Class 12th Political Science Chapter 8 Important Question Answer 8 Marks पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 1. वैश्विक निर्धनता किस प्रकार खतरे का स्रोत है? व्याख्या जिए।
उत्तर : वैश्विक निर्धनता निम्नलिखित प्रकार से खतरे का स्रोत है :
(i) वैश्विक निर्धनता शर्तिया तौर पर खतरे का स्रोत है। वर्तमान समय में विश्व की जनसंख्या 6 अरब से अधिक है तथा अनुमान है कि अगले 25 सालों में यह 7 अरब से अधिक हो जायेगी। यह भी संभावना है कि जनसंख्या 9-10 अरब तक पहुँच जाए।
(ii) यह भी निश्चित है कि दुनिया की कुल जनसंख्या का 50% छ: देशों चीन, भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश तथा इंडोनेशिया में रह रहा है। ऐसा अनुमान है कि आने वाले 50 सालों में दुनिया के सबसे गरीब देशों में जनसंख्या तीन गुना बढ़ेगी।
दूसरी तरफ, इस दौरान अनेक अमीर देशों की आबादी घटेगी। उच्च आय तथा कम आबादी अमीर देशों या सामाजिक समूहों को अधिक बनाने में मदद करती है जबकि, कम आय तथा अधिक आबादी गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और अधिक गरीब बनाते हैं।
(iii) अमीर तथा गरीब देशों के बीच यह असमानता उत्तरी गोलार्द्ध के देशों को दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से अलग करती है। असमानता का यह ग्राफ दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में काफी बढ़ा है। उदाहरण के लिए, विश्व में सबसे अधिक हथियारबंद संघर्ष अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देशों में होते हैं। यह दुनिया का सर्वाधिक गरीब इलाका है। 21वीं सदी के प्रारंभ में इस क्षेत्र में होने वाले संघर्षों में शेष दुनिया की तुलना में कहीं ज्यादा लोग मारे गए।
(iv) दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में निर्धनता के कारण ज्यादातर लोग •बेहतर जीवन विशेषकर आर्थिक अवसरों की खोज में उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में प्रवास कर रहे हैं। इस प्रघटना के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेदों का सिलसिला शुरू हो गया है।

प्रश्न 2. भारत में दो महत्त्वपूर्ण “पर्यावरण आंदोलनों” की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : भारत में दो महत्त्वपूर्ण “पर्यावरण आंदोलन” हैं (1) क्योटो प्रोटोकॉल, (2) नेशनल ऑटो फ्यूल पॉलिसी।
(1) क्योटो प्रोटोकाल : भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया। जलवायु परिवर्तन के संबंध में विभिन्न देशों का सम्मेलन जापान के क्योटो शहर में हुआ। इस सम्मेलन में भारत सहित 150 देशों ने हिस्सा लिया और जलवायु परिवर्तन को कम करने की वचनबद्धता को रेखांकित किया। यह प्रोटोकॉल ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सुनिश्चित, ठोस और समयबद्ध उपाय करेगा। भूमंडलीय शिखर सम्मेलन के बाद के वर्षों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के प्रयत्नों की असफलता के कारण क्योटो प्रोटोकॉल का महत्त्व बढ़ गया। गैसों के उत्सर्जन में इस कटौती को सभी छह ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्सॉइड, मीथेन, एच.एफ.सी.एस., पी. एफ.सी. और सल्फर हैक्ज़ाफ्लुओराइट) पर लागू किया गया। भारत का विचार है कि उत्सर्जन दर में कमी करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी विकसित देशों की है क्योंकि इन देशों ने एक लंबी अवधि तक बहुत ज्यादा उत्सर्जन किया है।
(2) नेशनल ऑटो फ्यूल पॉलिसी के अंतर्गत वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य कर दिया गया है। 2001 में ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम पारित हुआ। इसमें ऊर्जा के ज्यादा कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी की गई है। ठीक इसी तरह 2003 में बिजली अधिनियम में पुनर्नवा (Renewable) ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया है। हाल में प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाने की तरफ रुझान बढ़ा है।
इससे पता चलता है कि भारत पर्यावरण सुरक्षा की लिहाज से ठोस कदम उठा रहा है। भारत बायोडीजल संबंधित एक राष्ट्रीय मिशन चलाने के लिए भी तत्पर है। इसके अंतर्गत 2011-12 तक बायोडीजल तैयार होने लगेगा और इसमें 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल होगा। पुनर्नवीकृत होने वाली ऊर्जा के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक भारत में चल रहा है। भारत के अनुसार विकसित देश विकासशील देशों को वित्तीय संसाधन तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने के लिए तुरंत उपाय करें ताकि विकासशील देश “फ्रेमवर्क कन्वेशन ऑन क्लाइमेट चेंज” (Framework Convention on Climatic Change) की मौजूदा प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकें।

