8 अंकीय प्रश्न उत्तर – औंपनिवेशक शहर ( नगरीकरण , नगर – योजना , स्थापत्य ) – Class12th History Chapter 12

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 12 Important Question Answer 8 Marksऔपनिवेशक शहर(नगरीकरण, नगर-योजना, स्थापत्य)

प्रश्न 1. अंग्रेजों द्वारा भारत में पर्वतीय स्थलों तथा छावनियों की स्थापना के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : सैनिक छावनियों और हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह) औपनिवेशिक शहरी विकास का एक विशेष पहलू था। हिल स्टेशनों की स्थापना तथा आवास का कार्य सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से जुड़ा था। गोरखा युद्ध ( 1815-1816) के दौरान सिमला (वर्तमान शिमला) की स्थापना की गई। अंग्रेज-मराठा (1818) युद्ध के कारण अंग्रेजों की माउंट आबू के प्रति रूचि बढ़ी जबकि दार्जलिंग को 1835 में सिक्किम के राजाओं से छीना गया था। ये हिल स्टेशन सैनिकों के ठहरने, सीमा की निगरानी करने और शत्रु के विरुद्ध हमला बोलने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे। (i) भारतीय पर्वतों की मृदु और ठंडी जलवायु स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी जाती थी। विशेष रूप से इसलिए कि अंग्रेज गर्म मौसम को बीमारियों का जनक मानते थे। उन्हें गर्मियों के कारण हैजा और मलेरिया की सबसे अधिक आशंका रहती थी।
अत: वे सैनिकों को इन बीमारियों से दूर रखने की कोशिश करते थे। भारी-भरकम सेना के कारण ये स्थान पहाड़ियों में एक नई तरह की छावनी बन गए।
(ii) इन हिल स्टेशनों को सेनेटोरियम के रूप में विकसित किया गया। सैनिकों को यहाँ विश्राम करने और इलाज कराने के लिए भेजा जाता था।
(iii) क्योंकि हिल स्टेशनों की जलवायु यूरोप की ठंडी जलवायु से मिलती-जुलती थी इसलिए नए शासकों को वहाँ का मौसम काफी लुभाता था। वायसराय अपने पूरे स्टॉफ के साथ हर साल गर्मियों में हिल स्टेशनों पर ही डेरा डाल लिया करते थे। 1864 में वायसराय जॉन लॉरेंस ने अधिकारिक रूप से अपनी काउंसिल शिमला में स्थानांतरित कर दी। इस प्रकार गर्म मौसम में राजधानियाँ बदलने के क्रम पर विराम लग गया ।
(iv) शिमला भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ (प्रधान सेनापति) का भी अधिकृत आवास बन गया।
(v) हिल स्टेशन ऐसे अंग्रेजों और यूरोपियों के लिए भी आदर्श स्थान थे जो अपने घर जैसी बस्तियाँ बसाना चाहते थे। उनकी इमारतें यूरोपीय शैली की होती थीं। अलग-अलग मकानों के बाद एक-दूसरे से सटे विला और बागों के बीच में स्थित कॉटेज बनाए गए थे। एंग्लिकन चर्च और शैक्षणिक संस्थान आंग्ल आदर्शों के अनुरूप थे। सामाजिक जीवन में मनोरंजन के नए आयाम जोडे।
(vi) रेलवे के आने से हिल स्टेशन बहुत-से लोगों की पहुँच में आ गए। अब भारतीय भी वहाँ जाने लगे। उच्च और मध्यमवर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर-सपाटे के लिए इन स्थानों पर पहुँचने लगे। वहाँ उन्हें यूरोपीय शासकों के निकट होने का संतोष मिलता था।
(vi) हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण थे। इन स्टेशनों के आसपास के इलाकों में चाय और कॉफी बागानों की स्थापना की गई थी। अतः मैदानी भागों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ आने लगे। इस प्रकार अब हिल स्टेशन केवल यूरोपीय लोगों की ही सैरगाह नहीं रह गए थे।

