Class 12th Political Science Chapter 4 Important Question Answer 8 Marks सत्ता के वैकल्पिक केन्द्र

प्रश्न 1. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से 1962 तक चीन के साथ भारत के संबंधों का वर्णन करो।

अथवा

भारत और चीन किस प्रकार महान आर्थिक शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं ?
उत्तर : भारत और चीन का महान आर्थिक शक्तियों के रूप में उभरना-
(i) चीन और भारत दोनों एशिया के दो प्राचीन, महान शक्तिशाली, साधनसंपन्न देश हैं। दोनों में परस्पर सुदृढ़ मित्रता और सहयोग अमेरिका के लिए चिंता का कारण बन सकता है। दोनों देश अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक और आर्थिक मंचों पर एक सी नीति और दृष्टिकोण अपनाकर एकध्रुवीय विश्वव्यवस्था के संचालन करने वाले राष्ट्र अमेरिका और उसके मित्रों को चुनौती देने में सक्षम हैं।
(ii) भारत और चीन दोनों विकासशील देश हैं। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएँ हैं। दोनों देश नई अर्थव्यवस्था, मुक्त व्यापार नीति, उदारीकरण, वैश्वीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के पक्षधर हैं। दोनों देश विदेशी पूँजी निवेश का स्वागत करके एकध्रुवीय महाशक्ति अमेरिका और अन्य बहुराष्ट्रीय निगम समर्थक कंपनियाँ स्थापित और संचालन करने वाले राष्ट्रों को लुभाने, आंतरिक आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करके अपने यहाँ आर्थिक विकास की गति को बहुत ज्यादा बढ़ा सकते हैं।
(iii) दोनों ही राष्ट्र अपने यहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों में परस्पर सहयोग करके प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति दिखा सकते हैं।
(iv) दोनों देश विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेते समय अमेरिका और अन्य बड़ी शक्तियों की मनमानी शर्तें थोपने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रख सकते हैं। दोनों देश सच्चे दिल से पारस्परिक लाभकारी व्यापार नीतियाँ और उदारीकरण को सुदृढ़ करने वाले कदम उठा सकते हैं।
(v) चीन और भारत तस्करी रोकने, नशीली दवाओं के उत्पादन, विनिमय, वितरण, प्रदूषण फैलाने में सहायक कारकों और आतंकवादियों की गतिविधियों को रोकने में पूर्ण सहयोग देकर भी विश्वव्यवस्था की चुनौतियों को कम कर सकते हैं। क्योंकि इन क्षेत्रों में सहयोग से न केवल कीमतों के बढ़ने की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है बल्कि लोगों का स्वास्थ्य और सुरक्षा बढ़ेगी। दोनों देशों में आंतरिक सद्भाव, शांति, औद्योगिक विकास के अनुकूल वातावरण से निःसंदेह विदेशी पूँजी, उद्यमियों, व्यापारियों, नवीनतम प्रौद्योगिकी आदि के आने और नई-नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना, विभिन्न प्रकार की सेवाओं की वृद्धि और विस्तार में मदद मिलेगी।

प्रश्न 2. एक आर्थिक संघ के रूप में, आसियान (ए. एस.ई.ए.एन) की भूमिका का आकलन कीजिए।
उत्तर : एक आर्थिक संघ के रूप में आसियान की भूमिका :
(i) दुनिया में सबसे तेज रफ्तार से आर्थिक तरक्की करने वाले सदस्य देशों के समूह आसियान ने अब अपने उद्देश्यों को आर्थिक और सामाजिक दायरे से ज्यादा व्यापक बनाया है।
(ii) आसियान सुरक्षा समुदाय क्षेत्रीय विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाने की सहमति पर आधारित है। 2003 तक आसियान के सदस्य देशों ने कई समझौते किए जिनके द्वारा हर सदस्य देश ने शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर संप्रभुता के अधिकारों का सम्मान करने पर अपनी वचन बद्धता जाहिर की।
(iii) आसियान ने निवेश, श्रम और सेवाओं के मामले में मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने पर भी ध्यान दिया है। इस प्रस्ताव पर आसियान के साथ बातचीत करने पहल अमरीका और चीन ने कर भी दी है।
(iv) आसियान की मौजूदा आर्थिक शक्ति, खास तौर से भारत और चीन जैसे तेजी से विकसित होने वाले एशियाई देशों के साथ व्यापार और निवेश के मामले में उसकी प्रासंगिकता ने इसे और भी आकर्षक बना दिया है।
(v) आसियान की असली ताकत अपने सदस्य देशों, सहभागी सदस्यों और बाकी गैर-क्षेत्रीय संगठनों के बीच निरंतर संवाद और परामर्श करने की नीति में हैं। यह एशिया का एकमात्र ऐसा क्षेत्रीय संगठन है जो एशियाई देशों और विश्व शक्तियों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चर्चा के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध कराता है।

