Class 12th Political Science Chapter 7 Important Question Answer 8 Marks समकालीन विश्व में सुरक्षा

प्रश्न 1. सुरक्षा की परिभाषा दीजिए। सुरक्षा की पारंपरिक तथा गैर पारंपरिक धारणाओं की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : सुरक्षा की परिभाषा : सुरक्षा का मूल अर्थ है खतरे से आजादी। जो लोग सुरक्षा विषयक अध्ययन करते हैं, उनका मत है कि केवल उन चीजों को ‘सुरक्षा’ से जुड़ी चीजों का विषय बनाया जाना चाहिए, जिनसे जीवन के केन्द्रीय मूल्यों को खतरा उत्पन्न होता हो । सुरक्षा का संबंध गंभीर खतरों से है; ऐसे खतरे जिनको रोकने के उपाय न किये गये तो हमारे केंद्रीय मूल्यों को अपूरणीय हानि पहुँच सकती है। विश्व के सभी समाजों में सुरक्षा की धारणा एक समान नहीं रहती है। इसी कारण सुरक्षा एक विवादग्रस्त धारणा है। सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार के खतरे को सुरक्षा के लिए खतरा माना जाए।
सुरक्षा की पारंपरिक धारणा : सुरक्षा की परंपरागत धारणा का आवश्यक संबंध सुरक्षा से है। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् इस पहलू पर अधिक जोर नहीं दिया गया। इसका एक मुख्य कारण दुनिया के ज्यादातर शक्तिशाली देश अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए कमोबेश आश्वस्त थे। जैसा कि हम जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् शीतयुद्ध का दौर चला तथा इस दौरान संयुक्त राज्य अमरीका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट तथा सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी गुट एक-दूसरे के सामने थे।
1940 के दशक के उत्तरार्द्ध से स्वतंत्र होना शुरू किया तथा उनके सुरक्षा – सरोकार प्रायः यूरोपीय शक्तियों के समान ही थे। दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चात् जितने युद्ध हुए, उनमें 1/3 युद्धों के लिए शीतयुद्ध ही कारण रहा। एशिया तथा अफ्रीका के नए स्वतंत्र देशों के समक्ष सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोपीय देशों के मुकाबले दो अर्थों में विशिष्ट थीं। एक तो इन देशों को अपने पड़ोसी देश से सैन्य आक्रमण की आशंका थी। दूसरे, इन्हें आंतरिक सैन्य-संघर्ष की भी चिंता करनी थी। 1946 से 1991 के बीच गृह-युद्धों की तादाद में दोगुनी वृद्धि हुई । इस प्रकार, पड़ोसी देशों से युद्ध तथा आंतरिक संघर्ष नए स्वतंत्र देशों के समक्ष सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थे।
सुरक्षा की गैर-पारंपरिक अवधारणा : सुरक्षा की गैर-पारंपरिक अवधारणा केवल खतरों से संबंधित नहीं है। इसके तहत मानवीय अस्तित्व पर चोट पहुँचाने वाले व्यापक खतरों तथा आशंकाओं को सम्मिलित किया जाता है। सुरक्षा की गैर पारंपरिक अवधारणा के प्रतिपादकों का मत है, “केवल राज्य ही नहीं, व्यक्तियों और समुदायों या कहें कि समस्त मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता है।” इसीलिए सुरक्षा की गैर-पारंपरिक अवधारणा को ‘मानवता की सुरक्षा’ या ‘विश्व-रक्षा’ कहते हैं।
तमाम पक्षधर यह मानते हैं कि इसका प्राथमिक मकसद व्यक्तियों की सुरक्षा है। इस प्रकार सुरक्षा की गैर-पारंपरिक अवधारणा के दो पक्ष हैं: (i) मानवता की सुरक्षा (ii) विश्व सुरक्षा |

प्रश्न 2. भारत की ‘सुरक्षा रणनीति’ के विभिन्न घटकों का उल्लेख कीजिए ।

अथवा

भारत की सुरक्षा रणनीति के किन्हीं चार घटकों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए ।

