Class 12th Political Science Chapter 2 Important Question Answer 8 Marks दो-ध्रुवीयता का अन्त

प्रश्न 1. विश्व का दूसरे स्थाप का सर्वाधिक शक्तिशाली देश किस प्रकार इतना कमजोर हो गया कि वह अचानक विघटित हो गया । किन्ही छः कारको को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : सोवियत संघ के विघटन के छः परिणाम निम्नलिखित
(i) सोवियत संघ की ‘दूसरी दुनिया’ और पूर्वी यूरोप की समाजवादी व्यवस्था के पतन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे। इससे मोटे तौर पर तीन प्रकार के दूरगामी परिवर्तन हुए। हर परिवर्तन के बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव हुए।
(ii) ‘दूसरी दुनिया’ के पतन का एक प्रमुख परिणाम शीत युद्ध के दौर के संघर्ष की समाप्ति में हुआ। समाजवादी प्रणाली पूँजीवादी प्रणाली को पछाड़ पाएगी या नहीं- यह विचारात्मक विवाद अब कोई मुद्दा नहीं रहा।
(iii) शीतयुद्ध के इस विवाद ने दोनों गुटों की सेनाओं को उलझाया था, हथियारों की तेज होड़ शुरू की थी, परमाणु हथियारों के संचय को बढ़ावा दिया था तथा विश्व को सैन्य गुटों में बाँटा था। शीत युद्ध के समाप्त होने से हथियारों की होड़ भी समाप्त हो गई और एक नई शांति की संभावना का जन्म हुआ।
(iv) विश्व राजनीति में शक्ति-संबंध बदल गए और इस कारण विचारों और संस्थाओं के आपेक्षिक प्रभाव में भी बदलाव आया। शीत युद्ध के अंत के समय केवल दो संभावनाएँ थीं- या तो बची हुई महाशक्ति का दबदबा रहेगा और एकध्रुवीय विश्व बनेगा या फिर कई देश अथवा देशों के अलग-अलग समूह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण मोहरे बनकर उभरेंगे। और इस तरह बहुध्रुवीय विश्व बनेगा जहाँ किसी एक देश का बोलबाला नहीं होगा। हुआ यह कि अमेरिका अकेली महाशक्ति बन बैठा।
(v) अमेरिका की ताकत और प्रतिष्ठा की शह पाने से अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली अर्थव्यवस्था है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएँ विभिन्न देशों की ताकतवर सलाहकार बन गईं क्योंकि इन देशों को पूँजीवाद की ओर कदम बढ़ाने के लिए इन संस्थाओं ने कर्ज दिया है। राजनीतिक रूप से उदारवादी लोकतंत्र राजनीतिक जीवन को सूत्रबद्ध करने की सर्वश्रेष्ठ धारणा के रूप में उभरा है।
(vi) सोवियत खेमे के अंत का एक परिणाम था-नये देशों का उदय। इन सभी देशों ने एक स्वतंत्र देशों के राष्ट्रकुल (CIS) का गठन किया। इनमें से कुछ देश, खासकर बाल्टिक और पूर्वी यूरोप के देश ‘यूरोपीय संघ’ से जुड़ना और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का हिस्सा बनना चाहते थे। मध्य एशियाई देश अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाना चाहते थे। देशों ने रूस के साथ अपने मजबूत रिश्ते को जारी रखा और पश्चिमी देशों, अमेरिका, चीन तथा अन्य देशों के साथ संबंध बनाए। इस तरह अंतर्राष्ट्रीय फलक पर कई नए खिलाड़ी सामने आये । हरेक के हित, पहचान और आर्थिक-राजनीतिक समस्याएँ पृथक-पृथक थीं।

प्रश्न 2. सोवियत संघ (Soviet Union) का विघटन क्यों ? “हुआ?