प्रश्न 3. 1945 में यूरोपीय राज्यों के विनाश तथा आर्थिक बर्बादी के पश्चात यूरोपीय संघ के आविर्भाव तथा विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1945 में यूरोपीय राज्यों के विनाश तथा आर्थिक बर्बादी के पश्चात यूरोपीय संघ के आविर्भाव तथा विकास का वर्णन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है : (i) 1945 के बाद यूरोप के देशों में मेल-मिलाप को शीत युद्ध के कारण भी सहयोग हासिल हुआ। 1945 तक यूरोपीय देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं का विनाश देखा था तथा उन मान्यताओं एवं व्यवस्थाओं को भी ध्वस्त होते देखा था, जिन पर यूरोप आधारित था। यूरोप की अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन में अमरीका ने जबरदस्त सहयोग दिया। 1948 में ‘मार्शल योजना के तहत ‘यूरोपीय आर्थिक संगठन’ की स्थापना की गई। इस संगठन के माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों की आर्थिक मदद की गई। 1949 में ‘यूरोपीय परिषद’ राजनीतिक सहयोग के मामले में महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुई। 1957 में ‘यूरोपियन इकॉनॉमिक कम्युनिटी’ का गठन किया गया। ‘यूरोपियन पार्लियामेंट’ के गठन के पश्चात इसने राजनीतिक रूप ले लिया। 1992 में ‘यूरोपीय संघ’ की स्थापना से समान विदेश, सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से संबद्ध विषयों पर सहयोग तथा एकसमान मुद्रा (यूरो) का मार्ग तैयार हो गया। सोवियत गुट के पतन के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई।
(ii) 2005 में यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पाद अमरीका से अधिक अर्थात 12000, अरब डॉलर से भी अधिक था। इसकी मुद्रा यूरो अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमेरिका से तीन गुना ज्यादा है और इसी के चलते यह अमेरिका और चीन से व्यापारिक विवादों में पूरे प्रभुत्व के साथ बात करता है। इसकी आर्थिक शक्ति का प्रभाव इसके नजदीकी देशों पर ही नहीं, बल्कि एशिया और अफ्रीका के दूर-दराज के देशों पर भी है। यह विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठनों के अंदर एक महत्त्वपूर्ण समूह के रूप में काम करता है।
(iii) इसके दो सदस्य देश-ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य और कई अन्य देश सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य हैं। इसके चलते यूरोपीय संघ अमेरिका सहित तमाम देशों की नीतियों को प्रभावित करता है।
(iv) सैन्य शक्ति की दृष्टि से यूरोपीय संघ के पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसका कुल रक्षा बजट अमेरिका के पश्चात सबसे अधिक है। यूरोपीय संघ के दो देशों-ब्रिटेन और फ्रांस के पास लगभग 550 परमाणु हथियार हैं। अंतरिक्ष विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी यूरोपीय संघ का दुनिया में दूसरा स्थान है।

प्रश्न 4. किस आधार पर यह कहा जा सकता है कि 2040 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होगा जो अमरीका से आगे निकल जाएगा? विश्लेषण कीजिए ।

अथवा

तीव्र गति से विकास के लिए चीन द्वारा अपनाई गई किन्हीं चार आर्थिक नीतियों का वर्णन कीजिए ।

