Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 11 Important Question Answer 2 Marks विद्रोही और राज(1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान)

प्रश्न 1. अंग्रेजी नीति से अवध के ताल्लुकदार किस तरह प्रभावित हुए ? कोई पाँच तरीके बताओ।
उत्तर : अंग्रेजी नीति से अवध के ताल्लुकदार निम्नलिखित ढंग से प्रभावित हुए :
1.ताल्लुकदारों के किले ध्वस्त कर दिए गए और उनकी सेनाओं को भंग कर दिया गया।
2.1856 की एकमुश्त बंदोबस्त के अधीन उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल किया जाने लगा। कुछ ताल्लुकदारों के तो आधे से भी अधिक गाँव हाथ से जाते रहे।
3.उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई।
4.जमीनें छिन जाने से उनकी शक्ति तथा सम्मान को भारी क्षति पहुँची।
5. राजस्व की माँग लगभग दुगुनी कर दी गई जिससे ताल्लुकदारों में रोष फैल गया।

प्रश्न 2. 1857 के विद्रोह में तरह-तरह की अफवाहों और भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को उठ खड़ा होने के लिए कैसे उकसाया जा रहा था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : यह कथन सत्य है कि 1857 के विद्रोह के समय लोगों को तरह-तरह की अफवाहों और भविष्यवाणियों से उकसाया जा रहा था जैसाकि निम्नलिखित वृत्तांत से स्पष्ट होता है
(i) मेरठ से दिल्ली आने वाले सिपाहियों ने चर्बी के कारतूसों के बारे में कहा कि इन पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप लगाया गया था। अत: इन पर मुँह लगाने से हिंदू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।
(ii) उस समय यह एक अफवाह थी कि अंग्रेज सरकार हिंद और मुसलमान दोनों का धर्म नष्ट करने पर तुली है। इसलिए अंग्रेज सरकार ने बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और की हड्डियों का चूरा मिला दिया था।
(iii) यह भी अफवाह थी कि अंग्रेज भारतीयों को ईसाई बनाना चाहते थे।

अथवा

1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के विरूद्ध उभरे भारतीय नेतृत्व के स्वरूप की उदाहरणों की मदद से परख कीजिए।
उत्तर : 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध उभरे भारतीय नेतृत्व के स्वरूप : इस विद्रोह का प्रारम्भ सैनिक छावनी से हुआ! इसका प्रभाव भी मुख्य रूप से सैनिकों पर पड़ा।
जहाँ-जहाँ भारतीय सैनिक थे, विद्रोह की आग से वे भी भड़क उठे। केवल उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही इस विद्रोह का प्रभाव रहा। उत्तर भारत के कुछ देशी राजा भड़क उठे जिनकी गद्दियाँ छिन गई थीं या जिनकी पेंशन बंद हो गई थीं। अन्य राजा इससे दूर ही रहे। उत्तर भारत में पंजाब पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। अतः विद्रोह में राष्ट्रीय संग्राम का रूप नहीं देखा जा सकता।
चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का मुख्य कारण बने। हिन्दू सैनिक इसलिए भड़के, क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि इन कारतूसों पर जो चिकना पदार्थ लगा है, वह गाय की चर्बी है । मुसलमान सैनिक इसलिए भड़के क्योंकि उन्होंने भी सुन रखा था कि कारतूसों पर लगा चिकना पदार्थ सूअर की चर्बी थी। अतः गाय का सूअर की चर्बी से सने कारतूसों को प्रयोग में लाने से पहले दाँतों से छीलने का अर्थ था दोनों संप्रदायों का धर्मभ्रष्ट होना। अतः दोनों सम्प्रदायों को धार्मिक ठेस पहुँचाने से भी दोनों सम्प्रदायों के सैनिक भड़के।
यह सत्य है कि अंग्रेजों से किसान, मजदूर और जनसाधारण तंग थे, परन्तु उन्होंने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। भारत को गाँवों का देश कहा जाता है, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि गाँव इस विद्रोह की तपिश से अछूते रहे। यह विद्रोह कुछ प्रसिद्ध नगरों तक ही सीमित रहा। अत: निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 1857 की क्रांति एक सैनिक विद्रोह था।

