8 अंकीय प्रश्न उत्तर – विद्रोही औंर राज – Class12th History Chapter 11

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 11 Important Question Answer 8 Marks विद्रोही और राज(1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान)

प्रश्न 1. ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनसाधारण में व्याप्त संदेश में निहित कारणों का विश्लेषण कीजिए जिन्होंने 1857 ई. के विद्रोह को फैलाया।

अथवा

1857 के विद्रोह में विदेशी शासन के खिलाफ असंतोष किस सीमा तक उत्तरदायी था ? क्या इसे भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध कह सकते हैं ?

अथवा

1857 के विद्रोह के क्या कारण थे ? यह एक ‘सिपाही विद्रोह’ था अथवा ‘राष्ट्रीय आंदोलन’ ? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए ।
उत्तर : 1857 के विद्रोह को भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उपमा दी जाती है। यह सत्य है कि इस विद्रोह का आरंभ सैनिकों ने किया परंतु शीघ्र ही इसने एक क्रांतिकारी युद्ध का रूप ले लिया। इसका मुख्य कारण था-व्यापक जन-असंतोष। भारतीय जनता वर्षों से ब्रिटिश नीतियों तथा साम्राज्यवादी शोषण से पीड़ित थी। देशी राजा, कृषक, व्यापारी, सैनिक तथा साधारण जनता विदेशी शासन से तंग आ चुकी थी। वह किसी भी तरह विदेशी शासन से मुक्ति पाना चाहती थी। अतः जैसे ही विद्रोह की ज्वाला भड़की, सभी धर्मों, जातियों तथा वर्गों के लोग इसमें कूद पड़े। क्रांति के इन कारणों से स्पष्ट हो जाएगा कि यह व्यापक जन-असंतोष का ही परिणाम था।
1.राजनीतिक कारण : (i) लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि और डलहौजी की लैप्स नीति से भारतीय शासकों में असंतोष फैला हुआ था।
(ii) नाना साहिब की पेंशन बंद कर दी गई थी। इसलिए वह अंग्रेजों के विरुद्ध थे।
(iii) झाँसी की रानी को दत्तक पुत्र लेने की आज्ञा न मिली। अतः वह भी अंग्रेजों के विरुद्ध थी।
(iv) सतारा तथा नागपुर की रियासतें अंग्रेजी साम्राज्य में मिला ली गई थीं। इसलिए वहाँ के शासक अंग्रेजों के शत्रु बन गए। (v) जमींदार तथा सरदार भी अंग्रेजों के विरुद्ध थे क्योंकि उनकी भूमि छीन ली गई थी। –
2.आर्थिक कारण : (i) औद्योगिक क्रांति के कारण इंग्लैंड का बना मशीनी माल सस्ता हो गया। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी माल अधिक बिकने लगा और भारतीय उद्योग लगभग ठप्प हो गए। भारतीय कारीगरों की रोजी का साधन छिन गया और वे अंग्रेजी के विरुद्ध हो गए ।
(ii) अंग्रेजों की व्यापारिक नीति के कारण भारत का व्यापार भी लगभग समाप्त हो गया था। भारत के माल को इंग्लैंड पहुँचने पर भारी शुल्क देना पड़ता था जिससे भारतीय माल काफी महँगा पड़ता था। परिणामस्वरूप विदेशों में भारतीय माल की माँग घटने लगी और भारतीय व्यापार लगभग ठप्प हो गया।
