Class 12th Political Science Chapter 9 Important Question Answer 8 Marks वैश्वीकरण

प्रश्न 1. वैश्वीकरण की परिभाषा दीजिए। इसके किन्हीं तीन आर्थिक प्रभावों का वर्णन कीजिए ।

अथवा

वैश्वीकरण क्या है? वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर : वैश्वीकरण की परिभाषा : वैश्वीकरण वह प्रक्रम है, जिसमें हम अपने देश की अर्थव्यवस्था को शेष दुनिया के देशों के साथ जोड़ते हैं। यद्यपि हम अपने देश के आर्थिक तथा अन्य निर्णयों को दुनिया के एक क्षेत्र में क्रियान्वित करते हैं, जो दुनिया के दूरवर्ती क्षेत्रों में व्यक्तियों और समुदायों के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक अवधारणा (Concept) के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है -प्रवाह (flow) । प्रवाह कई प्रकार के हो सकते हैं। विश्व के एक भाग के विचारों का दूसरे भाग में पहुँचना, पूँजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना, वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना और उनका व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आवाजाही । यहाँ सबसे जरूरी बात है – विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है।
वैश्वीकरण के तीन आर्थिक प्रभाव : (i) आमतौर जिस प्रक्रिया को आर्थिक वैश्वीकरण के नाम से जाना जाता है, उसमें विश्व के विभिन्न देशों के मध्य आर्थिक प्रवाह तीव्र हो जाता है । यद्यपि कुछ आर्थिक प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं, तथापि कुछ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और शक्तिशाली देशों द्वारा जबरन लाद दिए जाते हैं। वैश्वीकरण के चलते तमाम दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में लाभ हुआ है। अलग-अलग देश अपने यहाँ होने वाले आयात पर प्रतिबंध लगाते थे, लेकिन अब ये प्रतिबंध अपेक्षाकृत कम हो गए हैं।
(ii) वैश्वीकरण के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करते समय हमें इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक स्थान पर एक समान नीति अपना लेने का तात्पर्य यह नहीं होता कि हर स्थान पर नतीजे भी एक समान होंगे। यद्यपि वैश्वीकरण के कारण विश्व के अलग-अलग हिस्सों में सरकारों ने लगभग समान आर्थिक नीतियों को अपनाया है, तथापि विश्व के अलग-अलग भागों में इसके परिणाम बहुत अलग-अलग हुए हैं।
(iii) आर्थिक वैश्वीकरण के कारण तमाम दुनिया में जनमत अत्यधिक गहराई से विभाजित हो गया है। आर्थिक वैश्वीकरण के कारण सरकारें कुछ उत्तरदायित्वों से अपने हाथ खींच रही हैं तथा इससे सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले निश्चित तौर पर चिंतित हैं। इनका विचार है कि आर्थिक वैश्वीकरण से जनसंख्या के छोटे तबके का फायदा होगा, जबकि नौकरी तथा जनकल्याण (शिक्षा स्वास्थ्य, स्वच्छता आदि) के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जायेंगे। दूसरी तरफ आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के समर्थकों का मत है कि इससे समृद्धि बढ़ेगी तथा इससे तमाम विश्व को फायदा होगा। अतः आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है तथा इसके प्रवाह को रोका नहीं जा सकता। कुल मिलाकर आर्थिक वैश्वीकरण के चलते ‘पारस्परिक निर्भरता’ की गति तेज हो गयी है। इसके कारण दुनिया के विभिन्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा जनता के बीच जुड़ाव निश्चित तौर पर बढ़ा है। हालाँकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को विश्व का पुन: उपनिवेशीकरण माना है।

प्रश्न 2. “वैश्वीकरण के कारण सत्ता राष्ट्र-राज्यों के स्थान पर वैश्विक उपभोक्ताओं के हाथ में आ गई है। ” इस कथन की पुष्टि कीजिए
उत्तर : “वैश्वीकरण के कारण सत्ता राष्ट्र-राज्यों के स्थान पर वैश्विक उपभोक्ताओं के हाथ में आ गयी है। ” यह कथन निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है:
(i) वैश्वीकरण के संदर्भ में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। सबसे सीधा-सरल विचार यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है, उसे करने की ताकत में कमी आती है। पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धारणा अब पुरानी पड़ गई और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है।
(ii) राज्य अब कुछेक मुख्य कामों तक ही अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना। इस तरह से राज्य ने अपने को पहले के कई ऐसे लोक-कल्याणकारी कामों से खींच लिया है, जिनका लक्ष्य आर्थिक और सामाजिक-कल्याण होता था। लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाजार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक है।विकासशील देशों में बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर फैसला करने की क्षमता में कमी आती है।