प्रश्न 3.1857 में भारतीय सिपाहियों के विद्रोह के क्या कारण थे ?
उत्तर : 1857 में भारतीय सिपाहियों ने निम्नलिखित कारणों से विद्रोह किया :
(i) 1857 ई. में एक ऐसा सैनिक कानून पास किया गया जिसके अनुसार सैनिकों को लड़ने के लिए समुद्र पार भेजा जा सकता था परंतु हिंदू सैनिक समुद्र पार जाना अपने धर्म के विरुद्ध समझते थे।
(ii) परेड के समय भारतीय सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता था। भारतीय सैनिक इस अपमान को अधिक देर तक सहन नहीं कर सकते थे।
(iii) भारतीय सैनिकों को अंग्रेज सैनिकों की अपेक्षा बहुत कम वेतन दिया जाता था। इस कारण उनमें असंतोष फैला हुआ था।
(iv) अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों के सामने ही उनकी सभ्यता तथा संस्कृति का मजाक उड़ाया करते थे। भारतीय सैनिक अंग्रेजों से इस अपमान का बदला लेना चाहते थे।

प्रश्न 4. 1857 के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अवध के ताल्लुकदारों की सत्ता किस प्रकार छीनी?
उत्तर : 1857 के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अवध के ताल्लुकदारों से निम्न प्रकार से सत्ता छीनी
(i) अवध के अधिग्रहण के कारण ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं।
(ii) उनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।
(iii) 1856 में एकमुश्त बंदोबस्त के नाम पर ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्था लागू कर दी गई। इससे ताल्लुकदारों को बेदखल किया जाने लगा। इसके परिणामस्वरूप ताल्लुकदारों के पास भूमि 67 प्रतिशत से कम होकर 38 प्रतिशत रह गई। दक्षिण अवध के ताल्लुकदारों के तो आधे से ज्यादा गाँव हाथ से जाते रहे ।
(iv) राजस्व माँग में 30 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक वृद्धि की गई क्योंकि बहुत सारे क्षेत्र का मूल्य निर्धारण बढ़ा-चढ़ा कर किया गया था। इससे ताल्लुकदार बुरी तरह प्रभावित हुए।

प्रश्न 5. भारत में 1857 में विद्रोह इतने सुनियोजित कैसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) यदि 1857 के विद्रोहों को तारीख के हिसाब से क्रम से रखा जाए तो ऐसा मालूम पड़ता है कि जैसे-जैसे विद्रोह की खबर एक शहर से दूसरे शहर में पहुँचती गई वैसे-वैसे सिपाही हथियार उठाते गए।
(ii) सिपाहियों द्वारा किसी न किसी विशेष संकेत जैसे शाम समय तोप का गोला दागना या बिगुल बजाकर विद्रोह का संकेत दिया।
(iii) पृथक-पृथक जगहों पर विद्रोह के ढर्रे में समानता का कारण आंशिक तौर पर उसकी योजना तथा ताल-मेल निहित था।
(iv)नि:संदेह विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच बेहतर संचार कायम था। सिपाही या उनके संदेशवाहक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे।
(v)विद्रोहों की संरचना और सबूतों से ऐसा मालूम पड़ता है कि इन विद्रोहों में योजना और समन्वय था। 1857 के विद्रोहियों द्वारा जारी की गई घोषणाओं में जाति और धर्म का भेद किए बिना समाज के सभी वर्गों से आह्वान किया जाता था। विद्रोह को एक ऐसे युद्ध के तौर पर पेश किया जा रहा था जिसमें हिंदुओं तथा मुसलमानों, दोनों का नफा नुकसान समान था।

प्रश्न 6. 1857 में विद्रोहियों ने अपनी एकता की कल्पमा को किस प्रकार साकार किया? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1857 के विद्रोहियों द्वारा अपनी एकता की कल्पना का प्रदर्शन :
1.1857 के विद्रोहियों द्वारा जारी की गई घोषणाओं में, जाति और धर्म का भेद किए बिना, समाज के सभी तबकों का आह्वान किया गया था। बहुत सारी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ से या उनके नाम पर जारी की गई थीं परंतु उनमें भी हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल रखा जाता था।
2.हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेजों द्वारा की गई कोशिशों के बावजूद ऐसा कोई फर्क नहीं दिखाई दिया। अंग्रेज शासन ने दिसंबर 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने के लिए 50,000 रुपये खर्च किए। उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।
3.सामूहिक रूप से उत्पीड़न के प्रतीकों के खिलाफ प्रदर्शन :
(i) लोगों को इस बात पर गुस्सा था कि ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था ने बड़े-छोटे भूस्वामियों को जमीन से बेदखल कर दिया था और विदेशी व्यापार ने दस्तकारों और बुनकरों को तबाह कर डाला था। ब्रिटिश शासन के हर पहलू पर निशाना साधा जाता था।
(ii) विद्रोही उद्घोषणाएँ इस व्यापक डर को व्यक्त करती थीं कि अंग्रेज, हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने पर तुले हैं और वे लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

