3 अंकीय प्रश्न उत्तर – उपनिवेशवाद और देहात – Class12th History Chapter 10

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 10 Important Question Answer 3 Marks उपनिवेशवाद और देहात (सरकारी अभिलेखों का अध्ययन)

प्रश्न 1. ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों थे ?
उत्तर : ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती था। इसके कई कारण थे। इनमें से कुछ कारण निम्नलिखित थे-
(i) जोतदारों के पास जमीन के बड़े-बड़े रकबे होते थे।
(ii) उन जोतदारों ने स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भील अपना नियंत्रण कर लिया था। इस प्रकार वे उस क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर अपनी व्यापक शक्ति का प्रयोग करते थे।
(iii) जोतदार गाँव में ही रहते थे और गरीब ग्रामवासियों के अधिकांश वर्ग पर सीधे अपनी ताकत का प्रयोग करते थे।
(iv) वे स्वयं खेती नहीं करते थे, बल्कि उनकी खेती बटाईदारों द्वारा की जाती थी जो फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे। इस प्रकार जोतदार बिना किसी लागत और मेहनत के धनवान और शक्तिशाली होते चले गए।

प्रश्न 2. जमींदार लोग अपनी जमींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे ?
उत्तर : जमींदार लोग अपनी जमींदारियों पर विभिन्न प्रकार से अपनाकर उन पर नियंत्रण रखते थे।
(i) फर्जी बिक्री एक महत्त्वपूर्ण तरकीब थी। अपनी भू-संपदा की नीलामी के समय उनके अपने ही आदमी ऊँची बोली लगाकर जमींदारी को खरीद लेते थे बाद में खरीद की राशि देने से इन्कार कर देते थे। दोबारा बोली लगाई जाती थी एक बार फिर जमींदार के आदमी ऊँची बोली लगाकर भू-संपदा खरीद लेते थे, परन्तु बाद में खरीद की राशि को देने से इन्कार कर देते थे। यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती थी और अन्त में थककर सरकार द्वारा उस भू-संपदा को बहुत कम कीमत पर फिर जमींदार को ही बेचना पड़ता था।
(ii) जब कोई नया खरीददार जमींदारी खरीद लेता था, तो पुराने जमींदार के लठियाल नए खरीदार के लोगों को मारपीट कर उसे भगा देते थे।
(iii) कंपनी के निर्णय के अनुसार स्त्रियों से उनकी संपत्ति को नहीं छिना जा सकता था। अत: जमींदार अपनी जमींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माता अथवा कुछ परिवार की किसी अन्य महिला सदस्य के नाम पर कर देते थे ताकि उन पर उनका नियंत्रण बना रहे।

प्रश्न 3. पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई ?

अथवा

राजमहल की पहाड़ियों में रहने वाले पहाड़िया लोगों को पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने पर क्यों मजबूर किया गया ? इनका उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : पहाड़िया लोग बाहर से आने वाले लोगों को संदेह तथा अविश्वास की दृष्टि से देखते थे। अत: जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया लोगों ने इसका प्रतिरोध किया परन्तु धीरे-धीरे उन्हें पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने के लिए विवश कर दिया गया। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया। अत: वे ऊपरी पहाड़ियों के चट्टानों एवं अधिक बंजर प्रदेशों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित होकर रह गए। इसका उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा। अंतत: वे गरीब हो गए। झूम खेती के लिए नयी-से-नयी उपजाऊ जमीनें चाहिए थीं परन्तु अब ऐसी जमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गई क्योंकि वे अब दामिन-ए-कोह का भाग बन चुकी थीं। इसलिए पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती को सफलतापूर्वक जारी नहीं रख सके। जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ कर दिए गए तो पहाड़िया शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 4. दामिन-ए-कोह क्या था? अठारहवीं शताब्दी के दौरान संथालों ने अंग्रेजों का प्रतिरोध क्यों किया ? तीन कारण लिखिए।

