Class 12th Political Science Chapter 2 Important Question Answer 3 Marks दो-ध्रुवीयता का अन्त

प्रश्न 1. द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त सोवियत संघ एक महाशक्ति के रूप में कैसे उभरा ? तथ्य देकर प्रमाणित करें।

अथवा

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनाने में सहायक किन्हीं छः कारकों का विश्लेषण कीजिए।

अथवा

द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त सोवियत संघ एक महाशक्ति के रूप में कैसे उभरा? तथ्य देकर प्रमाणित करें।

उत्तर : वे कारक जिन्होंने सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनाने में मदद दी थी :1.दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरा। अमेरिका को छोड़ दें तो सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी ।
2.सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी। उसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन थे जिसमें खनिज तेल, लोहा और इस्पात तथा मशीनरी उत्पाद शामिल थे।
3.सोवियत संघ के दूर-दराज के इलाके भी आवागमन की सुव्यवस्थित और विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे।
4. सोवियत संघ का घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत उन्नत था और पिन से लेकर कार तक सभी चीजों का उत्पादन वहाँ होता था। यद्यपि सोवियत संघ के उपभोक्ता उद्योग बनने वाली वस्तुएँ गुणवत्ता के लिहाज से पश्चिमी देशों के स्तर की नहीं थी।
5.सोवियत संघ की सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया था। सरकार बुनियादी जरूरत की चीजें, मसलन स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल तथा लोक-कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर मुहैया कराती थी। बेरोजगारी नहीं थी।
6.मिल्कियत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था तथा भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व होने के अलावा नियंत्रण भी राज्य का ही था।

प्रश्न 2. एकध्रुवीयता तथा द्वि-ध्रुवीयता का क्या अर्थ है ?
उत्तर : एक-ध्रुवीयता का अर्थ है- सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एक सुपर पॉवर अर्थात् अमेरिका के वर्चस्व का बोलबाला। वह आजकल दुनिया में केवल मात्र ऐसी शक्ति है जिसके वर्चस्व को सैनिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। सही अर्थ में अब उसकी टक्कर लेने वाला कोई देश नहीं है।
द्वि-ध्रुवीयता का अर्थ है-द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्व की दो सुपर शक्तियों (Super-Powers) यानी पूर्व सोवियत संघ तथा सं.रा. अमेरिका के बोलबाले का दौर। यह दौर 1990 तक चला।

प्रश्न 3. ऐसी किन्हीं चार वास्तविकताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध के पश्चात् विश्व राजनीति को बदल दिया।
उत्तर : शीत युद्ध ने विश्व की राजनीति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर भी कई महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाले, जिससे प्रत्येक कमजोर व शक्तिशाली देश या तो अपने आपको स्वतन्त्र रखने की इच्छा व्यक्त करता या फिर अपने को सबसे अधिक शक्तिशाली बनाना चाहता था।
शीत युद्ध के अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों का न वर्णन इस प्रकार है :
1.विश्व का दो गुटों में विभाजन शीत युद्ध का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रथम प्रभाव यह पड़ा कि विश्व का दो गुटों में विभाजन हो गया। एक गुट अमेरिका के साथ हो गया, दूसरा गुट सोवियत संघ के साथ हो गया।
2.सैनिक गठबन्धनों की राजनीति : शीत युद्ध का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव यह पड़ा कि इसके कारण सैनिक गठबंधनों की उत्पत्ति हुई तथा सैनिक गठबंधनों को शीत युद्ध एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाने लगा।
3.गुट निरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति : शीत युद्ध के कारण गुट-निरपेक्ष आंदोलन की उत्पत्ति हुई।
4.शस्त्रीकरण को बढ़ावा : शीत युद्ध का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर एक प्रभाव यह पड़ा कि इसमें शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 4. भारत का उज्बेकिस्तान से मजबूत सांस्कृतिक सम्बन्ध है, संक्षेप में स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : भारत ने उत्तर साम्यवादी देशों से अपने सम्बन्धों को नई दिशा देने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। सोवियत संघ से अलग होने वाले 15 गणराज्यों से अपने संबंध बनाने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति एवं अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं ने इन देशों यात्राएँ कीं तथा कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए। भारत ने उज़्बेकिस्तान से राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा कूटनीतिक सहयोग के लिए एक विशेष ढाँचे का निर्माण किया। 1993 में भारतीय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने उज्बेकिस्तान तथा कजाखिस्तान की यात्रा करके उनके साथ आर्थिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों को मजबूत किया।

