4 अंकीय प्रश्न उत्तर – समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व Class12th Political Science Chapter 4

Class 12th Political Science Chapter 3 Important Question Answer 3 Marks समकालीन विश्व में अमेरिकी वर्चस्व

प्रश्न 1. इराक पर आक्रमण को ‘आतंकवाद पर आक्रमण’ ठहराना कहाँ तक उचित है? अपने उत्तर के पक्ष में कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर : 1. इराक पर अमरीकी आक्रमण को आतंकवाद पर आक्रमण कहना पर्याप्त सीमा तक उचित नहीं है क्योंकि यह अमेरिका की भू-राजनीति या वर्चस्व का प्रतीक माना जाता है। आतंकवाद से इसका कोई लेना-देना नहीं था। 2003 के 19 मार्च को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूटनाम से इराक पर सैन्य-हमला किया। अमेरिकी अगुआई वाले ‘कॉअलिशन ऑफ वीलिंग्स (आकांक्षियों के महाजोट) ‘ में 40 से अधिक देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इराक पर इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। दिखावे के लिए कहा गया कि सामूहिक संहार के हथियार (वीपंस ऑफ मास डेस्ट्रक्शन) बनाने से रोकने के लिए इराक पर हमला किया गया है। इराक में सामूहिक संहार के हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमले के मकसद कुछ और ही थे, जैसे इराक के तेल-भंडार पर नियंत्रण और इराक में अमेरिका की मनपसंद सरकार कायम करना।
2.सद्दाम हुसैन की सरकार तो चंद रोज में ही जाती रही, ”लेकिन इराक को ‘शांत’ कर पाने में अमेरिका सफल नहीं हो सका। इराक्क में अमेरिका के खिलाफ एक पूर्णव्यापी विद्रोह भड़क उठा। अमेरिका के 3000 सैनिक इस युद्ध में खेत रहे जबकि इराक के सैनिक कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में मारे गए। एक अनुमान के अनुसार अमेरिकी हमले के बाद से लगभग 50000 नागरिक मारे गए हैं। अब यह बात बड़े व्यापक रूप में मानी जा रही है कि एक महत्वपूर्ण अर्थ में इराक पर अमेरिकी हमला सैन्य और राजनीतिक धरातल पर असफल सिद्ध हुआ है।) AMT

प्रश्न 2. अमरीकी वर्चस्व की किन्ही दो मुख्य बाधाओं का वर्णन कीजिए।

अथवा

अमरीकी वर्चस्व के मार्ग में आने वाले किन्हीं दो अवरोधों का वर्णन कीजिए ।

अथवा

अमेरिका के वर्चस्व पर आने वाली किन्हीं दो बाधाओं/ नियन्त्रणों को लिखिए।
उत्तर : अमरीका के वर्चस्व की बाधाएँ निम्नलिखित हैं: (i) सर्वाधिक सभ्य नागरिकों का रहना : हम जानते हैं कि अमरीका के लोग सुशिक्षित होने के साथ ही सुसंस्कृतज्ञ भी हैं। उनका द्विस्वभाव नहीं है तथा वे सुस्पष्ट और चेतनाशील जीवन जीने को प्राथमिकता देते हैं। ये लोग आम वयस्क मताधिकार और जन-सहमति के माध्यम से विश्व के एक अन्य देश के मामलों पर अमरीका के अनुचित दबाव डालने और सैन्य शक्ति का मनमाना / अनियंत्रित उपयोग करके उन पर किन्हीं प्रतिबंधों को जबरदस्ती लादने के कार्यों पर लगाम कस सकते हैं। यह सत्य है कि वहाँ का सत्तासीन दल इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया (टी.वी. एवं समाचार पत्र आदि) के माध्यम से असत्य एवं भ्रांतिकारी प्रचार-प्रसार करके जनमत को अपने पक्ष में करने की भरपूर चेष्टा करता है लेकिन वहाँ के नागरिक जहाँ पर भी लोकतांत्रिक राजनीति के अनन्य उद्देश्य और उसके कार्यान्वयन के बीच किसी तरह की भिन्नता को देखते हैं तो तुरंत उसका विरोध करते हैं।
(ii) दूसरा अवरोध अमरीका की आंतरिक संरचना में दिखाई पड़ता है। वहाँ पर सरकार के तीन अंग यथा-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता की है। अमरीकी संविधान ने किसी एक अंग द्वारा किसी अन्य अंग सुस्पष्ट भागीदारी की शक्ति पर हस्तक्षेप करने की कोई भी गुंजाइश नहीं छोड़ी है। वहाँ के संविधान की यह स्थिति उस दशा में कार्यपालिका पर अंकुश लगा सकती है जब वह किसी तरह की सैन्य शक्ति का प्रयोग करने की योजना बनाता है या उसका क्रियान्वयन करने की ओर उन्मुख होता है।