अथवा

कोई तीन उदाहरण देकर दर्शाइए कि अधिकांश पूर्ववर्ती सोवियत गणराज्यों में संघर्ष और तनाव की आशंकाएँ बनी रहती थीं।

अथवा

सोवियत संघ के विघटन के कोई दो कारण स्पष्ट कीजिए।

अथवा

सोवियत संघ के विघटन के किन्हीं दो प्रमुख कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 1991 में अचानक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी शक्ति सोवियत संघ बिखर गया। साम्यवादी व्यवस्था का अंत हो गया। सोवियत संघ के विघटन के निम्न कारण प्रमुख थे :
1.मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा किए गए सुधार : 1980 के दशक के मध्य में वह सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। पश्चिमी देशों की बराबरी करने के लिए विभिन्न तरह के सुधारों की आवश्यकता जरूरी समझी गई। गोर्बाचेव ने पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने, सोवियत संघ को लोकतांत्रिक रूप देने और वहाँ सुधार करने का फैसला किया। इस फैसले की कुछ ऐसी भी परिणतियाँ रहीं जिनका किसी को कोई अंदाजा नहीं था। पूर्वी यूरोप के देश सोवियत खेमे के हिस्से थे। इन देशों की जनता ने अपनी सरकारों और सोवियत नियंत्रण का विरोध करना शुरू कर दिया। गोर्बाचेव के शासक रहते सोवियत संघ ने ऐसी गड़बड़ियों में उस तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जैसे अतीत में होता था। पूर्वी यूरोप की साम्यवादी सरकारें एक के बाद एक गिर गईं।
2.गणराज्यों में राजनीतिक असंतोष एवं बिखराव : सोवियत संघ के बाहर हो रहे इन परिवर्तनों के साथ-साथ अंदर भी संकट गहराता जा रहा था और इससे सोवियत संघ के विघटन की गति और तेज हुई। गोर्बाचेव ने देश के अंदर आर्थिक-राजनीतिक सुधारों और लोकतंत्रीकरण की नीति चलाई। इन सुधार नीतियों का कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं द्वारा विरोध किया गया। 1991 में एक सैनिक तख्तापलट भी हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े गरमपंथियों ने इसे बढ़ावा दिया था। तब तक जनता को स्वतंत्रता का स्वाद मिल चुका था और वे कम्युनिस्ट पार्टी के पुराने रंगत वाले शासन में नहीं जाना चाहते थे। येल्तसिन ने इस तख्तापलट के विरोध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और वे नायक की तरह उभरे। रूसी गणराज्य ने, जहाँ बोरिस येल्तसिन ने आम चुनाव जीता था, केंद्रीकृत नियंत्रण को मानने से इंकार कर दिया।
सत्ता मॉस्को से गणराज्यों की तरफ खिसकने लगी। ऐसा खासकर सोवियत संघ के उन भागों में हुआ जो ज्यादा यूरोपीकृत थे और अपने को संप्रभु राज्य मानते थे। आश्चर्यजनक तौर पर मध्य-एशियाई गणराज्यों ने अपने लिए स्वतंत्रता की माँग नहीं की। वे सोवियत संघ के साथ ही रहना चाहते थे। सन् 1991 के दिसंबर में येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के तीन बड़े गणराज्य रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा की।

प्रश्न 3. सोवियत संघ के विघटन के लिए गोर्बाचेव कहाँ तक उत्तरदायी था? व्याख्या कीजिए।

