Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 13 Important Question Answer 8 Marks महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन

प्रश्न 1. राजनीति में प्रवेश से पूर्व महात्मा गाँधी के जीवन व गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए उनके प्रमुख राजनीतिक विचार भी लिखिए ।
उत्तर : राजनीतिक नेता के रूप में गाँधीजी का आरंभिक विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ और यहीं उनके राजनीतिक विचार परिपक्व हुए।
गाँधीजी और उनके विचार (Gandhiji and his thoughts) : मोहनदास करमचंद गाँधी का जन्म गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर 2 अक्टूबर, 1869 को हुआ था। ब्रिटेन में कानून की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् वे वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। न्याय की उच्च भावना से प्रेरित होकर उन्होंने नस्लवादी, अन्याय, भेदभाव और हीनता के विरुद्ध संघर्ष किया जिसका शिकार दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को होना पड़ रहा था।
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति तथा गाँधीजी का नेतृत्व (Position of the Indians in South Africa and leadership of Gandhiji) :(i) दक्षिण अफ्रीका में भारत से आए मजदूरों और व्यापारियों को मत देने का अधिकार नहीं था।
(ii) उन्हें पंजीकरण कराना तथा चुनाव कर देना पड़ता था।
(iii) उनको गंदी और भीड़ भरी उन बस्तियों में ही रहना होता था जो उनके लिए निर्धारित थीं ।
(iv) कुछ दक्षिणी अफ्रीकी उपनिवेशों में एशियाई और अफ्रीकी लोग रात के नौ बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकल सकते थे। गाँधीजी इन स्थितियों के विरोध में चलने वाले संघर्ष के शीघ्र ही नेता बन गए। 1893-94 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के नस्लवादी अधिकारियों के विरुद्ध एक वीरतापूर्ण परंतु अहिंसक संघर्ष चलाया। यही वह संघर्ष था जिसके दौरान उन्होंने सत्य और अहिंसा पर आधारित अपने राजनीतिक विचारों का प्रतिपाद किया।
गाँधीजी के राजनीतिक विचार (Political thoughts of Gandhiji):(i) गाँधीजी के अनुसार एक आदर्श सत्याग्रही सत्यप्रेमी और शांतिप्रिय होता है, परंतु वह जिस बात को गलत समझता है उस स्वीकार करने से दृढ़तापूर्वक इंकार कर देता है। वह गलत काम करने वालों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए हँसकर कष्ट सहन करता है। यह संघर्ष उसके सत्यप्रेम का ही अंग होता है, परंतु बुराई का विरोध करते हुए भी वह बुरे से प्रेम करता है। एक सच्चे सत्याग्रही की प्रकृति में घृणा के लिए कोई स्थान नहीं होता। इसके अतिरिक्त वह बिल्कुल निडर होता है। चाहे जो परिणाम हो, वह बुराई के सामने नहीं झुकता।
(ii) गाँधीजी की दृष्टि में अहिंसा कायरों और कमजोरों का अस्त्र नहीं है। केवल निडर और वीर लोग ही इसका उपयोग कर सकते हैं। वे हिंसा को कायरता से अधिक स्वीकार योग्य समझते थे। 1920 में अपने साप्ताहिक पत्र ‘यंग इंडिया’ में एक प्रसिद्ध लेख में उन्होंने लिखा था कि “अहिंसा हमारी प्रजाति का धर्म है जैसे हिंसा पशु का धर्म है,” परंतु “अगर केवल कायरता और हिंसा में किसी एक को चुनना हो तो मैं हिंसा को चुनने की सलाह दूँगा । भारत कायरतापूर्वक असहाय होकर अपने सम्मान का अपहरण होते देखता रहे, इसके बजाय मैं उसे अपने सम्मान की रक्षा के लिए शस्त्र उठाते देखना अधिक पसंद करूँगा। ” एक स्थान पर उन्होंने अपने पूरे जीवन-दर्शन की व्याख्या इस प्रकार की है :”सत्य और अहिंसा ही वह अकेला धर्म है जिसका मैं दावा करना चाहता हूँ। मैं किसी भी परामानवीय शक्ति का दावा नहीं करता; ऐसी कोई शक्ति मुझमें नहीं है।’
(iii) गाँधीजी के दृष्टिकोण का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे विचार और कर्म में कोई अंतर नहीं रखते थे। उनका सत्य-अहिंसा-दर्शन जोशीले भाषणों और लेखों के लिए न होकर दैनिक जीवन के लिए था।
(iv) गाँधीजी को साधारण जनता की संघर्ष शक्ति पर अटूट भरोसा था। उदाहरण के लिए 1942 में जब उनसे यह पूछा गया कि वह “साम्राज्य की शक्ति का सामना” कैसे कर सकेंगे तो उन्होंने उत्तर दिया था-“लाखों-लाख मूक जनता की शक्ति के द्वारा।”
(v) गाँधीजी को अपने जीवन में तीन अन्य लक्ष्य भी बड़े प्रिय थे। वे इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अपने जीवन की आहुति भी दे सकते थे। इनमें से पहला लक्ष्य था-हिंदू-मुस्लिम एकता। दूसरा लक्ष्य था-छुआछूत विरोधी आंदोलन तथा तीसरा लक्ष्य था-स्त्रियों की दशा सुधारना। वे एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जहाँ सभी समुदाय पूरे सम्मान रहते हों, 44 ‘छुआछूत” नामक कोढ़ के लिए कोई जगह न हो और जहाँ”स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार” हों।