प्रश्न 3. अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला क्यों किया ?
उत्तर : (1) 9/11 की घटना : 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर एवं पेंटागन पर जबरदस्त आतंकवादी हमला किया गया। इस हमले में लगभग 3000 लोग मारे गए। इस आतंकवादी हमले में अल-कायदा के शामिल होने की शंका जाहिर की गई। परिणामस्वरूप अमेरिका ने बदले की कार्यवाही करते हुए अफगानिस्तान जोकि अलकायदा का गढ़ बन चुका था, में युद्ध की घोषणा कर दी ।
(2) अफगानिस्तान में तालिबान एवं अलकायदा का शासन : अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध इसलिए शुरू किया, क्योंकि अफगानिस्तान में 2001 में तालिबान एव अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों का शासन था, जो विश्व स्तर पर आतंकवादी गतिविधियाँ कर रहे थे। अत: अमेरिका ने इन आतंकवादी संगठनों को समाप्त करने के लिए भी अफगानिस्तान में युद्ध किया।

प्रश्न 4. यह कहना कहाँ तक उचित है कि वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर 9/11 का आक्रमण वास्तव में अमेरिकी वर्चस्व पर आक्रमण था ? व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : अनेक विद्वानों की राय है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ 9/11 का आक्रमण, वास्तव में अमेरिकी वर्चस्व (विशेषकर सैनिक वर्चस्व) पर आक्रमण था। अफगानिस्तान हो, इराक हो या मध्य-पूर्व के देश हों, अमेरिका ने अपनी दादागीरी के बल पर इन “देशों में हस्तक्षेप किया। इससे अनेक धार्मिक कट्टरवादी समूह अमेरिका के दुश्मन बन गए। अल कायदा इनमें से प्रमुख था जिसने 9/11 की घटना को अंजाम दिया।
11 सितम्बर, 2001 के दिन अल कायदा के आतंकवादियों द्वारा ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अमरीका के विमानों का अपहरण करके न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के साथ उन्हें टकराना और अपार क्षति पहुँचाना। वर्जीनिया का पेंट व निशाना बनाया गया लेकिन विमान के पेन्सिलवेनिया में स्वतः ध्वस्त हो जाने के कारण वह बच गया। अमरीकियों के लिए यह दिल दहला देने वाला अनुभव था। उन्होंने इस घटना की तुलना (1814 (जब ब्रिटेन ने अमेरिका के वॉशिंगटन में आगजनी की थी ) और 1941 (जब जापान ने पर्ल हार्बर स्थित अमेरिकी बेड़े पर हमला किया था) की घटनाओं से की।
जहाँ तक जान-माल की हानि का सवाल है तो अमरीका की जमीन पर यह अब तक का सबसे गंभीर आक्रमण था। 9/11 के जवाब में अमरीका ने फौरी कदम उठाए और भयंकर कार्रवाई की। आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी युद्ध के अंग के रूप में अमरीका ने ‘ऑपरेशन एन्डयूरिंग फ्रीडम’ चलाया। यह अभियान उन सभी के विरुद्ध चला जिन पर 9/11 हमले का शक था। इस अभियान में मुख्य निशाना अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान-शासन को बनाया गया।
अमरीकी सेना ने पूरे विश्व में गिरफ्तारियाँ कीं। प्रायः गिरफ्तार लोगों के विषय में उनकी सरकार को जानकारी नहीं दी गई। गिरफ्तार लोगों को अलग-अलग देशों में भेजा गया और उन्हें खुफिया जेलखाने में बंदी बनाकर रखा गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधियों तक को इन बंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई। अमेरिका की सरकार और लोग किसी भी आतंकवादी या सैन्य कार्यवाही को नि:संदेह अपने स्वाभिमान और वर्चस्व के लिए एक चुनौती मानेंगे ही। याद रहे कि सैन्य शक्ति की दृष्टि से अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है।

प्रश्न 5. संयुक्त राज्य अमरीका ने इराक के विरुद्ध युद्ध क्यों किया ?