प्रश्न 7.1857 के विद्रोह की असफलता के कारणों का संक्षिप्त उल्लेख करें।
उत्तर : 1857 के विद्रोह की असफलता के कारण (Causes of the failure of the revolt of 1857) : 1857 के विद्रोह में भारतीय जनता ने जी-तोड़ कर अंग्रेजों का सामना किया, किन्तु कुछ कारणों से इस विद्रोह में भारतवासियों को असफलता मिली। इस विफलता के निम्न कारण थे-
1.यह विद्रोह निश्चित तिथि से पहले आरंभ हो गया। इसकी तिथि 31 मई निर्धारित की गई थी, किंतु यह 10 मई, 1857 को शुरू हो गया।
2.यह स्वतंत्रता संग्राम सारे भारत में फैल गया, परिवहन तथा संचार के अभाव में भारतवासी इस पर पूर्ण नियंत्रण न रख सके।
3. भारतवासियों के पास अंग्रेजों के मुकाबले हथियारों का अभाव था।
4.भारत के कुछ वर्गों ने इस विद्रोह में सक्रिय भाग नहीं लिया।
5.भारत में अंग्रेजों के समान कुशल सेनापतियों का अभा था।
6.अंग्रेजों को ब्रिटेन से यथासमय सहायता प्राप्त हो गई।
7.क्रांतिकारियों में किसी एक योजना एवं निश्चित उद्देश्यों की कमी थी।

प्रश्न 8. 1857 के विद्रोह से पहले के कुछ सालों में भारतीय सिपाहियों के अपने अंग्रेज अफसरों के साथ संबंधों की समीक्षा कीजिए।

अथवा

1820 ई. से 1840 ई. के बीच अंग्रेज अफसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना संबंध रखने पर विशेष जोर देते थे कैसे ?

अथवा

1840 और 1850 के दशकों में सिपाहियों के अपने गोरे अफसरों के साथ रिश्ते बहुत बदल चुके थे।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1820 के दशक से अंग्रेज अफसरों और सिपाहियों के बीच मधुर संबंध थे वे एक-दूसरे के साथ मौज-मस्ती, मल्लयुद्ध, तलवारबाजी आदि करते थे। कई अफसर अच्छी तरह से हिंदुस्तानी बोलते थे और उनको भारतीय रीति-रिवाजों का भी ज्ञान था। उनमें एक अफसर का प्रभावशाली व्यक्तित्व तथा अभिभावक के गुण विद्यमान थे परंतु 1840 के दशक के पश्चात् उनमें धीरे-धीरे श्रेष्ठता की भावना की वृद्धि हुई। उनका व्यवहार बदल गया। अभद्र व्यवहार करना आम बात हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि अफसरों और सिपाहियों के मध्य अंतर बढ़ने लगा। वह एक-दूसरे पर संदेह करने लगे जिसका उदाहरण चर्बी के कारतूसों की घटना थी जिसमें अंग्रेजों के प्रयत्न करने पर भी सिपाहियों ने उन पर विश्वास नहीं किया और इस अफवाह पर कि कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का प्रयोग किया गया था, विश्वास किया। यही संदेह और अविश्वास 1857 के सैनिक विद्रोह का तात्कालिक कारण बना।

प्रश्न 9. कला और साहित्य ने 1857 की स्मृति को जीवित बनाए रखने में किस प्रकार सहायता की है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : कला और साहित्य ने 1857 की स्मृति को जीवित बनाए रखने में बहुत मदद की है। अनेक चित्रों जैसे बहादुरशाह जफर, रानी लक्ष्मीबाई का चित्र और इस विद्रोह के बारे में विभिन्न पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों द्वारा लिखित पुस्तकें और विभिन्न भाषाओं में छपे समाचार पत्र अपने अंदर इतिहास को समेटे हुए हैं।
बहादुरशाह जफर उम्र के हिसाब से बहुत वृद्ध हो चुका, था। उसका केवल लाल किले और उसके आस-पास के कुछ ही इलाके पर नियंत्रण था वह पूरी तरह शक्तिहीन हो चुका था। जब मेरठ की छावनी से आने वाले सिपाहियों का जत्था लाल किले में दाखिल हुआ तो वह विद्रोहियों को शिष्टाचार का पालन करने के लिए विवश तक न कर सका। सिपाहियों से घिरे बहादुरशाह के पास उनकी बात मानने और उन्हें आशीर्वाद देने के अलावा कोई चारा नहीं था।
इतिहासकार इससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बहादुरशाह न चाहते हुए भी विद्रोह का औपचारिक नेता बना। उसने 1857 के विद्रोह को वैधता देने की कोशिश की। दो-तीन दिन के लिए उसने विद्रोहियों की आड़ में दिल्ली पर कब्जा किया लेकिन वह शीघ्र ही अंग्रेजों के अत्याचारों का शिकार बना। इतिहासकार उसे विद्रोह की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी मानते हैं ।
कला की तरह ही साहित्य भी हमें 1857 के विद्रोह के कारण, स्वरूप और प्रभावों की व्याख्या देते हैं। इनका अध्ययन करने से हमें पता चलता है कि यह विद्रोह सैनिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक कारणों से हुआ। चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग एक प्रमुख तात्कालिक कारण बना। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन और अधिक अधिनायकवादी और भारतीयों के प्रति शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण वाला हो गया।