(iii) अंग्रेजों के शासनकाल में जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया था। वे एक निश्चित कर सरकारी खजाने में जमा कराते थे और किसानों से मनचाहा कर वसूल करते थे। परिणामस्वरूप किसान लगातार पिस रहे थे। वे भी इस अत्याचार से मुक्ति पाना चाहते थे।
(iv) भारतीय जनता पर भारी कर लगा दिए गए थे। कर इतने अधिक थे कि लोगों का निर्वाह चलना भी कठिन हो गया था तंग आकर लोगों ने विद्रोह का मार्ग अपनाया।
3.सामाजिक तथा धार्मिक कारण : (i) ईसाई पादरी भारतवासियों को लालच देकर उन्हें ईसाई बना रहे थे। इस कारण भारतवासी अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए
(ii) विलियम बैंटिंक ने अनेक समाज-सुधार किए थे। उसने सती-प्रथा और बाल-विवाह पर रोक लगा दी थी। हिंदुओं ने इन सब बातों को अपने धर्म के विरुद्ध समझा।
(iii) अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार के कारण भी भारतवासियों में असंतोष फैल गया। उन्हें विश्वास हो गया कि अंग्रेज उन्हें अवश्य ही ईसाई बनाना चाहते हैं।
(iv) ईसाई प्रचारक अपने धर्म का प्रचार करने के साथ हिंदू धर्म के ग्रंथों की घोर निंदा करते थे। इस बात से भारतवासी भड़क उठे।
तात्कालिक कारण : सैनिकों को नए कारतूस प्रयोग करने के लिए दिए गए। इन कारतूसों पर सूअर तथा गाय की चर्बी लनगी हुई थी। अत: बैरकपुर छावनी के कुछ सैनिकों ने इनका प्रयोग करने से इन्कार कर दिया। मंगल पांडेय नामक एक सैनिक ने क्रोध में आकर एक अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर दी। इस आरोप में उसे फाँसी दे दी गई। अन्य भारतीय सैनिक इस घटना सवे क्रोधित हो उठे और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
स्वरूप या प्रकृति : (i) 1857 की क्रांति में जनता ने भाग लिया, चाहे भाग लेने वाले लोगों की संख्या कम ही थी।
(ii) जनता तथा शासक अंग्रेजों के विरुद्ध थे और वे उनसे छुटकारा पाना चाहते थे।
(iii) सैनिकों ने विद्रोह अवश्य किया, परन्तु उनका उद्देश्य रियायतें लेना नहीं था बल्कि अंग्रेजों को भारत से निकालना था।
(iv) देश के कुछ भागों में क्रांति नहीं हुई, वे शांत रहे। उनके शांत रहने का अर्थ यह नहीं लिया जा सकता कि उन्हें आजादी पसंद नहीं थी। वे किसी बात के कारण खामोश अवश्य थे, परन्तु अंग्रेजी शासन उन्हें भी पसंद नहीं था।
(v) इसमें हिंदू तथा मुसलमानों ने मिलकर संघर्ष किया। अतः स्पष्ट है कि लोग अंग्रेजी सत्ता से तंग थे और उन्होंने इस सत्ता को भारत से समाप्त करने के लिए शस्त्र उठाए। ऐसा महान कार्य स्वतंत्रता संग्राम के लिए ही किया जा सकता है। अतः यह सिपाही विद्रोह नहीं बल्कि भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था।