प्रश्न 4. वैश्वीकरण के किन्हीं दो राजनैतिक तथा दो सांस्कृतिक परिणामों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : 1. वैश्वीकरण के दो राजनीतिक परिणाम :
(i) वैश्वीकरण के कारण राज्य की सत्ता, अर्थात् सरकारों को जो करना है, उसे करने की शक्ति में आवश्यक रूप से कमी आती है। विश्व में वर्तमान में कल्याणकारी राज्य की धारणा अपना महत्त्व खोती जा रही है। वर्तमान में राज्य की भूमिका न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य तक सीमित होती जा रही है। अब राज्य कुछ मुख्य तथा अपरिहार्य कार्यों, जैसे कानून और व्यवस्था तथा नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा तक अपने को सीमित कर रहा है। लोक कल्याणकारी राज्य के स्थान पर अब बाजार आर्थिक तथा सामाजिक प्राथमिकताओं का मुख्य निर्धारक है। तमाम दुनिया में बहुराष्ट्रीय निगम अपना प्रसार करते जा रहे हैं। इसके कारण सरकारों की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता में कमी आ रही है।(ii) वैश्वीकरण की प्रक्रिया से राज्य की सत्ता में सदैव कमी आती है, ऐसा नहीं है। राज्य की प्रभुसत्ता को कोई प्रत्यक्ष चुनौती नहीं मिली है। राजनीतिक समुदाय के रूप में उसकी संप्रभुता अक्षुण्ण है। वास्तव में कुछ अर्थों में राज्य की शक्ति तथा सत्ता में वृद्धि हुई है। राज्य अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के माध्यम में अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ एकत्रित कर सकते हैं। कुल मिलाकर, वैश्वीकरण तथा टेक्नोलॉजी के माध्यम से राज्य पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली हो रहे हैं।
2.वैश्वीकरण के दो सांस्कृतिक परिणाम :
(i) वैश्वीकरण की प्रक्रिया के व्यापक प्रचार तथा प्रसार से यह बात जोर पकड़ती जा रही है कि यह प्रक्रिया विश्व की संस्कृतियों को खतरा समरूपता का जनक माना जाता है तथापि इसका अर्थ यह नहीं पहुँचायेगी। यद्यपि वैश्वीकरण सांस्कृतिक है कि वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता के चलते किसी विश्व-संस्कृति को जन्म दे रहा है। वस्तुतः विश्व-संस्कृति के नाम पर दुनिया पर पश्चिमी संस्कृति अंधाधुंध थोपी जा रही है। वैश्वीकरण का सांस्कृतिक प्रभाव तथा प्रसार कुछ सीमा तक राजीतिक दबदबे से भी जुड़ा है। राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से शक्तिशाली संस्कृति अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली समाजों पर अपना प्रभाव कायम करने का प्रयास करती है। वास्तव में, दुनिया वैसी दिखाई देती है, जैसा कि शक्तिशाली संस्कृति इसे बनाना। चाहती है।
(ii) दूसरी तरफ यह स्वीकार कर लेना भी गलत है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिक प्रभाव सदैव नकारात्मक होते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि संस्कृति जड़ नहीं होती है। यह ठीक है कि सभ्यता की तुलना में इसकी गति अपेक्षाकृत धीमी होती है। संस्कृति में समय के साथ बदलाव आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि सांस्कृतिक समरूपता वैश्वीकरण का एक मुख्य पहलू वैश्वीकरण से इसका विपरीत प्रभाव हुआ है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के चलते प्रत्येक संस्कृति पृथक् और विशिष्ट होती जा रही है। इस प्रक्रिया को ‘सांस्कृतिक विभिन्नता’ का नाम दिया जाता है। इस प्रकार, सांस्कृतिक प्रभाव तथा परिवर्तन एकतरफा नहीं होते।