प्रश्न 10. 1820 ई. से 1840 ई. के बीच अंग्रेज अफसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना संबंध रखने पर खासा जोर कैसे देते थे? संक्षेप में वर्णन कीजिए।

अथवा

“1890 और 1850 के दशकों में सिपाहियों के अपने गोरे अफसरों के साथ रिश्ते बहुत बदल चुके थे।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) 1820 ई. से 1840 ई. के मध्य अंग्रेज अफसर सिपाहियों के साथ दोस्ताना संबंध रखने पर विशेष जोर देते थे।
(ii) अंग्रेज अफसर सिपाहियों की मौजमस्ती में शामिल होते थे तथा उनके साथ मल्ल-युद्ध भी करते थे। उनमें अफसरों का रौब तथा अभिभावक का प्यार दोनों शामिल थे।
(iii) अफसर सिपाहियों के साथ शिकार पर जाते थे तथा उनके साथ तलवारबाजी करते थे। अनेक अंग्रेज अफसर बेहतर तरीके से हिंदुस्तानी बोलना जानते थे तथा स्थानीय रीति-रिवाजों तथा संस्कृति से बखूबी वाकिफ थे।
(iv) 1840 के दशक में अंग्रेज अफसरों तथा सिपाहियों के बीच ताल्लुकों में बदलाव नजर आने लगा। अफसरों में श्रेष्ठता की भावना पैदा होने लगी तथा वे सिपाहियों को कमतर नस्ल का समझने लगे।
(v) बदलते हुए हालातों में अब अंग्रेज अफसर सिपाहियों की भावनाओं की फिक्र तथा कद्र नहीं करते थे। उनके लिए शारीरिक हिंसा तथा असंसदीय भाषा आम बात हो गई थी। इस प्रकार, अफसरों तथा सिपाहियों के बीच फासला लगातार बढ़ता गया। अब पारस्परिक यकीन की जगह शक ने ले ली।

प्रश्न 11. 1857 के विद्रोहियों ने अपने विचारों का प्रसार करने और लोगों को विद्रोह में शामिल होने के लिए किस तरह प्रेरित किया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) घोषणाओं के द्वारा सभी लोगों से बिना जाति और धर्म में भेद किए विद्रोह का आह्वान किया जाता था। मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की ओर से की गई घोषणाओं में हिंदुओं की भावनाओं का विशेष ख्याल रखा जाता था।
(ii) इस विद्रोह को एक ऐसे युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को समान लाभ और हानि होनी थी।
(iii) इश्तिहारों में अंग्रेजों से पहले के अतीत पर ध्यान आकर्षित किया जाता था जैसे मुगल साम्राज्य के अंतर्गत धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण सभी समुदायों में सहअस्तित्व की भावना थी।
(iv) बहादुरशाह के नाम से जारी की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई देते हुए जनता से इस लड़ाई में सम्मिलित होने का आह्वान किया गया।
(v) विभिन्न छावनियों के सैनिकों में अच्छा संचार संपर्क स्थापित था। क्योंकि मई में नए कारतूसों के प्रयोग से इंकार करने पर सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी ने इस विषय पर 48 नेटिव इन्फेंट्री को पत्र लिखा था कि ‘हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला किया है और 48 नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतजार कर रहे हैं।’