प्रश्न 5. रूस और भारत के सपनों पर आधारित बहुध्रुवीय विश्व से क्या अभिप्राय है।
उत्तर : बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय यह है कि अंतर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ मौजूद हो सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो (यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा माने और साथ मिलकर कारवाई करें) क्षेत्रीयताओं को ज्यादा जगह मिलें, अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षे का समाधान बातचीत के द्वारा हो, हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतान्त्रिक और शक्ति संपन्न बनाया जाए।

प्रश्न 6. “सोवियत संघ का अन्त समाजवाद का अन्त नहीं है। ” टिप्पणी करें।
उत्तर : 1. अनेक लोग (जो राजनीति में रुचि रखते हैं) प्रायः यह वाद-विवाद करते रहते हैं कि सोवियत संघ का अंत समाजवाद का अंत नहीं है क्योंकि विचारधाराओं का अंत अचानक किसी एक घटना से नहीं होता। समाजवाद एक विचारधारा है। उसका विरोध पूँजीवादी विचारक ही करते हैं। समाजवाद का मूल आधार या आत्मा समाज या सर्व साधारण का कल्याण है। दूसरी ओर पूँजीवाद का आधार-व्यक्तिगत स्वार्थ तथा निर्बल और असहाय का शोषण करना है।
2.समाजवाद अवश्यम्भावी है। आज नहीं तो कल जरूर आयेगा क्योंकि विश्व में निर्धन देशों तथा निर्धन लोगों की संख्या कहीं अधिक है। इतिहास इस बात का गवाह है कि राजतंत्र / तानाशाही का अंत हुआ तो उसके स्थान पर लोकतंत्र एवं उदारवादी शासन प्रणाली आयी। सामंतवाद तथा जमींदारी और जागीरदारी का अंत हुआ तो भूमि जोतने वालों को मिली। पूँजीवाद का अंत होगा तो समाजवाद ही आएगा।

प्रश्न 7. सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत तथा रूस के संबंधों की चर्चा करें ।

उत्तर : I. सोवियत संघ भारत के संबंध कोई नवीन नहीं हैं। यह पूरा विश्व जानता है कि सोवियत संघ ने हमेशा भारत को अपना सहयोगी व मित्र देश माना है। भारत व सोवियत संघ के संबंध को देखकर कई बार यह कहा गया है कि भारत सोवियत गुट का ही एक सदस्य देश है। लेकिन इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। सोवियत संघ के विभाजन से पहले और विभाजन के बाद भारत व सोवियत संघ के संबंध में कभी भी कोई दरार नज़र नहीं आई। एक समय ऐसा भी रहा है जब सोवियत संघ ने रुपये की आधार मानकर भारत के साथ व्यापार किया तथा हर समय भारत को सैन्य प्रौद्योगिक सहायता मुहैया कराई।
II. सोवियत संघ के विघटन के बाद एक शंका यह उठने लगी। कि अब भारत व सोवियत संघ के संबंधों का क्या होगा? क्या ये दोनों देश ऐसे समय में अपने संबंधों को बनाए रख पाएँगे? क्या विभाजन के बाद स्वतन्त्र गणराज्य भारत के साथ संबंध कायम रख पाएँगे? 26 दिसम्बर, 1991 को सोवियत संघ के विभाजन के बाद भारत व सोवियत संघ के संबंध इस प्रकार से प्रभावित हुए