प्रश्न 2. ‘गाँधीजी ने राष्ट्रवादी संदेश का संचार शासकों की भाषा की जगह मातृभाषा में करने को प्रोत्साहित किया।’ उन्होंने अपने दर्शन के साथ असहयोग आंदोलन को किस प्रकार एकजुट किया? परख कीजिए।
उत्तर : गाँधीजी के दर्शन का आधार निम्नलिखित तत्व थे-
(a) अहिंसा का प्रयोग करना।
(b) विभिन्न धर्मों के बीच सौहार्द बढ़ाने का प्रयास करना।
(c) उच्च भारतीयों का निम्न जातियों और महिलाओं के प्रति भेदभाव वाले व्यवहार के लिए चेतावनी देना।
(d) गाँधीजी को एक राष्ट्रवादी के रूप में गरीबों के प्रति विशेष सहानुभूति थी इसलिए उन्होंने कई बार श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाई जैसे कि- अहमदाबाद में एक श्रम विवाद में हस्ताक्षेप करते हुए कपड़े की मिलों में काम करने वालों के लिए काम करने की बेहतर स्थितियों की माँग की थी।
(e) खेड़ा में फसल चौपट होने पर उन्होंने राज्य से किसानों का लगान माफ करने की माँग की थी।
इस प्रकार गाँधीजी ने अपने दर्शन के साथ असहयोग आंदोलन को एकजुट किया। उनका जन अनुरोध निस्संदेह कपट से मुक्त था और इसीलिए वह राष्ट्रवाद के आधार को व्यापक बनाने में सफल हुए जिसका प्रमाण असहयोग आंदोलन से मिलता है।

प्रश्न 3. असहयोग आंदोलन के कारण व इसके भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान की समीक्षा कीजिए । गाँधी जी ने खिलाफत को इसके साथ क्यों जोड़ा ?

अथवा

1920 के असहयोग आंदोलन का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : असहयोग आंदोलन का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान :(i) चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में की गई पहल से गाँधी जी एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में उभरे जिनमें गरीबों के लिए गहरी सहानुभूति थी। इसी तरह ये सभी स्थानिक संघर्ष थे। इसके बाद 1919 में औपनिवेशिक शासकों ने गाँधी जी की झोली में एक ऐसा मुद्दा डाल दिया जिससे वे कहीं अधिक विस्तृत आंदोलन खड़ा कर सकते थे। 1914-18 के महान युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के कारावास की अनुमति दे दी थी।
(ii) रॉलेट सत्याग्रह से ही गाँधीजी एक सच्चे राष्ट्रीय नेता बन गए। इसकी सफलता से उत्साहित होकर गाँधीजी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन की माँग कर दी ।
(iii) गाँधीजी ने यह आशा की थी कि असहयोग को खिलाफत के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय-हिंदू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे।
(iv) विद्यार्थियों ने सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया। कई कस्बों और नगरों में श्रमिक -वर्ग हड़ताल पर चला गया। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुई जिनमें 6 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान हुआ था।
(v) फरवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रात के चौरा-चौरी पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई। हिंसा की इस कार्यवाही से गाँधीजी को यह आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा।
(vi) असहयोग आंदोलन के दौरान हजारों भारतीयों को जेल में डाल दिया गया। स्वयं गाँधीजी को मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