प्रश्न 2. 1857 के विद्रोह के आरंभ और प्रसार पर एक निबंध लिखिए।

अथवा

1857 के विद्रोह का आरंभ किस प्रकार हुआ ? इसने एक चौतरफा विद्रोह का रूप कैसे धारण कर लिया ?

अथवा

1857 के जनविद्रोह की मुख्य घटनाओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर : विद्रोह का आरंभ मेरठ छावनी : 1857 के जनविद्रोह का आरंभ 10 मई, 1857 को दोपहर बाद मेरठ छावनी में हुआ। इसे भारतीय सैनिकों की पैदल सेना ने शुरू किया था । शीघ्र ही यह घुड़सवार सेना और फिर शहर तक फैल गया। शहर और आसपास के गाँवों के लोग सिपाहियों के साथ आ मिले। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया जहाँ हथियार और गोला-बारूद रखे हुए थे। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों पर निशाना साधा और उनके बंगलों तथा साजो-सामान को जलाना- फूँकना आरम्भ कर दिया। रिकॉर्ड दफ्तर, जेल, अदालत, डाकखाने, सरकारी खजाने, जैसी सरकारी इमारतों को लूटकर ध्वस्त किया जाने लगा। शहर को दिल्ली से जोड़ने वाली टेलीग्राफ लाइन काट दी गई। अँधेरा होते ही सिपाहियों का एक जत्था घोड़ों पर सवार होकर दिल्ली की ओर चल पड़ा।
दिल्ली : विद्रोही सिपाही 11 मई को प्रातः लाल किले के फाटक पर पहुँचे। रमजान का महीना था। मुगल सम्राट् बहादुर शाह को फाटक पर हल्ला सुनाई दिया। बाहर खड़े सिपाहियों ने उन्हें बताया कि वे मेरठ के सभी अंग्रेज पुरुषों को मारकर आए हैं क्योंकि वे हमें गाय और सूअर की चर्बी में लिपटे कारतूस दाँतों से खोलने के लिए मजबूर कर रहे थे इससे हिंदू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। तब तक सिपाहियों का एक और दल भी दिल्ली में प्रवेश कर चुका था। शहर के आम लोग भी उनके साथ जुड़ने लगे थे। बहुत-से यूरोपीय मारे गए। दिल्ली के अमीर लोगों पर हमले हुए और लूटपाट हुई। दिल्ली अंग्रेजों के नियंत्रण से बाहर जा चुकी थी। कुछ सिपाही दरबार के शिष्टाचार का पालन किए बिना ही लाल किले में घुस गए। उनकी माँग थी कि बादशाह उन्हें अपना आशीर्वाद दें। सिपाहियों से घिरे बहादुर शाह के पास उनकी माँग मानने के सिवाय और कोई चारा न था। इस प्रकार विद्रोह ने एक वैधता प्राप्त कर ली क्योंकि अब उसे मुगल बादशाह के नाम पर चलाया जा सकता था।
12 तथा 13 मई को उत्तर भारत में शांति रही परंतु जैसे ही यह खबर फैली कि दिल्ली पर विद्रोहियों का अधिकार हो चुका है और बहादुरशाह ने विद्रोह को अपना समर्थन दे दिया है, स्थिति तेजी से बदलने लगी। गंगा घाटी तथा दिल्ली के पश्चिम की कुछ छावनियों में विद्रोह के स्वर तेज होने लगे।
विद्रोह का विस्तार : सिपाहियों ने किसी-न-किसी विशेष संकेत के साथ अपनी कार्रवाई आरंभ की। कई स्थानों पर शाम के समय तोप का गोला दागा गया, तो कहीं बिगुल बजाकर विद्रोह का संकेत दिया गया। सबसे पहले विद्रोहियों ने शस्त्रागार पर अधिकार किया और सरकारी खजाने को लूटा। इसके बाद उन्होंने जेल, टेलीग्राफ, दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, बंगलों तथा सरकारी इमारतों पर हमले किए और सभी रिकॉर्ड जला डाले । सभी लोगों को एकजुट होकर फिरंगियों का सफाया करने के लिए हिंदी, उर्दू और फारसी में अपीलें जारी होने लगीं ।
विद्रोह में आम लोगों के शामिल हो जाने के साथ हमलों में विस्तार आता गया। लखनऊ, कानपुर और बरेली जैसे बड़े शहरों में साहूकार और धनी लोग भी विद्रोहियों के क्रोध का शिकार बनने लगे। किसान इन लोगों को न केवल अपना उत्पीड़क बल्कि अंग्रेजों का पिटू मानते थे। अधिकांश स्थानों पर अमीरों के घर-बार लूटकर ध्वस्त कर दिए गए। इन छिटपुट विद्रोहों ने शीघ्र ही चौतरफा विद्रोह का रूप ले लिया। शासन की सत्ता की खुलेआम अवहेलना होने लगी।
अवध : विद्रोह का सबसे भयंकर रूप अवध में देखने का मिला जहाँ के नवाब को अंग्रेजों ने शासन से हटा दिया था। वहा विद्रोह का नेतृत्व नवाब के युवा पुत्र बिरजिस कद्र ने किया था।

