Class 12th Political Science Chapter 7 Important Question Answer 3 Marks समकालीन विश्व में सुरक्षा

प्रश्न 1. मानव अधिकार क्या है? भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक क्यों है ? तीन कारण बताकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : I. मानव अधिकार ऐसे अधिकारों को कहते हैं, जो कि प्रत्येक मनुष्य को पहचान देने के नाते अवश्य ही प्राप्त होने चाहिए।
II. भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक है। इसके तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :
1.भारत का यह मानना है कि आधुनिक युग में कोई भी स्वतंत्र व लोकतांत्रिक देश मानव अधिकारों के बिना न तो प्रगति कर सकता है और न ही उस देश में शांति स्थापित रह सकती है।
2.मानव अधिकार ऐसे अधिकार हैं, जो कि मानव की उन्नति व प्रगति के लिए अति आवश्यक व महत्त्वपूर्ण हैं।
3.भारत विश्व शांति तथा मानवता के उत्थान में विश्वास रखता है। इसलिए वह मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक है।

“प्रश्न 2. किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में क्या विकल्प होते हैं?
उत्तर : किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में निम्न विकल्प होते हैं :
(1) आत्मसमर्पण करना।
(2) आक्रमणकारी देश की शर्तें मानना ।
(3) आक्रमणकारी देश को युद्ध में हराना।
युद्ध की स्थिति में अत्यधिक विनाश एवं जान-माल की क्षति होती है। युद्ध के कारण कई लोग विकलांगता के शिकार हो जाते हैं तथा महिलाएँ विधवा हो जाती हैं। अधिकांश लोगों को कई प्रकार की बीमारियाँ जकड़ लेती हैं। युद्ध के परिणामस्वरूप शहर के शहर तथा गाँव के गाँव नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 3. सहयोगमूलक सुरक्षा की परिभाषा लिखिए।
उत्तर : सुरक्षा पर मँडराते अनेक अपारंपरिक खतरों से निपटने के लिए सैन्य-संघर्ष की नहीं बल्कि आपसी सहयोग की जरूरत है। आतंकवाद से लड़ने अथवा मानवाधिकारों को बहाल करने में भले ही सैन्य-बल की कोई भूमिका हो और पर यहाँ भी सैन्य बल एक सीमा तक ही कारगर हो सकता है लेकिन गरीबी मिटाने, तेल तथा बहूमूल्य धातुओं की आपूर्ति (Supply) बढ़ाने, अप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य बल से क्या सहायता मिलेगी, यह कहना कठिन है। वस्तुतः ऐसे ज्यादातर मामलों में सैन्य बल के इस्तेमाल से मामला और बिगड़ेगा।
सहयोग-मूलक सुरक्षा में विभिन्न देशों के अलावा राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अन्य संस्थाएँ (जैसे-संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि), स्वयंसेवी संगठन (जैसे-रेड क्रॉस) आदि शामिल हो सकते हैं।

प्रश्न 4. भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक क्यों हैं? तीन कारण बताकर स्पष्ट कीजिए
उत्तर : I. मानव अधिकार ऐसे अधिकारों को कहते हैं, जो । कि प्रत्येक मनुष्य को पहचान देने के नाते अवश्य ही प्राप्त होने चाहिए।
II. भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक है। इसके तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1.भारत का यह मानना है कि आधुनिक युग में कोई भी स्वतंत्र व लोकतांत्रिक देश मानव अधिकारों के बिना न तो प्रगति कर सकता है और न ही उस देश में शांति स्थापित रह सकती है।
2.भारत विश्व शांति तथा मानवता के उत्थान में विश्वास रखता है। इसलिए वह मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक है।
3.मानव अधिकार ऐसे अधिकार हैं कि जो मानव की उन्नति व प्रगति के लिए अति आवश्यक और महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 5. “सुरक्षा” की परंपरागत अवधारणा को कीजिए।
उत्तर : “सुरक्षा” की परंपरागत अवधारणा (Tradi tional Concerns of Security) :
सुरक्षा की परंपरागत धारणा में सबसे बड़ी चिन्ता सैनिक र खतरे से संबंधित होती है। इस प्रकार के खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है। शत्रु देश दूसरे देश को सैनिक हमले की धमकी देकर । उसकी प्रभुसत्ता, अखंडता तथा स्वतंत्रता के लिए खतरा उत्पन्न 0 करता है। इस प्रकार के सैनिक हमले में न केवल सैनिक ही मारे से जाते हैं बल्कि बड़ी संख्या में सामान्य नागरिक भी हताहत होते हैं तथा करोड़ों रुपये की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। इस प्रकार सुरक्षा की परंपरागत धारणा में किसी देश की सुरक्षा को ज्यादातर खतरा उसकी सीमा के बाहर से इसलिए होता है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था नहीं है एवं ऐसी कोई ताकत भी नहीं है जो विभिन्न देशों के व्यवहार पर नियंत्रण रख सके। इसलिए ताकतवर देश अपनी मनमानी करने लगते हैं।

