8 अंकीय प्रश्न उत्तर – उपनिवेशवाद और देहात – Class12th History Chapter 10

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 10 Important Question Answer 8 Marks उपनिवेशवाद और देहात (सरकारी अभिलेखों का अध्ययन)

प्रश्न 1. ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों का जमींदारों की ओर से प्रतिरोध क्यों और कैसे किया गया ? अंतत: उसका क्या परिणाम निकला ?
उत्तर : (i) स्थिति (Position) : यद्यपि गाँवों में जोतदार की स्थिति उभर रही थी लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों की सत्ता पूर्णतया समाप्त नहीं हुई थी। राजस्व की बहुत ज्यादा माँग और अपनी भू-संपदा (land estate) की ब्रिटिश कम्पनी द्वारा संभावित नीलामी (auctions) की समस्या से निपटने के लिए जमींदारों ने कुछ नए रास्ते निकाल लिए।
(ii) नई रणनीतियाँ (New Strategies) : जमींदारों ने अपनी स्थिति को बचाए रखने और कम्पनी की सत्ता का प्रतिरोध करने के लिए जो कई राजनीतियाँ बनाई उनमें से एक रणनीति फर्जी बिक्री की तरकीब (विधि) थी। वह कई तरह के हथकंडे अपनाते थे। उदाहरण के लिए बर्दमान के एक जमींदार (राजा) ने सबसे पहले अपनी भूसंपदा का कुछ भाग अपनी माता को दे दिया। ब्रिटिश ईस्ट-इंडिया कम्पनी ने यह फैसला कर रखा था कि स्त्रियों की भूसंपत्ति को नहीं छीनेगी।
(iii) नकली नीलामी (Fake Auction) : (i) जमींदारों ने नीलामी संबंधी दूसरे कदम के तौर पर अपने चमचों या एजेन्टों को खड़ा करके नीलामी की प्रक्रिया के दौरान जोड़-तोड़ की तरकीब अपना रखी थी। वे जान-बूझकर कम्पनी या अंग्रेज अधिकारियों को तंग करने के लिए राजस्व माँग के भुगतान नहीं करते थे और रकम जान-बूझकर रोक लेते थे। कहने को भुगतान न की गई बकाया राशि चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती ही गई। जब कम्पनी तंग होकर उस जमींदार की মু-संपदा को नीलाम करती तो जमींदार के अपने ही आदमी (एजेंट या चमचे) उसे खरीद लेते थे। इसमें भ्रष्ट अधिकारी भी उनसे घूस ले लेते थे या कभी-कभी ऊँची-ऊँची बोलियाँ लगाकर फिर भूमि खरीदने से मुकर जाते थे और नीलाम की भू-संपदा के सौदे को अनिर्मित स्थिति में लटका देते थे। एक ही भू-संपदा पर ऐसी प्रक्रिया वे कई बार कराते थे। इसलिए कम्पनी तंग आकर या तो जमींदार की बकाया रकम रद्द कर देती थी या बातचीत करके व्यय रकम लेकर ही आखिरकार उसी राजा या जमींदार को हारकर भू-संपदा दे देती थी। एक रिकार्ड के अनुसार 1793 से 1801 के मध्य 15 प्रतिशत बेनामी या नकली सौदे इसी प्रकार के हुए।
(iv) अन्य तरीके (Other Methods) : जमींदार लोग भूमि परिवारजनों के नाम ट्रांसफर करके या फर्जी बिक्री दिखाकर अपनी भू-संपदा को छीनने से बचाने के साथ-साथ कुछ अन्य तरीके भी अपनाते थे। यदि किसी प्रबल अंग्रेज गवर्नर जनरल या अधिकारी की जिद के कारण किसी जमींदार की भू-संपदा को बाहर का आदमी खरीद लेता था तो उसे जमींदार अपने लठियाल या बाहुबलियों का जोर दिखाकर या जान से मार देने की धमकी देकर अथवा मारपीट करके उसे भगा देते थे। इस प्रकार नए जमींदार या बाहरी जमींदार, पुराने जमींदार की संपदा में घुसने की हिम्मत नहीं करते थे।
