3 अंकीय प्रश्न उत्तर – महात्मा गाँधी राष्टीय आन्दोलन – Class12th History Chapter 13

Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 13 Important Question Answer 3 Marks महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

प्रश्न 1. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में खिलाफत आंदोलन का महत्त्व बताइए।
उत्तर : 1. खिलाफ़त आंदोलन और राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ एक नई धारा आई। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गाँधीजी ने खिलाफत आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत बनाने और मुस्लिम जनता को राष्ट्रीय आंदोलन में लाने का अच्छा मौका समझा। गाँधीजी ने खिलाफत आंदोलन को “हिंदुओं और मुसलमानों को एक सूत्रबद्ध करने के ऐसे अवसर के रूप में देखा जो सौ वर्षों में भी नहीं आयेगा। “
2.गाँधीजी ने 1920 ई. के आरंभ में ही घोषणा की कि खिलाफत का प्रश्न संवैधानिक सुधारों तथा पंजाब के अत्याचारों के प्रश्नों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। अगर तुर्की के साथ शांति स्थापित करने की शर्तें भारतीय मुसलमान को संतुष्ट नहीं कर पायेंगी तो वे असहयोग आंदोलन शुरू करेंगे। वस्तुतः गाँधीजी जल्द ही खिलाफत आंदोलन के नेता बन गए।
3.इस बीच सरकार ने रॉलेट एक्ट को रद्द करने, पंजाब की नृशंसताओं के लिए क्षतिपूर्ति करने या स्वराज्य की लालसा को पूरा करने से इंकार कर दिया। जून, 1920 ई. में इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमें स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों का बहिष्कार करने का एक कार्यक्रम स्वीकृत किया। खिलाफत कमेटी ने 31 अगस्त, 1920 ई. को असहयोग आंदोलन शुरू किया। सबसे पहले उसमें गाँधीजी शामिल हुए। उन्होंने युद्ध के दौरान अपनी सेवाओं के लिए दिया गया ‘केसर-ए-हिंद’ पदक लौटा दिया।

प्रश्न 2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन क्यों शुरू किया गया ? इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर : सिविल नाफरमानी अथवा सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरंभ 1930 में गाँधी जी के नेतृत्व में हुआ। यह आन्दोलन दो चरणों में चला और 1933 ई. के अंत तक चलता रहा। इसके कारणों और इसकी प्रगति के महत्त्व का वर्णन इस प्रकार है
कारण : (1) 1928 ई. में ‘साइमन कमीशन’ भारत आया। इस कमीशन ने भारतीयों के विरोध के बावजूद भी अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी। इससे भारतीयों में असंतोष फैल गया।
(2) सरकार ने नेहरू रिपोर्ट की शर्तों को स्वीकार न किया।
(3) बारदौली के किसान आन्दोलन की सफलता ने गाँधीजी को सरकार के विरुद्ध आंदोलन चलाने के लिए प्रेरित किया ।
(4) गाँधीजी ने सरकार के सामने कुछ शर्ते रखीं, परन्तु वायसराय ने इन शर्तों को स्वीकार न किया। इन परिस्थितियों में गाँधीजी ने सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरंभ कर दिया।
महत्त्व : सिविल नाफरमानी आन्दोलन वास्तव में ही उस समय तक का सबसे बड़ा जन-संघर्ष था। इस आंदोलन में देश के सभी भागों तथा सभी वर्गों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। लोगों ने बड़ी संख्या में जेल-यात्रा की परन्तु सरकार के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया। यद्यपि 1934 में यह आंदोलन समाप्त हो गया तो भी यह स्वतंत्रता सेनानियों का तब तक मार्ग-दर्शन करता रहा जब तक कि देश स्वतंत्र नहीं हो गया।

प्रश्न 3. असहयोग आंदोलन की ओर ले जाने वाली घटनाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर : असहयोग आंदोलन (1920-22) निम्नलिखित कारणों से चलाया गया : (i) भारतीयों ने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेजों को पूरा सहयोग दिया था परन्तु महायुद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों ने भारतीय जनता का खूब शोषण किया।
(ii) प्रथम महायुद्ध के दौरान भारत में प्लेग आदि महामारियाँ फूट पड़ीं परन्तु अंग्रेजी सरकार ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया।
(iii) गाँधीजी ने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेजों की सहायता करने का प्रचार इस आशा से किया था कि वे भारत को स्वराज्य प्रदान करेंगे परन्तु युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटिश सरकार ने गाँधीजी की आशाओं पर पानी फेर दिया।
(iv) 1919 ई. में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट पास कर दिया जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए बंदी बनाया जा सकता था। इस काले कानून के कारण जनता में रोष फैल गया।
(v) इसी बीच गाँधीजी को पंजाब में जाने से रोक दिया गया।। इसके अतिरिक्त कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
(vi) रॉलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक विशाल जनसभा हुई। अंग्रेजों ने एकत्रित भीड़ पर गोलियाँ चलायीं जिससे सैकड़ों लोग मारे गए।
(vii) सितंबर, 1920 ई. में कांग्रेस ने अपना अधिवेशन कलकत्ता (कोलकाता) में बुलाया। इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा गया जिसे बहुमत से पास कर दिया गया।