1.दोनों देशों के हितों में व्यापक बदलाव आया।
2.दोनों देशों ने नए वातावरण और नई दिशा में संबंधों को बढ़ाने की पहल की।
3.दोनों देशों (रूस व भारत) के राज्य अध्यक्षों ने एक-दूसरे के देशों की यात्राएँ कीं जिससे व्यापारिक संबंधों में सहमति बनी।
4.रक्षा समझौतों को सम्पन्न किया गया।
5.1998 में अमरीका के दबाव के बाद भी भारत व रूस ने भारत-रूस सैन्य तकनीकी सहयोग समझौता 2010 तक बढ़ाया।
6.कारगिल संकट के समय रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भारत की भूमिका को सराहा तथा पाकिस्तान को घुसपैठिए वापस बुलाने व नियंत्रण रेखा का सम्मान करने की सलाह दी।

प्रश्न 8. भारत ने सोवियत संघ के साथ बीस वर्षीय ‘शांति और मित्रता की संधि’ पर कब और क्यों हस्ताक्षर किए?
उत्तर : (i) भारत और सोवियत संघ के बीच बीस वर्षीय ‘शाति और मित्रता की संधि’ पर अगस्त 1971 में हस्ताक्षर किए गए।
(ii) इस संधि के तहत भारत पर किसी देश के आक्रमण की स्थिति में सोवियत संघ के समर्थन का आश्वासन दिया गया।

प्रश्न 10. मध्य एशियाई गणराज्य किस कारण से प्रतिस्पर्धा का केन्द्र बने हुए हैं, समझाइए।
उत्तर : मध्य एशियाई गणराज्यों में प्रतिस्पर्धा :
I. मध्य एशिया में तजाकिस्तान दस वर्षों यानी 2001 तक गृह युद्ध की चपेट में रहा। इस पूरे क्षेत्र में कई सांप्रदायिक संघर्ष. युद्ध, हिंसा की समस्या विकट हो रही है। यहाँ के स्थानीय लोग अर्मेनियाई अलग होकर अर्मेनिया से मिलना चाहते हैं। जार्जिया में भी दो प्रांत स्वतन्त्रता चाहते हैं। यूक्रेन किरगिस्तान तथा जार्जिया में मौजूद शासन को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। कई देश और प्रांत नदी जल के सवाल पर आपस में भिड़े हुए हैं। इन सारी बातों की वजह से अस्थिरता का माहौल है और आम नागरिक का जीवन दूभर है।
II. मध्य एशियाई गणराज्यों में हाइड्रो-कार्बनिक (पेट्रोलियम) संसाधनों का विशाल भण्डार है। इससे इन गणराज्यों को आर्थिक लाभ हुआ है। लेकिन इसी कारण से यह क्षेत्र बाहरी ताकतों और तेल कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा भी बन चला है। इस क्षेत्र में अमेरिका का बढ़ता हुआ हस्तक्षेप भी है। अमेरिका इन क्षेत्रों को सैनिक ठिकाना बनाना चाहता है। रूस इन्हें पड़ोसी राज्य मानता है। उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए। खनिज तेल जैसे संसाधन की मौजूदगी के कारण चीन के हित भी इस क्षेत्र से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 12. किन चार कारकों के योगदान से सोवियत संघ एक विश्व (महा) शक्ति बन गया ?
उत्तर : निम्नलिखित कारकों के योगदान से सोवियत संघ एक विश्व (महा) शक्ति बन गया
(i) दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के नियंत्रण में आ गए। सोवियत संघ द्वारा इन देशों को फासीवादी ताकतों से मुक्त कराया गया था। इस प्रकार, इन सभी देशों की राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली के आधार पर ढाला गया।
(ii) सोवियत संघ द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया। अमरीका के अलावा सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी।
(iii) सोवियत संघ की संचार प्रणाली अत्यधिक उन्नत थी। उसके पास विशाल ऊर्जा-संसाधन थे जिनमें खनिज तेल, लोहा, इस्पात तथा मशीनरी उत्पाद शामिल हैं। आवागमन की सुव्यवस्थित तथा विशाल प्रणाली के कारण सोवियत संघ के दूर-दराज इलाक़े परस्पर संबद्ध थे। के
(iv) सोवियत संघ ने हथियारों की होड़ में समय-समय पर अमरीका को बराबर की टक्कर दी। सोवियत संघ ने अमरीका के नेतृत्व वाले ‘नाटो’ संगठन को चुनौती देने के लिए 1955 में ‘वारसा संधि’ की। पूर्वी यूरोप का संपूर्ण हिस्सा सोवियत संघ के दबदबे में रहा।