प्रश्न 3. क्या 1857 का विद्रोह सैनिक विद्रोह था ? इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर : सिपाही विद्रोह के समर्थक यूरोपियन इतिहासकारों के नाम हैं-मार्श मैन, सीले, जॉन लारेंस आदि। उनके अनुसार सिपाही विद्रोह का एकमात्र कारण था-चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग। इस विद्रोह में जनसाधारण ने हिस्सा नहीं लिया। जो जमींदार, शासक आदि इस विद्रोह में शामिल थे, वे केवल अपने स्वार्थ के कारण अंग्रेजों से बदला लेना चाहते थे। इस मौके से लाभ उठाकर असंतुष्ट जमींदार, वे राजा जिनका राज्य हड़प लिया गया था या जिनकी पेंशन बंद कर दी गई थी , वे सभी विद्रोह में कूद पड़े। उपरोक्त कथन के पक्ष और विरोध संबंधी तथ्यों का विश्लेषण करना आवश्यक है :
1.सिपाही विद्रोह के पक्ष में तर्क (Logic in the favour of Sepoy):(i) इस विद्रोह का प्रारम्भ सैनिक छावनी से हुआ। इसका प्रभाव भी मुख्य रूप से सैनिकों पर पड़ा। जहाँ-जहाँ भारतीय सैनिक थे, विद्रोह की आग से वे भी भड़क उठे। केवल उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही इस विद्रोह का प्रभाव रहा। उत्तर भारत के कुछ देशी राजा भड़क उठे जिनकी गद्दियाँ छिन गई ? या जिनकी पेंशन बंद हो गई थीं। अन्य राजा इससे दूर ही रहे। उत्तर भारत में पंजाब पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा। अतः इस विद्रोह में राष्ट्रीय संग्राम का रूप नहीं देखा जा सकता।
(ii) चर्बी वाले कारतूस ही इस विद्रोह का मुख्य कारण बने।
हिन्दू सैनिक इसलिए भड़के क्योंकि उन्होंने सुन रखा था कि इन कारतूसों पर जो चिकना पदार्थ लगा है, वह गाय की चर्बी है। मुसलमान सैनिक इसलिए भड़के क्योंकि उन्होंने भी सुन रखा था कि कारतूसों पर लगा चिकना पदार्थ सूअर की चर्बी थी। अतः गाय और सूअर की चर्बी से सने कारतूसों को प्रयोग में लाने से पहले दाँतों से छीलने का अर्थ था दोनों सम्प्रदायों का धर्मभ्रष्ट होना। अतः दोनों सम्प्रदायों को धार्मिक ठेस पहुँचाने से भी दोनों सम्प्रदायों के सैनिक भड़के।
(iii) अंग्रेजों से किसान, मजूदर और जनसाधारण तंग थे, परन्तु उन्होंने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया। भारत को गाँवों का देश कहा जाता है, परन्तु आश्चर्य की बात है कि गाँव इस विद्रोह की तपिश से अछूते रहे। यह विद्रोह कुछ प्रसिद्ध नगरों तक ही सीमित रहा ।
2.सिपाही विद्रोह के विरुद्ध तर्क (Logic against the Sepoy Mutiny):(i) इस विद्रोह में केवल सैनिक ही नहीं लड़े थे, बल्कि जनसाधारण भी लड़ा था। यह अलग बात है कि योजनाबद्ध तरीके से वे किसी एक स्थान से नहीं लड़े थे।
(ii) झाँसी और दिल्ली के नागरिक सैनिकों के साथ मिलकर अपने-अपने नगर की रक्षा कर रहे थे। उन्होंने अंग्रेजी सेना को पीछे धकेल दिया। जो भी वे संभव सहायता दे सकते थे, उन्होंने सैनिकों को यथाशक्ति दी।
(iii) इस विद्रोह में ग्रामवासी भी पीछे नहीं रहे। दिल्ली और मेरठ के बीच गाँवों के लोग सैनिकों के साथ आ मिले थे इन किसानों का अंग्रेजों के प्रति भारी रोष था। अतः वे इस मौके को नहीं गँवाना चाहते थे। हाँ, लड़ाई के मुख्य केन्द्र नगर ही थे। इसलिए लोग गाँवों की भूमिका का मूल्यांकन कम करते हैं।
(iv) कई स्थानों पर सैनिकों की टुकड़ी अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्त बनी रही। अत: इस विद्रोह को पूरी तरह से सैनिक विद्रोह कहना ठीक नहीं।