अथवा

सोवियत संघ के विघटन के किन्हीं तीन कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : गोर्बाचेव द्वारा अपनाई गई नीति : (i) गोर्बाचेव के प्रयत्न : गोर्बाचेव ने सुधार करने का प्रयत्न किया परंतु साम्यवादी दल के सदस्य अपनी सत्ता और विशेषाधिकारों के कम होने के कारण प्रसन्न नहीं थे। जनसाधारण भी सुधारों की धीमी गति से धीरज खो बैठा। इस प्रकार उनको कहीं भी-जनसाधारण से या दल के सदस्यों से समर्थन नहीं मिला।
(ii) सोवियत संघ का प्रशासनिक व राजनीतिक रूप से गतिरुद्ध होना : सोवियत संघ में 70 वर्ष तक एक दल का शासन रहा जो जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं था। गतिरुद्ध प्रशासन, अधिक भ्रष्टाचार, गलतियों को सुधारने की अक्षमता, शासन में खुलेपन की अनिच्छा, केंद्रीकृत सत्ता के परिणामस्वरूप प्रशासनिक और राजनीतिक ढाँचा असफल रहा था। आम जनता के असंतोष में वृद्धि हो रही थी। इसके विपरीत पार्टी के सदस्यों को विशेषाधिकार प्राप्त थे।
(iii) लोगों की आकांक्षाओं को पूरा न करना : अर्थव्यवस्था के गतिरुद्ध होने, उपभोक्ता वस्तुओं की कमी के कारण राजव्यवस्था को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा क्योंकि लोगों की आकांक्षाओं के अनुसार काम नहीं हो रहा था।
(iv) संसाधनों का गलत प्रयोग : सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का अधिकांश भाग परमाणु हथियारों, सैन्य-सामग्री और अपने पिछलग्गू देशों के विकास पर खर्च किए ताकि उन पर नियंत्रण बना रहे। इससे अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा।
(v) पश्चिमी देशों के प्रति गलत प्रचार : काफी समय तक यह प्रचार किया गया था कि सोवियत राजव्यवस्था पश्चिमी देशों की व्यवस्था से अच्छी है, अतः जब लोगों को पश्चिमी देशों की जानकारी मिली तो उनका भ्रम टूट गया क्योंकि वह उनसे पिछड़े हुए थे।
(vi) राष्ट्रवादी भावनाओं में वृद्धि : सोवियत संघ के विघटन का तत्कालीन कारण राष्ट्रीय भावनाओं का उभार था। राष्ट्रीयता की भावना सोवियत संघ में इसके आकार, विविधता और आंतरिक समस्याओं के कारण हमेशा विद्यमान रही। इस प्रकार की भावनाएँ रूस, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, उक्रेन तथा जार्जिया में विद्यमान थीं। संभवत: गोर्बाचेव के सुधारों ने राष्ट्रवादियों के असंतोष में वृद्धि की। यह भी विचार है कि उपर्युक्त गणराज्यों में यह विचार पैदा हुआ कि पिछड़े क्षेत्रों-मध्य एशियाई गणराज्यों-को संघ में शामिल रखने की कीमत वह चुका रहे थे। अत: उन्होंने सबसे पहले विघटन की घोषणा की।

प्रश्न 4. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनाने में सहायक किन्हीं छः कारकों की व्याख्या कीजिए।

अथवा

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनाने में सहायक किन्हीं छः कारकों का विश्लेषण कीजिए ।
उत्तर : द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् निम्नलिखित कारकों ने सोवियत संघ को एक महाशक्ति बनने में सहायता की :
(i) दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ एक महाशक्ति के रूप में उभरा। संयुक्त राज्य अमेरिका को छोड़ दें तो सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी। सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी। उसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन थे जिसमें खनिज तेल, लोहा और इस्पात तथा मशीनरी उत्पाद शामिल हैं।
(ii) सोवियत संघ के दूर-दराज के इलाके भी आवागमन की सुव्यवस्थित और विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे। सोवियत संघ का घरेलू उपभोक्ता उद्योग भी बहुत उन्नत था और पिन से लेकर कार तक सभी चीजों का उत्पादन वहाँ होता था। यद्यपि सोवियत संघ के उपभोक्ता उद्योग में बनने वाली वस्तुएँ गुणवत्ता के लिहाज से पश्चिमी देशों के स्तर की नहीं थीं।
(iii) सोवियत संघ की सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया था। सरकार बुनियादी जरूरत की चीजें-मसलन स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल तथा लोक-कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर मुहैया कराती थी। बेरोजगारी नहीं थी।
(iv) मिल्कियत पर प्रमुख रूप से राज्य का स्वामित्व था तथा भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व होने के अलावा नियंत्रण भी राज्य का ही था।
(v) हथियारों की होड़ में सोवियत संघ ने समय-समय पर संयुक्त राज्य अमेरिका को बराबर की टक्कर दी। द्वितीय विश्व युद्ध तक केवल अमेरिका के पास ही परमाणु हथियार थे। परंतु 1949 में सोवियत संघ भी परमाणु बम बनाने में सफल हो गया। अब हर क्षेत्र में अमरीकी वर्चस्व को चुनौती मिलनी शुरू हो गई। (vi) अंतरिक्ष कार्यक्रम में भी सोवियत संघ ने अपनी धाक जमायी जब यूरी गगारिन ने पहली बार अंतरिक्ष में कदम रखे।