प्रश्न 2. “औपनिवेशिक बंबई की स्थापत्य-कला शाही सत्ता, राष्ट्रवाद और धार्मिक वैभव के विचारों का प्रतिनिधित्व करती थी।” इस कथन की उदाहरणों सहित पुष्टि कीजिए ।
उत्तर : आरंभ में बंबई सात द्वीपों का प्रदेश था ज्यों-ज्यों जनसंख्या बढ़ी, इन द्वीपों को एक-दूसरे से जोड़ दिया गया ताकि अधिक जगह पैदा की जा सके। इस प्रकार एक विशाल शहर अस्तित्व में आया।
बंबई की अर्थव्यवस्था के विस्तार के कारण 19वीं शताब्दी के मध्य में रेलवे और जहाजरानी के विस्तार तथा प्रशासकीय संरचना विकसित करने की आवश्यकता अनुभव हुई। अत: बहुत-सी नई इमारतें बनाई गई। इनकी स्थापत्य या वास्तु शैली यूरोपीय शैली जैसी थी।
बंगले तथा सार्वजनिक भवन : आरंभ में ये इमारतें परंपरागत भारतीय इमारतों की तुलना में अजीब-सी दिखाई देती थीं परंतु धीरे-धीरे भारतीय भी यूरोपीय स्थापत्य शैली के आदी हो गए और उन्होंने इसे अपना लिया। दूसरी ओर अंग्रेजों ने भी अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ भारतीय शैलियों को अपनाया। इसका एक उदाहरण उन बंगलों को माना जा सकता है जिन्हें बंबई और पूरे देश में सरकारी अफसरों के लिए बनाया गया था। बंगला एक बड़े भूखंड पर बना होता था। उसमें रहने वालों को न केवल प्राइवेसी मिलती थी बल्कि उनके और भारतीय जगत् के बीच दूरी भी स्पष्ट हो जाती थी। परंपरागत ढलवाँ छत और चारों ओर बना बरामदा बंगले को ठंडा रखता था। बंगले के परिसर में घरेलू नौकरों के लिए अलग से क्वार्टर होते थे।
सार्वजनिक भवनों के लिए मुख्य रूप से तीन स्थापत्य शैलियों का प्रयोग किया गया दो शैलियाँ उस समय इंग्लैंड में प्रचलित थीं। से एक शैली को नवशास्त्रीय या नियोक्लासिकल शैली कहा जाता था। बड़े-बड़े स्तंभों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण इस शैली की विशेषता थी। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इस शैली को विशेष रूप से अनुकूल माना जाता था। अंग्रेजों को लगता था कि जिस शैली में शाही रोम की भव्यता दिखाई देती थी, उसे ब्रिटिश भारत के वैभव की अभिव्यक्ति के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। 1833 में बंबई का टाउन हॉल इसी शैली के अनुसार बनाया गया था।

प्रश्न 3. औपनिवेशिक काल में नव-गॉथिक तथा इंडो-सारासेनिक स्थापत्य शैलियों में बने भवनों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। इन शैलियों की मुख्य विशेषताएँ भी बताएँ।
उत्तर : 1. नव-गॉथिक शैली : नव-गॉथिक शैली की मुख्य विशेषताएँ ऊँची उठी हुई छतें, नोकदार मेहराबें और बारीक साज-सज्जा थी। इस शैली का जन्म इमारतों, विशेषकर उन गिरजों से हुआ था जो मध्यकाल में उत्तरी यूरोप में बनाए गए थे। इस शैली को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में दोबारा अपनाया गया। यह वही समय था जब सरकार बंबई में आधारभूत ढाँचे का निर्माण कर रही थी। उसके लिए यही चुनी गई।
सचिवालय, बबई विश्वविद्यालय और उच्च न्यायालय जैसी कई शानदार इमारतें इसी शैली में बनाई गई।
नव गॉथिक शैली में बनी कुछ इमारतों के लिए भारतीयों ने पैसा दिया था। उदाहरण के लिए यूनिवर्सिटी हाल के लिए सर कोवासजी जहाँगीर रेडीमनी ने पैसा दिया। वह एक धनी पारसी व्यापारी थे। इसी प्रकार यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी के लिए घंटाघर का निर्माण प्रेमचंद रॉयचंद के पैसे से किया गया था। इसका नाम उनकी माँ के नाम पर राजाबाई टावर रखा गया था। भारतीय व्यापारियों को नव-गॉथिक शैली इसलिए भाती थी क्योंकि उनका मानना था कि अंग्रेजों द्वारा लाए गए बहुत-से विचारों की तरह उनकी भवन निर्माण शैलियाँ भी प्रगतिशील हैं। उनका मानना था कि इन शैलियों द्वारा बंबई को एक आधुनिक शहर बनाने में सहायता मिलेगी।
परंतु नव-गॉथिक शैली का सबसे अच्छा उदाहरण विक्टोरिया टर्मिनस है। यह ग्रेट इंडियन पेनिन्स्युलर रेलवे कंपनी का स्टेशन का मुख्यालय हुआ करता था।
अंग्रेजों ने शहरों में रेलवे स्टेशनों के डिजाइन और निर्माण में काफी निवेश किया था । क्योंकि वे एक अखिल भारतीय रेलवे नेटवर्क के सफल निर्माण को अपनी एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानते थे। मध्य बंबई में इन्हीं इमारतों का दबदबा था। उनकी नव-गॉथिक शैली शहर को एक विशिष्ट चरित्र प्रदान करती थी।
2.इंडोसारासेनिक शैली : बीसवीं सदी के आरंभ में एक नई मिश्रित स्थापत्य शैली विकसित हुई जो भारतीय और यूरोपीय शैलियों का मिश्रण थी। इस शैली को इंडो-सारासेनिक शैली का नाम दिया गया था। “इंडो” शब्द “हिंदू” का संक्षिप्त रूप था जबकि “सारासेन” शब्द का प्रयोग यूरोप के लोग मुसलमानों को संबोधित करने के लिए करते थे। इस शैली पर यहाँ की मध्यकालीन इमारतों-गुंबदों, छतरियों, जालियों. मेहराबों-आदि का काफी प्रभाव था। सार्वजनिक वास्तु शिल्प में भारतीय शैलियों का समावेश करके अंग्रेज यह दिखाना चाहते थे कि वे यहाँ के वैध और स्वाभाविक शासक हैं। 1911 में राजा जार्ज पंचम और उनकी पत्नी मेरी के स्वागत के लिए गेटवे ऑफ इंडिया बनाया गया। यह परंपरागत गुजराती शैली का प्रसिद्ध उदाहरण है। उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने इसी शैली में ताजमहल होटल बनवाया था। यह इमारत न केवल भारतीय उद्यमशीलता का प्रतीक थी, बल्कि अंग्रेजों के नस्ली क्लबों और होटलों के लिए एक चुनौती भी थी।

