहुत पिछड़ा था। इनमें घोर निर्धनता, पिछड़ापन, विकास के नाम पर शून्य था ।इन देशों के सामने मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की थी। नव-स्वतंत्र देशों की आजादी के लिहाज से भी आर्थिक विकास महत्त्वपूर्ण था। बगैर टिकाऊ विकास के कोई देश सही मायनों में आजाद नहीं रह सकता। उसे धनी देशों पर निर्भर रहना पड़ता। इसमें वह उपनिवेशक देश भी हो सकता था जिसमें राजनीतिक आजादी हासिल की गई।

प्रश्न 8. शीत युद्ध के लिए उत्तरदायी दो महाशक्तियों M के नाम लिखिए। विश्व एकल ध्रुवीय कब बना?
उत्तर : शीत युद्ध के लिए उत्तरदायी दो महाशक्तियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद अर्थात् 1980 के दशक के अन्त एवं 1990 के दशक के आरंभ में विश्व एकल ध्रुवीय बना। एक ध्रुवीय शक्ति का नाम अमेरिका था क्योंकि उसे किसी भी अन्य शक्ति से चुनौती नहीं मिल पा रही थी। यह विश्व राजनीति में एकमात्र महाशक्ति रह गया था जिसके कारण विश्व एक ध्रुवीय होता चला गया।

प्रश्न 9. शीत युद्ध के दौरान, एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप के छोटे देश, महाशक्तियों के मित्र देशों के रूप में उनके लिए कैसे सहायक थे। व्याख्या कीजिए।
उत्तर : छोटे देश निम्न कारणों से महाशक्तियों के बड़े काम के थे : (क) महत्त्वपूर्ण संसाधन (जैसे तेल और खनिज)। (ख) भू-क्षेत्र (ताकि यहाँ से महाशक्तियाँ अपने हथियारों और सेना का संचालन कर सकें ) ।
(ग) सैनिक ठिकाने (जहाँ से महाशक्तियाँ एक-दूसरे की जासूसी कर सकें ) ।
(घ) आर्थिक मदद (जिसमें गठबंधन में शामिल बहुत से छोटे-छोटे देश सैन्य खर्च वहन करने में मददगार हो सकते थे) ।
ये ऐसे कारण थे जो छोटे देशों को महाशक्तियों के लिए जरूरी बना देते थे। विचारधारा के कारण भी ये देश महत्त्वपूर्ण थे। गुटों में शामिल देशों की निष्ठा से यह संकेत मिलता था कि महाशक्तियाँ विचारों का पारस्परिक युद्ध भी जीत रही हैं। गुट में शामिल हो रहे देशों के आधार पर वे सोच सकती थी कि उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद समाजवाद और साम्यवाद से कहीं बेहतर है अथवा समाजवाद और साम्यवाद, उदारवादी लोकतंत्र और पूँजीवाद की अपेक्षा बेहतर है।

प्रश्न 10. शीत युद्ध के दायरों से क्या अभिप्राय है ? किन्हीं दो ऐसे दायरों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : I. अर्थ- तनावपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय फिजा या वातावरण को ही शीत युद्ध कहा जाता है। यह तनावपूर्ण वातावरण सन् 1945 से 1990 तक दो शक्तिशाली विश्व शक्तियों के गुटों में जारी रहा। ऐसा लगता था कि अभी युद्ध छिड़ा और अभी युद्ध हुआ। स.रा. अमेरिका, ब्रिटेन तथा सोवियत संघ एवं पूर्वी यूरोपीय देशों में यह तनावपूर्ण स्थिति ही इतिहास में शीत युद्ध कहलाया।
II. दायरे – (1) सैन्य गुटों जैसे नाटो, सेण्टो, सीएटो तथा वारसा पैक्ट का निर्माण।
(2) अत्यधिक विनाशकारी हथियारों के निर्माण के लिए अन्धाधुन्ध होड़ तथा जगह-जगह मिसाइलें तैनात करना। (3) साम्यवाद तथा पूँजीवाद के विस्तार व प्रसार को रोकना शीत युद्ध के प्रमुख दायरे थे।

प्रश्न 11. बांडुंग सम्मेलन क्या था ? इसके परिणामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : अप्रैल 1955 में बांडुंग स्थान में एशियाई और अफ्रीकी राष्ट्रों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें 39 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उपस्थित सभी देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों को स्वीकार करने के साथ-साथ इनका विस्तार भी किया अर्थात् पाँच सिद्धान्तों के स्थान पर दस सिद्धान्त की स्थापना की गई । इस सम्मेलन में एशियाई तथा अफ्रीकी देशों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया तथा महान् शक्तियों का अनावश्यक अनुसरण न करने पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में सभी राज्यों की पूर्ण संप्रभुता की रक्षा करने, किसी राज्य पर सैनिक आक्रमण न करने तथा किसी राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर भी बल दिया गया।

प्रश्न 12. गुटनिरपेक्ष देशों में शामिल अधिकांश को ‘अल्प विकसित देशों’ दर्जा क्यों दिया गया ?