अथवा

चीन की अर्थव्यवस्था को उत्थान की दिशा में ले जाने वाले किन्हीं तीन कारकों का मूल्यांकन कीजिए ।
उत्तर : 2040 ई. तक चीन एक आर्थिक शक्ति के रूप में :
1.1978 के बाद से जारी चीन की आर्थिक सफलता को एक महाशक्ति के रूप में इसके उभरने के साथ जोड़कर देखा जाता है। आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने के बाद से चीन सबसे ज्यादा तेजी से आर्थिक वृद्धि कर रहा है और माना जाता है कि इस रफ्तार से चलते हुए 2040 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, अमेरिका से भी आगे निकल जाएगा। आर्थिक स्तर पर अपने पड़ोसी मुल्कों से जुड़ाव के चलते चीन पूर्व एशिया के विकास का इंजन-जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्रीय मामलों में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया है। इसकी विशाल आबादी, बड़ा भू-भाग, संसाधन, क्षेत्रीय अवस्थिति और राजनैतिक प्रभाव इस तेज आर्थिक वृद्धि के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। चीन ने ‘शॉक थेरेपी’ पर अमल करने के बजाय अपनी अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध ढंग से खोला ।
2.नयी आर्थिक नीतियों के कारण चीन की अर्थव्यवस्था को अपनी जड़ता से उबरने में मदद मिली। कृषि के निजीकरण के कारण कृषि उत्पादों तथा ग्रामीण आय में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निजी बचत का परिमाण बढ़ा और इससे ग्रामीण उद्योगों की तादाद बड़ी तेजी से बढ़ी। उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज रही। व्यापार के नये कानून तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों (स्पेशल इकॉनामिक जोन (SEZ) के निर्माण से विदेश-व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
3.चीन पूरे विश्व में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक देश बनकर उभरा। चीन के पास विदेशी मुद्रा का अब विशाल भंडार है और इसके दम पर चीन दूसरे देशों में निवेश कर रहा है। चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हो गया। इस तरह दूसरे देशों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था खोलने की दिशा में चीन ने एक कदम और बढ़ाया। अब चीन की योजना विश्व आर्थिकी से अपने जुड़ाव को गहरा करके भविष्य की विश्व व्यवस्था को एक मनचाहा रूप देने की है।
4.आज क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर चीन एक ऐसी जबरदस्त आर्थिक शक्ति बनकर उभरा है कि सभी देश उसका लोहा मानने लगे हैं। चीन की अर्थव्यवस्था का बाहरी दुनिया से जुड़ाव और पारस्परिक निर्भरता ने अब यह स्थिति बना दी है कि अपने व्यावसायिक साझीदारों पर चीन का जबरदस्त प्रभाव बन चुका है और यही कारण है कि जापान, अमेरिका, आसियान और रूस- सभी व्यापार के आगे चीन से बाकी विवादों को भुला चुके हैं। उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही चीन और ताइवान के मतभेद भी खत्म हो जायेंगे और ताइवान इसकी अर्थव्यवस्था के साथ ज्यादा घनिष्ठ रूप से जुड़ जायेगा। 1997 के वित्तीय संकट के बाद आसियान देशों की अर्थव्यवस्था को टिकाए रखने में चीन के आर्थिक उभार ने काफी मदद की है। लातिनी अमेरिका और अफ्रीका में निवेश और मदद की इसकी नीतियाँ बताती हैं कि विकासशील देशों के मामले में चीन एक नई विश्व शक्ति के रूप में उभरता जा रहा है।
अंततः कहा जा सकता है कि चीन की विकास दर यदि इसी तरह रही तो वह 2040 तक क्या उसके पूर्व ही दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होगा। स्वयं अमेरिकी सरकार और अर्थशास्त्रियों का भी यही मत है।