प्रश्न 4. असहयोग आंदोलन की वापसी के तुरंत बाद कांग्रेस में क्या मतभेद उत्पन्न हुए ? इन मतभेदों के परिणामस्वरूप हुए घटनाक्रमों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर : प्रथम असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के बाद कांग्रेस : 1922-28 के दौरान भारतीय राजनीति में बड़ी-बड़ी घटनाएँ घटीं। कांग्रेस में भारी मतभेद उभर गए। एक गुट के विचार के प्रतिनिधि चितरंजन दास और मोतीलाल नेरू थे जिन्होंने बदली हुई परिस्थितियों में एक नए प्रकार की राजनीतिक गतिविधि का सुझाव दिया। उनका कहना था कि राष्ट्रवादियों की विधानसभाओं का बहिष्कार समाप्त करके उनमें भाग लेना चाहिए, सरकारी योजनाओं के अनुसार उनके चलने में बाधा डालनी चाहिए, उनकी कमजोरियों को सामने लाना चाहिए, उनको राजनीतिक संघर्ष का क्षेत्र बनाना चाहिए तथा इस प्रकार जन-उत्साह जगाने में उनका उपयोग करना चाहिए।
‘अपरिवर्तनवादी” कहे जाने वाले गुट के सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. अंसारी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद तथा दूसरे लोगों ने विधानमंडलों में जाने का विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि संसदीय राजनीति में भाग लेने से जनता के बीच काम की उपेक्षा होगी, राष्ट्रवादी उत्साह कमजोर पड़ेगा और नेताओं के बीच प्रतिद्वंद्विता पैदा होगी, इसलिए ये लोग चरखा चलाने , चरित्र-निर्माण, हिन्दू-मुस्लिम एकता, छूआछूत उन्मूलन तथा गाँवों में और गरीबों के बीच निचले स्तरों पर कार्य जैसे रचनात्मक कार्यों पर जोर देते रहे। उनका कहना था कि इससे देश धीरे-धीरे जन- संघर्ष के एक और दौर के लिए तैयार होगा।

प्रश्न 5. साइमन कमीशन भारत क्यों आया था ?
उत्तर : 1919 ई. के एक्ट के अनुसार यह निर्णय हुआ था कि प्रत्येक दस वर्ष के बाद सुधारों का मूल्यांकन करने के लिए इंग्लैंड से एक कमीशन भारत आयेगा। इसलिए 1928 ई. में जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक आयोग (Commission) भारत आया था। इस आयोग में एक भी भारतीय न था, जबकि इसका उद्देश्य भारत के हितों की देखभाल करना था। अतः भारतीयों ने इसका स्थान-स्थान पर बहिष्कार और जोरदार विरोध किया। जहाँ भी यह आयोग गया, वहाँ पर भारतीयों ने इसका काले झंडे दिखाकर ‘साइमन वापस जाओ’ के नारों के साथ बहिष्कार किया। अंग्रेजों ने प्रदर्शनकारियों का दमन बड़ी क्रूरता से किया। जब यह आयोग लाहौर पहुँचा, तो लाला लाजपतराय ने प्रदर्शन कर रहे जुलूस का नेतृत्व किया। पुलिस के भीषण लाठी प्रहार से लाला जी को कई गहरी चोटें लगीं जिनके फलस्वरूप बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इसी तरह से लखनऊ में जुलूस का नेतृत्व पंडित जवाहर लाल नेहरू कर रहे थे। उन पर भी जब लाठी प्रहार होने लगा, तो गोविंद बल्लभ पंत ने तुरंत अपना सिर उनके सिर पर रख दिया जिसके फलस्वरूप पंत जी को पक्षाघात हो गया और जीवन भर वे अपनी गर्दन सीधी रखकर न बैठ पाये।