प्रश्न 5. “पूर्व-रूसी गणराज्यों में साम्यवाद से पूँजीवाद में परिवर्तन आसान नहीं था।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।

अथवा

“साम्यवाद से पूँजीवाद की ओर संक्रमण करना आसान काम नहीं था।” टिप्पणी कीजिए ।
साम्यवाद से पूँजीवाद तक का सफर सरल न था। टिप्पणी करो।
उत्तर : ” पूर्व-रूसी गणराज्यों में साम्यवाद से पूँजीवाद से परिवर्तन आसान नहीं था।” इस कथन की समीक्षा निम्नलिखित .प्रकार से की जा सकती है
(i) इस संक्रमण को ‘प्रघात चिकित्सा’ या ‘शॉक थेरेपी’ नाम दिया गया है। इसको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अपना आदर्श या नमूना बनाया गया था। वस्तुतः यह नमूना संयुक्त राष्ट्र की इन युगल संस्थाओं/अभिकरणों ने सभी राष्ट्रों को निर्देशित किया था। अर्थात् इसको अपनाने का आदेश दिया था। रूस का संदर्भ देते हुए हम इस संक्रमण के कटु एवं कठिन अनुभवों पर टिप्पणी कर सकते हैं। उल्लेखनीय है कि रूस एक समय साम्यवादी देश और विश्व की महाशक्ति हुआ करता था।
(ii) साम्यवाद संपत्ति पर राज्य का स्वामित्व रहने का पक्षधर है जबकि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था संपत्ति के निजीकरण और उदारीकरण तथा इसकी विधियों के प्रति आस्थावान है। हम जानते हैं कि रूस, मध्य एशिया तथा पूर्वी यूरोप के देशों को 1990 के दशक में अर्थ प्रबंध में संक्रमण की तंग सुरंग से होकर आगे बढ़ना पड़ा था। उल्लेखनीय है कि उक्त दशक में संयुक्त राष्ट्र के युगल अभिकरणों (विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने विश्व के समस्त देशों की अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था में विलय करने का आदेश पारित किया था।
(iii) रूस में साम्यवाद आधारित अर्थव्यवस्था थी अर्थात् संपत्ति पर राज्य का स्वामित्व था जबकि पूँजीवादी प्रकृति वाली अर्थव्यवस्था संपत्ति के स्वामित्व का निजीकरण करने पर बल देती है। इसका सार्वजनिक या सरकार के स्वामित्व के साथ कोई सरोकार नहीं रहता है। अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के कारण रूस को सर्वाधिक कठिनाई का सामना करना पड़ा। यह परिवर्तन उस देश के लिए किसी सदमे (धक्के) से कम न था। विदेशी व्यापार के प्रबंधन की प्रवृत्ति और रुझान ने वहाँ आमूल परिवर्तन झेला। ऐसा परिवर्तन झेलना बहुत कठिन था।
(iv) इसीलिए हमने देखा कि तत्कालीन सोवियत संघ का वर्ष 1991 में विघटन हो गया था। यह घटना अचानक ही घटित हुई। तीन बड़े गणराज्य यथा-रूस, यूक्रेन तथा बेलारूस ने सोवियत संघ के समाप्त होने की घोषणा कर दी और इस तरह सोवियत संघ 15 स्वतंत्र देशों में बंट गया। वहाँ पर राष्ट्रमंडल की स्थापना की गई।
(v) यह गोर्बाचेव की व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को मान्यता, मुक्त व्यापार तथा विश्व के अन्य देशों की आर्थिक सहायता करने जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को धारण करने वाली उदारवादी नीति का परिणाम था। यह नीति दो रूसी शब्दों पेरेस्त्रोइका (Perestroika) अर्थात् अर्थव्यवस्था की पुनः विरंचना और ग्लासनॉस्ट (Glasnost) अर्थात् उदारता या मुक्तता पर आधारित थी। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था ने रूस की अर्थव्यवस्था के समाजवादी/साम्यवादी ढाँचे को ध्वस्त कर दिया था। यही बात पूर्वी यूरोप के देशों और मध्य एशिया के देशों में भी देखी गई।
(vi) इस प्रक्रिया के दौरान रूस में राज्य के स्वामित्व वाला संपूर्ण औद्योगिक ढाँचा डाँवाडोल हो गया था। विनिवेश नीति के तहत लगभग 90 प्रतिशत उद्योग निजी क्षेत्र को बेच दिए गए। उनका बिक्री मूल्य न्यूनतम रखा गया इसलिए सरकार को भारी नुकसान और आर्थिक हानि उठानी पड़ी। रूबल का अवमूल्यन हो गया तथा उस अवधि में रूस के घरेलू बाजारों में वस्तुओं के दाम आकाश छूने लगे।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि साम्यवादी/समाजवादी अर्थव्यवस्था का संक्रमण पूँजीवादी व्यवस्था करने के दौरान प्रघात चिकित्सा (शॉक थेरेपी) जैसी वेदना महसूस हुई और उस वेदना से रूसी व्यवस्था आज भी मुक्त नहीं हो पाई है।