(v) बदलती हुई अनुकूल परिस्थितियाँ (Changed Favourable Circumstances) : उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में कृषि उत्पाद की कीमतों में मंदी की स्थिति समाप्त हो गई। इसलिए, जो जमींदार 1790 के दशक की तकलीफों को झेलने में सफल हो गए, उन्होंने अपनी सत्ता को सुदृढ़ बना लिया। राजस्व के भुगतान संबंधी नियमों को भी कुछ लचीला बना दिया गया। फलस्वरूप गाँवों पर जमींदार की सत्ता और अधिक मजबूत हो गई लेकिन आगे चलकर 1930 के दशक की घोर मंदी की हालत में अंतत: जमींदारों का भट्टा बैठ गया और जोतदारों ने देहात में अपने पाँव मजबूत कर लिए।

प्रश्न 2. राजमहल की पहाड़ियों में पहाड़ी लोगों द्वारा कुदाल और हल का प्रयोग कैसे शुरू किया गया और इसके विस्तार तथा क्षेत्र और पर्यावरण पर क्या-क्या प्रभाव पड़े ? उल्लेख कीजिए।
उत्तर : 1. राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में पहाड़ी लोगों द्वारा देश के अन्य भागों के विपरीत कुदाल और हल का प्रयोग झूम खेती के क्षेत्र पर केन्द्रित गतिविधियों के रूप में गया। उनके प्रयासों से पहाड़ी क्षेत्रों में कृषक अर्थव्यवस्था की शुरू किया सीमाओं से बाहर झूम कृषि के रूप में कृषि के विस्तार के साथ-साथ पहाड़ियों के इलाके में जंगल और चारागाह उनकी अर्थव्यवस्था के अटूट हिस्से बन गए।
2.पहाड़ी लोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों के प्रति आशंकित थे और वे उनसे प्रायः बातचीत करने को तैयार नहीं थे। वे उन्हें अपने भूमि हथियाने वाले, जंगलों की अंधाधुध कटाई करने वाले, चरागाहों को उजाड़ने वाले, वन उत्पादों को उनसे मनमानी कीमतों और ऐच्छिक ढंग से हड़पने वाले मानते थे। जब कभी अंग्रेज अधिकारी या लोग पहाड़ी क्षेत्र की ओर अग्रसर होते थे तो पहाड़ी लोग अपना घर-बार और गाँव छोड़कर भाग जाते थे। पहाड़ी लोग राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहा करते थे। वे कुदाल और हल आदि उपकरणों की मदद से जंगल की उपज इकट्ठी करके गुजर-बसर करते थे और जंगल के छोटे से हिस्से में झाड़ियों को काटकर घास-फूस को जलाकर जमीन साफ कर लेते थे।
3.वे कुदाल और हल से खोदकर राख की पोटाश से उपजाऊ बनी भूमि पर अपने खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे।
4.पहाड़ी लोग अपने कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच लेते थे, कुछ समय (वर्षों) तक उससे साफ की गई जमीन में खेती करते थे और फिर उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़ कर नए इलाके में चले जाते थे जिससे कि उस जमीन में खोई हुई उर्वरता पुनः उत्पन्न हो जाए।
5.राजमहल की पहाड़ियों में फैले हुए जंगलों से पहाड़ी लोग खाने के लिए महुआ के फूल एकत्र करते थे, बेचने के लिए रेशम के कोआ और राल तथा काठ-कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करते थे।
6.जंगलों में उगे हुए पेड़ों के झंडों के नीचे छोटे-छोटे पौधे उग आते थे अथवा पहाड़ी लोगों द्वारा छोड़ी गई परती जमीन पर जो घास-फूस की हरी चादर सी बिछ जाती थी वह पशुओं के लिए चरागाह बन जाती थी। पहाड़ी लोग झोंपड़ियाँ बनाकर रहा करते थे। वे पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे और यही भूमि उनकी पहचान और जीवन का आधार थी।