प्रश्न 4. “गाँधी जी जहाँ भी गए वहीं उनकी चमत्कारिक शक्तियों की अफवाहें फैली।” सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : गाँधी जी जहाँ भी गए वहीं उनकी चमत्कारिक शक्तियों की अफवाहें फैल गईं। कुछ स्थानों पर यह कहा गया कि उन्हें राजा द्वारा किसानों के दुख तकलीफों के सुधार के लिए भेजा गया है तथा उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत करने की शक्ति है। कुछ अन्य स्थानों पर यह दावा किया गया कि गाँधी जी की शक्ति अंग्रेज बादशाह से उत्कृष्ट है। और यह कि उनके आने से औपनिवेशिक शासक जिले से भाग जाएँगे । गाँधी जी का विरोध करने वालों के लिए भयंकर परिणाम की बात बताती कहानियाँ भी थीं। इस तरह की अफवाहें फैली कि गाँधी जी की आलोचना करने वाले गाँव के लोगों के घर रहस्यात्मक रूप से गिर गए अथवा उनकी फसल चौपट हो गई।
गाँधी बाबा, गाँधी महाराज अथवा सामान्य महात्मा जैसे अलग-अलग नामों से ज्ञात गाँधी जी भारतीय किसान के लिए । एक उद्धारक के समान थे जो उनकी ऊँची करों और रचनात्मक अधिकारियों से सुरक्षा करने वाले और उनके जीवन को मान-मर्यादा और स्वायत्तता वापस लाने वाले थे। गरीबों विशेषकर किसानों के बीच गाँधी जी की अपील थी। उनकी सात्विक जीवन शैली और उनके द्वारा धोती तथा चरखा जैसी प्रतीकों के विवेकपूर्ण प्रयोग से लोगों को बहुत बल मिला। जाति से महात्मा गाँधी एक व्यापारी और पेशे से वकील थे लेकिन उनकी सादी जीवन-शैली तथा हाथों से काम करने के प्रति उनके लगाव की वजह से वे गरीब श्रमिकों के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति रखते थे तथा बदले में वे लोग गाँधी जी से सहानुभूति रखते थे।
जहाँ अधिकांश अन्य राजनीतिज्ञ उन्हें कृपा की दृष्टि से देखते थे वहीं ये न केवल उनके जैसा दिखने बल्कि उन्हें अच्छी तरह समझने और उनके जीवन के साथ स्वयं को जोड़ने के लिए सामने आते थे ।