प्रश्न 6. भारत और सोवियत संघ के आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य तथा सांस्कृतिक संबंधों पर एक निबंध लिखें।

अथवा

भारत, रूस तथा पूर्व साम्यवादी गणराज्यों के संबंध का विवरण दीजिए |

अथवा

साम्यवादी रूस के साथ भारत के बदलते संबंधों का विश्लेषण कीजिए।

अथवा

“ यद्यपि भारत ने साम्यवादी रह चुके सभी देशों के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए हैं तथापि भारत तथा रूस के संबंध सबसे अधिक घनिष्ठ हैं।” उपरोक्त कथन को न्याय-संगत ठहराने के लिए कोई तीन तर्क दीजिए।
उत्तर : भारत और सोवियत संघ के संबंध (Relationship between India and Soviet Union) : प्रस्तावना (Introduction) : शीतयुद्ध के दौरान भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुत गहरे थे। इससे आलोचकों को यह कहने का अवसर भी मिला कि भारत सोवियत खेमे (गुट) का हिस्सा था। इस दौरान भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुआयामी थे।
विभिन्न पहलू (Aspects) :1.आर्थिक (Economic) : सोवियत संघ ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की ऐसे वक्त में मदद की जब ऐसी मदद पाना मुश्किल था। सोवियत संघ ने भिलाई, बोकारो और विशाखापट्टनम के इस्पात कारखानों तथा भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स जैसे मशीनरी संयंत्रों के लिए आर्थिक और तकनीकी सहायता दी । भारत में जब विदेशी मुद्रा की कमी थी तब सोवियत संघ ने रुपये को माध्यम बनाकर भारत के साथ व्यापार किया।
2.राजनीतिक (Political) : सोवियत संघ ने कश्मीर माम पर संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के रुख को समर्थन दिया। सोवियत संघ ने भारत के संघर्ष के गाढ़े दिनों खासकर सन् 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मदद की। भारत ने भी सोवियत संघ की विदेश नीति का अप्रत्यक्ष, लेकिन महत्त्वपूर्ण तरीके से समर्थन किया।
3.सैन्य (Military) : भारत को सोवियत संघ ने ऐसे वक्त में सैनिक साजो-सामान दिए जब शायद ही कोई अन्य देश अपनी सैन्य टेक्नोलॉजी भारत को देने के लिए तैयार था। सोवियत संघ ने भारत के साथ कई ऐसे समझौते किए जिससे भारत संयुक्त रूप से सैन्य उपकरण तैयार कर सका।
4.सांस्कृतिक (Cultural) : हिंदी फिल्में और भारतीय संस्कृति सोवियत संघ में लोकप्रिय थे। बड़ी संख्या में भारतीय लेखकों और कलाकारों ने सोवियत संघ की यात्रा की ।
भारत-रूस तथा अन्य पूर्व सोवियत गणराज्यों के आपसी संबंध : 1.भारत ने साम्यवादी रह चुके सभी देशों के साथ अच्छे संबंध कायम किए हैं लेकिन भारत के संबंध रूस के साथ सबसे ज्यादा गहरे हैं। भारत की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण पहलू भारत का रूस के साथ संबंध है या भारत-रूस संबंधों का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है। भारत-रूस के आपसी संबंध इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं। भारतीय हिन्दी फिल्मों के नायकों में राजकपूर से लेकर अमिताभ बच्चन तक रूस और पूर्व सोवियत संघ के बाकी गणराज्यों में घर-घर जाने जाते हैं। आप इस क्षेत्र में हिंदी फिल्मी गीत बजते सुन सकते हैं और भारत यहाँ के जनमानस का एक अंग है।
2.रूस और भारत दोनों का सपना बहध्रुवीय विश्व का है। बहुध्रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय यह है कि अंतर्राष्ट्रीय फलक पर कई शक्तियाँ मौजूद हों, सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो (यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा मानें और साथ मिलकर कार्यवाही करें), क्षेत्रीयताओं को ज्यादा जगह मिले, अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों का समाधान बातचीत के द्वारा हो, हर देश की स्वतंत्र विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा फैसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतांत्रिक और शक्तिसंपन्न बनाया जाए। 2001 के भारत-रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में भारत और रूस के बीच 80 द्विपक्षीय दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए हैं।
3.भारत को रूस के साथ अपने संबंधों के कारण कश्मीर, ऊर्जा-आपूर्ति, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से संबंधित सूचनाओं के आदान-प्रदान, पश्चिम एशिया में पहुँच बनाने तथा चीन के साथ अपने संबंधों में संतुलन लाने जैसे मसलों में फायदे हुए हैं।
4.रूस को भारत के संबंध से सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत रूस के लिए हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार देश है।
5.भारतीय सेना को अधिकांश सैनिक साजो-सामान रूस से . प्राप्त होते हैं। चूँकि भारत तेल के आयातक देशों में से एक है इसलिए भी भारत रूस के लिए महत्त्वपूर्ण है। उसने तेल के संकट की घड़ी में हमेशा भारत की मदद की है। भारत रूस से अपने ऊर्जा-आयात को भी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
6.ऐसी कोशिश कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के साथ भी चल रही है। इन गणराज्यों के साथ सहयोग के अंतर्गत तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश करना भी शामिल है। रूस भारत की परमाण्विक योजना के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। रूस ने भारत के अंतरिक्ष उद्योग में भी जरूरत के वक्त क्रायोजेनिक रॉकेट देकर मदद की है। भारत और रूस विभिन्न वैज्ञानिक परियोजनाओं में साझीदार हैं।