अथवा

भारतीय सुरक्षा रणनीति के बड़े घटक कौन-कौन से हैं?
उत्तर : भारत की सुरक्षा रणनीति के विभिन्न घटक : भारत को पारंपरिक (सैन्य) और अपारपंरिक खतरों का सामना करना पड़ा है। ये खतरे सीमा के अंदर से भी उभरे और बाहर से भी भारत की सुरक्षा नीति के चार बड़े घटक हैं और अलग-अलग वक्त में इन्हीं घटकों के हेर-फेर से सुरक्षा की रणनीति बनायी गई है।
(i) प्रथम घटक या कारक : सुरक्षा नीति का पहला घटक रहा सैन्य-क्षमता को मजबूत करना, क्योंकि भारत पर पड़ोसी देशों से हमले होते रहे हैं। पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में और चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया। दक्षिण एशियाई इलाके में भारत के चारों तरफ परमाणु हथियारों से लैस देश हैं। ऐसे में भारत के परमाणु परीक्षण करने के फैसले (1998) को उचित ठहराते हुए भारतीय सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया था। भारत ने सन् 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया था।
(ii) दूसरा घटक या कारक: भारत की सुरक्षा नीति का दूसरा घटक है, अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघों और संस्थाओं को मजबूत करना। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई एकता, अनौपनिवेशीकरण और निरस्त्रीकरण के प्रयासों की हिमायत की। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र संघ को अंतिम पंच मानने पर जोर दिया। भार ने हथियारों के अप्रसार के संबंध में एक सार्वभौम और बिना भेदभाव वाली नीति चलाने की पहलकदमी की, जिसमें हर देश को सामूहिक संहार के हथियारों (परमाणु, जैविक, रासायनिक) से संबद्ध बराबर के अधिकार और दायित्व हों। भारत ने नव-अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग उठायी और सबसे बड़ी बात यह कि दो महाशक्तियों की खेमेबाजी से अलग उसने गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व शांति का तीसरा विकल्प सामने रखा। भारत उन 160 देशों में शामिल है, जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए हैं। क्योटो प्रोटोकॉल में वैश्विक तापवृद्धि पर काबू रखने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के संबंध में दिशा-निर्देश बताए गए हैं। सहयोगमूलक सुरक्षा की पहलकदमियों के समर्थन में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्र संघ के शांतिबहाली के मिशनों में भेजी है।
(iii) तीसरा घटक या कारक : भारत की सुरक्षा रणनीति का तीसरा घटक है, देश की अंदरूनी सुरक्षा समस्याओं से निबटने की तैयारी। नागालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कई उग्रवादी समूहों ने समय-समय पर इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोशिश की। भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया है। यह व्यवस्था विभिन्न समुदाय और जन-समूहों को अपनी शिकायतों को खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी करने का मौका देती है।
(iv) चौथा कारक या घटक : आखिर में एक बात यह कि भारत में अर्थव्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास किए गए हैं कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से निजात मिले तथा नागरिकों के बीच आर्थिक असमानता ज्यादा न हो। ये प्रयास ज्यादा सफल नहीं हुए हैं। हमारा देश अब भी गरीब है और असमानताएँ मौजूद हैं। फिर भी, लोकतांत्रिक राजनीति में ऐसे अवसर उपलब्ध हैं कि गरीब और वंचित नागरिक अपनी आवाज उठा सकें। लोकतांत्रिक रीति से निर्वाचित सरकार के ऊपर दबाव होता है कि वह आर्थिक संवृद्धि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए। इस प्रकार, लोकतंत्र सिर्फ राजनीतिक आदर्श नहीं है; लोकतांत्रिक शासन जनता को ज्यादा सुरक्षा मुहैया कराने को साधन भी है।

प्रश्न 3. सुरक्षा से क्या अभिप्राय है? सुरक्षा को होने वाले खतरे के किन्हीं चार नए स्रोतों की भूमिका का आकलन कीजिए ।

