Class 12th Political Science Chapter 4 Important Question Answer 3 Marks सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र

प्रश्न 1. क्षेत्रीय संगठनों की स्थापना के किन्हीं चार उद्देश्यों को सूचीबद्ध कीजिए हैं
उत्तर : क्षेत्रीय संगठनों की स्थापना के चार उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(i) क्षेत्रीय संगठनों को बनाने का उद्देश्य अपने-अपने इलाके में चलने वाली ऐतिहासिक दुश्मनियों को भुला देना है। साथ-ही-साथ जो भी कमजोरियाँ या कठिनाइयाँ क्षेत्रीय देशों के सामने आएँ उन्हें .परस्पर सहयोग से स्थानीय स्तर पर उनका समाधान ढूँढ़ने का प्रयास किया जाए।
(ii) क्षेत्रीय संगठनों का उद्देश्य यह भी है कि क्षेत्रीय संगठनों के के सदस्य राष्ट्र अपने-अपने इलाकों में अधिक शांतिपूर्ण और सहकारी क्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने की कोशिश करें। वे चाहते हैं कि वे अपने क्षेत्र के देशों की अर्थव्यवस्थाओं का समूह बनाने की दिशा में कार्य करें। इसके दो उदाहरण यूरोपीय संघ और आसियान हैं।
(iii) क्षेत्रीय संगठन अमरीका के राजनीतिक तथा आर्थिक प्रभुत्व पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं। इस संदर्भ में यूरोपियन यूनियन तथा आसियान की भूमिका महत्वपूर्ण है।
(iv) क्षेत्रीय संगठन विकास की विषमताओं को काफी हद तंक दूर कर सकते हैं। इन संगठनों का उद्देश्य शांतिपूर्ण तथा सहयोगात्मक तरीके से विकास करना है।

प्रश्न 2. एक आर्थिक समुदाय के रूप में बने यूरोपीय संघ ने एक राजनीतिक संगठन का रूप क्यों ले लिया?
उत्तर : (i) एक लंबे समय में बना यूरोपीय संघ आर्थिक सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक रूप लेता गया है। अब यूरोपीय संघ स्वयं काफी हद तक एक विशाल राष्ट्र-राज्य की तरह ही काम करने लगा। हालांकि यूरोपीय संघ का एक संविधान बनाने की कोशिश तो असफल हो गई। लेकिन इसका अपना झंडा, गान स्थापना दिवस और अपनी मुद्रा है। अन्य देशों से संबंधों के मामले में इसने काफी हद तक साझी विदेश सुरक्षा नीति भी बना ली है। नए सदस्यों को शामिल करते हुए यूरोपीय संघ ने सहयोग के दायरे के विस्तार की कोशिश की। नए सदस्य मुख्यत: भूतपूर्व सोवियत खेमे के थे। यह प्रक्रिया आसान नहीं रही। अनेक देशों के लोग इस बात को लेकर खास उत्साहित नहीं थे कि जो ताकत उनके देश की सरकार को हासिल थी वह अब यूरोपीय संघ को दे दी जाए। यूरोपीय संघ में कुछ देशों का शामिल करने के सवाल पर भी असहमति है।
(ii) यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव बहुत जबरदस्त है। इसकी आर्थिक शक्ति का प्रभाव इसके नजदीकी देशों पर ही नहीं, बल्कि एशिया और अफ्रीका के दूर-दराज के मुल्कों पर भी है। यह विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठनों के अंदर एक महत्त्वपूर्ण समूह के रूप में काम करता है।
(iii) यूरोपीय संघ के दो सदस्य देश ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। यूरोपीय संघ के कई और देश सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य हैं। चीन के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरण विनाश के मामलों पर धमकी या सैनिक शक्ति का उपयोग करने की जगह कूटनीति, आर्थिक निवेश औ बातचीत की इसकी नीति ज्यादा प्रभावी साबित हुई है।
(iv) अधिराष्ट्रीय संगठन के तौर पर यूरोपीय संघ आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मामलों में दखल देने में सक्षम है लेकिन अनेक मामलों में इसके सदस्य देशों की अपनी विदेश और रक्षा नीति है जो कई बार एक-दूसरे के खिलाफ भी होती है।