प्रश्न 7. सोवियत संघ में सोवियत व्यवस्था की किन्हीं तीन सकारात्मक तथा तीन नकारात्मक विशेषताओं को उजागर कीजिए ।
उत्तर : सोवियत प्रणाली की सकारात्मक विशेषताएँ :(i) सोवियत अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण था। सोवियत संघ की सरकार द्वारा सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कर दिया गया था। सरकार बुनियादी आवश्यकताओं की वस्तुओं, जैसे स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा रियायती दरों पर उपलब्ध कराती थी। बेरोजगारी नहीं थी। भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व व नियंत्रण राज्य का था।
(ii) सोवियत प्रणाली के अंतर्गत अर्थव्यवस्था समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की आवश्यकता से प्रेरित थी। यह समाज की समानता के सिद्धांत पर रचना के पक्ष में थी।
(iii) इसके अंतर्गत राज्य और ‘पार्टी की संस्था’ को प्राथमिक महत्त्व दिया गया।
(iv) अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी। विकास के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा योजनाओं का निर्माण किया गया और उनको लागू किया गया। अमरीका को छोड़कर यह व्यवस्था शेष विश्व की तुलना में अधिक विकसित थी।

सोवियत संघ की तीन नकारात्मक विशेषताएँ :(i) सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का शिकंजा कसता चला गया। यह प्रणाली सत्तावादी होती गई और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया।
(ii) सोवियत संघ में एक दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंकुश था। यह दल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं था।
(iii) संघ के 15 गणराज्यों में रूस का ही अधिक बोलबाला रहना और अन्य 14 गणराज्यों की जनता का स्वयं को उपेक्षित तथा दमित समझना।
(iv) प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ बनाने में विफल रहना तथा पश्चिमी देशों से पिछड़ जाना। उल्लेखनीय है कि सोवियत संघ ने अस्त्र-शस्त्रों के विनिर्माण में राष्ट्र की आय का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया था।