7.वे प्राकृतिक वातावरण, अपने वनों, चरागाहों, पशुओं, जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए इन क्षेत्रों में बाहरी लोगों को प्रवेश नहीं करने देते थे। जब कभी बाहरी जनजातियों और मैदानी लोगों के साथ लड़ाई छिड़ जाती थी तो पहाड़ी लोग अपने मुखियाओं के नेतृत्व में लड़कर प्राकृतिक वातावरण की रक्षा करते थे।
8.ये पहाड़ी लोग पहाड़ियों को अपना मूलाधार (roots ways) बनाकर उन मैदानों पर हमले करते रहते थे। यहाँ अन्य लोग किसान के रूप में एक स्थान पर बसकर अपनी खेती-बाड़ी किया करते थे। ये याद रहे कि पहाड़ी लोग केवल अकाल के दिनों में या अनाज आदि के अभाव के समय में मैदानी इलाकों पर हमले करते थे ताकि बाहरी लोगों पर अपनी ताकत का लोहा मनवा सकें। मैदानी लोग पहाड़ी लोगों से डरते थे और कई उन्हें खेराज के रूप में अच्छी खासी रकम देकर शांति खरीद लेते थे लेकिन यह शांति प्रायः अस्थायी होती थी।
9.अंग्रेजों ने ब्रिटिश सत्ता और प्रभाव के फैलने के साथ-साथ अपने स्वार्थ और मुनाफा कमाने के लिए जंगलों की कटाई के काम को प्रोत्साहित किया। जमींदारों और जोतदारों ने परती भूमि को धान के खेतों में बदल दिया। अंग्रेजों के लिए स्थायी कृषि का विस्तार जरूरी था क्योंकि उससे राजस्व के स्रोतों में बढ़ोत्तरी हो सकती थी. निर्यात के लिए फसल पैदा हो सकती थी और एक स्थायी, सुव्यवस्थित समाज की स्थापना हो सकती थी।
10.अंग्रेज जंगलों को उजाड़ मानते थे और वनवासियों को असभ्य, बर्बर, उपद्रवी और क्रूर समझते थे जिन पर शासन करना उनके लिए कठिन था। जो भी हो, ज्यों-ज्यों स्थायी कृषि का विस्तार हुआ, उसका पर्यावरण पर कुल मिलाकर बुरा असर पड़ा। जंगलों और चारागाहों का क्षेत्र सिकुड़ता चला गया।

प्रश्न 3. 18वीं सदी के दौरान बंगाल के जमींदार कंपनी को नियमित रूप से राजस्व का भुगतान क्यों नहीं कर पाये? इससे जोतदार किस प्रकार सशक्त हुए ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : ‘जमीदार शब्द की नवीन परिभाषा के अनुसार जमीदार गाँव में भू-स्वामी नहीं था बल्कि वह राज्य का राजस्व समाहर्ता मात्र था। राजस्व संग्रह करने को लेकर इनके नीचे अनेक गाँव होते थे। जो कंपनी तय करती थी। उस जमींदारी की समस्त संपदा पर कंपनी कुल राजस्व माँग निर्धारित करती थी। यदि राजस्व संग्रह कर समय से भुगतान नहीं कर पाता तो कंपनी उस जमींदारी को नीलाम कर सकती थी। किंतु इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद कुछ प्रारंभिक दशकों में जमींदार अपनी राजस्व माँग का भुगतान करने में लापरवाह रहे जिनसे उनके ऊपर राजस्व की बकाया रकम बढ़ती गयी। जमींदारों की इस असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1.राजस्व की प्रारंभिक माँगे : कंपनी सरकार का यह मानना था कि माँग को आने वाले संपूर्ण समय के लिये निर्धारित किया जा रहा है। आगे चलकर कृषि के विस्तार से कीमतों में बढ़ोत्तरी होने पर बाद में कंपनी उस कृषि में अपने हिस्से का दावा नहीं कर सकती। इस प्रत्याशित हानि को कम स्तर पर करने के लिये कंपनी ने राजस्व माँग को ऊँचे स्तर पर रखा।