प्रश्न 12.1857 के विद्रोह में विद्रोहियों की गतिविधियों को जानने वाले स्रोतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1857 के विद्रोहियों की गतिविधियों को जानने वाले स्रोतों का वर्णन निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है :
(i) 1857 के विद्रोहियों की गतिविधियों में काफी हद तक समन्वय था। विभिन्न छावनियों के सिपाहियों के बीच बेहतर संचार कायम था। सिपाही या उनके संदेशवाहक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लोग बगावत की योजनाएँ बना रहे थे तथा उसी के बारे में बात करते थे।
(ii) सिपाही अपने विद्रोह के कर्ताधर्ता स्वयं थे। इतिहासकार चार्ल्स बॉल के अनुसार, “ये पंचायतें रात को कानपुर सिपाही लाइनों में इकट्ठा होती थीं तथा सामूहिक तौर पर कुछ फैसले जरूर लिए जा रहे थे| “
(iii) विद्रोही सिपाही ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे अपने विचारों का प्रसार करने तथा लोगों को विद्रोह में सम्मिलित करने के लिए, जारी की गई कुछ घोषणाओं व इश्तहारों के अलावा हमारे पास ऐसे अधिक स्रोत नहीं हैं जिनके आधार पर हम विद्रोहियों के दृष्टिकोण को समझ सकें।
(iv) 1857 के विद्रोह के बारे में “आजमगढ़ घोषणा, 25 अगस्त 1857” हमारी जानकारी का मुख्य स्रोत हैं। इस घोषणा में कहा गया था, “यह सर्वविदित है कि इस युग में हिंदुस्तान के लोग, हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही अधर्मो और षड्यंत्रकारी अंग्रेजों की निरंकुशता व उत्पीड़न से त्रस्त हैं। इसलिए देश के सभी धनवान लोगों को, खासतौर से जिनका मुस्लिम शाही परिवारों से ताल्लुक रहा है और जिन्हें लोगों का धर्मरक्षक और स्वामी माना जाता है, अपने जीवन और संपत्ति को जनता की कुशलक्षेम के लिए होम कर देना चाहिए।”
(v) उत्तर भारत के विभिन्न गाँवों में चपातियाँ बाँटने की रिर्पोटें आ रही थीं। ऐसा कहा जाता है कि रात में एक आदमी आकर गाँव के चौकीदार को एक चपाती तथा पाँच और चपाती बनाकर अगले गाँवों में पहुँचाने के लिए कहता था। हालाँकि चपातियाँ बाँटने का उद्देश्य और मतलब न उस समय साफ था और न ही आज साफ है।

प्रश्न 13. उन चित्रकारों ने जिन्होंने 1857 के विद्रोह के चित्र बनाए थे, इन घटनाओं को किस रूप में देखा और वे क्या सोचते थे और क्या कहना चाहते थे? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : (i) अखबारों में छपी खबरों को जनता की कल्पना और मनोदशा पर भारी असर होता है। वे घटनाओं के बारे में लोगों की भावनाओं और सोच को तय करती हैं । भारत में औरतों और बच्चों के साथ हुई हिंसा की कहानियों को पढ़कर ब्रिटेन की जनता प्रतिरोध और सबक सिखाने की माँग करने लगी।
(ii) जोजेफ नोएल वेटन ने सैनिक विद्रोह के बाद ‘इन मेमोरियम’ बनाई। उसमें एक चित्र में अंग्रेज औरतें और बच्चे एक घेरे में एक दूसरे से लिपटे दिखाई देते हैं। वे लाचार और मासूम दिखाई दे रहे हैं मानो एक भयानक घड़ी की आशंका में हैं।
(iii) कुछ अन्य रेखाचित्रों व पेंटिंग में हमें औरतें अलग तेवरों में दिखाई देती हैं। इनमें वे विद्रोहियों के हमले से अपना बचाव करती हुई नजर आती हैं। उन्हें वीरता की मूर्ति के रूप में दर्शाया गया है।
(iv) हास्यपरक व्यंग्य की ब्रिटिश पत्रिका पंच के पन्नों में प्रकाशित एक कार्टून में कैनिंग को एक नेक बुजुर्ग के रूप में दर्शाया गया जिसका हाथ एक सिपाही के सिर पर है जो अभी भी नंगी तलवार और कटार लिए हुए है और दोनों से खून टपक रहा है। यह एक ऐसी छवि थी जो उस समय की ब्रिटिश तस्वीरों में बार-बार सामने आती थी।