प्रश्न 6. वैश्विक गरीबी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे गैर-परम्परागत या मानवीय सुरक्षा से सम्बन्धित मुद्दों की व्याख्या करें ।
उत्तर : विश्व में विद्यमान कई मुद्दों में से वैश्विक गरीबी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये तीनों मुद्दे सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप से मानवाधिकारों से जुड़े हुए हैं। इन सभी मुद्दों का वर्णन इस प्रकार है
I. वैश्विक गरीबी (Global Poverty) : विश्व में आज सबसे बड़ी समस्याओं में से एक वैश्विक गरीबी है । यद्यपि गरीबी सम्पूर्ण विश्व में पाई जाती है परंतु विकासशील तथा नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों में यह सबसे अधिक खतरनाक रूप में विद्यमान है। अधिकांश विकासशील देशों में लोगों को खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं हैं, जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न देशों में रोजगार के अवसर सीमित हैं, जिसके कारण सभी लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता। अतः वे लोग गरीबी की अवस्था में जीवन बिताने के लिए विवश रहते हैं। वर्तमान समय में लगभग 1.2 बिलियन जनसंख्या को केवल 1 डॉलर पर ही गुजारा करना पड़ता है।
इस आँकड़े से विश्व में गरीबी की भयंकर स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। गरीबी के कारण विकासशील देशों के लोगों को कुपोषण, भुखमरी तथा महामारी इत्यादि से समय-समय पर जूझना पड़ता है। गरीबी के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना पाई जाती है तथा वह गलत कार्यों की ओर आकर्षित होने लगते हैं।
II. स्वास्थ्य (Health) : विश्व के अधिकांश देशों को आज स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। विश्व स्तर पर बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता तथा वैज्ञानिक उन्नति के बावजूद भी विश्व के अधिकांश लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के पीड़ित हैं। उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में 20 मिलियन लोगों की मृत्यु ऐसी बीमारियों से हुई, जिनका इलाज सम्भव था । इससे स्पष्ट है कि आर्थिक सम्पन्नता एवं चिकित्सा तथा वैज्ञानिक उन्नति का सभी लोगों को फायदा नहीं मिल रहा। इसका फायदा केवल विकसित देशों के कुछ थोड़े से लोगों को पहुँच रहा है। जबकि आज भी विकासशील देशों के लोग चेचक, हैजा, प्लेग तथा एड्स जैसी बीमारियों से मर रहे हैं परंतु उनका इलाज नहीं हो पा रहा है। विकासशील देशों के बच्चे असमय मृत्यु एवं कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इन्हें स्वच्छ पानी, उचित चिकित्सा सहायता तथा साफ वातावरण नहीं मिल पाता, जिसका नकारात्मक प्रभाव इनके स्वास्थ्य पर पड़ता है।
III. शिक्षा (Education) : वर्तमान समय में विश्व के सभी लोगों को शिक्षा देना भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। वास्तव में गरीबी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आपस में जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, गरीब व्यक्ति न तो शिक्षित हो पाता है, और न ही बीमारी के समय अपना इलाज करवा पाता है, इसा तरह एक अशिक्षित व्यक्ति न तो उचित रोजगार प्राप्त कर पाता है, और न ही स्वास्थ्य की देखभाल कर पाता है। विश्व के अधिकांश देशों. विशेषकर विकासशील देशों में बहुत अधिक निरक्षरता पाई जाती है। अशिक्षित व्यक्ति चालाक लोगों की बातों में आकर गलत कार्य करने लगते हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के एक महत्त्वपूर्ण अभिकरण यूनेस्को (UNESCO-United Nations Education Scientific and Cultural Organisation) ने विश्व स्तर पर शिक्षा के प्रसार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है। यूनेस्को के संविधान की प्रस्तावना का प्रथम वाक्य है कि “चूँकि युद्ध मनुष्य के दिमाग में पैदा होता है इसलिए शान्ति को सुरक्षित रखने की आधारशिला भी मानव दिमाग में बनाई जानी चाहिए अर्थात् लोगों को शैक्षाणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक आधार पर जागरूक एवं शिक्षित बनाया जाये, ताकि वे गलत कार्यों की ओर अग्रसर न हों।”