2.अव्यावहारिक राजस्व प्रणाली : असमान राजस्व प्रणाली के कारण राजस्व भुगतान समस्या खड़ी हो गयी। फसल अच्छी हो या खराब, इससे कंपनी को कोई लेना-देना नहीं था। राजस्व चुकाना हर हालत में जरूरी था। सूर्यास्त विधि के अनुसार तो यदि निश्चित समय या तारीख पर सूर्यास्त होने तक भुगतान नहीं किया जाता था तो जमींदारी को नीलाम किया जा सकता था।
3.इस्तमरारी बंदोबस्त : इस्तमरारी बंदोबस्त ने प्रारंभ में जमींदारी की शक्ति को रैयत से राजस्व इकट्ठा करने और अपनी जमींदारी का प्रबंध करने तक सीमित कर दिया था। कंपनी जमींदारों को पूरा महत्त्व तो देती थी पर उन्हें नियंत्रित कर उनकी स्वायत्तत्ता को सीमित करना भी चाहती थी फलस्वरूप जमींदारों की सैन्य टुकड़ियों को भंग कर दिया गया। जमींदारों से स्थानीय न्याय और स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति छीन ली। सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया।
4.जोतदारों का असहयोग : जमींदार का कारिन्दा ‘अमला’ राजस्व संग्रहण के लिये गाँव में जाता था। कभी-कभी फसल खराब होती थी तो किसानों को देय राशियों का भुगतान करना मुश्किल हो जाता था कभी जोतदार ‘रैयत’ को राजस्व भुगतान में जान-बूझकर देरी करवा देते थे। वे जमींदार के अधिकारियों को भी उनके कर्त्तव्य पालन करने से रोकते थे इन जोतदारों का रैयत पर अच्छा नियंत्रण होता था क्योंकि जमींदार तो शहरों में रहते थे और जोतदार गाँव में ही रहते थे। जमींदार आसानी से इन पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। इस प्रकार राजस्व की बकाया रकमों के मामले बढ़ते जाते थे। जोतदार छोटे किसानों को भी राजस्व नहीं देने के लिए भड़काते थे।
5.18वीं शताब्दी के अंत में जहाँ एक और अनेक जमींदार संकट की स्थिति से गुजर रहे थे, वहीं दूसरी ओर धनी किसानों के कुछ समूह गाँवों में अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे थे। फ्रांसिस बुकानन के उत्तरी बंगाल के दिनाजपुर जिले के सर्वेक्षण में हमें धनी किसानों के इस वर्ग का जिन्हें ‘जोतदार’ कहा जाता था, विशद विवरण देखने को मिलता है। 19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक आते-आते, जोतदारों ने जमीन के बड़े-बड़े रकबे, जो कभी-कभी तो कई हजार एकड़ में फैले थे, अर्जित कर लिए थे।
6.स्थानीय व्यापार और साहूकार के कारोबार पर भी उनका नयंत्रण था और इस प्रकार से उस क्षेत्र के गरीब काश्तकारों पर व्यापक शक्ति का प्रयोग करते थे।
7.उनकी जमीन का काफी बड़ा भाग बटाईदारों (अधियारों या बरगादारों) के माध्यम से जोता जाता था, जो खुद अपने हल लाते थे, खेत में मेहनत करते थे और फसल के बाद उपज का आधा हिस्सा जोतदारों को दे देते थे।
8.उत्तरी बंगाल में जोतदार सबसे अधिक शक्तिशाली थे, हालाँकि धनी किसान और गाँव के मुखिया लोग भी बंगाल के अन्य भागों के देहाती इलाकों में प्रभावशाली बनकर उभर रहे थे। कुछ जगहों पर उन्हें ‘हवलदार’ कहा जाता था और कुछ अन्य स्थानों पर वे गाँटीदार (मुखिया) (gantidars) या मंडल’ कहलाते थे। उनके उदय से जमींदारों के अधिकार का कमजोर पड़ना अवश्यंभावी था।

प्रश्न 4. स्थायी कृषि के विस्तार का पहाड़ियों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? इस संबंध में ब्रिटिश सरकार तथा संथालों की क्या नीति रही ?