प्रश्न 6. स्पष्ट कीजिए कि “भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में एक जन-आंदोलन था।”
उत्तर : क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपना तीसरा बड़ा आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया। यह आंदोलन अगस्त 1942 में शुरू हुआ जिस “अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नाम दिया गया। भले ही गाँधी जी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया था तो भी देश भर के युवा कार्यकर्ता हड़तालों और तोड़फोड़ की कार्रवाइयों के आंदोलन चलाते रहे। कांग्रेस में जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी सदस्य भूमिगत प्रतिरोध में सबसे अधिक सक्रिय थे। पश्चिम में सतारा और पूर्व में मेदिनीपुर जैसे कई जिलों में “स्वतंत्र” सरकार (प्रतिसरकार) की स्थापना कर दी गई थी। अंग्रेजों ने आंदोलन के प्रति बहुत ही कड़क रुख अपनाया। फिर भी इस विद्रोह को दबाने में सरकार को एक वर्ष से भी अधिक समय लग गया।
भारत छोड़ो” आंदोलन एक व्यापक जन-आंदोलन था जिसमें लाखों भारतीय शामिल थे। इस आंदोलन ने युवाओं को बड़ी संख्या में अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपने कॉलेज छोड़कर जेल का रास्ता अपनाया। जिस दौरान कांग्रेस के नेता जेल में थे, उस समय जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के सदस्य अपना प्रभाव क्षेत्र फैलाने में लगे थे। इन्हीं सालों में लीग को पंजाब और सिंध में अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला जहाँ अभी तक उसका कोई विशेष आधार नहीं था।
1944 में जब विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था, गाँधीजी को रिहा कर दिया गया।

प्रश्न 7. स्वतंत्रता के बाद के कुछ महीनों में गाँधीजी द्वारा सांप्रदायिक सद्भाव के लिए किए गए संघर्ष का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

अथवा

अनेक विद्वानों ने स्वतंत्रता के बाद के महीनों को गाँधीजी के जीवन का ‘श्रेष्ठतम क्षण’ क्यों कहा है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता के बाद के कुछ महीने गाँधीजी के जीवनकाल का श्रेष्ठतम क्षण था। इसका आधार सांप्रदायिक सद्भाव के लिए उनके द्वारा किया गया संघर्ष था। गाँधीजी ने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था वह एक बड़ी कीमत चुका कर उन्हें मिली थी। उनका राष्ट्र विभाजित हो गया था। हिंदू तथा मुसलमान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो चुके थे। अत: गाँधीजी ने कलकत्ता (बंगाल) के दंगाग्रस्त क्षेत्रों में सिखों, हिन्दुओं और मुसलमानों से आह्वान किया कि वे अतीत को भुलाकर एक-दूसरे के प्रति भाईचारे का हाथ बढ़ाने तथा शांति से रहने का संकल्प लें।
बंगाल में शांति स्थापना के अभियान के बाद गाँधीजी दिल्ली आ गए। यहाँ से वे पंजाब के दंगाग्रस्त जिलों में जाना चाहते थे। घरेलू राजधानी में ही शरणार्थियों की आपत्तियों के कारण उनकी सभाएँ अस्त-व्यस्त होने लगीं। अनेक शरणार्थियों को उनकी सभाओं में कुरान की आयतें पढ़े जाने पर आपत्ति थी। कई लोग इस बात पर आपत्ति उठा रहे थे कि गाँधीजी उन हिन्दुओं और सिखों की पीड़ा के बारे में बात क्यों नहीं करते जो अभी भी पाकिस्तान में फंसे हुए हैं। डी.जी. तेंदुलकर के अनुसार, गाँधीजी | ‘पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदाय के कष्टों के बारे में समान रूप से चिंतित थे। उन्हें राहत प्रदान करने के लिए वे वहाँ भी जाना चाहते थे परन्तु वहाँ वे किस मुँह से जाते क्योंकि जब दिल्ली में ही वे मुसलमानों को पूरी सुरक्षा का आश्वासन नहीं दे पा रहे थे।” गाँधीजी के इस संघर्ष का अंतिम परिणाम था 30 जनवरा, 1948 को उनकी हत्या यह एक बहुत बड़ा बलिदान था।