प्रश्न 8. सोवियत व्यवस्था की किन्हीं चार प्रमुख | विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

अथवा

सोवियत प्रणाली क्या थी? सोवियत प्रणाली की किन्ही चार विशेषताओं का आकलन कीजिए ।

उत्तर : सोवियत प्रणाली : 1917 की रूसी क्रान्ति के बाद साम्यवादी विचारधारा के अधीन समाजवादी सोवियत गणराज्य की स्थापना की गई। पूँजीवाद से पृथक् विचारधारा के रूप में इस संकल्पना के तहत सार्वजनिक हित पर आधारित नियोजित अर्थव्यवस्था अपनाई गई। पूँजीवादी देशों के विपरीत यहाँ उद्योग-धंधों के विकास पर अधिक बल नहीं दिया गया। सार्वजनिक सम्पत्ति व्यवस्था कायम करना और समाज को समानता के सिद्धांत के आधार पर रचने की कोशिश करना ही सोवियत प्रणाली कहलाई।
सोवियत व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं : (i) समाजवादी सोवियत गणराज्य 1917 की रूसी क्रांति के बाद अस्तित्व में आया था । वस्तुत: यह क्रांति पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध में थी तथा यह समाजवादी आदर्शों तथा समतामूलक समाज की आवश्यकता से प्रेरित थी। सोवियत व्यवस्था के निर्माताओं ने राज्य तथा पार्टी की संस्था’ को काफी महत्त्व दिया। सोवियत राजनीतिक व्यवस्था की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिये कोई प्रावधान नहीं था।
(ii) सोवियत व्यवस्था के तहत अर्थव्यवस्था का संपूर्ण ढाँचा योजनाबद्ध तथा राज्य के नियंत्रण में था। जैसा कि हम जानते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् सोवियत संघ महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया था। उस दौरान अमरीका के अलावा, सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था बाकी दुनिया के मुकाबले कहीं ज्यादा विकसित थी। जिन पूर्वी यूरोप के देशों को द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत संघ ने फासीवादी ताकतों के चंगुल से आजाद कराया था, वे सभी देश सोवियत संघ के नियंत्रण में आ गए थे।
(iii) सोवियत संघ के पास विशाल ऊर्जा संसाधन थे तथा उसकी संचार प्रणाली अत्यधिक उन्नत थी। सोवियत संघ के दूर-दराज के क्षेत्र भी आवागमन की सुव्यवस्थित तथा व्यापक प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे। सोवियत संघ के पास खनिज तेल, लोहा तथा इस्पात के विशाल संसाधन थे। उसका उपभोक्ता उद्योग भी काफी विकसित था। वहाँ पिन से लेकर कार तक सभी वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था। सरकार द्वारा सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर तय कर दिया गया था। सरकार मूलभूत आवश्यकताओं; जैसे-स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, बच्चों की देखभाल तथा लोक कल्याण की सुविधाएँ मुहैया कराती थी। देश में बेरोजगारी नहीं थी। सोवियत संघ में मिल्कियत का प्रमुख स्वरूप राज्य का स्वामित्व था। भूमि तथा उत्पादक संपदाओं पर भी राज्य का नियंत्रण था।
(iv) सोवियत व्यवस्था में नौकरशाही का नियंत्रण अत्यधिक था। इस व्यवस्था का स्वरूप सत्तावादी था तथा नागरिकों की आजादी सीमित थी। अभिव्यक्ति की आजादी न होने के कारण लोग चुटकुलों तथा व्यंग्य चित्रों के जरिए अपनी असहमति व्यक्त करते थे। कम्युनिस्ट पार्टी का एकछत्र शासन था तथा बाकी सभी संस्थाओं पर इस दल का नियंत्रण था। कम्युनिस्ट पार्टी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। जनता ज्यादातर मामलों में अपने को उपेक्षित, पृथक तथा दमित महसूस करती थी।

You cannot copy content of this page
Scroll to Top