अथवा

साहूकारों, जमींदारों और औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध संथाल विद्रोह के कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल के पहाड़ी प्रदेश में जमीन के एक बहुते बड़े इलाके को सीमित कर दिया तथा इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया। यहाँ उन्हें स्थायी कृषि करनी थी। इसी भूमि को ‘दामिन-ए-कोह’ का नाम दिया गया था।
अठारहवीं शताब्दी के दौरान संथालों का प्रतिरोध : संथालों को स्थायी कृषि के लिए राजमहल की पहाड़ियों में ‘दामिन-ए-कोह’ के नाम से भूमि दी गई थी। वे एक जगह स्थायी रूप से बस गए थे और बाजार के लिए कई प्रकार की वाणिज्यिक फसलों की खेती करने लगे थे वे व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन भी करने लगे थे परन्तु उन्हें शीघ्र ही इस बात का आभास हो गया। उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। इसके कई कारण थे
(ii) संथालों ने जिस जमीन को साफ करके खेती शुरू की थी उस पर सरकार (राज्य) भारी कर लगा रही थी। (ii) साहूकार (दिकू) उनके ऋण पर बहुत ऊँची दर से ब्याज लगा रहे थे। (iii)आण न चुका पाने की दशा में वे उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे थे। (h) जमींदार लोग दामिन प्रदेश पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे |
अतः 1850 के दशक तक, संथाल लोग यह अनुभव करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने के लिए. उनका अपना शासन होना आवश्यक है। इसलिए उन्होंने जमींदारों साहूकारों और औपनिवेशक राज के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

प्रश्न 5. वक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे ?
उत्तर : दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति निम्नलिखित कारणों से क्रुद्ध थे- (i) पहले ऋणदाताओं ने कपास की खेती के लिए रैयतों को काफी उधार दिया और मुनाफा कमाया परन्तु जब उन्हें लगने लगा कि अब भारतीय कपास की माँग कम होती जा रही है और रैयत उनका कर्ज नहीं चुका सकते थे तो उन्होंने ऋण देने से इन्कार कर दिया। (ii) रैयत अब अपने को असहाय महसूस कर रहे थे। ऋणदाताओं द्वारा ऋण देने से इन्कार को लेकर उन्हें बहुत गुस्सा आया। (iii) वे सिर्फ इस बात से क्रोधित नहीं थे कि वे ऋण क बोझ से दबे जा रहे थे अथवा कि वे अपने जीवन को बचाने के लिए ऋणदाता पर पूर्ण रूप से निर्भर थे. बल्कि उन्हें इस बात का ज्यादा गुस्सा था कि ऋणदाता वर्ग इतना संवेदनशील हो गया था कि वह उनकी हालत पर कोई तरस नहीं खा रहा था।
(iv) ऋण देने वाले लोग गाँव के प्रथागत मानकों यानी रूढ़ि रिवाजों का भी उल्लंघन कर रहे थे।

प्रश्न 6. इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गईं?
उत्तर : सन् 1793 में औपनिवेशिक शासन द्वारा इस्तमरारी बंदोबस्त को लागू किया गया। इसके तहत प्रत्येक जमींदार को एक निश्चित राशि राजस्व के रूप में जमा करनी होती थी। लेकिन इस्तमरारी बंदोबस्त के पश्चात् कुछ प्रारंभिक दशकों में जमींदारों ने राजस्व माँग को अदा करने में बराबर अपनी हिचिकिचाहट दिखाई और इस कारण राजस्व की बकाया राशि में लगातार बढ़ोत्तरी होती गई। ऐसी व्यवस्था की गई थी कि निश्चित राशि नहीं चुका पाने वाले जमींदारों से राजस्व वसूल करने के लिए उनकी संपदाएँ नीलाम कर दी जाती थीं इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने के बाद 75 प्रतिशत से अधिक जमींदारियाँ हस्तांतरित कर दी गई थीं।

प्रश्न 7. पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस प्रकार भिन्न थी?
उत्तर : पहाड़िया लोगों की आजीविका :
(i) पहाड़िया लोगों का गुजर-बसर जंगल की उपज से होता था। वे झूम खेती किया करते थे। वे जंगल के छोटे से हिस्से में झाड़ियों को काटकर और घास-फूस को जलाकर जमीन को साफ कर लेते थे और राख की पोटाश से उपजाऊ बनी जमीन पर तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा लगा लेते थे।
(ii) कुछ वर्षों तक उस साफ की गई जमीन में खेती करते थे और फिर उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़कर नए इलाके में चले जाते थे जिससे कि उस जमीन की समाप्त हो चुकी उर्वरता फिर से उत्पन्न हो सके।
(iii) पहाड़िया लोग खाने के लिए जंगलों में महुआ के फूल एकत्र करते थे।
(iv) पहाड़िया लोग बेचने के लिए रेशम के कोया और राल तथा काठ-कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करते थे। वे कुदाल का इस्तेमाल करते थे।
(v) पहाड़िया लोग पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे।
(vi) वे जंगल में शिकार करते थे।
(vii) पहाड़ियों को अपना मूलाधार बनाकर, पहाड़िया लोग बराबर उन मैदानों पर आक्रमण करते रहते थे। पहाड़ियों द्वारा ये आक्रमण मुख्यत: अपने आपको अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने के लिए किए जाते थे।
(viii) मैदानों में रहने वाले जमींदार प्रायः इन पहाड़ी मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज देते थे और उनसे शांति खरीदते थे। इसी प्रकार, व्यापारी लोग भी इन पहाड़ियों द्वारा नियंत्रित रास्तों का इस्तेमाल करने की अनुमति प्राप्त करने हेतु उन्हें कुछ पथकर दिया करते थे। इस प्रकार का पथकर पाकर पहाड़िया मुखिया उन व्यापारियों की रक्षा करते थे और उन्हें यह भी आश्वासन देते थे कि कोई भी उनके माल को नहीं लूटेगा। संथालों की आजीविका :
(i) संथल लोग भी जंगल को काटकर जमीन जोतते थे और चावल, कपास, तंबाकू तथा सरसों की खेती करते थे।
(ii) संथाल लोग खेती के लिए हल का प्रयोग करते थे।
(iii) बाद में संथाल लोग एक जगह रहकर स्थायी कृषि करने लगे थे।
(iv) संथाल व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन भी करते थे।