प्रश्न 5. फरवरी 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह के अवसर पर गाँधीजी द्वारा व्यक्त विचारों की व्याख्या कीजिए। क्या वे अपने विचारों को व्यवहार में लाए? उदाहरण दीजिए।
उत्तर : (i) दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गोपाल कृष्णा गोखले ने गाँधीजी को एक वर्ष तक ब्रिटिश भारत की यात्रा करने की सलाह दी जिससे कि वे इस भूमि और इसके लोगों को जान सकें। उनकी पहली महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक उपस्थिति फरवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में हुई।
(ii) जब गाँधी जी की बोलने की बारी आई तो उन्होंने मज़दूर गरीबों की ओर ध्यान न देने के कारण भारतीय विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना निश्चय ही अत्यंत शानदार है किंतु उन्होंने वहाँ धनी व सजे-सँवरे भद्रजनों की उपस्थिति और ‘लाखों गरीब’ भारतीयों की अनुपस्थिति के बीच की विषमता पर अपनी चिंता प्रकट की।
(iii) 1916 ई. के अंतिम माह में गाँधीजी को अपने नियमों को व्यवहार में लाने का अवसर मिला। दिसंबर 1916 में लखनऊ में हुई वार्षिक कांग्रेस में बिहार में चंपारन से आए। एक किसान ने उन्हें वहाँ अंग्रेज नील उत्पादकों द्वारा किसानों के प्रति किए जाने वाले कठोर व्यवहार के बारे में बताया। यहीं से गाँधी जी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत मानी जा सकती है।
(iv) चंपारन, अहमदाबाद और खेड़ा में की गई पहल से गांधी जी एक ऐसे राष्ट्रवादी के रूप में उभरे जिनमें गरीबों के लिए गहरी सहानुभूति थी। इसी तरह ये सभी स्थानिक संघर्ष थे। इसके बाद 1919 में औपनिवेशिक शासकों ने गाँधीजी की झोली में एक ऐसा मुद्दा डाल दिया जिससे वे कहीं अधिक विस्तृत आंदोलन खड़ा कर सकते थे। 1914-18 के महान युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के कारावास की अनुमति दे दी थी।
(v) रॉलेट सत्याग्रह से ही गाँधीजी एक सच्चे राष्ट्रीय नेता बन गए। इसकी सफलता से उत्साहित होकर गाँधीजी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन की माँग कर दी।
(vi) गाँधीजी ने यह आशा की थी कि असहयोग को खिलाफत के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय-हिंदू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे।
(vii) विद्यार्थियों ने सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया। कई कस्बों और नगरों में श्रमिक-वर्ग हड़ताल पर चला गया। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुईं जिनमें 6 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान हुआ था।
(viii) असहयोग आंदोलन के दौरान हजारों भारतीयों को जेल में डाल दिया गया। स्वयं गाँधीजी को मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
1922 तक गाँधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एकदम परिवर्तित कर दिया और इस प्रकार फरवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपने भाषण में किए गए वायदे को उन्होंने पूरा किया। अब यह व्यावसायिकों व बुद्धिजीवियों का ही आंदोलन नहीं रह गया था, अब हजारों की संख्या में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया। इनमें से कई गाँधीजी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उन्हें अपना ‘महात्मा’ कहने लगे।