प्रश्न 3. वैश्विक राजनीति में पर्यावरण से संबंधित किन्हीं चार चिंताओं को सूचीबद्ध कीजिए ।
उत्तर : वैश्विक राजनीति में पर्यावरण संबंधी चार चिंताओं को निम्नलिखित प्रकार से सूचीबद्ध किया जा सकता है:
(i) एक तरफ तमाम दुनिया में कृषि योग्य भूमि में कोई वृद्धि नहीं हो रही है। दूसरी तरफ वर्तमान उपजाऊ जमीन के एक बड़े भाग की उर्वरता कम होती जा रही है। चरागाहों के चारे समाप्त होने को हैं तथा मत्स्य भंडार निरंतर कम हो रहे हैं। जलाशयों की जलराशि तेजी से कम हो रही है। इन सब कारणों से प्रदूषण बढ़ रहा है तथा खाद्य उत्पादन में कमी आ रही है ।।
(ii) संयुक्त राष्ट्र की विश्व विकास रिपोर्ट, 2006 के अनुसार विकासशील देशों की 1 अरब 20 करोड़ जनता को स्वच्छ जल प्राप्त नहीं होता तथा 2 अरब 60 करोड़ जनसंख्या को साफ-सफाई की सुविधाएँ नहीं मिल पाती। इन्हीं कारणों से 30 लाख से भी अधिक बच्चे प्रति वर्ष मृत्यु का शिकार होते हैं।
(iii) प्राकृतिक वनों द्वारा जलवायु को संतुलित रखा जाता है। तथा इससे जलचक्र में भी संतुलन कायम रहता है। इन्हीं प्राकृतिक वनों में पृथ्वी की जैव विविधता का भंडार भरा रहता है। लेकिन इन प्राकृतिक वनों की व्यापक स्तर पर कटाई की जा रही है तथा लोग विस्थापित हो रहे हैं। जैव विविधता को निरंतर भारी नुकसान हो रहा है। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण उन पर्यावासों का विध्वंस है, जो जैव प्रजातियों की दृष्टि से समृद्ध हैं। पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में ओजोन गैस की मात्रा लगातार कम हो रही है। इसे ओजोन परत में छेद होना भी कहा जाता है। इसके कारण पारिस्थितिकी तंत्र तथा मनुष्यों के स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो रहा है।
(iv) 1992 में संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण तथा विकास के विषय पर केंद्रित एक सम्मेलन का आयोजन ब्राजील के रियो-डि-जेनेरियो में हुआ था। इसे पृथ्वी सम्मेलन भी कहा जाता है। इस सम्मेलन में 170 देशों, अनेक स्वयंसेवी संगठनों तथा कई बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया। वैश्विक राजनीति के दायरे में पर्यावरण के मुद्दे पर बढ़ते सरोकारों को इस सम्मेलन में ठोस रूप दिया गया। रियो सम्मेलन में यह तथ्य स्पष्ट तौर पर सामने आया कि दुनिया में अमीर तथा विकसित देश अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध तक गरीब और विकासशील देश अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध पर्यावरण के अलग-अलग एजेंडे के पक्षधर हैं। इस सम्मेलन में उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओजोन परत के छेद तथा ग्लोबल वार्मिंग को लेकर थी । दक्षिणी देश पर्यावरण प्रबंधन तथा आर्थिक विकास के पारस्परिक संबंधों को सुलझाने के लिए अधिक चिंतित थे।