प्रश्न 3. आपके विचार में चीन के अलावा कौन-सा देश आर्थिक रूप से शक्ति का वैकल्पिक केन्द्र हो सकता है ?
उत्तर : सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र (Alternative Centre of Power) : वर्तमान समय में भारत विश्व की उभरती हुई आर्थिक व्यवस्था में महाशक्ति के रूप में उभरता हुए देश है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने संचार, तकनीक, विज्ञान एवं सूचना के क्षेत्र में किसी भी देश से अधिक उन्नति की है। भारत के पास एक शक्तिशाली सेना है तथा भारत एक परमाणु संपन्न जिम्मेदार राष्ट्र है। अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका को देखते हुए ही भारत के साथ असैनिक परमाणु संधि की है। सम्भव है कि भविष्य में चीन एवं भारत एकपक्षीय विश्व को चुनौती दें। 1990 के दशक से भारत ने बड़ी तेजी से अपना आर्थिक विकास किया है। भारत ने कम्प्यूटर तथा सूचना तकनीक के क्षेत्र में विश्व में सर्वोच्च स्थान बनाया हुआ है। सूचना तकनीक का प्रत्येक जानकार आज बेंगलुरू की तरफ देखता है।

प्रश्न 4. भू-राजनीति की परिभाषा लिखिए।
उत्तर : भू-राजनीति का अभिप्राय संसाधनों (Resources) की नीति से है। इसकी व्याख्या करते हुए हम कह सकते हैं कि यह नीति इस बात के लिए चिंतित और प्रयत्नशील रहती है कि पृथ्वी पर विद्यमान संसाधनों में से किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है। यह राजनीति विश्व स्तर पर इन्हीं प्रश्नों से जूझती रहती है। यूरोपीय शक्तियाँ और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साधन और उद्देश्य संसाधन प्राप्ति को ही रखते हैं। वस्तुत: भूमि स्तर पर संसाधनों को लेकर राज्यों के बीच तनातनी हुई है। संसाधनों से जुड़ी भू-राजनीति को पश्चिमी दुनिया ने ज्यादातर व्यापारिक संबंध, युद्ध तथा ताकत के संदर्भ में सोचा है। इस सोच के मूल में विदेश में संसाधनों की मौजूदगी तथा समुद्री नौवहन में दक्षता है।

प्रश्न 5. दक्षिण एशिया में कौन-कौन से देश सम्मिलित हैं? इस क्षेत्र में शांति और सहयोग को कैसे बढ़ाया जा सकता है ?
उत्तर : I. देश : प्राय: (i) बांग्लादेश, (ii) भूटान, (iii) मालदीव, (iv) भारत, (v) नेपाल, (vi) पाकिस्तान और (vii) श्रीलंका (सात देशों) को इंगित करने के लिए ‘दक्षिण एशिया’ पद का व्यवहार किया जाता है।
II. शांति तथा सहयोग :
1.इस क्षेत्र में शांति के प्रयास द्विपक्षीय भी हुए हैं और क्षेत्रीय स्तर पर भी । दक्षेस (साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन) (SAARC) की स्थापना दक्षिण एशियाई देशों द्वारा बहुस्तरीय साधनों से आपस के सहयोग करने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है।
2.दक्षेस के सदस्य देशों ने सन् 2002 में दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौते (SAFTA) पर हस्ताक्षर किए। इसमें पूरे दक्षिण एशिया के लिए मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने का वायदा है। यदि दक्षिण एशिया के सभी देश अपनी सीमा रेखा के आर-पार मुक्त व्यापार पर सहमत हो जाएँ तो इस क्षेत्र में शांति और सहयोग के एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।

प्रश्न 6. सार्क (SAARC) से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व लिखो।
उत्तर : सार्क (SAARC) : दक्षेस एक दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन अथवा संघ है जिसका गठन दिसम्बर 1985 में ढाका में हुआ। इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल श्रीलंका और मालदीव सात देश सम्मिलित हैं।

महत्त्व (Importance) :
(1) सार्क संगठन ने दक्षिण एशिया के लोगों के कल्याण तथा उसके आजीविका स्तर को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
(2) इसके द्वारा इस क्षेत्र में और अधिक विकास, सामाजिक उन्नति तथा सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
(3) इस संगठन के द्वारा दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास की भावना को बढ़ावा मिला है।
(4) सार्क के सभी सातों देशों की आपसी समस्याओं की पारस्परिक विश्वास तथा सूझ-बूझ से सुलझाने का अवसर प्राप्त हुआ है।