प्रश्न 5. वैश्वीकरण ने भारत को कैस प्रभावित किया है और भारत को वैश्वीकरण क्या लाभ हुआ है।
उत्तर : (i) भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव (Impact of globatisation in India) :
(i) वैश्वीकरण के इतिहास पर नजर डाली जाए तो यह ज्ञात होता है कि वैश्वीकरण इतिहास की विभिन्न कालवधियों में पहले भी हो चुका है। पूँजी, वस्तु विचार और लोगों की आवाजाही का इतिहास कई सदियों का गवाह हे ।
(ii) औपनिवेशिक दौ में ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा तैयार माल का आयातक देश था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद यह तय किया गया कि अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन भारत में ही किया जाएगा। ऐसे में आयात पर प्रतिबंध लगाया गया जिसे ‘सरंक्षणवाद’ का नाम दिया गया। इसका कुछ लाभ तो भारत को जरूर मिला। कुछेक क्षेत्रों की तरफ ध्यान नहीं दे पाएँ जैसे- प्राथमिक शिक्षा, आर्थिक विकास की गति का धीमा होना आदि।
वैश्वीकरण के लाभ :
(1) वैश्वीकरण के चलते पूरी दुनिया वस्तुओं के व्यापार में इजाफा हुआ है, अलग-अलग देश अपने यहाँ होने वाले आयात पर प्रतिबंध लगाते थे, लेकिन अब ये प्रतिबंध कम हो गए हैं। ठीक इसी तरह दुनिया भर में पूँजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध हैं। व्यावहारिक धरातल पर इसका अर्थ वह हुआ कि धनी देश के निवेशकर्ता अपना धन अपने देश की जगह कहीं और निवेश कर सकते हैं, खासकर विकासशील देशों में, जहाँ उन्हें ज्यादा मुनाफा होगा। वैश्वीकरण के चलते अब विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाधा नहीं रही, उनका प्रवाह अबाध है। इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका उदाहरण है।
(2) जो भी हो, वैश्वीकरण के कारण जिस सीमा तक और पूँजी का प्रवाह बढ़ा है, उस सीमा तक लोगों की नहीं गढ़ सकी है। विकसित देश अपनी वीजा-नीति के अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतर्कता से अभेद्य बनाए हैं, ताकि दूसरे देशों के नागरिक विकसित देशों में आकर उनके नागरिकों के नौकरी-धंधे न हथिया लें।
(3) वैश्वीकरण के परिणामों पर सोचते हुए हमें इस बात ध्यान रखना चाहिए कि हर जगह एक सम्मान नीति अपना का मतलब यह नहीं होता। कि हर जगह परिणाम भी समान वैश्वीकरण के कारण दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकार ने एक सी आर्थिक नीतियों को अपनाया है लेकिन विश्व विभिन्न भागों में इसके परिणाम बहुत अलग-अलग हुए हैं। भी हमें सर्व सामान्यनिष्कर्ष निकालने के बजाय संदर्भ-विशेष ध्यान देना होगा।

प्रश्न 8. वैश्वीकरण से क्या अभिप्राय है? वैश्वीकरण के प्रतिरोध के किन्हीं दो रूपों को सूचीबद्ध कीजिए ।

अथवा

वैश्वीकरण की धारणा की व्याख्या कीजिए तथा इसके प्रतिरोध के कोई दो कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : I. अभिप्राय : वैश्वीकरण वह प्रक्रम है, जिसमें म अपने निर्णयों को दुनिया के एक क्षेत्र में क्रियान्वित करते हैं, जो दुनिया के दूरवर्ती क्षेत्र में व्यक्तियों और समुदायों के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते सरल शब्दों में, वैश्वीकरण की बुनियादी बात है – प्रवाह (flow) | प्रवाह कई प्रकार के हो सकते हैं विश्व के एक भाग के विचारों का दूसरे भाग में पहुँचना, पूँजी का एक से ज्यादा जगहों पर जाना, वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना और उनका व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आवाजाही । यहाँ सबसे जरूरी बात है- विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव, पैदा हुआ है और कायम भी है।
II. प्रतिरोध के दो रूप :
1.गलाकाट प्रतिस्पर्धा : शिव-त्रिशूल की तरह त्रिकोणीय ‘नई आर्थिक नीति’ (अर्थात् उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण) को भारत सरकार ने वर्ष 1990 के दशक से अंगीकार किया है। इसने 1960 के दशक से घात लगाकर बैठे हुए बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के लिए अभिनदंन द्वार खोलकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न कर दी है। ये कंपनियाँ भारत की घरेलू कंपनियों एवं निर्माताओं की तुलना में अत्यधिक सस्ती दर पर तैयार माल और उत्पादों को बेचने लगी हैं। भारत सरकार ने भी इन्हें विशेष रियायतें देनी शुरू कर दी हैं। ये रियायतें-अर्थव्यवस्था के विशेष क्षेत्र (SEZ) विकसित करने, पाँच वर्ष तक कर में छूट देने तथा देश के श्रम कानूनों में ढिलाई बरत कर उन्हें श्रमिकों का शोषण करने की खुली छूट देने के प्रभाव वाले हैं। सरकार की इस उदारता ने घरेलू उद्योगों को उत्पादन बंद करने की स्थिति में पहुँचा दिया है।
2.बेरोजगारी की समस्या : बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति अंधभक्ति रखने वाली परंतु राष्ट्रहित के प्रतिकूल सरकारी नीतियों ने केवल चंद धनी उद्योगपतियों और व्यापारिक घरानों को छोड़कर देश के अन्य सभी उद्यमियों, कामगारों तथा श्रमिकों को बेरोजगारी की अंधी खाई में धक्का दे दिया है। बेरोज़गारी पिछले पंद्रह वर्षों से लगातार बढ़ती जा रही है।

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