प्रश्न 4. 1857 के विद्रोह में अफवाहों ने क्या भूमिका निभाई? वे परिस्थितियाँ कौन-सी थीं जिनसे लोगों ने अफवाहों में विश्वास किया था?

अथवा

“अफवाहों और भविष्यवाणियों के जरिए लोगों को खड़ा होने के लिए उकसाया जा रहा था।” 1857 के विद्रोह के संदर्भ में कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : वास्तव में अफवाह तभी फैलती है जब इसमें लोगों के जहन में गहरे दबे डर और संदेह की अनुगूँज सुनाई दे। ब्रिटिश नीतियोंने भी लोगों में गहरे डर को जगाया। इसलिए अफवाहें तेजी से फैलीं। इन अफवाहों के पीछे आगे दी गई नीतियों का हाथ था :(i) लॉर्ड विलियम बैंटिंक के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार पश्चिमी शिक्षा, पश्चिमी विचारों और पश्चिमी संस्थानों के द्वारा भारतीय समाज को “सुधारने” के लिए विशेष नीतियाँ लागू कर रही थी। (ii) भारतीय समाज के कुछ वर्गों की सहायता से उन्होंने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्थापित किए थे। (ii) अंग्रेजों ने सती-प्रथा को समाप्त करने (1829) और हिंदू विधवा-विवाह को वैधता देने के लिए कानून बनाए। (iv) ईसाई मिशनरियों ने भारत में जोर-शोर से ईसाई धर्म का प्रचार किया। (v) गोद लिए हुए पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाने को मान्यता नहीं दी गई। (vi) कारतूसों पर गाय या सूअर की चर्बी का लगा होना। इन कारतूसों को प्रयोग से पहले दाँतों से काटना पड़ता था। 1857 के विद्रोह के बारे में अनेक सरकारी दस्तावेज मिलते हैं। औपनिवेशिक प्रशासक और सैनिक अपनी चिट्ठियों, डायरियों, आत्मकथाओं तथा सरकारी इतिहासों में अपने-अपने ब्यौरे दर्ज कर गए हैं। असंख्य मेमों तथा नोट्स, परिस्थितियों के आकलन एवं विभिन्न रिपोर्टों से भी हमें सरकारी सोच और अंग्रेजों के बदलते रवैये की जानकारी मिलती है। आज इनमें से बहुत-से दस्तावेजों को सैनिक विद्रोह के रिकॉर्ड्स पर केंद्रित खंडों में संकलित किया जा चुका है। (vi) ये दस्तावेज अंग्रेज अधिकारियों में व्याप्त भय और बेचैनी तथा विद्रोहियों के बारे में उनकी सोच की जानकारी देते हैं। ब्रिटिश अखबारों और पत्रिकाओं में सैनिक विद्रोहियों द्वारा की गई हिंसा को बड़े लोमहर्षक शब्दों में छापा जाता था। ऐसी कहानियाँ जनता की भावनाओं को भड़काती थीं तथा बदला लेने का माँगों को हवा देती थीं। लाख कोशिशों के बावजूद ब्रिटिश लोगों का विश्वास नहीं जीत सके और इन अफवाहों की वजह से बिचौलियों ने लोगों को 1857 में क्रांतिकारी कदम उठाने को मजबूर किया। (viii) किसी बड़ी कार्रवाई के आह्वान को इस भविष्यवाणी से और अधिक शक्ति मिली कि प्लासी की लड़ाई के 100 वर्ष पूरा होते ही 23 जून, 1857 को अंग्रेजी राज समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 5. भारत में अंग्रेजी शासन के इतिहास में 1857 के विद्रोह ने एक युग की समाप्ति और दूसरे नये युग का आरंभ किया। इस कथन के पक्ष में उदाहरण देते हुए इस विप्लव के परिणाम भी बताइए।
