Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 10 Important Question Answer 2 Marks उपनिवेशवाद और देहात (सरकारी अभिलेखों का अध्ययन)

प्रश्न 1. “पाँचवीं रिपोर्ट में दिए गए तर्कों और साक्ष्यों को बिना किसी आलोचना के स्वीकार नहीं किया जा सकता है।” तर्क दीजिए।

अथवा

1813 की पाँचवीं रिपोर्ट के एक सकारात्मक और एक नकारात्मक पहलू का विश्लेषण कीजिए ।
उत्तर : (i) ‘पाँचवी रिपोर्ट’ एक प्रचार समिति के द्वारा तैयार की गई थी। यह रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन स्वरूप पर इंग्लैंड की संसद में गंभीर वाद-विवाद का आधार बन गई थी।
(ii) ग्रामीण बंगाल में 18वीं सदी के अंतिम दशकों में क्या घटित हुआ, इसके विषय में हमारी अवधारणा लगभग 150 वर्षों तक पाँचवी रिपोर्ट के आधार पर ही निर्भर रही।
(iii) यद्यपि पाँचवी रिपोर्ट के साक्ष्य अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं तथापि इसका सावधानीपूर्ण आलोचनात्मक अवलोकन अपरिहार्य है। हमें इस रिपोर्ट के उद्देश्य को भी विस्तारपूर्वक समझना होगा।
(iv) आधुनिक शोधों से विदित होता है कि पाँचवीं रिपोर्ट की विषयवस्तु. तकों तथा साक्ष्यों को बिना किसी आलोचना तथा गंभीर अध्ययन के स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस रिपोर्ट, में भारत में जमींदारी सत्ता के पतन को बढ़ा-चढ़ाकर वर्णित किया गया है। वास्तव में, पाँचवीं रिपोर्ट के लेखक कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना के लिए कटिबद्ध थे।

प्रश्न 2. रैयतवारी व्यवस्था क्या थी ? रैयतों ने हिंसक रूप क्यों लिया ? तीन कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari.System): दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में रैयतवाड़ी बंदोबस्त लागू किया गया जिसके अंतर्गत किसान भूमि का मालिक था यदि वह भू-राजस्व . ४ का भुगतान करता रहा। इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि यह वही व्यवस्था है, जो भारत में पहले से थी। बाद में यह व्यवस्था मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों में भी लागू कर दी गई। इस व्यवस्था में 20-30 वर्ष बाद संशोधन कर दिया जाता था तथा राजस्व की राशि बढ़ा दी जाती थी।
रैयतों के हिंसक रूप : कारण
रैयतवारी व्यवस्था से भी किसानों की दशा नहीं सुधरी। इनमें केवल इतना अन्तर था कि जमींदार के स्थान पर सरकार स्वयं एक नए जमींदार का रूप लेकर आ खड़ी हुई। सरकारी अधिकारियों द्वारा किसानों का शोषण जमींदारों से कोई कम नहीं होता था। किसानों के लिए जमींदार और सरकार एक ही सिक्के के दो पहलू थे। उनसे ।। लगान कड़ाई से वसूल किया जाता था राजस्व के बदले में किसानों को किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाती थी। अतः किसान की आर्थिक दशा पहले से भी खराब हो गई। सूखे और अकाल ने किसान के पास बचा-खुचा भी अपनी झोली में उड़ेल लिया। इस तरह किसान पूरी तरह से भिखारी बन गया। उसे इस दशा तक पहुँचाने के लिए दोषी थे-जमींदार, सरकार और महाजन। तीनों ने किसान को नोंच-नोंच कर खाया।

प्रश्न 3. रैयत ऋणदाताओं को कुटिल और धोखेबाज = समझने लगे थे “। अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारत में रैयतवारी प्रथा के संदर्भ में इस कथन को न्यायसंगत ठहराइए।
उत्तर : (i) पैसा उधार देने का कारोबार निश्चित रूप से औपनिवेशिक शासन से पहले भी काफी फैला हुआ था। ऋणदाता बैयत के पारस्परिक संबंधों पर कई प्रकार के प्रथागत मानक लागू होते थे।
(ii) एक सामान्य मानक यह था कि ब्याज मूलधन से अधिक नहीं लिया जा सकता था। इसका प्रयोजन ऋणदाता द्वारा को जाने वाली जबरन वसूली को सीमित करना और यह परिभाषित करना था कि उचित ब्याज क्या होना चाहिए।
(iii) नि: संदेह रैयत ऋणदाता को कुटिल तथा धोखेबाज समझने लगे थे। ऋणदाताओं के द्वारा खातों में धोखाधड़ी करने एवं कानून को धत्ता बताने की शिकायत करते थे।
(iv) इस संदर्भ में 1859 में अंग्रेजों ने एक परिसीमन कानून पारित किया और इसमें यह कहा गया कि ऋणदाता तथा रैयत के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र केवल तीन वर्षों के लिए ही मान्य होंगे। निः संदेह इस कानून का उद्देश्य बहुत समय तक ब्याज को संचित होने से रोकता था।
(v) परंतु ऋणदाता ने इस कानून को घुमाकर अपने पक्ष में कर लिया तथा रैयत से हर तीसरे साल एक नया बंधपत्र भरवाने लगा। इस बंधपत्र में मूलधन तथा उस पर उत्पन्न एवं इकट्ठा हुए संपूर्ण ब्याज को मूलधन के रूप में दर्ज किया जाता था। और इस मूलधन पर नए सिरे से ब्याज जोड़ा जाता था।