अथवा

अमेरिका द्वारा 2003 में इराक पर किए गए आक्रमण का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

अथवा

2003 में, अमरीका तथा उसके साथ लगभग 40 देशों ने मिलकर, सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के नाम पर आक्रमण कर दिया परंतु इराक में इन इराक को हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इस आक्रमण का क्या कोई अन्य कारण भी हो सकता था?
उत्तर : इराक पर अमेरिकी आक्रमण (2003) (America’s attack on Iraq) :
1.2003 के 19 मार्च को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूटनाम से इराक पर सैन्य- हमला किया। अमेरिकी अगुआई वाले ‘कॉअलिशन ऑफ वीलिंग्स (आकांक्षियों के महाजोट)’ में 40 से अधिक देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इराक पर इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। दिखावे के लिए कहा गया कि सामूहिक संहार के हथियार (वीपंस ऑफ मास डेस्ट्रक्शन) बनाने से रोकने के लिए इराक पर हमला किया गया है। इराक में सामूहिक संहार के हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमले के मकसद कुछ और ही थे, जैसे इराक के तेल-भंडार पर नियंत्रण और इराक में अमेरिका की मनपसंद सरकार कायम करना।
2.सद्दाम हुसैन की सरकार तो चंद रोज़ में ही जाती रही, लेकिन इराक को ‘शांत’ कर पाने में अमेरिका सफल नहीं हो सका। इराक में अमेरिका के खिलाफ एक पूर्णव्यापी विद्रोह भड़क उठा। अमेरिका के 3000 सैनिक इस युद्ध में खेत रहे जबकि इराक के सैनिक कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में मारे गये। एक अनुमान के अनुसार अमेरिकी हमले के बाद से लगभग 50000 नागरिक मारे गये हैं। अब यह बात बड़े व्यापक रूप में मानी जा रही है कि एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में इराक पर अमेरिकी हमला सैन्य और ‘राजनीतिक धरातल पर असफल सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 6. इतिहास हमें वर्चस्व (hegemony) के विषय में क्या सिखाता है ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर : वर्चस्व एवं इतिहास (Hegemony and History):
(i) वर्चस्व बदलता रहता है (Hegemony is always changed) : शक्ति-संतुलन के तर्क को देखते हुए वर्चस्व की स्थिति अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य परिघटना है। इसका कारण बड़ा सीधा-सादा है। विश्व-सरकार जैसी कोई चीज नहीं होती और ऐसे में हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है। कभी-कभी अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि कम-से-कम उसका वजूद बचा रहे। इस कारण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में विभिन्न देश शक्ति-संतुलन को लेकर बड़े सतर्क होते हैं और आमतौर पर वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि वह बाकी देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाए।
(ii) फ्रांस और ब्रिटेन का वर्चस्व (Hegemony of France and Britain) : ऊपर जिस शक्ति-संतुलन की बात कही गई है उसे इतिहास से भी पुष्ट किया जा सकता है। चलन के मुताबिक हम 1648 को वह साल स्वीकार करते हैं जब संप्रभु राज्य विश्व राजनीति के प्रमुख किरदार बने। इसके बाद से साढ़े तीन सौ साल गुजर चुके हैं। इस दौरान सिर्फ दो अवसर आए जब किसी एक देश ने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर वही प्रबलता प्राप्त की जो आज अमेरिका को हासिल है। यूरोप की राजनीति के संदर्भ में 1660 से 1713 तक फ्रांस का दबदबा था और यह वर्चस्व का पहला उदाहरण है। ब्रिटेन का वर्चस्व और समुद्री व्यापार के बूते . कायम हुआ उसका साम्राज्य 1860 से 1910 तक बना रहा। यह वर्चस्व का दूसरा उदाहरण है।
(iii) वर्चस्व का अंत अवश्यंभावी है (End of Hegemony is must ) : इतिहास यह भी बताता है कि वर्चस्व अपने चरमोत्कर्ष के समय अजेय जान पड़ता है, लेकिन यह हमेशा के लिए कायम नहीं रहता। इसके ठीक विपरीत शक्ति-संतुलन की राजनीति वर्चस्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है। 1660 में लुई 14वें के शासनकाल में फ्रांस अपराजेय था लेकिन 1713 तक इंग्लैंड, हैब्सबर्ग, ऑस्ट्रिया और रूस फ्रांस की ताकत को चुनौती देने लगे। 1860 में विक्टोरियाई शासन का सूर्य अपने पूरे उत्कर्ष पर था और ब्रिटिश साम्राज्य हमेशा के लिए सुरक्षित लगता था। 1910 तक यह स्पष्ट हो गया कि जर्मनी, जापान और अमेरिका ब्रिटेन की ताकत को ललकारने के लिए उठ खड़े हुए हैं। इसी तरह, अब से 20 साल बाद एक और महाशक्ति या कहें शक्तिशाली देशों का गठबंधन उठ खड़ा हो सकता है क्योंकि तुलनात्मक रूप से देखें तो अमेरिका की ताकत कमजोर पड़ रही है।