अथवा

अधिकांश गुट निरपेक्ष देशों को ‘न्यूनतम विकसित देशों’ की श्रेणी में क्यों रखा गया था ?
उत्तर : गुटनिरपेक्ष देशों में शामिल अधिकांश देशों को अल्प – विकसित या न्यूनतम विकसित देशों (Least Developed Countries) का दर्जा इसलिए दिया गया क्योंकि ये देश आर्थिक दृष्टि से बहुत ही पिछड़े हुए थे। इनके अधिकांश लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते थे। यहाँ के लोगों का जीवन स्तर बहुत ही निम्न था । इन देशों के समक्ष मुख्य चुनौती आर्थिक रूप से और अधिक विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की थी।
नव-स्वतंत्र देशों की आजादी की दृष्टि से भी आर्थिक विकास महत्त्वपूर्ण था। बिना टिकाऊ विकास के कोई देश सही अर्थों में स्वतंत्र नहीं रह सकता। उसे धनी देशों पर निर्भर रहना पड़ता। इसमें वह उपनिवेशक देश भी हो सकता था जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की गई। इसी समझ से नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ।
गुटनिरपेक्ष देश द्वितीय विश्व युद्ध से पहले किसी न किसी विकसित देश या औपनिवेशिक शक्ति के उपनिवेश थे। उनके संसाधनों को जमकर लूटा गया तथा उन्हें औद्योगिक विकास से वंचित रखा गया अतः वे अल्प-विकसित या विकासशील देश कहलाए।

प्रश्न 13. भारत की गुट निरपेक्षता की नीति को ‘अनियमित’ तथा ‘सिद्धान्तहीन’ कहा जाता है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं ? क्यों ?
उत्तर : नहीं, मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। इस नीति का एकपक्षीय अवलोकन करके ही आलोचकों ने टिप्पणी की है। वस्तुत: उनका संकेत 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय पाकिस्तान को चीन और अमेरिका द्वारा अस्त्रास्त्र और आर्थिक सहायता दी जाने के कारण भारत की व्यष्टि तौर पर अस्मिता और राष्ट्र स्तर पर संप्रभुता खतरे में पड़ गई थी। पाकिस्तान के मामले में हस्तक्षेप करने वाली एक साम्यवादी और दूसरी पूँजीवादी शक्तियों की इस दुश्चेष्टा को निरुत्साहित करने के लिए भारत का सोवियत संघ के साथ मैत्री का हाथ बढ़ाना सर्वथा उचित था। गुटनिरपेक्ष नीति का सृजन ही इसलिए किया गया था कि दो महाशक्तियाँ नव-स्वतंत्र देशों की संप्रभुता पर दखल न दे सकें। भारत ने गुट निरपेक्ष किसी भी सदस्य देश को ऐसी संकट की स्थिति में कूटनीति अपनाने से कभी भी न रोका और इसके विपरीत सहायता ही दी है। ‘आसियान’ नामक दक्षिण एशिया का संगठन ‘गुटनिरपेक्ष नीति’ का ही चरम विकास है।

प्रश्न 14. शीत युद्ध के काल में अवरोध की स्थिति ने युद्ध तो रोका, परन्तु महाशक्तियों के बीच पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को क्यों नहीं रोक सकी ?
उत्तर : (i) इन गुटों से जुड़े राष्ट्र यह भलीभाँति जानते थे कि आपसी युद्ध में भारी जोखिम है क्योंकि परमाणु बमों का प्रयोग किए जाने की दशा में समूचा संसार तबाह हो जाएगा और ऐसे बम दोनों गुटों के पास मौजूद थे।
(ii) पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता इस कारण न रुक पाई कि दोनों गुटों की विचारधाराएँ एक-दूसरे से विपरीत थीं। उनमें समझौता होने का कोई प्रश्न न था।
(iii) दोनों गुट औद्योगीकरण के चरम विकास की अवस्था में थे और उन्हें उद्योगों के लिए कच्चा माल विश्व के अल्पविकसित देशों से ही मिल सकता था। एक तरह से यह उन देशों के लिए की गई छीना-झपटी या स्पर्धा थी।