प्रश्न 8. अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया ?
उत्तर : सन् 1861 में अमेरिका में गृहयुद्ध छिड़ गया। इस गृहयुद्ध से ब्रिटेन के कपास क्षेत्र (मंडी तथा कारखानों) में हड़कंप मच गया। अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास के आयात में भारी गिरावट आ गई। वह सामान्य मात्रा का 3 प्रतिशत तक रह गया। भारत तथा अन्य देशों को बड़ी व्यग्रता से यह संदेश भेजा गया कि ब्रिटेन को कपास का अधिक मात्रा में निर्यात करे। साहूकारों को अधिक से अधिक अग्रिम राशियाँ दी गई, जिससे वे रैयतों को अधि क से अधिक उधार दे सकें। दक्कन के रैयतों को अकस्मात् ही असीमित ऋण उपलब्ध होने लगा उन्हें कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ जमीन के लिए 100 रु. अग्रिम मिलने लगे। साहूकार भी दीर्धावधिक ऋण देने के लिए एकदम तैयार बैठे थे। अमेरिकी संकट के दौरान कपास उगाने वाले एकड़ों की संख्या दुगनी हो गई। 1882 तक स्थिति यह हो गई कि ब्रिटेन में आयात होने वाले कपास का 90 प्रतिशत भारत से निर्यात होता था।
लेकिन इन सबके बावजूद सभी किसान उत्पादकों को समृद्धि प्राप्त नहीं हो सकी। कुछ धनी किसानों के लिए तो यह काफी फायदेमंद साबित हुआ, लेकिन अधिकतर किसान कर्ज के बोझ से और अधिक दब गए। अमेरिकी गृहयुद्ध की समाप्ति के पश्चात् भारतीय कपास की माँग धीरे-धीरे घटती चली गई। पूर्व में लिए गए ऋण को नहीं चुकाने के बावजूद, रैयत फिर से ऋण लेने पर मजबूर होते गए। धीरे-धीरे साहूकारों को ऋण देना भी बंद कर दिया। रैयतों की स्थिति बेहद नाजुक हो गई और आखिरकार उन्होंने विद्रोह कर रास्ता अपना लिया।

प्रश्न 9. किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं ?
उत्तर : सरकारी स्रोतों में सरकारी सर्वेक्षण तथा रिपोर्ट आदि शामिल हैं। इनमें दी गई जानकारी सरकारी दृष्टिकोण तथा सरकार के हित से प्रेरित होती है। इनमें किसी घटना के लिए सरकार को दोषी ठहराने की बजाय विरोधी पक्ष को दोषी सिद्ध करने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए दक्कन दंगा आयोग से विशेष रूप से यह जाँच करने के लिए कहा गया था कि क्या सरकारी राजस्व की माँग का स्तर किसानों के क्रोध का कारण नहीं थी। इसमें सारा दोष ऋणदाताओं अथवा साहूकारों का ही था। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि औपनिवेशिक सरकार यह मानने को कदापि तैयार नहीं थी कि किसानों में असंतोष अथवा उनका रोष कभी सरकारी कार्यवाही के कारण उत्पन्न हुआ था।
सच तो यह है कि सरकारी रिपोर्ट इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए बहुमूल्य स्रोत तो हैं परन्तु उनका उपयोग करने से पहले उनका सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक है।

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