प्रश्न 4. वैश्विक संपदा की जिम्मेदारी न केवल सांझी है, बल्कि अलग-अलग भी है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं?
उत्तर : I. वैश्विक संपदा की जिम्मेदारी केवल साझी नहीं है अपितु अलग-अलग है।
(i) जलवायु के परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमाचार यानी यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC-1992) में भी कहा गया है कि इस संधि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप, पर्यावरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर सांझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते हुए पर्यावरण की सुरक्षा के प्रयास करेंगे। इस नियमाचार को स्वीकार करने वाले देश इस बात पर सहमत थे कि ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदा समय में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा हिस्सा विकसित देशों का है। यह बात भी मानी गई कि विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है। इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो प्रोटोकॉल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है।
(ii) क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता है। इसके अंतर्गत औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ्लोरो कार्बन जैसी कुछ गैसों के बारे में माना जाता है कि वैश्विक तापवृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) में इनकी कोई-न-कोई भूमिका जरूर है।
II. हाँ, मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। मैं अपने निर्णय के समर्थन में निम्न तर्क देता हूँ :
(i) यह एक विशाल संघर्ष है, इसे एक मिशनरी भावना से व्यक्तिगत स्तर पर, गैर-सरकारी, स्वयंसेवी संस्थाओं के स्तर पर, स्थानीय सरकारों और निकायों के स्तर पर, जिला स्तरों पर, प्रांतीय या राज्य स्तर पर, राष्ट्रीय या देशीय स्तर पर और अंततः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है।
(ii) मानव व्यर्थ के अहं (egoes), संघर्षो, टकरावों, लड़ाइयों और युद्धों से बचें और साझी संपदा और संसाधनों पर निरंतर अनुसंधान और खोज कार्य किए जाने चाहिए, ताकि इनमें छुपी हुई प्राकृतिक संपदा, संसाधनों, जलसंपदा आदि का उपयोग सभी के कल्याण के लिए किया जा सके और मानव की भावी पीढ़ियों के भविष्य को आश्वस्त होकर सुनिश्चित और सुरक्षित बनाया जा सके।

प्रश्न 5. आज के विश्व के सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं? किन्ही चार का वर्णन करें।
उत्तर : आज विकट परिस्थितियों में सभी देशों के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती यह है कि कैसे पर्यावरण को बचाकर अपना आर्थिक विकास किया जा सकता है। जैसे प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग सीमित मात्रा में किया जाना चाहिए। जितनी पेड़ों की हम कटाई करते हैं, उतने पेड़ लगाने चाहिए। सौर ऊर्जा का अधिक-से-अधिक प्रयोग करना चाहिए। वर्षा के पानी को संरक्षित करना चाहिए। वैश्विक राजनीति पर्यावरण के प्रति निम्न कारणों से चिंतित है :
(क) समुद्रतटीय प्रदूषण : समुद्रतटीय प्रदूषण वैश्विक चिंता का एक और कारण है। भूमि की मात्रा सीमित है परंतु जनसंख्या में वृद्धि हुई है और विकास की होड़ में अनावश्यक उत्पादन होता है तथा अपशिष्ट पदार्थ (Waste) की मात्रा बढ़ती जा रही है। बहुत से देश अपने अपशिष्ट पदार्थ समुद्रों में फेंकने लगे हैं जिससे अनेक विश्वव्यापी समस्याएँ बढ़ने लगी हैं। समुद्री तटों पर प्रदूषण बढ़ा है जिसने पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डाला है। आज विश्व के सभी देश बढ़ते समुद्रतटीय प्रदूषण की चुनौती को स्वीकार करके इस समस्या का निदान करने में समग्र चिन्तन की अपनी आवश्यकता को महसूस कर रहे हैं।
( ख ) जल प्रदूषण : जल की मात्रा सीमित है जबकि जल की पूर्ति, माँग अथवा मात्रा असीमित है। जल की सीमित मात्रा के साथ-साथ मानव ने नदियों व समुद्र के पानी को भिन्न-भिन्न ढंगों से प्रदूषित करना शुरू कर दिया है। कारखानों से निकलने वाले विषैले रसायनों, कीटनाशक पदार्थों, पैट्रोलियम उत्पादन से तथा नगरों के गंदे नालों के पानी से नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है। विश्व विकास रिपोर्ट 2006 के अनुसार विकासशील देशों की एक अरब बीस करोड़ जनता को पीने के लिए शुद्ध जल उपलब्ध नहीं होता। आज विश्व के सभी देश इस चुनौती को स्वीकार करके इसके लिए सख्त कानून बनाकर उसे सख्ती से लागू करने का आदेश दे सकते हैं।
(ग) वायुमंडल में ओजोन रिसाव : वायुमंडल में ओजोन की परत में छेद होने लगा है जिसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि होती जा रही है जिससे पहाड़ों पर जमी बर्फ अधिक पिघलने लगी है, समुद्र तल ऊँचा उठने लगा है और इसके कारण कई देशों के जलमग्न होने की संभावना बढ़ रही है।
(घ) वनों की कटाई व भू-क्षरण : वातावरण की स्वच्छता के लिए वन अनिवार्य तत्त्व हैं। केवल प्रकृति में वन ही दूषित वायु के भक्षक हैं और बदले में वे स्वच्छ ऑक्सीजन प्रदान करते हैं जो कि जीवन के लिए अनिवार्य तत्त्व है। आज के युग में जनसंख्या व उद्योगो के विस्तार के कारण स्वच्छ हवा का अभाव होता जा रहा है। निरंतर वनों की कमी से वायु के चक्र में भी बाधा पड़ती है और इस तरह वनों के अभाव से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है जिससे वातावरण दूषित होता जा रहा है। वनों की अंधाधुंध कटाई ने जलवायु को प्रभावित किया है, प्रकृति की जैव-विविधता को असंतुलित किया है।