प्रश्न 7. बाह्य सुरक्षा की पारंपरिक धारणा से क्या अभिप्राय है? इस प्रकार की सुरक्षा के किन्हीं दो तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : (क) परंपरागत सुरक्षा से अभिप्राय राष्ट्रीय सुरक्षा की धारणा से होता है। इससें सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है। इस खतरे का स्रोत कोई अन्य देश होता है।
(ख) परंपरागत सुरक्षा के अंतर्गत बाहरी हमले का सामना के लिए अपनायी जाने वाली नीति के निम्नलिखित तत्व हैं:
(i) शक्ति-संतुलन : इसके अंतर्गत अन्य देशों, विशेषकर पड़ोसी देशों, के सैन्य-शक्ति में संतुलन बनाने का प्रयत्न किया जाता है ताकि अन्य देश या पड़ोसी देश सैन्य-शक्ति में अधिक शक्तिशाली न हो सकें। उदाहरणतया भारत और पाकिस्तान विदेशों से सैन्य सामग्री खरीदते रहते हैं ताकि सैन्य शक्ति का आधुनिकीकरण होता रहे।
(ii) गठबंधन बनाना : पारंपरिक सुरक्षा नीति का चौथा तत्व गठबंधन बनाना है जिसका उद्देश्य गठबंधन में सम्मिलित देशों द्वारा सैन्य हमले को रोकना अथवा उससे रक्षा करना है। अमरीका द्वारा स्थापित नाटो और सोवियत संघ की वारसा संधि इसके उदाहरण हैं। गठबंधन अपनी शक्ति के प्रभाव को बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं। गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।
(iii) रक्षा : रक्षा के लिए युद्ध को सीमित या समाप्त कर दिया जाता है। इसके लिए राष्ट्रीय सेना को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वह बाहरी खतरों का सामना कर सके।
(iv) अपरोध : इसके द्वारा युद्ध की आशंका को रोकना होता है।

प्रश्न 8. निर्धनता विश्व के लिए किस तरह एक खतरा है ?
उत्तर : खतरे का एक और स्रोत वैश्विक निर्धनता है। विश्व की जनसंख्या फिलहाल 6 अरब 20 करोड़ है और अगले 25 वर्षों में यह 7 से 8 अरब तक हो जाएगी। संभव है, यह आँकड़ा 9-10 अरब तक पहुँच जाए। फिलहाल विश्व की कुल आबादी वृद्धि का 50 फीसदी सिर्फ 6 देशों-भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में घटित हो रहा है। अनुमान है कि अगले 50 सालों में दुनिया के सबसे गरीब देशों में जनसंख्या तीन गुनी बढ़ेगी, जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ति उच्च आय और जनसंख्या की कम वृद्धि के कारण धनी देश अथवा सामाजिक समूहों को और धनी बनने में मदद मिलती है, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और ग़रीब बनाते हैं।