उत्तर : इस विद्रोह के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित थे :1.कंपनी का राज्य समाप्त (End of Company Rule) : इंग्लैंड स्थित ब्रिटिश सरकार ने 1857 के विद्रोह की प्रबलता को देखते हुए कंपनी को भारत में शासन करने के अयोग्य समझा। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल को भी समाप्त कर दिया। दूसरे शब्दों में कंपनी का शासन पूरी तरह से समाप्त हो गया।
2.भारत सचिव की नियुक्ति (Appointment of the Secretary of India) : इंग्लैंड स्थित ब्रिटिश सरकार के अधीन संसद के निर्देशों के अनुसार ही अब भारत का शासन चलाया जाने लगा। भारत सचिव की नियुक्ति की गई, जिसकी सहायता के लिए पन्द्रह सदस्यों वाली एक समिति बनाई गई।
3.वायसराय की नियुक्ति (Appointment of Viceroy) : अब गवर्नर जनरल के स्थान पर वायसराय नियुक्त किया गया।
4. भारतीय नरेशों को आश्वासन (Assurance to the India rulers) : ब्रिटिश सरकार (या क्राउन या महारानी) ने भारतीय नरेशों को आश्वस्त किया कि अब किसी भी कीमत पर उनके क्षेत्रों को नहीं हड़पा जाएगा। कंपनी द्वारा दी गई सुविधाएँ पूर्ववत् रहेंगी। उनमें किसी प्रकार का फेरबदल नहीं किया जायेगा ।
5.धार्मिक हस्तक्षेप न करना (Non-interference in the religious matters) : 1858 ई. में महारानी विक्टोरिया ने घोषणा की कि सरकार भविष्य में किसी के भी धार्मिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी, क्योंकि अंग्रेजों को आभास हो गया कि भारतीय जनमानस धार्मिक आघात सहन नहीं कर सकता। विद्रोह के मूल में यही धार्मिक भावना बारूद का काम कर गई थी।
6.गोद प्रथा की अनुमति (Permission granted for lapse system) : ब्रिटिश सरकार ने अब भारतीय नरेशों को फिर से गोद प्रथा चालू रखने की अनुमति दे दी क्योंकि अधिकांश नरेश संतानहीन होने के कारण बच्चा गोद लेने के लिए विवश थे इसी आधार पर वे अपने राज्य को हड़पा जाना स्वीकार नहीं कर सकते थे।
7.भारतीयों को उच्च पद देना (High posts to Indians) : भेदभाव की नीति छोड़कर अब पढ़े-लिखे भारतीयों को उच्च पद दिये जाने लगे थे क्योंकि अंग्रेजों द्वारा भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने से शिक्षित भारतीय क्रुद्ध हो गये थे।
8.अंग्रेजी सेना के अनुपात में वृद्धि (Increase in the ratio of English Army) : भारत में अंग्रेजी सेना में अंग्रेज सैनिकों का अनुपात भारतीय सैनिकों की अपेक्षा बढ़ा दिया गया। कई लड़ाकू भारतीय जातियों के सेना में भर्ती करने का निश्चय किया गया, जिससे कि भविष्य में अंग्रेजों को कोई भय न रहे। तोपखाना भी अंग्रेजों के अधीन कर दिया गया।
9.स्वतंत्रता के बीज (The seeds of freedom) : 1857 की क्रांति सीमित तो थी, परन्तु भारतीय जनमानस की धरती पर स्वतंत्रता का अंकुर फूट निकला था।
10.राष्ट्रीय जागृति (National awakeness): बुद्धिजीवी वर्ग राष्ट्र जागृति के प्रति विशेष रूप से प्रयास करने लगा था। प्रेस की स्वतंत्रता का लाभ उठाकर बुद्धिजीवी जन – जन के मन में राष्ट्रीय भावनाओं को उभारने में लग गए।