प्रश्न 14. अंग्रेजों द्वारा 1857 के सैनिक विद्रोह की बनाई तस्वीरों को देखने पर तरह-तरह की भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ क्यों पैदा होती हैं? स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : (i) अंग्रेजों द्वारा 1857 के सैनिक विद्रोह की बनाई तस्वीरों को देखने पर तरह-तरह की भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ पैदा होती हैं। कुछ तस्वीरों में अंग्रेजों को बचाने तथा विद्रोहियों को कुचलने वाले अंग्रेज नायकों की प्रशंसा की गई।
(ii) टॉमस जोन्स बार्कर ने 1859 में ‘रिलीफ ऑफ लखनऊ चित्र बनाया। विद्रोही टुकड़ियों द्वारा लखनऊ का घेरा डाल देने के बाद कमिश्नर हेनरी लॉरेंस ने ईसाइयों को इकट्ठा करके अत्यधिक सुरक्षित रेजीडेंसी में शरण ली थी।
(iii) बार्कर की पेंटिंग कैम्पबेल के आगमन के अवसर का जश्न मनाती है। कैन्वस के बीच में कैम्पबेल, ऑट्रम तथा हेवलॉक ब्रिटिश नायकों की छवियाँ हैं।
(iv) इस चित्र के अगले हिस्से में पड़े शव तथा घायल लोग इस घेरेबंदी के समय हुई हिंसा की गवाही देते हैं। मध्य भाग में घोड़ों की विजयी तस्वीरें इस बात को दिखाती हैं कि अब ब्रिटिश सत्ता और नियंत्रण कायम हो है। चुका(v) इन चित्रों के माध्यम से अंग्रेज जनता के बीच अपनी सरकार के प्रति विश्वास. पैदा करते थे। इन चित्रों से यह मालूम पड़ता था कि संकट का दौर गुजर चुका है, विद्रोह खत्म हो गया है तथा अंग्रेज जीत गए हैं।

प्रश्न 15. क्या 1857 की क्रांति एक सैनिक विद्रोह था या प्राम स्वतंत्रता संग्राम ? इस क्रांति के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर : सिपाही विद्रोह के समर्थक यूरोपियन इतिहासकारों के नाम हैं-मार्श मैन, सीले, जॉन लारेंस आदि। उनके अनुसार सिपाही विद्रोह का एकमात्र कारण था-चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग। इस विद्रोह में जनसाधारण ने हिस्सा नहीं लिया। जो जमींदार, शासक आदि इस विद्रोह में शामिल थे, वे केवल अपने स्वार्थ के कारण अंग्रेजों से बदला लेना चाहते थे। इस मौके से लाभ उठाकर असंतुष्ट जमींदार, वे राजा जिनका राज्य हड़प लिया गया था या जिनकी पेंशन बंद कर दी गई थी, वे सभी विद्रोह में कूद पड़े। उपरोक्त कथन के पक्ष और विरोध संबंधी तथ्यों का विश्लेषण करना आवश्यक है :
इस विद्रोह का प्रारम्भ सैनिक छावनी से हुआ। इसका प्रभाव भी मुख्य रूप से सैनिकों पर पड़ा। जहाँ-जहाँ भारतीय सैनिक थे. विद्रोह की आग से वे भी भड़क उठे। केवल उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही इस विद्रोह का प्रभाव रहा। उत्तर भारत के कुछ देशी राजा भड़क उठे जिनकी गद्दियाँ छिन गई थीं या जिनकी पेंशन बंद हो गई थीं। अन्य राजा इससे दूर ही रहे। उत्तर भारत में पंजाब पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। अत: विद्रोह में राष्ट्रीय संग्राम का रूप नहीं देखा जा सकता।
चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का मुख्य कारण बने। हिन्दू सैनिक इसलिए भड़के, क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि इन कारतूसों पर जो चिकना पदार्थ लगा है, वह गाय की चर्बी है। मुसलमान सैनिक इसलिए भड़के क्योंकि उन्होंने भी सुन रखा था कि कारतूसों पर लगा चिकना पदार्थ सूअर की चर्बी थी। अतः गाय का सूअर की चर्बी से सने कारतूसों को प्रयोग में लाने से पहले दाँतों से छीलने का अर्थ था दोनों संप्रदायों का धर्मभ्रष्ट होना। अतः दोनों सम्प्रदायों को धार्मिक ठेस पहुँचाने से भी दोनों सम्प्रदायों के सैनिक भड़के।
यह सत्य है कि अंग्रेजों से किसान, मजदूर और जनसाधारण तंग थे, परन्तु उन्होंने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। भारत को गाँवों का देश कहा जाता है, परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि गाँव इस विद्रोह की तपिश से अछूते रहे । यह विद्रोह कुछ प्रसिद्ध नगरों तक ही सीमित रहा। अतः निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 1857 की क्रांति एक सैनिक विद्रोह था।