उत्तर : स्थायी कृषि का विस्तार होने से जंगलों तथा चरागाहों का क्षेत्र संकुचित होता गया। अतः पहाड़ी लोगों तथा स्थायी खेतिहरों के बीच झगड़ा तेज हो गया। पहाड़ी लोग नियमित रूप से बसे गाँवों पर हमले बोलने लगे और ग्रामवासियों से अनाज तथा पशु छीन-झपटकर ले जाने लगे। औपनिवेशिक अधिकारियों ने उत्तेजित होकर पहाड़ियों पर काबू पाने का भरसक प्रयास किया परन्तु उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं था ।
ब्रिटिश सरकार की नीति : 1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। तत्पश्चात् 1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति अपनाई। इसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था बदले में उन्हें अपने आदमियों को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी अपेक्षा की गई कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे परन्तु बहुत-से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से इन्कार कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने के कारण उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा। जिस समय शांति स्थापना के लिए प्रयास चल रहे थे उस समय पहाड़िया लोग अपने आप को शत्रु सैन्यबलों से बचाने और बाहरी लोगों से लड़ाई जारी रखने के लिए पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए।
अतः जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तो यह स्वाभाविक ही था कि पहाड़िया लोग उसको संदेह तथा अविश्वास की दृष्टि से देखते। शांति स्थापना के अभियानों और क्रूरतापूर्ण दमन की यादों के कारण वे समझ गए कि उनके इलाके में आने वाला प्रत्येक गोरा आदमी उनसे उनके जंगल और जमीन छीनकर उनकी जीवन-शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू है।

प्रश्न 5. अठारहवीं शताब्दी की कृषि सम्बन्धी प्रमुख दोषों और समस्याओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : अठारहवीं शताब्दी की कृषि के प्रमुख दोषों एवं समस्याओं का निम्न प्रकार उल्लेख किया जा सकता है :
(i) मानसून पर निर्भर (Dependence on Monsoon) : अठारहवीं शताब्दी में कृषि में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ था। वह अभी भी मानसून पर निर्भर थी।
(ii) सिंचाई के साधनों का अभाव (Lack of Means of Irrigation) : भारतीय कृषि की सबसे कमी नहरों व अन्य सिंचाई की व्यवस्था न होना था। उस काल में भी नहरों के अभाव में कृषि पूर्णत: वर्षा पर आश्रित रहती थी। स्थानीय आवश्यकताओं को देखते हुए कुएँ व तालाब आदि से भी सिंचाई की व्यवस्था की प गई किन्तु फिर भी सिंचाई की समस्या को सुलझाया न जा सका।
(iii) पशुओं की समस्या (Problems of Animals) : भारतीय कृषि का मुख्य आधार पशु रहे हैं अतः पशुओं को धन के रूप में देखा गया। किसान पशुओं को पालते थे। उनसे दूध प्राप्त करते और कृषि में उनसे सहायता लेते थे। गरीब किसानों को दो बैल रख पाना भी कठिन होता था। दूसरे, पशुओं को पर्याप्त चारा न मिल पाना और उनके स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था न होने से उनका पर्याप्त उपयोग भी नहीं हो पाता था।
(iv) खाद की समस्या (Problems of Mamure) : भारतीय कृषि के लिए खाद की समस्या भी सदा से बनी रही है। अठारहवीं शताब्दी में भी इसमें कोई प्रगति नहीं हुई। वैज्ञानिक उपायों से खाद बनाने की व्यवस्था नहीं थी। परम्परागत रूप में गोबर की खाद को भारतीय कृषि के लिए सर्वोत्तम समझे जाने के बाद भी भारतीय किसान गोबर के उपले बनाकर खाना बनाने के लिए उपयोग कर लेता था, अतः भूमि को खाद नहीं मिलती थी और धीरे-धीरे उसकी उर्वरा शक्ति कम हो जाती थी।