प्रश्न 8. गाँधी जी की दांडी यात्रा की प्रगति के बारे में लोगों को कैसे और किन-किन बातों का पता चला ?
उत्तर : (क) दांडी (Dandi) :(i) ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाये जाने के तुरंत बाद महात्मा गाँधी ने घोषणा की कि ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घृणित कानूनों में से एक, जिसने नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य को एकाधिकार दे दिया है, को तोड़ने के लिए एक यात्रा का नेतृत्व करेंगे।
(ii) अधिकांश भारतीयों को गाँधीजी की इस चुनौती का महत्त्व समझ में आ गया था किंतु अंग्रेजी राज को नहीं। हालांकि गाँधीजी ने अपनी ‘नमक यात्रा’ की पूर्व सूचना वाइसराय लाड इविन को दे दी थी किंतु इर्विन उनकी इस कार्रवाई के महत्त्व को न समझ सके। 12 मार्च, 1930 को गाँधीजी ने साबरमती में अपने आश्रम से समुद्र को ओर चलना शुरू किया। देश के अनेक समाचार पत्रों तथा कई भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में गाँधी जी की दांडी यात्रा के बारे में पूरी जानकारी दी जाती रही गाँधी जी स्थान-स्थान पर घूमकर गाँव-गाँव में जनसमूहों को संबोधित करते थे। तीन हफ्तों बाद वे अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने मुट्ठी भर नमक बनाकर स्वयं को कानून की निगाह में अपराधी बना दिया। इसी बीच देश के अन्य भागों में समान्तर यात्राएँ आयोजित की गईं।
(ख) संवाद (Dialogues) : नमक यात्रा निम्न तीन कारणों से उल्लेखित थी : (i) यही वह घटना थी जिसके चलते महात्मा गाँधी दुनियाँ की नजर में आए। इस यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक कवरेज दी।
(ii) यह पहली राष्ट्रवादी गतिविधि थी जिसमें औरतों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। समाजवादी कार्यकर्ता कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गाँधी जी को समझाया कि वे अपने आंदोलनों को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। कमलादेवी खुद उन असंख्य औरतों में से एक थीं जिन्होंने नमक या शराब कानूनों का उल्लंघन करते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी थी।
(iii) सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि नमक यात्रा के कारण ही अंग्रेजों को यह अहसास हुआ कि अब उनका राज बहुत दिन नहीं टिक सकेगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में हिस्सा देना पड़ेगा।

प्रश्न 9. साइमन कमीशन भारत में क्यों आया ? भारत में इसका विरोध क्यों हुआ ?
उत्तर : 1927 ई. में इंग्लैण्ड की सरकार ने एक कमीशन नियुक्त किया। इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे इसीलिए इस कमीशन को साइमन कमीशन कहा जाता है। यह कमीशन 1928 ई. में भारत पहुँचा। इसका उद्देश्य 1919 ई. के सुधारों के परिणामों की जाँच करना था। इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसी कारण भारत में इसका स्थान-स्थान पर विरोध किया गया। यह कमीशन जहाँ भी गया, वहीं इसका स्वागत काली झंडियों से किया गया। स्थान-स्थान पर ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे लगाये गये। जनता के इस शांत प्रदर्शन को सरकार ने बड़ी कठोरता से दबाया। लाहौर में इस कमीशन का विरोध करने के कारण लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसाई गईं जिससे वह शहीदी को प्राप्त हुए। देश के सभी राजनीतिक दलों ने सरकार की इस नीति की कड़ी आलोचना की ।

प्रश्न 10. गाँधीजी एक सक्षम राजनेता होने के साथ-साथ एक महान समाज-सुधारक भी थे। इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि गाँधीजी एक सक्षम राजनेता होने के साथ-साथ एक महान समाज-सुधारक भी थे। राजनेता के रूप में उन्होंने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को एक व्यापक जन-आंदोलन में बदल दिया। 1922 में उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। 1924 में जेल से छूटने के बाद कई वर्षों तक उन्होंने अपना ध्यान समाज सुधार पर केंद्रित रखा। सबसे पहले उन्होंने अपना ध्यान घर में बुने कपड़े (खादी) को बढ़ावा देने तथा छुआछूत को समाप्त करने पर लगाया। गाँधीजी का विश्वास था कि स्वतंत्रता पाने योग्य बनने के लिए भारतीयों को बाल-विवाह और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों से मुक्त होना पड़ेगा। सभी मतों के भारतीयों के बीच सद्भावना का वातावरण तैयार करना होगा। इसलिए उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों के बीच सौहार्द्र पर बल दिया। उनका मानना था कि आर्थिक स्तर पर भी भारतीयों को स्वावलंबी बनना होगा। इसलिए उन्होंने विदेशी कपड़े के स्थान पर खादी पहनने पर जोर डाला।

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