प्रश्न 4. औपनिवेशिक भारत में हिल स्टेशनों ( पर्वतीय सैरगाहों) के विकास को बढ़ावा देने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर : (i) सैनिक छावनियों और हिल स्टेशन (पर्वतीय सैरगाह) औपनिवेशिक शहरी विकास का एक विशेष पहलू था। हिल स्टेशनों की स्थापना तथा आवास का कार्य सबसे पहले ब्रिटिश सेना की जरूरतों से जुड़ा था। गोरखा युद्ध (1815-1816) के दौरान सिमला (वर्तमान शिमला) की स्थापना की गई। अंग्रेज-मराठा (1818) युद्ध के कारण अंग्रेजों की माउंट आबू के प्रति रूचि बढ़ी जबकि दार्जिलिंग को 1835 में सिक्किम के राजाओं से छीना गया था । ये हिल स्टेशन सैनिकों के ठहरने, सीमा की निगरानी करने और शत्रु के विरुद्ध हमला बोलने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।
(ii) भारतीय पर्वतों की मृदु और ठंडी जलवायु स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानी जाती थी। विशेष रूप से इसलिए कि अंग्रेज गर्म मौसम को बीमारियों का जनक मानते थे। उन्हें गर्मियों के कारण हैजा और मलेरिया की सबसे अधिक आशंका रहती थी। अत: वे सैनिकों को इन बीमारियों से दूर रखने की कोशिश करते थे। भारी-भरकम सेना के कारण ये स्थान पहाड़ियों में एक नई तरह की छावनी बन गए।
(iii) इन हिल स्टेशनों को सेनेटोरियम के रूप में विकसित किया गया। सैनिकों को यहाँ विश्राम करने और इलाज कराने के लिए भेजा जाता था।
(iv) क्योंकि हिल स्टेशनों की जलवायु यूरोप की ठंडी जलवायु से मिलती-जुलती थी, इसलिए नए शासकों को वहाँ का मौसम काफी लुभाता था। वायसराय अपने पूरे स्टॉफ के साथ हर साल गर्मियों में हिल स्टेशनों पर ही डेरा डाल लिया करते थे। 1864 में वायसराय जॉन लॉरेंस ने अधिकारिक रूप से अपनी काउंसिल शिमला में स्थानांतरित कर दी। इस प्रकार गर्म मौसम में राजधानियाँ बदलने के क्रम पर विराम लग गया। ,
(v) शिमला भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ (प्रधान सेनापति) का भी अधिकृत आवास बन गया।
(vi) हिल स्टेशन ऐसे अंग्रेजों और यूरोपियों के लिए भी आदर्श स्थान थे जो अपने घर जैसी बस्तियाँ बसाना चाहते थे परंतु उनकी इमारतें यूरोपीय शैली की होती थीं। अलग-अलग मकानों के बाद एक-दूसरे से सटे विला और बागों के बीच में स्थित कॉटेज बनाए गए थे। एंग्लिकन चर्च और शैक्षणिक संस्थान आंग्ल आदर्शों के अनुरूप थे। सामाजिक जीवन में मनोरंजन के नए आयाम जोड़े गए थे।
(vii) रेलवे के आने से हिल स्टेशन बहुत-से लोगों की पहुँच में आ गए। अब भारतीय भी वहाँ जाने लगे । उच्च और मध्यमवर्गीय लोग, महाराजा, वकील और व्यापारी सैर-सपाटे लिए इन स्थानों पर पहुँचने लगे। वहाँ उन्हें यूरोपीय शासकों के निकट होने का संतोष मिलता था।
(viii) हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण थे। इन स्टेशनों के आसपास के इलाकों में चाय और कॉफी बागानों की स्थापना की गई थी। अतः मैदानी भागों से बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ आने लगे। इस प्रकार अब हिल स्टेशन केवल यूरोपीय लोगों की ही सैरगाह नहीं रह गए थे।

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