प्रश्न 16. भारत में अग्रेजी राज्य ध्वस्त होने के पश्चात् विद्रोही किस प्रकार की शासन संरचना व प्रशासन व्यवस्था करना चाहते थे ? उसकी समीक्षा कीजिए।
उत्तरः विद्रोही क्या चाहते थे : 1857 में जो कुछ हुआ, उसे रचने के लिए इतिहासकारों की कोशिशों को बहुत हद तक और मजबूरन, अंग्रेजों के दस्तावेजों पर निर्भर रहना पड़ता विडंबना यह है कि इन स्रोतों से अंग्रेज अफसरों की सोच का तो पता चलता है लेकिन इस बारे में ज्यादा सुराग नहीं मिल पाता कि विद्रोही क्या चाहते थे।
(क) एकता की कल्पना :
(i) 1857 में विद्रोहियों द्वारा जारी की गई घोषणाओं में, जाति और धर्म का भेद किए बिना, समाज के सभी तबकों का आह्वान किया गया था। बहुत सारी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ से या उनके नाम पर जारी की गई थीं परंतु उनमें भी हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल रखा जाता था ।
(ii) हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेजों द्वारा की गई कोशिशों के बावजूद ऐसा कोई फर्क नहीं दिखाई दिया। अंग्रेज शासन ने दिसंबर 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने के लिए 50,000 रुपये खर्च किए। उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।
(ख) उत्पीड़न के प्रतीकों के खिलाफ :
(i)लोगों को इस बात पर गुस्सा था कि ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था ने बड़े-छोटे भूस्वामियों को जमीन से बेदखल कर दिया और विदेशी व्यापार ने दस्तकारों और बुनकरों को तबाह कर डाला था। ब्रिटिश शासन के हर पहलू पर निशाना साधा जाता था।
(ii) विद्रोही उद्घोषणाएँ इस व्यापक डर को व्यक्त करती थी कि अंग्रेज, हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने पर तुले हैं और वे लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
(iii) बहुत सारे स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह उन तमाम ताकतों के विरुद्ध हमले की शक्ल ले लेता था जिनको अंग्रेजों की हिमायती या जनता का उत्पीड़क समझा जाता था।
(ग) वैकल्पिक सत्ता की तलाश :
(i) ब्रिटिश शासन ध्वस्त हो जाने के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर जैसे स्थानों पर विद्रोहियों ने एक प्रकार की सत्ता और शासन संरचना स्थापित करने का प्रयास किया।
(ii) विद्रोहियों द्वारा स्थापित शासन संरचना का प्राथमिक उद्देश्य युद्ध की जरूरतों को पूरा करना था लेकिन ज्यादातर मामलों में ये संरचनाएँ अंग्रेजों की मार सहन नहीं कर पाईं। अवध में अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध सबसे लंबा चला।

प्रश्न 17. लॉर्ड डलहौजी की अवध अधिग्रहण नीति की आलोचनात्मक परख कीजिए।

अथवा

“ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” इस कथन के संदर्भ में लॉर्ड डलहौजी की अवध के अधिग्रहण की नीति को सविस्तार समझाइए।