प्रश्न 7. चीन के साथ भारत के सुधरते संबंधों की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : (i) 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान चीन का व्यवहार भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रहा। इसके बाद संबंधों में सुधार आया। 1976 ई. में फिर से चीन में भारत का राजदूत भेजा गया। 1985 ई. में चीन के साथ एक व्यापार समझौता किया गया। चीन ने भारत को कोयला तथा तेल आदि देना मंजूर किया और भारत से उसने कच्ची लौह धातु और चीनी उद्योग में काम आने वाली मशीनें लेना स्वीकार किया।
(ii) दिसम्बर 1988 में राजीव गाँधी द्वारा चीन का दौरा करने से भारत-चीन संबंधों को सुधारने के प्रयासों को बढ़ावा मिला। इसके बाद से दोनों देशों ने टकराव टालने और सीमा पर शांति और यथा स्थिति बनाए रखने के उपायों की शुरुआत की है। दोनों देशों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में परस्पर सहयोग और व्यापार के लिए सीमा पर चार पोस्ट खोलने के समझौते भी किए हैं।
(iii) शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से भारत-चीन संबंधों में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है। अब इनके संबंधों का रणनीतिक ही नहीं, आर्थिक पहलू भी है। दोनों ही खुद को विश्व-राजनीति की उभरती शक्ति मानते हैं और दोनों ही एशिया की अर्थव्यवस्था और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहेंगे।
(iv) 1999 से भारत और चीन के बीच व्यापार सालाना 30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। इससे चीन के साथ संबंधों में नई गर्मजोशी आई है। चीन और भारत के बीच 1992 में 33 करोड़ 80 लाख डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था जो 2006 में बढ़कर 18 अरब डॉलर का हो चुका है। हाल में दोनों देश ऐसे मसलों पर भी सहयोग करने के लिए राजी हुए हैं जिनसे दोनों के बीच विभेद पैदा हो सकते थे; जैसे-विदेशों में ऊर्जा-सौदा हासिल करने का मसला । वैश्विक धरातल पर भारत और चीन ने विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों के संबंध में एक जैसी नीतियाँ अपनाई हैं।

प्रश्न 8. आसियान के मुख्य उद्देश्यों और इसके विज़न दस्तावेज 2020 का वर्णन कीजिए।

अथवा

1967 में आसियान (ASEAN) की स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य थे ?

अथवा

आसियान के किन्हीं चार प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

अथवा

आसियान (ASEAN) के गठन के किन्हीं दो कारणों को स्पष्ट कीजिए |
उत्तर : आसियान की स्थापना के पीछे निम्न उद्देश्य थे-
(i) संयुक्त राष्ट्र के घोषणापत्र (Charter) में उल्लेखित सिद्धांतों का अनुपालन करते हुए क्षेत्रीय शांति और सुस्थिरता को प्रबल बनाना। पारस्परिक शांति, सौहार्द एवं समन्वय स्थापित करने और आत्म-विश्वास तथा आत्मरक्षा का माहौल बनाने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया के सदस्य देशों को संगठित करना ।
(ii) आर्थिक विकास को सत्वरता से आगे बढ़ाना। इन देशों में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रस्थिति का उत्थान और संस्कृति के विकास को संयुक्त सहयोग से प्राप्त / सुनिश्चित करना ।
(iii) राष्ट्रों के बीच पारस्परिक विश्वास को बढ़ाना, विचार-विनिमय को सशक्त बनाना और एक-दूसरे की समस्याओं का मूल्यांकन करना/को समझना।
(iv) दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रहने वाले लोगों को कल्याण वर्द्धन करना तथा उनके जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए तत्पर रहना। उनके बीच समय-समय पर उत्पन्न होने वाले राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुद्दों/विवादों का पुनरावलोकन करने के लिए सम्मेलन, शिखरवार्ताओं और कार्यशालाओं का आयोजन करना । पहली शिखर वार्ता 14 दिसम्बर, 2005 को क्वालालम्पुर में आयोजित की गई थी। इसमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, कोरियाई गणराज्य, न्यूजीलैंड तथा भारत ने भाग लिया था।
(v) आसियान को कार्यक्षम बनाये रखने के लिए राष्ट्रीय एकता को सम्मान देना एक निर्णायक तत्त्व है।
(vi) आसियान राष्ट्रों के लिए सांझा/सामूहिक बाजार और उत्पादन का आधार बनाना।