प्रश्न 7. सैन्य शक्ति के रूप में “अमेरिका वर्यस्व” के कोई दो उदाहरण दीजिए?
उत्तर : सैन्य शक्ति के रूप में अमेरिकी वर्यस्व के दो उदाहरण :
1.अमरीका की मौजूदा ताकत की रीढ़ उसकी बढ़ी-चढ़ी सैन्य शक्ति है। आज अमरीका की सैन्य शक्ति अपने आप में अनूठी है और बाकी देशों की तुलना में बेजोड़। अनूठी इस अर्थ में कि आज अमरीका अपनी सैन्य क्षमता के बूते पूरी दुनिया में कहीं भी निशाना साध सकता है। उसके पास एकदम सही समय में अचूक और घातक वार करने की क्षमता है। अपनी सेना को युद्धभूमि से अधिकतम दूरी पर सुरक्षित रखकर वह अपने दुश्मन को उसके घर में ही पंगु बना सकता है।
2.अमरीकी सैन्य शक्ति का यह अनूठापन अपनी जगह लेकिन इससे भी ज्यादा विस्मयकारी तथ्य यह है कि आज कोई भी देश अमरीकी सैन्य शक्ति की तुलना में उसके बराबर भी नहीं है। अमरीका से नीचे के कुल 12 ताकतवर देश एक साथ मिलकर अपनी सैन्य क्षमता के लिए जितना खर्च करते हैं उससे कहीं ज्यादा अपनी सैन्य क्षमता के लिए अकेले अमरीका करता है। इसके अतिरिक्त, पेंटागन अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा रक्षा अनुसंधान और विकास के मद में अर्थात् प्रौद्यागिकी पर खर्च करता है। इस प्रकार अमरीका के सैन्य प्रभुत्व का आधार सिर्फ उच्च सैन्य व्यय नहीं बल्कि उसकी गुणात्मक बढ़त भी है। अमेरीका आज सैन्य प्रौद्योगिकी के मामले में इतना आगे है कि किसी और देश के लिए इस मामले में उसकी बराबरी कर पाना संभव नहीं है।

प्रश्न 8. एक आक्रमण में सैनिक बल प्रायः जिन चार नियत कार्यों को पूरा करना चाहते हैं उनका उल्लेख कीजिए। इराक पर आक्रमण में किस कार्य में अमरीका की गंभीर कमजोरी प्रतिबिम्बित हुई ?
उत्तर : एक आक्रमण में सैनिक बल का प्रयोग प्रायः निम्नलिखित चार नियत कार्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है :
1.उस देश या क्षेत्र को जीतने के लिए।
2.अपराधी देश या शत्रु पक्ष को अपराध करने (उसके मार्ग) में अड़चनें पैदा करने) के लिए या उसे रोकने के लिए।
3.शत्रु देश को दंड देने के लिए।
4.इच्छित क्षेत्र अथवा देश में कानून तथा व्यवस्था बहाल करने के लिए।