प्रश्न 6. विश्व की साझी संपदा’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा ऐसी ‘साझी संपदा’ के कोई चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर : I. विश्व की साझी विरासत का अर्थ : साझी संपदा वह संसाधन है, जिस पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का हक होता है। यह साझा चूल्हा, साझा चरागाह, साझा मैदान, साझा कुआँ या नदी कुछ भी हो सकता है। इसी तरह विश्व के कुछ ‘हिस्से और क्षेत्र किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं। इसीलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। इन्हें ‘वैश्विक संपदा’ या ‘मानवता की साझी विरासत’ कहा जाता है। इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं।
II. विश्व की साझी संपदा के चार उदाहरण :
( क ) इमारती लकड़ियाँ: पहले किसी देश की नौसैनिक शक्ति इमारती लकड़ी से जुड़ी थी और विदेशी व्यापार नौसैनिक क्षमता से संबद्ध था। अतः पश्चिमी देशों ने उन देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहा जहाँ से उन्हें अपनी किश्तियों तथा जलपोतों के निर्माण के लिए इमारती लकड़ी मिल सकती थी। उस समय तेल को मूल्यवान नहीं समझा जाता था। इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकड़ियों की आपूर्ति हेतु पश्चिमी शक्तियों ने अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के देशों पर प्रभाव जमाया।
(ख) तेल भंडार : तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्जा जमाने के लिए राजनीतिक संघर्ष छिड़ता रहा है। पश्चिम एशिया में विश्व के तेल-भंडार का 64 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। सऊदी अरब के पास विश्व के कुल तेल भंडार का एक-चौथाई हिस्सा है।
इराक का तेल भंडार दूसरे नम्बर पर आता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, भारत आदि में इस तेल की खपत बड़े पैमाने पर होती है। अतः अमेरिका तथा पश्चिम के देश इस संसाधन पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं।
(ग) जल संसाधन : विश्व राजनीति में जल एक अन्य महत्त्वपूर्ण संसाधन है। दुनिया के कुछ हिस्सों में स्वच्छ पानी का अभाव है। इस जीवनदायी संसाधन को लेकर हिंसक संघर्ष की संभावना है और इसलिए विश्व राजनीति के कुछ विद्वानों ने “जल युद्ध” शब्द गढ़ा है। देशों के बीच जल-संसाधनों पर वर्चस्व के लिए झड़पें हो चुकी हैं। 1950 और 1960 के दशक में इजराइल, सीरिया और जार्डन के बीच संघर्ष हुआ। बहुत से देशों के बीच नदियों का साझा है और उनके बीच सैन्य संघर्ष होते रहते हैं।
(घ) आर्थिक संसाधन : संसाधन जितने अधिक होंगे, देश की अर्थव्यवस्था में उतनी ही अधिक वृद्धि की संभावना हो जाती है। संसाधनों के आधार पर देश का औद्योगीकरण, आर्थिक विकास तथा सैन्य शक्ति बढ़ती है और विश्व राजनीतिक में भी उस देश की आवाज को वजन प्राप्त होने लगता है। संसाधनों पर अपनी पहुँच बनाए रखना हर देश चाहता है और वह इस उद्देश्य को प्राथमिकता देकर अपनी विदेशी नीति का निर्माण तथा संचालन करता है।