प्रश्न 9. पारंपरिक सुरक्षा नीति के एक तत्त्व के रूप में गठबंधन बनाने से क्या अभिप्राय है ? इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर : गठबंधन से अभिप्राय : पारंपरिक सुरक्षा नीति का चौथा तत्व गठबंधन बनाना है जिसका उद्देश्य गठबंधन में सम्मिलित देशों द्वारा सैन्य हमले को रोकना अथवा उससे रक्षा करना है। अमरीका द्वारा स्थापित नाटो और सोवियत संघ की वारसा संधि इसके उदाहरण हैं। गठबंधन अपनी शक्ति के प्रभाव को बढ़ाने के लिए बनाए जाते हैं। गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते हैं।
गठबंधन के लाभ : (i) गठबंधन में कई देश शामिल होते हैं और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं। (ii) अधिकांश गठबंधनों को लिखित संधि से एक औपचारिक रूप मिलता है। और ऐसे गठबंधनों को यह बात बिल्कुल स्पष्ट रहती है कि खतरा किससे है। (iii) किसी देश अथवा गठबंधन की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंधन बनाते हैं। (iv) गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंधन भी बदल जाते है।

प्रश्न 10. तीसरी दुनिया के देशों में रहने वाले लोगों के समक्ष किन्हीं चार खतरों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : तीसरी दुनिया से अभिप्राय उन देशों से है, जो विकासशील है अर्थात् उनमें हम संपूर्ण एशियाई, अफ्रीकी और लेटिन अमरीकी देशों को सम्मिलित करते है।
चार खतरे : (i) एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के सामने खड़ी सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोपीय देशों के मुकाबले दो `मायनों में विशिष्ट थीं। एक तो इन देशों को अपने पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका थी।
(ii) इन्हें अंदरूनी सैन्य-संघर्ष की भी चिंता करनी थी।
(iii) इन देशों को सीमावार से खतरा तो था ही खासकर पड़ोसी देशों से साथ ही भीतर से भी खतरे की आशंका थी। अनेक नव-स्वतंत्र देश संयुक्त राज्य अमरीका या सोवियत संघ अथवा औपनिवेशिक ताकतों से कहीं ज्यादा अपने पड़ोसी देशों से आशकित थे। इनके बीच सीमा रेखा और भू-क्षेत्र अथवा आबादी पर नियंत्रण को लेकर या एक-एक करके सभी सवालों पर झगड़े हुए।
(iv) अलग राष्ट्र बनाने पर तुले अंदर के अलगावादी आंदोलनों से भी इन देशों को खतरा है।
(v) तीसरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी व प्रमुख समस्या एड्स, चिकनगुनिया, डेंगू बुखार, बर्ड फ्लू और अन्य महामारियाँ खतरा बनकर आती हैं तथा शिक्षा के अभाव में प्रायः पारस्परिक घृणा, संकीर्ण भावनाओं का विकास होता है जो धार्मिक उन्माद, भाषावाद, क्षेत्रवाद जैसी बुराइयों को जन्म देता है।

प्रश्न 11. पारंपरिक सुरक्षा नीति के एक तत्त्व के रूप में शक्ति संतुलन की व्याख्या कीजिए। कोई राज्य यह संतुलन कैसे स्थापित कर सकता है ?
उत्तर : पारंपरिक सुरक्षा नीति का एक तत्व के रूप में शक्ति-संतुलन : (i) कोई देश अपने अड़ोस-पड़ोस में देखने पर पाता है कि कुछ मुल्क छोटे हैं तो कुछ बड़े। इससे जाता है कि भविष्य में किस देश से उसे खतरा हो सकता है। मिसाल के लिए कोई पड़ोसी देश संभव है यह न कहे कि वह हमले की तैयारी में जुटा है। हमले का कोई प्रकट कारण भी नहीं जान पड़ता हो । फिर भी यह देखकर कि कोई देश बहुत ताकतवर है यह भांपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है। इस वजह से हर सरकार दूसरे देश से अपने शक्ति संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है।
(ii) कोई सरकार दूसरे देशों से शक्ति-संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करती है। जो देश नजदीक हों, जिनके साथ अनबन हो या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाई हो चुकी हो उनके साथ शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में करने पर खासतौर पर जोर दिया जाता है।
(iii) शक्ति-संतुलन बनाये रखने की यह कवायद ज्यादातर अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने की होती है लेकिन आर्थिक और प्रौद्योगिकी की ताकत भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सैन्य शक्ति