प्रश्न 9. “आसियान” की किन्ही चार विशेषताओं को उजागर कीजिए। (CBSE Delhi 2013)
उत्तर : आसियान की प्रमुख चार विशेषताएँ : (i) आसियान एशिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्रीय संगठन है जो एशियाई देशों और विश्व शक्तियों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चर्चा के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध कराता है। (ii) आसियान देशों को सांझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करने तथा इस इलाके के सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करने में सहयोग देता है। (iii) आसियान हर सदस्य देश में शांति, निष्पक्षता, सहयोग अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा संप्रभुता के अधिकारों का सम्मान करने पर अपनी वचनबद्धता जाहिर करता है। (iv) आसियान द्वारा टकराव की जगह बातचीत को बढ़ावा देने की नीति से बात करने की प्रबलता पर जोर देता है। (v) आसियान ने निवेश, श्रम और सेवाओं के मामले में मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने पर भी ध्यान प्रकट किया है।

प्रश्न 10. भारत और चीन के बीच विवादास्पद मामलों का परीक्षण कीजिए । बृहत्तर सहयोग के लिए उन्हें कैसे निपटाया जा सकता है। अपने सुझाव दीजिए |
उत्तर : I. सौहार्द के पहलू : प्राचीन काल से ही भारत तथा चीन के आपसी संबंध बहुत मित्रतापूर्वक रहे हैं। सन् 1949 में चीन में जब साम्यवादी शासन की स्थापना हुई तो भारत ने उसे मान्यता प्रदान की। सन् 1951 में जब चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई भारत आए तो ‘हिन्दी-चीनी-भाई-भाई’ के नारों से उनका स्वागत किया गया। देशों ने पंचशील के सिद्धांतों पर हस्ताक्षर (29 अप्रैल, 1954) करके अपने संबंधों को और अधिक मजबूत किया।
II. भारत-चीन विवाद के क्षेत्र : समय-समय पर दोनों देशों के बीच मतभेद के कई क्षेत्र रहे हैं, जो इस प्रकार हैं :
1.सन् 1950-51 में तिब्बत पर चीनी आक्रमण के समय तिब्बत के राजनीतिक तथा धार्मिक नेताओं ने भारत में शरण ली। वे अभी भी भारत में रह रहे हैं। इससे दोनों देशों में तनाव बना हुआ है।
2.दोनों देशों के बीच मैकमोहन रेखा (Mac Mohan Line) जो दोनों देशों के बीच की सीमा रेखा है, पर विवाद है। चीन ने इस सीमा-रेखा को मानने से इंकार कर दिया है।
3.पाकिस्तान ने 1965 तथा 1971 में भारत पर जब आक्रमण किए, तो चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया, उसकी सहायता की तथा उसे हथियार भी दिए। इससे भी भारत-चीन संबंधों में काफी तनाव पैदा हुआ (याद रहे, अब भी चीन भारत के कुछ पड़ोसी देशों को जिनमें पाकिस्तान के साथ म्यांमार भी शामिल है खतरनाक हथियारों के निर्माण में मदद दे रहा है।) सन् 1976 में दोनों के बीच राजदूत स्तर पर कूटनीतिज्ञ संबंध फिर से स्थापित किए गए।
सन् 1988 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी चीन के दौरे पर गए। सन् 1991 में चीन के प्रधानमंत्री ली पेंग (Li-Peng) भारत की यात्रा पर आए। सन् 1996 में चीन के राष्ट्रपति ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान भारत तथा चीन के बीच चार समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए परन्तु भारत द्वारा मई, 1998 में किए गए परमाणु परीक्षणों के पश्चात् दोनों देशों के बीच में फिर कटुता पैदा हो गई। जुलाई 2000 में चीन के विदेश मंत्री भारत की यात्रा पर आए और इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार वृद्धि तथा सीमा विवाद को हल करने के बारे में सहमति हुई परंतु सीमा विवाद (Border dispute) अभी तक हल न हो पाने के कारण दोनों देशों के संबंध मित्रतापूर्ण नहीं कहे जा सकते।