अमेरिकी कमजोरी :
(क) 2003 के 19 मार्च को अमेरिका ने ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के कूटनाम से इराक पर सैन्य हमला किया। अमेरिकी ‘अगुआई वाले ‘कॉअलिशन ऑफ वीलिंग्स (आकाक्षियों के महाजोट) ‘ में 40 से अधिक देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने इराक पर इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। दिखावे के लिए कहा गया कि सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने के लिए इराक पर हमला किया गया है। इराक में सामूहिक संहार के हथियारों की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमले के मकसद कुछ और ही थे, जैसे इराक के तेल-भंडार पर नियंत्रण और इराक में अमेरिका की मनपसंद सरकार कायम करना।
(ख) सद्दाम हुसैन की सरकार तो चंद रोज में ही जाती रही, लेकिन इराक को ‘शांत’ कर पाने में अमेरिका सफल नहीं हो सका है। इराक में अमेरिका के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह भड़क उठा। अमेरिका के 3000 सैनिक इस युद्ध में खेत रहे जबकि इराक के सैनिक कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में मारे गये। एक अनुमान के अनुसार अमेरिकी हमले के बाद से लगभग 50000 नागरिक मारे गये हैं। अब यह बात बड़े व्यापक रूप में मानी जा रही है कि एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में इराक पर अमेरिकी हमला सैन्य और राजनीतिक धरातल पर असफल सिद्ध हुआ है।

प्रश्न 9. “बैंड-वैगन” की रणनीति से क्या अभिप्राय है? यह ‘छुपा लो’ की रणनीति से कैसे भिन्न है ?
उत्तर : “बैंड-वैगन” की रणनीति अमेरिका के वर्चस्व से सम्बन्धित है। विश्व के रणनीतिकारों के लिए सदैव यह एक कठिन प्रश्न रहा है कि अमेरिका के वर्चस्व से कैसे निपटा जाए। कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि अमेरिका से संघर्ष करने की अपेक्षा उसके वर्चस्व के साये में आकर अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। उदाहरण के लिए देश के आर्थिक विकास के लिए निवेश करना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा व्यापार को बढ़ावा देना आवश्यक है। और ये सभी आवश्यकताएँ अमेरिका के साथ रहकर पूरी हो सकती हैं। इस रणनीति को ही “बैंड-वैगन” रणनीति कहा जाता है। “छुपा लो” की रणनीति “बैंड-वैगन” की रणनीति से अलग है। इस नीति के अन्तर्गत एक देश अपने आपको इस प्रकार छुपा लेता है कि वह अमेरिका की नजरों में न चढ़ पाए।

प्रश्न 10. अमेरिकी वर्चस्व से निपटने के लिए विभिन्न उपायों का विश्लेषण कीजिए। अथवा विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमरीका के वर्चस्व पर कैसे अंकुश लगाया जा सकता है?
उत्तर : अमेरिका के वर्चस्व से निपटारा : (1) संयुक्त राज्य अमेरीका के बढ़ते वर्चस्व ने विचारकों को सोचने के लिए विवश कर दिया है। उनके समक्ष अनेक प्रश्न आ रहे हैं। जैसे कि कब तक चलेगा अमरीकी वर्चस्व? इस वर्चस्व से कैसे बचा जा सकता है? जाहिरा तौर पर ये सवाल हमारे वक्त के सबसे झंझावाती सवाल हैं। इतिहास से हमें इन सवालों के जवाब के कुछ सुराग मिलते हैं लेकिन बात यहाँ इतिहास की नहीं वर्तमान और भविष्य की हो रही है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में ऐसी चीजें गिनी-चुनी ही हैं जो किसी देश की सैन्यशक्ति पर लगाम कस सकें। हर देश में सरकार होती है लेकिन विश्व-सरकार जैसी कोई चीज नहीं होती।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति दरअसल ‘सरकार विहीन’ राजनीति कुछ कायदे-कानून जरूर हैं जो युद्ध पर अंकुश रखते हैं लेकिन ये कायदे-कानून युद्ध को रोक नहीं सकते। फिर, शायद ही कोई देश होगा जो अपनी सुरक्षा को अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के हवाले कर दे। तो क्या इन बातों से यह समझा जाए कि न तो वर्चस्व से कोई छुटकारा है और न ही युद्ध से।
(3) फिलहाल हमें यह बात मान लेनी चाहिए कि कोई भी देश अमरीकी सैन्यशक्ति के जोड़ का मौजूद नहीं है। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों में अमरीकी वर्चस्व को चुनौती दे पाने की सम्भावना है लेकिन इन देशों के बीच आपसी मतभेद हैं और इन विभेदों के रहते उनका अमेरिका के विरुद्ध फिलहाल कोई गठबंधन संभव नहीं हो सकता।

प्रश्न 11. ‘ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम’ क्या था? यह अमेरिकी वर्चस्व को कैसे दर्शाता है ?