उत्तर : (i)लार्ड डलहौजी 1851 में यह निर्णय ले लिया था कि किसी न किसी बहाने से अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया जाएगा। पाँच साल बाद (1856) उसने इस रियासत को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग घोषित कर दिया। यद्यपि अवध अंग्रेजों का मित्र राज्य था लेकिन वहाँ की जमीन नील और कपास की खेती के लिए बहुत उचित थी। इस इलाके को उत्तरी भारत के बड़े बाजार के रूप में विकसित किया जा सकता था। अवध के नवाब वाजिद अली शाह को यह कहते हुए गद्दी से हटाकर कलकत्ता (कोलकाता) भेज दिया गया कि वह शासन अच्छी तरह नहीं कर रहा।
(ii)अवध में भिन्न प्रकार की पीड़ाओं जैसे राजसत्ता का नवाब से छीना जाना, उसके राज्य या भू-भाग का छीना जाना, नवाब और उसके रिवारजनों के लिए प्रतिष्ठा, प्रभाव और सम्मान के विरुद्ध थामताल्लुकदारों से भू-भाग और भू-संपदाएँ छीन ली गई तथा अनेक जमींदारों की जमीनें नीलाम कर दी गईं किसानों से भारी भू-राजस्व कठोरता से वसूल किया गया। बड़ी संख्या में अवध के नवाब के सैनिकों को नौकरी से अलग कर दिया गया) इन तमाम पीड़ा उत्पन्न करने वाली उथल-पुथलों और घटनाओं ने अनेक नवाबों, अवध के ताल्लुकदारों, जमींदारों और सिपाहियों को परस्पर जोड़ दिया। वे फिरंगी राज के आगमन को विभिन्न अर्थों में एक प्यारी दुनिया की समाप्ति के रूप में देखने लगे थे वे सभी चीजें उनकी आँखों के सामने देखते ही देखते बिखर रही थीं जो लोगों के लिए बहुत मूल्यवान थीं तथा जिन्हें वे प्यार करते थे।
(iii) 1857 के विद्रोह के शुरू होने के बाद ताल्लुकदारों की जागीरें, उनके किले, पैतृक भू-संपदाएँ और जिस सत्ता का स्वाद वे कई पीढ़ियों से चखते आ रहे थे वे सब अंग्रेजी राज ने उनसे छीन लिया। जो पहले ताल्लुकदारों के पास हथियारबंद सिपाही होते थे वह अवध के अधिग्रहण के तुरंत बाद ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गई और उनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए गए।
(iv)1856 में अंग्रेजों ने अवध में एकमुश्त बंदोबस्त के नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू कर दी विह बंदोबस्त इस मान्यता पर आधारित था कि ताल्लुकदार सरकार और रैयतों के बीच माध्यम थे जिनके पास जमीन का मालिकाना हक (Ownership) नहीं था। अंग्रेज कहते थे कि ताल्लुकदारों ने धोखाधड़ी और ताकत से अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। ब्रिटिश भू-राजस्व अधिकारियों का मानना था कि ताल्लुकदारों को हटाकर वे जमीन असली मालिकों के हाथ में सौंप देंगे जिससे किसानों के शोषण में कमी आएगी। जो सरकार को राजस्व वसूली के बाद मिलता है उसकी कुल रकम में बढ़ोत्तरी होगी। वस्तुतः ऐसा नहीं हुआ।

प्रश्न 18. 1857 के विद्रोहियों द्वारा की गई घोषणाओं की समीक्षा कीजिए । उन्होंने अपनी घोषणाओं में ब्रिटिश राज से सम्बद्ध प्रत्येक चीज को बुरी तरह खारिज क्यों किया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः (i) 1857 में विद्रोहियों द्वारा जारी की गई घोषणाओं में जाति और धर्म का भेद किए बिना, समाज के सभी तबकों का आह्वान किया गया था। बहुत सारी घोषणाएँ मुस्लिम राजकुमारों या नवाबों की तरफ से या उनके नाम पर जारी की गई थीं परंतु उनमें भी हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल रखा जाता था।
(ii) हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेजों द्वारा की गई कोशिशों के बावजूद ऐसा कोई नहीं दिखाई दिया। अंग्रेजी शासन ने दिसंबर 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने के लिए 50,000 रुपये खर्च किए। उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही।
(iii) लोगों को इस बात पर गुस्सा था कि ब्रिटिश भूराजस्व व्यवस्था ने बड़े-छोटे भूस्वामियों को जमीन से बेदखल कर दिया था और विदेशी व्यापार ने दस्तकारों और बुनकरों को तबाह कर डाला था। विद्रोहियों द्वारा ब्रिटिश शासन के हर पहलू पर निशाना साधा जाता था।
(iv) विद्रोही उद्घोषणाएँ इस व्यापक डर को व्यक्त करती थीं कि अंग्रेज, हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने पर तुले हैं और वे लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं।
(v) बहुत सारे स्थानों पर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह उन तमाम ताकतों के विरुद्ध हमले की शक्ल ले लेता था जिनको अंग्रेजों के हिमायती या जनता का उत्पीड़क समझा जाता था।

प्रश्न 19. सन् 1801 में अंग्रेजों द्वारा अवध पर अधिग्रहण नीति के प्रावधानों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1801 ई. में अवध पर अधिग्रहण नीति के निम्नलिखित प्रावधान थे :
1.इस संधि में यह शर्त थी कि नवाब अपनी सेना समाप्त कर दे।
2.वह रियासत में अंग्रेज टुकड़ियों को तैनात करे।
3. वह अपने दरबार में विराजमान ब्रिटिश रेजीडेंट की सलाह पर काम करे।
4.अपनी सैनिक शक्ति से वंचित हो जाने के बाद नवाब अपनी रियासत में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिनोंदिन अंग्रेजों पर निर्भर होता जा रहा था। अब विद्रोही मुखियाओं और ताल्लुकदारों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रहा था।

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