(v) पिछड़ी तकनीक एवं भारी ऋणग्रस्तता (Backward technique and heavy indebtedness) : भारतीय किसान कृषि की पिछड़ी तकनीक प्रयोग करते थे। उन्हें प्रायः ऋणग्रस्तता में जन्म लेना पड़ता था, कर्ज में ही पलते थे तथा भारी ऋण अपनी सन्तान के लिए छोड़कर मर जाते थे।

प्रश्न 6. अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय जमींदारों की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर : अठारहवीं शताब्दी में जमींदारों का जीवन (Life style of Zamindars during 18th century) : अंग्रेजों के सत्ता में आने से पहले उत्तर मुगल सम्राटों के काल में जमींदारों की स्थिति कई कारणों से बहुत सुधर गई। प्रायः सम्राट अयोग्य थे। उनकी कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर जमींदारों ने मनमाने ढंग से अपने अधिकारों का प्रयोग किया और किसानों का शोषण किया।
अंग्रेजों की सत्ता प्राप्ति के साथ ही उनकी स्थिति और सुधरी। जिन नीतियों को अंग्रेजों ने अपनाया वे भूमि नीतियाँ जमींदारों के पक्ष में थीं:
(i) जमींदारों और मालगुजारों को भू-स्वामी बना दिया गया।
(ii) अंग्रेज वफादार जमींदारों से लाभ कमाते थे और बेईमान जमींदारों की भूमि नीलाम कर देते थे।
(iii) जमींदारों को भी काफी लाभ पहुँचा क्योंकि इस व्यवस्था के अनुसार इन्हें सरकारी कोष में एक निश्चित धनराशि ही जमा करवानी पड़ती थी लेकिन वे किसानों से मनमानी धनराशि लेते थे।
(iv) समय पर भू-राजस्व न देने पर जमींदार किसान की भूमि छीन लेता था।
(v) महालवाड़ी प्रथा के अंतर्गत मालगुजारी का बंदोबस्त अलग-अलग गाँवों या जागीरों (महलों) के आधार पर उन जमींदारों या उन परिवारों के मुखियाओं के साथ किया, जो भूमि कर के स्वामी होने का दावा करते थे।
(vi) अंग्रेजों ने जमींदारों को भूमि का स्वामी बना दिया। फिर जब जमींदारों ने किसानों का शोषण करना शुरू किया तो कंपनी खामोश रही और जमींदारों के विरुद्ध कुछ भी सुनने को तैयार न हुई।
(vii) जब कंपनी ने विधान परिषद में भारतीय सदस्य लेने शुरू किए तो भारतीय जमींदारों को ही उसमें स्थान मिला।

प्रश्न 7. बुकानन की यात्राएँ तथा सर्वेक्षण ब्रिटिश इंडिया कंपनी के लिए विकास तथा प्रगति का आधार थे। उदाहरण देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : (1) बुकानन के विवरण तथा उसकी रिपोर्टों को पढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था। उसकी यात्राएँ केवल भू-दृश्यों के प्रेम और अज्ञात की खोज से ही प्रेरित नहीं थीं। वह नक्शा नवीसों, सर्वेक्षकों, पालकी उठाने वाले कुलियों आदि के बड़े दल के साथ यात्रा करता था। उसकी यात्राओं का खर्च ईस्ट इंडिया कंपनी उठाती थी क्योंकि उसे उन सूचनाओं की आवश्यकता थी। बुकानन को यह स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि उसे क्या देखना, खोजना और लिखना है। वह जब भी अपने लोगों की फौज के साथ किसी गाँव में जाता था तो उसे सरकार के एक एजेंट के रूप में ही देखा जाता था।
(2) जब कंपनी ने अपनी शक्ति को मजबूत कर लिया और अपने व्यवसाय का विकास कर लिया तो वह उन प्राकृतिक साधनों की खोज में जुट गई जिन पर अधिकार करके वह उनका मनचाहा उपयोग कर सकती थी। उसने राजस्व स्रोतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित की और जानकारी एकत्र करने के लिए अपने भूविज्ञानियों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति विज्ञानियों और चिकित्सकों को भेजा। असाधारण प्रेक्षण शक्ति का धनी बुकानन ऐसा ही एक व्यक्ति था। वह जहाँ कहीं भी गया, उसने पत्थरों तथा चट्टानों और वहाँ की भूमि के भिन्न-भिन्न स्तरों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया उसने वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान पत्थरों तथा खनिजों को खोजने का प्रयास किया। उसने लौह खनिज और अभ्रक, ग्रेनाइट तथा साल्टपीटर में समृद्ध सभी स्थानों का पता लगाया। उसने सावधानीपूर्वक नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धतियों का निरीक्षण भी किया।