प्रश्न 4. 1793 ई. का स्थायी बंदोबस्त क्या था ? इसकी मुख्य विशेषताओं और बंगाल के लोगों पर इसके प्रभावों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : बंगाल में स्थायी बंदोबस्त 1793 में लागू किया गया था।
1. इस व्यवस्था में भूमि जमींदारों को स्थायी रूप से दे दी जाती थी और उन्हें एक निश्चित धनराशि सरकारी कोष में जमा करनी पड़ती थी।
2.इससे जमींदारों को कानूनी तौर पर मालिकाना अधिकार मिल गये। अब वे किसानों से मनमाना लगान लेते थे।
3.इस व्यवस्था से सरकार को लगान के रूप में एक बँधी-बँधाई धनराशि मिल जाती थी।
4.इस व्यवस्था से नये जमींदारों का जन्म हुआ, जो शहरो में बड़े-बड़े बंगलों में और तरह-तरह की सुख-सुविधाओं के साथ रहते थे। गाँव में उनके कारिन्दे किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार करके भूमि कर ले जाते थे। जमींदार को किसानों के दुःख-सुख से कोई मतलब न था।
5.किसानों को बदले में सिंचाई या ऋण सुविधा नाम मात्र को भी नहीं मिलती थी।

प्रश्न 5. जमींदारी की भू-संपदा की नीलामी व्यवस्था के क्या दोष थे ?
उत्तर : जमींदारी की भू-संपदा की नीलामी व्यवस्था के दोष :
1.भू-संपदा की नीलामी में बोली लगाने के लिए अनेक खरीददार होते थे और संपदाएँ सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को बेच दी जाती थीं- बोली बिना सोचे-समझे दी जाती थी।
2.भू-संपदा की नीलामी के अनेक खरीददार राजा के अपने ही नौकर या एजेंट होते थे और राजा की ओर से जमीनों को खरीदा जाता था।
3.नीलामी में 95 प्रतिशत से अधिक बिक्री फर्जी होती थी। 4. राजा (जमींदार) को जमीनें खुले तौर पर बेच दी जाती थीं और उनकी जमींदारी का नियंत्रण भी उन्हीं के हाथों में रहता था।

प्रश्न 6. ईस्ट इंडिया कम्पनी को अपनी नई राजस्व नीति से क्या-क्या उम्मीदें थीं ? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर : (i) इस्तमरारी बंदोबस्त लागू किए जाने से वे सभी समस्याएँ हल हो जाएँगी जो बंगाल की विजय के समय से ही उनके समक्ष उपस्थित हो रही थीं।
(ii) अधिकारी लोग ऐसा सोचते थे कि खेती, व्यापार और राज्य के राजस्व सब विकसित किए जा सकेंगे।
(iii) उद्यमकर्ता भी अपने पूँजी-निवेश से एक निश्चित लाभ कमाने की उम्मीद रख सकेंगे।
(iv) अधिकारियों को यह भी उम्मीद थी कि इस प्रक्रिया से छोटे किसानों (योमेन) और धनी भूस्वामियों का एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हो जाएगा जिसके पास कृषि में सुधार करने के लिए पूँजी और उद्यम दोनों होंगे।
(v) उन्हें यह भी उम्मीद थी कि ब्रिटिश शासन से पालन-पोषण और प्रोत्साहन पाकर यह वर्ग कंपनी के प्रति वफादार बना रहेगा।

प्रश्न 8. ब्रिटिश सरकार की पहाड़ियों पर नियंत्रण करने की आलोचनात्मक परख कीजिए।
उत्तर : 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में अंग्रेजों ने स्थिर खेती के क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए जंगलों की सफाई-कटाई को प्रोत्साहित किया। वह वनवासियों को असभ्य, क्रूर, बर्बर और उपद्रवी मानते थे तथा एक स्थायी और सुव्यवस्थित समाज की स्थापना करना चाहते थे। अत: वह जंगली लोगों को सभ्य बनाना और उनसे खेती का काम करवाना चाहते थे।
1770 के दशक में उन्होंने पहाड़िया लोगों को निर्मूल कर देने की नीति अपनाई और बाद में पहाड़िया मुखियाओं को वार्षिक भत्ता देकर अपने व्यक्तियों का चाल-चलन ठीक रखने का उत्तरदायित्व सौंपा। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे परंतु बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। इन परिस्थितियों में पहाड़िया लोगों ने अपने आपको शत्रुतापूर्ण सैन्य बलों से बचाने के लिए बाहरी लोगों से लड़ाई जारी रखी और पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। उनके मन में यह भावना थी कि प्रत्येक गोरा आदमी चाहे वह बुकानन ही क्यों न हो, उनका शत्रु है जो उनके जंगल और जमीन छीनकर उनकी जीवनशैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने के लिए आया है। अतः उन्होंने इनका प्रतिरोध किया। इसके पश्चात जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहाड़िया लोगों ने उनका भी विरोध किया परंतु असफल रहे। अंत में वह इन पहाड़ियों के भीतर की ओर जाने के लिए विवश हो गए। इसका उनके रहन-सहन और जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 9. 1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों के प्रति क्या नीति अपनाई ? 1780 के दशक में इसमें क्या परिवर्तन आया और इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर : 1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। नीति में परिवर्तन : 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति अपनाई। इसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था। बदले में उन्हें अपने आदमियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी अपेक्षा की गई कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे।
परिणाम : बहुत-से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से इन्कार कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने । के कारण उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।