प्रश्न 15. शीत युद्ध के दौरान दोनों महा-शक्तियाँ छोटे देशों पर अपना नियंत्रण क्यों बनाए रखना चाहती थीं ?
उत्तर : शीतयुद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियाँ (अमरीका तथा सोवियत संघ) छोटे देशों पर अपना नियंत्रण निम्नलिखित कारणों की वजह से बनाए रखना चाहती थीं :
1.अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव एवं समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्हें अपने गुट बनाने की जरूरत पड़ी थी।
2. अनेक राष्ट्र विशेषकर यूरोप में दोनों शक्तियाँ एक-दूसरे के विरुद्ध दो विश्वयुद्ध लड़ चुकी थीं। वे अब भी सोच रही थीं कि तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने पर वे अपने-अपने समर्थक राष्ट्रों से सैनिक, युद्ध सामग्री, खाद्य सामग्री आदि तुरंत प्राप्त कर सकेंगे।
3.तेल उत्पादक देशों को अपनी ओर करना जरूरी था ताकि सामान्य परिस्थितियों में आर्थिक विकास तथा संकट की घड़ी में युद्ध संचालन, यातायात तथा औद्योगिक एवं कृषि उन्नति निरन्तर जारी रखी जा सके।
4.खनिज सम्पदा एशियाई, अफ्रीकी तथा लातीनी देशों से प्राप्त की जा सकती थी।
5.अनेक देशों के समर्थन या मित्रता के बाद उनके भू-क्षेत्र को महाशक्तियाँ अपने हथियारों एवं सेना का संचालन करने के लिए उपयोग कर सकती थी।

प्रश्न 16. बेलग्रेड शिखर सम्मेलन क्या था?
उत्तर : बेलग्रेड शिखर (Belgrade Summit) सम्मेलन : गुट निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन सितम्बर 1961 में बेलग्रेड में हुआ। इस सम्मेलन में 25 एशियाई तथा अफ्रीकी व एक यूरोपीय राष्ट्र ने भाग लिया। लैटिन अमेरिका के तीन राष्ट्रों ने पर्यवेक्षकों के रूप में सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन में महाशक्तियों से अपील की गई कि वे विश्व शान्ति तथा निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें तथा परमाणु परीक्षण न करें। विश्व के सभी भागों तथा रूपों में उप-निवेशवाद, साम्राज्यवाद, नव-उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद की घोर निन्दा की गई। बेलग्रेड सम्मेलन में 20 सूत्रीय घोषणा-पत्र को स्वीकार किया गया। इस घोषणा-पत्र में कहा गया कि विकासशील राष्ट्र बिना किसी भय व बाधा के आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास को प्रेरित करें।

प्रश्न 17. यह क्यों कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध का अंत, शीत युद्ध का आरंभ था?

अथवा

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति को शीत युद्ध का प्रारम्भ क्यों समझा जाता था ? व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : (i) जैसा कि हम जानते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध का अंत उस समय हुआ जब अमरीका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा तथा नागासाकी पर अगस्त 1945 में परमाणु बम गिरा दिए। इससे जापान युद्ध में आत्मसमर्पण के लिए बाध्य हो गया।
(ii) आलोचकों का मत है कि अमरीका द्वारा जापान पर परमाणु बम गिराना अनावश्यक था। अमरीका यह बात बेहतर तरीके से जानता था कि जापान युद्ध में आत्मसमर्पण करने वाला है।
(iii) आलोचकों का यह भी मत है कि अमरीका एशिया तथा अन्य स्थानों पर सोवियत संघ की सैनिक तथा राजनीतिक शक्ति के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना चाहता था।
(iv) द्वितीय विश्व युद्ध के अंत से जर्मनी, जापान तथा इटली की ताकत खत्म हो गई। अमरीका तथा सोवियत संघ विश्व की दो शक्तियाँ उभर कर सामने आईं। वस्तुतः अमरीका तथा सोवियत संघ के बीच संदेह तथा पारस्परिक तनावों के कारण ही शीत युद्ध का जन्म हुआ।

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