अथवा

सुरक्षा की दृष्टि से खतरे के नए स्रोत लिखिए।

अथवा

सुरक्षा को खतरे के किन्ही चार नये स्रोतों की पहचान तथा व्याख्या कीजिए।

अथवा

प्रत्येक के लिए एक-एक उदाहरण देकर, सुरक्षा की किन्हीं तीन नई चुनौतियों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : I. सुरक्षा से अभिप्राय : सुरक्षा का बुनियादी अर्थ है- खतरे से आजादी । मानव का अस्तित्व और किसी देश का जीवन खतरों से भरा होता है। तब क्या इसका मतलब यह है कि हर तरह के खतरे को सुरक्षा पर खतरा माना जाए? सुरक्षा से जुड़े अनेक अन्य पहलू भी आज विश्व में सुरक्षा की समस्या से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हैं। जैसे- पर्यावरण को बढ़ रहा खतरा, निर्धनता, आतंकवाद एवं मानवाधिकारों की सुरक्षा एवं विस्तार आदि।
II. सुरक्षा के लिए नए चार खतरे :
1.आतंकवाद (Terrorism) : आतंकवाद का आशय राजनीतिक खून-खराबे से है, जो जान-बूझकर और बिना किसी हमदर्दी के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से ज्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं। कोई राजनीतिक संदर्भ या स्थिति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल प्रयोग अथवा बल प्रयोग की धमकी देकर बदलना चाहते हैं। जनमानस को आतंकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया जाता है और आतंकवाद नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघर्षों में शामिल अन्य पक्ष के खिलाफ करता है।
2.मानवाधिकार (Human Rights ): मानवाधिकारों के लिए खतरा अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नए स्रोतों का अंग माना जाता है। मानवाधिकारों को तीन कोटियों में रखा गया है। हो सकता है, आपको लगे कि मानवाधिकारों की इससे कहीं ज्यादा कोटियाँ हो सकती हैं, लेकिन इन तीनों कोटियों से मानवाधिकार विषयक चर्चा की शुरुआत की जा सकती है। पहली कोटि राजनीतिक अधिकारों की है, जैसे अभिव्यक्ति और सभा करने की आजादी। दूसरी कोटि आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की है। अधिकारों की तीसरी कोटि में उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अधिकार आते हैं। कई देशों/क्षेत्रों में आज मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।
3.प्रदूषण (Pollution) : पर्यावरण के तीव्र नुकसान से देश की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। विश्व की आबादी निरंतर बढ़ रही है। यह छह सौ करोड़ के आँकड़े को पहले ही पार कर चुकी है। इस विशाल मानव समूह के लिए निवास स्थान, रोजगार के लिए नए-नए कारखानों के निर्माण के लिए भूमि-स्थल, जल संसाधनों का अभाव अभी से महसूस किया जा रहा है। विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों में वनों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे मानव की भावी पीढ़ियों के लिए भयंकर खतरा पैदा होता जा रहा है। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के कारण मानव स्वरूप, सामान्य जीवन और शांत वातावरण के लिए खतरा पैदा हो गया है। समुद्रों में विकसित और औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा निरंतर फेंके जाने वाला कूड़ा जल में रहने वाले जीवों के जीवन के लिए खतरा बन चुका है। अनेक राष्ट्रों को समुद्रों से मानव भोजन मिलता है और अनेक समुदाय के लोगों को रोटी-रोजी भी समुद्र से मिलती है। समुद्र से अनेक खनिज और उपयोगी पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं, जो औद्योगिक और यातायात विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं।
4.निर्धनता (Poverty) : खतरे का एक और स्रोत वैश्विक निर्धनता है। विश्व की जनसंख्या फिलहाल 6 अरब 20 करोड़ है और अगले 25 वर्षों में यह 7 से 8 अरब तक हो जाएगी। फिलहाल विश्व की कुल आबादी वृद्धि का 50 फीसदी सिर्फ 6 देशों-भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेशि में घटित हो रहा है। अनुमान है कि अगले 50 सालों में दुनिया के सबसे गरीब देशों में जनसंख्या तीन गुनी बढ़ेगी, जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ति उच्च और जनसंख्या की कम वृद्धि के कारण धनी देश अथवा सामाजिक समूहों को और धनी बनने में मदद मिलती है, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और गरीब बनाते हैं।

प्रश्न 4. वैश्विक सुरक्षा की समस्या के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्यों है?

अथवा

आजकल अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पारस्परिक सहयोग को क्यों महत्त्वपूर्ण समझा जा रहा है ? समझाइए।
उत्तर : अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और पारस्परिक सहयोग :
1. आज की दुनिया परस्पर बहुत समीप आ गई है। अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा पर मँडराते अनेक अपारंपरिक खतरों से निपटने के लिए सैन्य-संघर्ष की नहीं बल्कि आपसी सहयोग की जरूरत है। आतंकवाद से लड़ने अथवा मानवाधिकारों को बहाल करने में भले ही सैन्य-बल की कोई भूमिका हो (और यहाँ भी सैन्य -बल एक सीमा तक ही कारगर हो सकता है), लेकिन गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धातुओं की आपूर्ति बढ़ाने, अप्रवासियों और शरणार्थियों की आवाजाही के प्रबंधन तथा महामारी के नियंत्रण में सैन्य बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्किल है। वस्तुतः ऐसे अधिकांश मसलों में सैन्य-बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा।
2.ज्यादा प्रभावी यही होगा कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से रणनीतियाँ तैयार की जायें। सहयोग द्विपक्षीय (दो देशों के बीच), क्षेत्रीय, महादेशीय अथवा वैश्विक स्तर का हो सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि खतरे की प्रकृति क्या है और विभिन्न देश इससे निबटने के लिए कितने इच्छुक तथा सक्षम हैं। सहयोगमूलक सुरक्षा में विभिन्न देशों के अतिरिक्त राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अन्य संस्थाएँ, जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन (संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि), स्वयंसेवी संगठन (एमनेस्टी इंटरनेशनल, रेड क्रॉस, निजी संगठन तथा दानदाता संस्थाएँ, चर्च और धार्मिक संगठन, मजदूर संगठन, सामाजिक और विकास संगठन), व्यावसायिक संगठन और निगम तथा जानी-मानी हस्तियाँ (जैसे नेल्सन मंडेला, पोप) शामिल हो सकती हैं।
3.सहयोगमूलक सुरक्षा में भी अंतिम उपाय के रूप में बल-प्रयोग किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी उन सरकारों से निबटने के लिए बल प्रयोग की अनुमति दे सकती है, जो अपनी ही जनता को मार रही हों अथवा गरीबी, महामारी और प्रलयंकारी घटनाओं की मार झेल रही जनता के दुःख-दर्द की उपेक्षा कर रही हों। ऐसी स्थिति में सुरक्षा की अपारंपरिक धारणा का जोर होगा कि बल-प्रयोग सामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में किया जाए, न कि कोई एक देश अंतर्राष्ट्रीय और स्वयंसेवी संगठनों समेत दूसरों की मर्जी पर कान दिए बगैर बल प्रयोग का रास्ता अख्तियार करे ।

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