प्रश्न 13. सोवियत प्रणाली की किन्हीं चार कमियाँ अथवा त्रुटिपूर्ण व्यवस्था के कोई चार कारण बताइए।

अथवा

सोवियत प्रणाली की किन्हीं चार कमियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : सोवियत प्रणाली की कमियाँ (अथवा दोष) अग्रलिखित हैं – (i) सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
(ii) सोवियत संघ में एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
(iii) संघ के 15 गणराज्यों में रूस का ही अधिक बोलबाला रहना और अन्य 14 गणराज्यों की जनता का स्वयं को उपेक्षित तथा दमित समझना।
(iv) प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ बनाने में विफल रहना तथा पश्चिमी देशों से पिछड़ जाना। उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ ने अस्त्र-शस्त्रों के विनिर्माण में राष्ट्र की आय का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया था।

प्रश्न 14. “शॉक थेरेपी” के चार परिणाम लिखिए।
उत्तर : शॉक थेरेपी के परिणाम (Consequences of Shock Therapy)
(क) असमानता में वृद्धि : निजीकरण के कारण भूतपूर्व सोवियत संघ के गणराज्यों के अमीर तथा गरीब लोगों के बीच असमानता और अधिक हो गई। पुराना व्यापारिक ढाँचा तो नष्ट हो गया, परंतु उसके स्थान पर कोई वैकल्पिक ढाँचा नहीं दिया गया। शॉक थेरेपी से पूर्व सोवियत संघ के खेमे के देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और लोगों को बेहतर जीवन की अपेक्षा बर्बादी का सामना करना पड़ा।
(ख) आर्थिक परिवर्तन पर अधिक ध्यान : आर्थिक परिवर्तन पर ही अधिक ध्यान दिया गया जबकि लोकतांत्रिक संस्थाओं का सही निर्माण नहीं हो सका। कहीं संसद निर्बल रही तो कहीं राष्ट्रपति बहुत अधिक सत्तावादी हो गये। इन देशों में संविधान निर्माण भी सही तरह से न हो सका। अतः यह स्पष्ट है कि साम्यवाद से पूँजीवाद की तरफ संक्रमण का यह सबसे बेहतर तरीका साबित नहीं हुआ।
(ग) गरीबी का प्रसार : समाजवादी अर्थव्यवस्था और सरकारी स्वामित्व के उत्पादन तथा वितरण की समाप्ति के कारण पूर्व सोवियत संघ के खेमे के देशों में गरीबी का प्रसार हुआ। पहले लोगों को रियायती दर पर वस्तुएँ उपलब्ध होती थीं। अब वस्तुओं की कीमत बाजार के आकार पर निश्चित होती थी जो पहले से अधिक थी।
(घ) असंतोष की भावना का विकास : निजीकरण और पूँजीवादी व्यवस्था के अपनाए जाने से अमीर-गरीब का भेद बढ़ा और दोनों के बीच की खाई चौड़ी हुई। इसने गरीब लोगों में असंतोष की भावना का विकास किया। गरीब व्यक्ति यह महसूस करने लगा कि साम्यवादी व्यवस्था में स्वतंत्रता न सही दो समय खाना तो मिलता था जो अब मिलना कठिन हो गया था। कई देशों में माफिया वर्ग उभरकर आया जिसने विषमता की पीड़ा को बढ़ाने का काम किया।

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