अथवा

“ऑपरेशन एन्डयूरिंग फ्रीडम” से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- I. अर्थ- यह 11 सितंबर, 2001 को अल-कायदा संगठन के आतंकवादियों द्वारा न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर किए गए आक्रमण के विरुद्ध अमेरिका द्वारा समूचे विश्व से आतंकवादियों का नामोनिशान मिटाने का एक बहुत ही खतरनाक अभियान था। इसका मुख्य निशाना अफगानिस्तान का तालिबान शासन और अल-कायदा संगठन था।
II. वर्चस्व की अभिव्यक्ति
(i) समूचे विश्व में इस अभियान को चलाकर निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करने और उन्हें खुफिया जेलों में बंदी बनाने तथा
(ii) ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम को संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना चलाने से अमरीकी वर्चस्व की झलक मिलती है।

प्रश्न 12. किन्हीं ऐसी चार वास्तविकताओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने शीत युद्ध के बाद विश्व राजनीति को बदल दिया।
उत्तर : (i) शीत युद्ध के बाद से आज तक संयुक्त राज्य अमरीका विश्व की अकेली महाशक्ति बन बैठा है। अमरीका की ताकत और प्रतिष्ठा ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था को थोप दिया है।
(ii) विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष पर अमरीका का प्रभाव है और इनके कर्ज से दबे विश्व के लगभग सभी देश विश्व व्यापार संगठन के नियमों को मानने के लिए लाचार हैं।
(iii) यह ठीक है कि रूस पहले के सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बना है और स्वतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रकुल (CIS) का मुखिया है लेकिन यह पहले जितना शक्तिशाली नहीं रहा और इसका पूर्वी गठबंधन (वार्सा पैक्ट) भी दम तोड़ चुका है।
(iv) अब संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन एवं सुधारों की बात की जा रही है। अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण तथा अपरंपरागत सुरक्षा के क्षेत्र का भी विस्तार किया जा रहा है और राष्ट्र सुरक्षा से अधिक व्यष्टि सुरक्षा को महत्त्व दिया जाने लगा है।

प्रश्न 13. 1991 में ‘नई विश्व व्यवस्था’ (New World Order) की शुरुआत कैसे हुई ?

अथवा

‘नई विश्व व्यवस्था’ (New World Order) क्या है ?
उत्तर : नई विश्व व्यवस्था तथा इसकी शुरुआत (Meaning and Beginning of New World Order) :
1.सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति के रूप में बने रहने को नई विश्व व्यवस्था कहा जाता है। सोवियत संघ के अचानक विघटन से हर कोई आश्चर्यचकित रह गया। दो महाशक्तियों (अमेरिका तथा सोवियत संघ) में अब एक का वजूद तक न था जबकि दूसरा अपनी पूरी ताकत, या कहें कि बढ़ी हुई ताकत के साथ कायम था। इस तरह जान पड़ता है कि अमेरिका के वर्चस्व (Hegemony) की शुरुआत 1991 में हुई जब एक ताकत के रूप में सोवियत संघ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य से गायब हो गया। एक सीमा तक यह बात सही है लेकिन हमें इसके साथ-साथ दो और बातों का ध्यान रखना होगा।
2.पहली बात यह है कि अमेरिकी वर्चस्व के कुछ पहलुओं का इतिहास 1991 तक सीमित नहीं है बल्कि इससे कहीं पीछे दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के समय 1945 तक जाता है।.
3.दूसरी बात, अमेरिका ने 1991 से ही वर्चस्वकारी क की तरह बर्ताव करना शुरू नहीं किया। दरअसल, यह बात ही बहुत बाद में जाकर साफ हुई कि दुनिया वर्चस्व के दौर में जी रही है।

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