प्रश्न 12. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात्, एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के समक्ष आई चुनौतियों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : (i) द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देशों के समक्ष आई चुनौतियों में आर्थिक रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता की गरीबी से उबारने की थी ।
(ii) नव-स्वतंत्र देशों की आजादी के लिहाज से भी आर्थिक विकास महत्त्वपूर्ण था। बगैर टिकाऊ विकास के कोई देश सही मायनों में आजाद नहीं रह सकता। उसे धनी देशों पर निर्भर रहना पड़ता हैं।
(iii) इसमें वह उपनिवेशक देश भी हो सकता था जिससे राजनीतिक आजादी हासिल की गई ।
(iv) नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ। 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार और विकास से संबंधित सम्मेलन (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट-अंकटाड) में ‘टुवीर्ड्स अ न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवलपमेंट’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार प्रणाली में सुधार का प्रस्ताव किया गया था। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सुधारों से
(क) अल्प विकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त होगा जिनका दोहन पश्चिम के विकसित देश करते हैं।
(ख) अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजार तक होगी। वे अपना सामान बेच सकेंगे और इस तरह गरीब देशों के लिए यह व्यापार फायदेमंद होगा।
(ग) पश्चिमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी और
(घ) अल्प विकसित देशों की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़ेगी।

प्रश्न 13. मानव सुरक्षा की विभिन्न धारणाओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : (i) पारंपरिक सुरक्षा की धारणा :
(क) पारंपरिक धारणा का संबंध मुख्यतः बाहरी सुरक्षा से होता है। यह सुरक्षा मुख्यतः राष्ट्र की सुरक्षा से संबंधित होती है।
(ख) सुरक्षा की पारंपरिक धारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक समझा जाता है।
(ग) बाहरी सुरक्षा के खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश (मुल्क) बनता है। वह देश सैन्य आक्रमण की धमकी देकर संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता जैसे किसी देश के केन्द्रीय मूल्यों के लिए खतरा उत्पन्न करता है।
(ii) अपारंपरिक सुरक्षा की धारणा : (क) इस धारणा में न केवल सैन्य खतरे बल्कि मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले अन्य व्यापक खतरों और आशंकाओं को भी शामिल किया जाता है। इस अवधारणा में सरकार असुरक्षित चीजों या मुद्दों, उनके खतरे तथा सुरक्षा के तरीकों पर विचार करती है।
(ख) सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा में सिर्फ राज्य ही नहीं, व्यक्तियों और संप्रदायों या यों कहें कि संपूर्ण मानवता की सुरक्षा के प्रति सावधानी बरती जाती है। इस धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व सुरक्षा भी कहा जाता है।
(iii) इस धारणा में मानवता की रक्षा को राज्यों की सुरक्षा से अधिक महत्त्व दिया जाता है। यह सुरक्षा भुखमरी, महामारी, प्राकृतिक आपदा, आतंकवाद, आंतरिक संघर्ष आदि से व्यष्टि की रक्षा करने तक विस्तृत है।

प्रश्न 14. ऐसी दो अस्त्र-नियंत्रण संधियों का उल्लेख कीजिए, जिन पर अमेरिका और सोवियत संघ ने हस्ताक्षर किए।
उत्तर : 1. सीमित परमाणु परीक्षण संधि (एल.टी.बी. टी.) : वायुमंडल, बाहरी अंतरिक्ष तथा पानी के अंदर परमाणु परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने वाली इस संधि पर अमरीका तथा सोवियत संघ ने मास्को में 5 अगस्त, 1963 को हस्ताक्षर किए तथा यह संधि 10 अक्टूबर, 1963 से प्रभावी हो गई।
2.परमाणु अप्रसार संधि (एन.पी.टी.) : यह संधि केवल परमाणु शक्ति-सम्पन्न देशों को एटमी हथियार रखने की अनुमति देती है और शेष देशों को ऐसे हथियार प्राप्त करने से रोकती है। इस संधि पर जुलाई, 1968 को वाशिंगटन और मास्को में हस्ताक्षर हुए और यह संधि 5 मार्च, 1970 से प्रभावी हुई। इस संधि को 1995 में अनियत काल के लिए बढ़ा दिया गया।

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