प्रश्न 5. 2020 के लिए आसियान की स्वप्न दृष्टि की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : (i) पृष्ठभूमि : शीत युद्ध के दौर में आए टकरावों और भागमभाग की स्थिति को दक्षिण-पूर्व एशिया संभालने की स्थिति में नहीं था। बांडुंग सम्मेलन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से एशिया और तीसरी दुनिया के देशों में अनौपचारिक स्र पर सहयोग और मेलजोल कराने के प्रयास कारगर नहीं हो रहे थे। इन प्रयासों ने ही अंतत: दक्षिण-पूर्व एशियाई संगठन (आसियान) को जन्म दिया।
आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। इसके विजन (स्वप्नदृष्टि दस्तावेज या साझी योजना का मसौदा ) 2020 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बहिर्मुखी भूमिका को प्रमुखता दी गई है। आसियान शैली का महत्त्व और विस्तार इसकी राष्ट्रों के बीच विश्वास निर्माणी उपायों में हमेशा सफल रहने वाली नीति के कारण ही है। इसी तरकीब से आसियान ने कंबोडिया के टकराव को समाप्त किया, पूर्वी तिमोर के संकट को संभाला और पूर्व एशियाई सहयोग पर बातचीत के लिए 1999 से नियमित रूप से वार्षिक बैठक आयोजित कर रहा है।
आसियान आर्थिक समुदाय का उद्देश्य आसियान देशों का साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना तथा इस इलाके के सामाजिक और आर्थिक विकास में मदद करना है। यह संगठन इस क्षेत्र के देशों के आर्थिक विवादों को निपटाने के लिए बनी मौजूदा व्यवस्था को भी सुधारना चाहेगा। आसियान ने निवेश, श्रम और सेवाओं के मामले में मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने पर भी ध्यान दिया है। इस प्रस्ताव पर आसियान के साथ बातचीत करने की पहल अमेरिका और चीन ने कर भी दी है। आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है।
आसियान समुदाय के मुख्य स्तंभों और उनके उद्देश्यों का वर्णन इस प्रकार है :
(1) बैंकॉक घोषणा : 1967 में पाँच देशों ने बैंकॉक घोषणा करके ” आसियान” की स्थापना की थी। ये देश थे- इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर और थाईलैंड । आर्थिक विकास को तेज करना तथा उसके माध्यम से ही सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की ओर अग्रसर होना इसका मुख्य उद्देश्य था। संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्तर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित क्षेत्रीय शक्ति और स्थायित्व को बढ़ावा देना इसका प्रमुख कार्य था।
(2) आसियान शैली : यूरोपीय संघ की तरह इसने स्वयं को अधिराष्ट्रीय संगठन बनाने या उसकी तरह अन्य व्यवस्थाओं को अपने हाथ में लेने का लक्ष्य नहीं रखा। अनौपचारिक, टकराव रहित और सहयोगात्मक मेल-मिलाप का नया उदाहरण पेश करके आसियान ने काफी यश कमाया है। इसी को “आसियान शैली” कहते हैं। आसियान की कार्य प्रणाली में सार्वभौमिकता का सम्मान करना बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है।
(3) 2003 में उद्देश्यों का विस्तार : दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करने वाले संगठन के सदस्य देशों ने अब अपने उद्देश्यों को आर्थिक और सामाजिक दायरे से निकलकर ज्यादा व्यापक बनाया है। वर्ष 2003 में आसियान सुरक्षा समुदाय, आसियान आर्थिक समुदाय, आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय नामक तीन स्तंभों के आधार पर आसियान समुदाय बनाने की दिशा में उठाया गया कदम कुछ हद तक यूरोपीय संघ से मिलता-जुलता है।
(4) सुरक्षा समुदाय : आसियान ने सुरक्षा समुदाय भी बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाना रहा था। वर्ष 2003 तक आसियान के सदस्य देशों ने अनेक समझौते किए जिनके द्वारा प्रत्येक देश ने शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ाने बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा संप्रभुता का सम्मान करने पर अपनी वचनबद्धता जाहिर की। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 1994 में आसियान क्षेत्रीय मंच की स्थापना भी की गई।