प्रश्न 10 . कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता अथवा स्थिति में गिरावट के चार कारण बताइए।
उत्तर : कम्पनी के काल में जमींदारों की असफलता अथवा स्थिति में गिरावट के कारण :
(i) प्रारंभिक माँगें बहुत ऊँची थीं, क्योंकि ऐसा महसूस किया गया था कि यदि माँग को आने वाले संपूर्ण समय के लिए निर्धारित किया जा रहा है तो आगे चलकर कीमतों में बढ़ोत्तरी होने और खेती का विस्तार होने से आय में वृद्धि हो जाने पर भी कंपनी उस वृद्धि में अपने हिस्से का दावा कभी नहीं कर सकेगी। इस प्रत्याशित हानि को कम करने के लिए, कम्पनी ने राजस्व माँग को ऊँचे स्तर पर रखा और इसके लिए तर्क दिया कि ज्यों-ज्यों कृषि के उत्पादन में वृद्धि होती जाएगी और कीमतें बढ़ती जाएँगी, जमींदारों का बोझ धीरे-धीरे कम होता जाएगा।
(ii) यह ऊँची माँग 1920 के दशक में लागू की गई थी जब कृषि की उपज की कीमतें नीचे थीं, जिससे रैयत (किसानों) के लिए जमींदार को उनकी देय राशियाँ चुकाना मुश्किल था।
(iii) राजस्व असमान था। फसल अच्छी हो या खराब राजस्व का ठीक समय पर भुगतान जरूरी था।
(iv) इस्तमरारी बंदोबस्त ने प्रारंभ में जमींदार की शक्ति को रैयत (किसानों) से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी जमींदारी का प्रबंधन करने तक ही सीमित कर दिया था।

प्रश्न 11. 18वीं शताब्दी के दौरान बंगाल के जमींदारों की सत्ता को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किस प्रकार नियंत्रित किया गया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जमींदारों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने हेतु निम्न कदम उठाए-
(i) जमींदारों की सैन्य टुकड़ियों को भंग कर दिया गया।
(ii) सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया और उनकी व्यवहारियों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर की देखरेख में रख दिया गया।
(iii) जमींदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली गई।
(iv) समय के साथ-साथ, कलेक्टर का कार्यालय सत्ता के एक विकल्पी केंद्र के रूप से उभर आया और जमींदार के अधिकार को पूरी तरह सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया गया।

प्रश्न 12. दक्कन दंगा आयोग पर टिप्पणी लिखिए।

अथवा

दक्कन रायट्स कमीशन की रिपोर्ट की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।
उत्तर : जब विद्रोह दक्कन में फैला तो प्रारंभ में बंबई की सरकार ने उसे गंभीतापूर्वक नहीं लिया परन्तु भारत सरकार ने जो 1857 के विद्रोह के बाद से चिंतित थी, बंबई की सरकार पर दबाव डाला कि वह दंगों के कारणों की खोज करने के लिए जाँच आयोग बैठाए। आयोग ने दंगा पीड़ित जिलों में जाँच पड़ताल कराई, रैयत वर्गों, साहूकारों और साथी गवाहों के बयान लिए, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में राजस्व की दरों, कीमतों और ब्याज के बारे में आँकड़े इकट्ठे किए और जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोटों का संकलन किया। इसके आधार पर आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की जो 1878 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में पेश की गई।
यह रिपोर्ट जिसे ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ कहा जाता है, इतिहासकारों को उन दंगों का अध्ययन करने के लिए आधार सामग्री उपलब्ध कराती है।

प्रश्न 13. बुकानन की भारत यात्रा के वास्तविक उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : बुकानन की भारत यात्रा का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार क्षेत्र के भू-दृश्यों का अध्ययन करना था ताकि आर्थिक विकास की संभावनाएं तलाशी जा सकें। इसके अतिरिक्त वह कंपनी के लिए अन्य महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ भी इकट्ठी करना चाहता था। उसे यह स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि उसे क्या देखना, खोजना और लिखना है। बंगाल सरकार के अनुरोध पर उन्होंने ऐसी भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण किया और अपनी रिपोर्ट तैयार की। इसके आधार पर बहुत बड़े क्षेत्र के वनों को साफ करके स्थायी कृषि का विस्तार किया गया जिससे कंपनी के भू-राजस्व में बहुत अधिक वृद्धि हुई।

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