(iii) जब बुकानन किसी भू-दृश्य के बारे में लिखता था तो वह केवल यह नहीं लिखता था कि भू-दृश्य कैसा था, बल्कि वह यह भी लिखता था कि उसे किस प्रकार अधिक उत्पादक बनाया जा सकता है अथवा वहाँ कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं तथा कौन-से पेड़ काटे जा सकते हैं या कौन-से उगाए जा सकते हैं। उसकी सूक्ष्म दृष्टि और प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न होती थीं।
(iv) प्रगति के संबंध में उसका आकलन आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा से निर्धारित होता था। वह निश्चित रूप से वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था और यह महसूस करता था कि वनों को कृषि भूमि में बदलना ही होगा।

प्रश्न 8. ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा की गई भू-राजस्व व्यवस्थाओं और सर्वेक्षण पर लेख लिखिए।
उत्तर : भू-राजस्व व्यवस्था तथा सर्वेक्षण (Land revenue systems and surveys)
(क) स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) :
1.बंगाल में स्थायी बंदोबस्त 1793 में लागू किया गया था। इस व्यवस्था में भूमि जमींदारों को स्थायी रूप से दे दी जाती थी और उन्हें एक निश्चित धनराशि सरकारी कोष में जमा करनी पड़ती थी।
2.इससे जमींदारों को कानूनी तौर पर मालिकाना अधिकार मिल गये। अब वे किसानों से मनमाना लगान लेते थे।
3.इस व्यवस्था से सरकार को लगान के रूप में हो बंधी-बंधाई धनराशि मिल जाती थी।
4.इस व्यवस्था से नये जमींदारों का जन्म हुआ, जो शहरों में बड़े-बड़े बंगलों में और तरह-तरह की सुख-सुविधाओं के साथ रहते थे। गाँव में उनके कारिन्दे किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार करके भूमि कर ले जाते थे जमींदार को किसानों के दुःख-सुख से कोई लगाव न था।
5.किसानों को बदले में सिंचाई या ऋण सुविधा नाममात्र को भी नहीं मिलती थी।
(ख) रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System) : दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत में रैयतवाड़ी बंदोबस्त लागू किया गया जिसके अंतर्गत किसान भूमि का मालिक था यदि वह भू-राजस्व का भुगतान करता रहा। इस व्यवस्था के समर्थकों का कहना है कि यह वही ध्यवस्था है, जो भारत में पहले से थी। बाद में यह व्यवस्था मद्रास और । बंबई प्रेसिडेंसियों में भी लागू कर दी गई। इस व्यवस्था में 20-30 वर्ष बाद संशोधन कर दिया जाता था तथा राजस्व की राशि बढा दी जाती थी। रैयतवाड़ी व्यवस्था में निम्नलिखित त्रुटियाँ थीं :
(i) भू-राजस्व 45 से 55 प्रतिशत था, जो बहुत अधिक था। (ii) भू-राजस्व बढ़ाने का अधिकार सरकार ने अपने पास रखा था।
(ii) सूखे अथवा बाढ़ की स्थिति में भी पूरा राजस्व देना पड़ता था। इससे भूमि पर किसान का प्रभुत्व कमजोर पड़ गया।
प्रभाव (Effects):
(i) इससे समाज में असंतोष और आर्थिक विषमता का वातावरण छा गया।
(ii) सरकारी कर्मचारी किसानों पर अत्याचार करते रहे तथा किसानों का शोषण पहले जैसा ही होता रहा।
(ग) महालवाड़ी प्रथा (Mahalwari System) :
(i) इस व्यवस्था के अंतर्गत मालगुजारी का बंदोबस्त अलग-अलग गाँवों या जागीरों (महलों) के आधार पर उन जमींदारों या उन परिवारों के मुखियाओं के साथ किया जो भूमि कर के स्वामी होने का दावा करते थे।
(ii) अब अपनी भूमि बेचकर भी किसान भू-राजस्व दे सकता था। अगर वह भू-राजस्व समय पर नहीं देता था तो सरकार उसकी भूमि नीलाम करवा सकती थी।

प्रश्न 9. 18वीं शताब्दी से ब्रिटिश शासन काल के अन्त तक विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों के भारतीय किसानों के जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़े ? उल्लेख कीजिए।