प्रश्न 6. दक्षेस (सार्क) तथा यूरोपीय संघ में वैकल्पिक शक्ति के केन्द्रों के रूप में प्रमुख अंतर क्या हैं?
उत्तर : दक्षेस (सार्क) और यूरोपीय संघ में वैकल्पिक शक्ति के रूप में अंतर-
I. दक्षेस (सार्क) (SAARC):
(i) अभिप्राय : सार्क अथवा दक्षेस एक दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन अथवा संघ है जिसका गठन दिसंबर 1985 में ढाका में हुआ था। इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव-सात देश सम्मिलित हैं। अब तक इसके ग्यारह सम्मेलन हो चुके हैं। प्रथम सम्मेलन 8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ था।
(ii) उद्देश्य (Objectives) :
(क) इस क्षेत्रीय संगठन को बनाने का उद्देश्य अपने-अपने इलाके में चलने वाली ऐतिहासिक दुश्मनियों को भुला देना है। साथ-ही-साथ, जो भी कमजोरियाँ या कठिनाइयाँ क्षेत्रीय देशों के सामने आएँ उन्हें परस्पर सहयोग से स्थानीय स्तर पर उनका समाधान ढूँढ़ने का प्रयास किया जाए।
(ख) इस क्षेत्रीय संगठन का उद्देश्य यह भी है कि सदस्य राष्ट्र अपने-अपने इलाकों में अधिक शांतिपूर्ण और सहकारी क्षेत्रीय व्यवस्था विकसित करने की कोशिश करें। सदस्य देश चाहते हैं कि वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं का समूह बनाने की दिशा में कार्य करें।
(iii) महत्त्व : सार्क की स्थापना का महत्त्व निम्नलिखित है: 1. सार्क ने दक्षिण एशिया के लोगों के कल्याण तथा उनके आजीविका स्तर को सुधारने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
2.इसके द्वारा इस क्षेत्र में और अधिक विकास, सामाजिक प्रगति तथा सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
3.इस संगठन के द्वारा दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास की भावना को बढ़ावा मिला है।
4.सार्क के गठन से सभी सातों देशों की आपसी समस्याओं को पारस्परिक विश्वास तथा सूझ-बूझ से सुलझाने का अवसर प्राप्त हुआ है।
(iv) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका : सार्क के सदस्य देशों में आपसी मतभेद, दुश्मनी तथा परस्पर वैमनस्य के कारण इसके वैकल्पिक शक्ति केंद्र बनने की कोशिशें नाकाम रही हैं। इसकी भूमिका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नगण्य है।
II. यूरोपीय संघ (European Union) :
(i) अभिप्राय : यूरोपीय संघ की स्थापना सन् 1992 में हुई। प्रारंभ में इसमें पश्चिमी यूरोप के छः देश-फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, बेल्जियम, हॉलैंड और लक्जमबर्ग थे। कालांतर में इसमें डेनमार्क, ऑयरलैंड और ब्रिटेन ने भी सदस्यता ले ली। शांगेन संधि ने यूरोपीय समुदाय के देशों के बीच सीमा नियंत्रण समाप्त कर दिया। कुछ समय बाद स्पेन और पूर्वी जर्मनी भी इसमें शामिल हो गए। जनवरी 2002 में नई मुद्रा के रूप में यूरो को स्वीकार कर लिया गया। साइप्रस, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, हंगरी, लात्विया, लिथुआनिया, माल्टा, पोलैंड, स्लोवेकिया और स्लोवानिया, बुल्गारिया और रोमानिया भी कालांतर में इसमें शामिल हो गए।
(ii) उद्देश्य :
(a) विश्व की दो महाशक्तियों अर्थात् अमेरिका और सोवियत संघ में से किसी का भी सामना करने के लिए राजनीतिक, आर्थिक और संस्कृति के स्तर पर यूरोप के सभी देशों को सक्षम बनाने तथा यूरोप के सभी देशों के मध्य एकता और समन्वय बनाए रखने के लिए इस संघ को बनाया गया।
(b) संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष यूरोप के समस्त देशों की समस्याओं को रखने और तुरंत निदान पाने के लिए इसके दो देश-ब्रिटेन और फ्रांस संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य हैं। अत: यह संघ वहाँ पर लिए जाने वाले निर्णयों में भी दखल रखता है। इसका सुरक्षा बजट भी अमेरिका के पश्चात् एकदम दूसरे स्थान पर आने वाला सुरक्षा बजट हैं।
(iii) प्रभाव / भूमिका :
(a) यूरोपीय संघ का राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक प्रभाव बहुत जबरदस्त है। 2005 यह दुनिया की उससे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और इसका सकल घरेलू उत्पादन 12000 अरब डॉलर से ज्यादा था। इसकीह सर्वमान्य मुडा यूरो है जो अमरीकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमरीका से तीन गुनी ज्यादा है और इसके चलते यह अमरीका और चीन से व्यापारिक विवादों में पूरी धौंस के साथ बात करता है।
(b) यूरोपीय संघ के दो सदस्य देश-ब्रिटेन और फ्रांस सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। यूरोपीय संघ के कई और देश सुरक्षा परिषद् के अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं। इसके चलते यूरोपीय संघ अमरीका समेत सभी मुल्कों की नीतियों को प्रभावित करता है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित अमरीकी नीतियों को हाल के दिनों में प्रभावित करना इसका एक उदाहरण है। चीन के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरण विनाश के मामलों पर धमकी या सैनिक शक्ति का उपयोग करने की जगह कूटनीति, आर्थिक निवेश और बातचीत की इसकी नीति अधिक प्रभावी साबित हुई है।

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