प्रश्न 6. 1857 के विद्रोह की प्रमुख उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : विद्रोह की उपलब्धियाँ (Achievements of the Revolt) : 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम चाहे असफल रहा,परंतु इसकी अनेक उपलब्धियाँ एवं परिणाम बहुत ही महत्त्वपूर्ण थे। यह विद्रोह व्यर्थ नहीं गया। यह अपनी उपलब्धियों के कारण ही हमारे इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की श्रेणियों में आ सका। इसकी उपलब्धियाँ निम्न थीं :
1.हिन्दू-मुस्लिम एकता (Hindu-Muslim unity) : इस आंदोलन एवं संघर्ष के दौरान हिन्दू एवं मुस्लिम न केवल साम्प्रदायिकता की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर अपने देश के बारे में एक सामान्य मंच पर आए, बल्कि लड़े और एक साथ ही यातनायें भी सहीं। अंग्रेजों को यह एकता तनिक भी नहीं भायी। इसलिए उन्होंने शीघ्र ही अपनी ‘फूट डालो एवं शासन करों’ की नीति को और तेज कर दिया।
2.राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि (7he background of National Movement) : राष्ट्रीय आंदोलन एवं स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष की पृष्ठभूमि को इस विद्रोह ने तैयार किया। इसी संग्राम ने देश की पूर्ण स्वतंत्रता के जो बीज बोए उसी का फल 15 अगस्त, 1947 को प्राप्त हुआ।
3.देशभक्ति की भावना का प्रसार (Spread of Patriotic feelings): इस संग्राम ने भारतीय जनता के मस्तिष्क पर वीरता त्याग एवं देशभक्तिपूर्ण संघर्ष की एक ऐसी छाप छोड़ी कि वे अब प्रान्तीय एवं क्षेत्रीयता की संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठकर धीरे-धीरे राष्ट्र के बारे में एक सच्चे नागरिक की तरह सोचने लगे। विद्रोह के नायक सारे देश के लिए प्रेरणा के स्रोत एवं घर-घर में चर्चित होने वाले नायक बन गए। यह इस आंदोलन की एक महान उपलब्धि थी।
4.देशी राज्यों को राहत (Relief to the Princely States) : देशी राजाओं को अंग्रेजी सरकार ने यह आश्वासन दिया कि भविष्य में उनके राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य का अंग नहीं बनाया जाएगा। उनका अस्तित्व स्वतंत्र रूप से बना रहेगा। इसलिए अधिकांश देशी राजाओं ने ब्रिटिश शासन का समर्थन करना शुरू कर दिया। भारतीय शासकों को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार दे दिया गया। इससे अनेक शासकों ने राहत की साँस ली।
5.भारतीयों को सरकारी नौकरियों की घोषणा (Gov. Service to the Indians) : सैद्धान्तिक रूप में भारतीय सर्वोच्च पदों पर धीरे-धीरे प्रगति करके जा सकते थे। सरकारी घोषणा की गई थी कि भारतीयों के साथ जाति एवं रंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा, लेकिन अंग्रेजों ने अपना वायदा पूरा नहीं किया जिससे राष्ट्रीय आंदोलन बराबर बढ़ता गया।
6.धार्मिक हस्तक्षेप समाप्त कर दिया गया (The religious interference ended) : सैद्धान्तिक रूप से भारतीय प्रजा को पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता का विश्वास दिलाया गया, लेकिन व्यावहारिक रूप में हिन्दू और मुसलमानों में धार्मिक घृणा एवं साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया।

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