उत्तर : अठारहवीं शताब्दी के दूसरे भाग से लेकर पूरे ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारतीय किसानों की स्थिति बहुत ही खराब हो गई। कंपनी के शासन काल में भू-राजस्व की दरें बहुत ऊँची थीं जिन्हें किसानों के लिए चुकाना बहुत कठिन था। सरकार को समय पर लगान चुकाने के लिए प्रायः काश्तकारों को, ग्रामीण महाजनों और साहूकारों के चंगुल में फँसना पड़ता था। कई बार किसानों को उसी अनाज या फसल की खेती करनी होती थी जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी चाहती थी। सरकारी अफसर किसानों से मनमाने ढंग से कृषि उत्पाद खरीद लेते थे।
विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों का किसानों पर प्रभाव (Impact of different revenue systems or Settlements on farmers): अंग्रेजों ने भू-राजस्व की जो भी प्रणालियाँ चलाई उन सबका भारतीय किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ा क्योंकि वे सबकी सब शोषण पर आधारित थीं और उनमें भूमि-कर बहुत ऊँचा था। इनमें से कुछ प्रमुख व्यवस्थाएँ अग्रलिखित थीं :
(i) इजारेदारी ( नीलामी) प्रथा का किसानों पर प्रभाव (Impact of lzaredari system on farmers) : वॉरेन हेस्टिंग्ज ने कम्पनी के हितों को ध्यान में रखकर इजारेदारी प्रथा को प्रोत्साहन दिया था। इस प्रथा के अंतर्गत किसी क्षेत्र विशेष को उसी व्यक्ति को दे दिया जाता था, जो उसकी अधिकतम बोली देता था। अतः बोलीदाता अपना पैसा पूरा करने तथा अतिरिक्त लाभ कमाने के लालच से किसानों के हितों की बात कैसे सोच सकता था। वह कड़ाई से तथा अत्याचारों के बल पर अपना दमन-चक्र चलाता था ताकि वह किसानों से अधिक-से-अधिक पैसा ऐंठ सके। इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल के एक-तिहाई किसान खेत छोड़कर भाग गए। विवश होकर उन्होंने अपने जीवनयापन का साधन अन्य क्षेत्रों में ढूँढना शुरू कर दिया। कुछ चोर-डाकुओं की टोली में शामिल हो गए।
(ii) इस्तमरारी प्रथा का किसानों पर प्रभाव (Impact of Istamrari System on farmers) : चार्ल्स कार्नवालिस ने जब देखा कि इजारेदारी प्रथा बिल्कुल असफल हो रही है तो उसने एक नई व्यवस्था शुरू कर दी जो स्थायी बंदोबस्त कहलाती है। 1793 ई. में बंगाल में इस प्रथा को पक्का किया गया। इस प्रथा में जमींदार एक निश्चित धनराशि सरकार को राजस्व के रूप में दे दिया करते थे। इसके बदले में जमींदार को भूमि का स्वामित्व सौंप दिया गया। अतः जमींदार किसानों का शोषण पूरी तरह से करने लगे। राजस्व के अलावा भी किसानों को जमींदारों की बेगार करनी पड़ती थी और बिना मजदूरी दिए जमींदार कृषक से अपना काम करा लेते थे।
(iii) किसान और रैयतवाड़ी व्यवस्था (The farmers and Ryohwari System) : इस व्यवस्था को मद्रास में लागू किया गया। इस व्यवस्था में किसी मध्यस्थ की व्यवस्था नहीं थी। जमींदार भी बीच में नहीं थे। किसानों का सरकार से सीधा सम्पर्क था । तीस वर्षों की अवधि के लिए एक निश्चित राजस्व किसानों के साथ तय हो जाता था परंतु इस व्यवस्था से भी किसानों की दशा नहीं सुधरी। इनमें केवल इतना अन्तर था कि जमींदार के स्थान पर सरकार स्वयं एक नए जमींदार का रूप लेकर आ खड़ी हुई। सरकारी अधिकारियों द्वारा किसानों का शोषण जमींदारों से कोई कम नहीं होता था। किसानों के लिए जमींदार और सरकार एक ही सिक्के के दो पहलू थे। उनसे लगान कड़ाई से वसूल किया जाता था। राजस्व के बदले में किसानों को किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाती थी। अतः किसान की आर्थिक दशा पहले से भी खराब हो गई। सूखे और अकाल ने किसान के पास बचा-खुचा भी अपनी झोली में उड़ेल लिया। इस तरह किसान पूरी तरह से भिखारी बन गया। उसे इस दशा तक पहुँचाने के लिए दोषी थे-जमींदार, सरकार और महाजन। तीनों ने किसान को नोंच-नोंच कर खाया।

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