प्रश्न 7. विश्व राजनीति में संसाधनों को लेकर राष्ट्री के बीच तनातनी रही है। टिप्पणी करें।

अथवा

संसाधनों की भू-राजनीति पर विस्तृत चर्चा करें।
उत्तर : वैश्विक राजनीति में तनाव का एक मुख्य कारण संसाधनों पर अधिक से अधिक वर्चस्व कायम करना रहा है। किसी भी देश को अमीर, विकसित और शक्तिशाली बनाने में मुख्य भूमिका इनकी ही रहती है। प्रमुख संसाधनों तथा विश्व राजनीति में उनकी भूमिका को निम्न रूप से स्पष्ट किया जा सकता है :
( क ) इमारती लकड़ियाँ (Furniture woods) : पहले किसी देश की नौसैनिक शक्ति इमारती लकड़ी से जुड़ी थी और विदेशी व्यापार नौसैनिक क्षमता से संबद्ध था। अतः पश्चिमी देशों ने उन देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहा जहाँ से उन्हें अपनी किश्तियों तथा जलपोतों के निर्माण के लिए इमारती लकड़ी मिल सकती थी। उस समय तेल को मूल्यवान नहीं समझा जाता था। इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकड़ियों की आपूर्ति हेतु पश्चिमी शक्तियों ने अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के देशों पर प्रभाव जमाया।
(ख) तेल भंडार (Oil Reserve) : तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्जा जमाने के लिए राजनीतिक संघर्ष छिड़ता रहा है। पश्चिम एशिया में विश्व के तेल-भंडार का 64 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। सऊदी अरब के पास विश्व के कुल तेल भंडार का एक-चौथाई हिस्सा है।इराक का तेल भंडार दूसरे नम्बर पर आता है। संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, भारत आदि में इस तेल की खपत बड़े पैमाने पर होती है। अत: अमेरिका तथा पश्चिम के देश इस संसाधन पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं ।
(ग) जल संसाधन (Water Resources) : विश्व राजनीति में जल एक अन्य महत्त्वपूर्ण संसाधन है। दुनिया के कुछ हिस्सों में स्वच्छ पानी का अभाव है। इस जीवनदायी संसाधन को लेकर हिंसक संघर्ष की संभावना है और इसलिए विश्व राजनीति के कुछ विद्वानों ने “जल युद्ध” शब्द गढ़ा है। देशों के बीच जल-संसाधनों पर वर्चस्व के लिए झड़पें हो चुकी हैं। 1950 और 1960 के दशक में इजराइल , सीरिया और जार्डन के बीच संघर्ष हुआ। बहुत से देशों के बीच नदियों का साझा है और उनके बीच सैन्य संघर्ष होते रहते हैं।
वस्तुतः संसाधन जितने अधिक होंगे, देश की अर्थव्यवस्था में उतनी ही अधिक वृद्धि की संभावना हो जाती है। संसाधनों के आधार पर देश का औद्योगीकरण, आर्थिक विकास तथा सैन्य शक्ति बढ़ती है और विश्व राजनीतिक में भी उस देश की आवाज को वजन प्राप्त होने लगता है। संसाधनों पर अपनी पहुँच बनाए रखना हर देश चाहता है और वह इस उद्देश्य को प्राथमिकता देकर अपनी विदेशी नीति का निर्माण तथा संचालन करता है।

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