प्रश्न 11. यूरो अमेरिकी डॉलर के लिए खतरा कैसे बन सकता है ?
उत्तर : 1. यूरो यूरोपीय संघ की मुद्रा है। यूरो अमरीकी डॉलर ‘प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकता है। यूरोपीय संघ के सदस्यों की सांझी मुद्रा यूरो का प्रचलन बढ़ रहा है। जैसे-जैसे इसकी सदस्यता में बढ़ोत्तरी होगी, यूरो डॉलर को चुनौती देता नजर आएगा। विश्व व्यापार में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी अमरीका से तीन गुनी ज्यादा है और इसी के चलते वह अमरीका और चीन व्यापारिक विवादों में पूरी धौंस के साथ बात करता है ।
2.यूरोपीय संघ के आर्थिक प्रभाव के साथ-साथ राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव भी जबरदस्त है। उसे अमरीका धौंस नहीं दे सकता।
3.2005 में यह (यूरोपीय संघ की) दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पादन 12000 अरब डालर से भी अधिक था जो अमरीका से भी ज्यादा था।
4.यूरोपीय संघ की आर्थिक शक्ति का प्रभाव नजदीकी देशों पर ही नहीं बल्कि एशिया और अफ्रीका के दूरदराज के मुल्कों पर भी है। इससे भी अमरीका तथा इसकी अर्थव्यवस्था को चिंता हो सकती है।
5.यूरोपीय संघ विश्व संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन के अंदर एक महत्त्वपूर्ण समूह के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 12. यूरोपीय संघ की कोई चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर : (1) यूरोपीय संघ की सांझी मुद्रा, स्थापना दिवस, गान एवं झंडा है।
(2) यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक एव सैनिक प्रभाव बहुत अधिक है।
(3) यूरोपीय संघ के दो सदस्य (इंग्लैंड एव फ्रांस) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।
(4) यूरोपीय संघ आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मामलों में दखल देने में सक्षम है।

प्रश्न 13. यूरोपीय संघ के गठन का क्या कारण था ?
उत्तर : (i) दूसरे विश्व युद्ध की मार से त्रस्त और पस्त यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्था को पुनः गतिशील बनाना आवश्यक हो गया था।
(ii) यूरोप के इन देशों ने सबसे पहले इस्पात और कोयले की कमी महसूस की। उनके उद्योग और कारखाने बंद होने के कगार पर पहुँच गए थे। अत: सबसे पहले अप्रैल 1951 को यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय का गठन हुआ।
(iii) परमाणु ऊर्जा और व्यापार बढ़ाने के लिए यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) और यूरोपीय ऊर्जा समुदाय बने। अंततः इन समुदायों को यूरोपीय संघ में फरवरी, 1992 की मास्ट्रिस्ट संधि से विलीन किया गया।

प्रश्न 14. राजनीतिक एवं आर्थिक एकांतवास की समाप्ति करने से पहले चीन को किस-किस संकट का सामना करना पड़ा? संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।

अथवा

चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार के बावजूद, चीन की जनता पर पड़े किन्हीं चार नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर : राजनीतिक एवं आर्थिक एकांतवास की समाप्ति करने से पहले चीन को निम्नलिखित संकटों का सामना करना पड़ा :
(i) चीन की साम्यवादी क्रांति 1949 में माओ के नेतृत्व में हुई थी तथा क्रांति के पश्चात् चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना हुई। चीन की आर्थिक व्यवस्था का ताना-बाना सोवियत मॉडल . पर आधारित था। साम्यवादी चीन आर्थिक तौर पर पिछड़ा हुआ था तथा उसने (चीन ने) पूँजीवादी दुनिया से अपने ताल्लुक खत्म कर लिए थे।
(ii) राजनीतिक तथा आर्थिक एकांतवास के इस दौर में चीन के पास अपने संसाधनों से गुजारा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था।
(iii) चीन के पास विदेशी बाजारों से तकनीक और सामानों को खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा का अभाव था। परिणामस्वरूप, चीन ने आयातित सामानों को धीरे-धीरे घरेलू स्तर पर बनाना प्रारंभ कर दिया।
(iv) अर्थव्यवस्था के इस नए मॉडल से चीन ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया तथा अपने तमाम संसाधनों का प्रयोग किया। सभी नागरिकों को रोजगार तथा सामाजिक कल्याण की योजनाओं के अंतर्गत लाया गया। इसके कारण अर्थव्यवस्था का विकास 5 से 6 प्रतिशत सालाना वृद्धि की दर से हुआ। लेकिन आबादी में 2-3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि विकास की दर को प्रभावहीन बना रही थी। परिणामस्वरूप, निरंतर बढ़ती आबादी विकास के लाभ से वंचित हो रही थी। खेती का उत्पादन उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुकूल अधिशेष नहीं दे पा रहा था।

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