प्रश्न 6. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की प्रगति को 1918-1920 के दौरान प्रभावित करने वाले दो प्रमुख घटनाक्रम क्या थे ?
उत्तर : 1. 1918 ई. में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ। ब्रिटिश सरकार के भारत मंत्री एडविन मांटेग्यू तथा वायसराय लार्ड चैम्सफोर्ड ने 1918 ई. में संविधान सुधारों की एक योजना सामने रखी, जिसके आधार पर 1919 ई. का भारत सरकार अधिनियम बनाया गया। इससे सरकार भारतीयों को संतुष्ट करना चाहती थी। भारतीयों को संतुष्ट करने के प्रयास करते समय भी भारत सरकार दमन के लिए तैयार थी। मार्च, 1919 में सरकार ने केंद्रीय विधान परिषद् के एक-एक भारतीय सदस्य द्वारा विरोध के बावजूद रॉलेट एक्ट पास कर दिया। इस कानून में सरकार को अधिकार प्राप्त था कि वह किसी भी भारतीय पर मुकदमा चलाये बिना, उसे जेल में बंद कर सके तथा उसकी कोई अपील, वकील और दलील न हो। इस क़ाले कानून का सारे देश में विरोध हुआ। 1919 ई. में मार्च और अप्रैल महीने में भारत में अभूतपूर्व राजनीतिक, जागरण आया। लगभग पूरे देश में एक नई स्फूर्ति आ गई। हड़तालें, काम रोको अभियान, जुलूस, प्रदर्शन आदि होते थे हिंदू-मुस्लिम एकता के नारों से आकाश गूंजने लगा था। भारतीय जनता अब अंग्रेजों की गुलामी का जुआ उतार कर फेंकना चाहती थी
अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 ई. को बैसाखी, वाले दिन एक शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रही जनता पर जनरल डायर ने गोलियों की बौछार करवा दी। पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। चारों ओर लोग गुस्से से अपने दाँत पीस रहे थे, उन्हें अंग्रेजों के इस घृणित कृत्य पर भारी रोष था।
2.1919 ई. में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। इससे भी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को बल मिला। ब्रिटेन तथा उसके सहयोगियों ने तुर्की की उस्मानिया सल्तनत के साथ जो व्यवहार किया था और जिस तरह टुकड़े करके थ्रेस को हथिया लिया था, राजनीतिक चेतना प्राप्त मुसलमान उसके आलोचक थे। दिल्ली में नवंबर, 1919 ई. में आयोजित अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन ने फैसला किया कि अगर उनकी माँगें न मानी गईं तो वे सरकार से सहयोग करना बंद कर देंगे। इस समय मुस्लिम लीग पर राष्ट्रवादियों का नेतृत्व था। उसने राजनीतिक प्रश्नों पर राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके आंदोलन का पूरा-पूरा समर्थन किया। बाल गंगाधर तिलक और गाँधीजी जैसे नेताओं ने खिलाफत आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्ण अवसर समझा। गाँधीजी ने 1920 ई. के आरंभ में घोषणा की कि खिलाफत का प्रश्न संवैधानिक सुधारों तथा पंजाब के अत्याचारों से जुड़ी घटनाओं से अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि अगर तुर्की के साथ शांति संधि की शर्तें भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करतीं, तो वे असहयोग आंदोलन छेड़ देंगे । वास्तव में गाँधीजी खिलाफत आंदोलन के एक नेता के रूप में उभरे।
3.इस बीच सरकार ने रॉलेट एक्ट को रद्द करने, पंजाब में हो रहे अत्याचारों की भरपाई करने या राष्ट्रवादियों की स्वशासन की आकांक्षा को संतुष्ट करने से इंकार कर दिया था। जून, 1920 ई. को इलाहाबाद में सभी दलों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें स्कूलों, कॉलेजों और अदालतों के बहिष्कार का एक कार्यक्रम बनाया गया। खिलाफत कमेटी ने 31 अगस्त, 1920 ई. को एक असहयोग आंदोलन आरंभ किया। लोगों से आग्रह किया गया कि वे सरकारी शिक्षा संस्थाओं (स्कूलों और कॉलेजों), अदालतों, सरकारी कार्यालयों आदि का बहिष्कार करेंगे। विदेशी वस्त्रों तथा अन्य वस्तुओं का बहिष्कार करेंगे, सरकार से प्राप्त पद, प्रतिष्ठा-सूचक सम्मान को वापस लौटा देंगे। हाथ से कते सूत के वस्त्र पहनेंगे। कांग्रेस ने जनसाधारण को आंदोलन में शामिल करके इसे जन-आंदोलन बना दिया।

प्रश्न 7. गाँधीजी ने ऐसी आशा क्यों की थी कि असहयोग और खिलाफत को मिलकर चलाने से औपनिवेशिक शासन का भारत में अंत किया जा सकता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : गांधी जी ने यह आशा की थी कि असहयोग की खिलाफत के साथ मिलाने पर भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय हिंदू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक सत्ता का अंत कर देंगे। खिलाफत आंदोलन मुस्लिम संवेदना के आहत होने का परिणाम था। महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन के विस्तार के लिए खिलाफत को इसमें शामिल कर लिया। दोनों आंदोलन के एक साथ होने से दोनों ही समुदाय के लोग उससे जुड़ गए और आंदोलन को एक राष्ट्रीय पहचान मिली।
(i) छात्रों के सरकारी विद्यालयों एवं कॉलेजों का बहिष्कार किया।
(ii) वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया।
(iii) किसानों ने करों का भुगतान नहीं किया।
(iv) विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
(v) खादी को अपनाया गया और चरखा प्रतीक रूप से अपनाया गया।
(vi) अछूतोद्धार की दशा में रचनात्मक कार्य किए गए। प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार किया गया। आंदोलनों ने भारतीय समाज के सभी वर्गों को प्रेरित किया और उन्होंने उसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। आंदोलनों से हिंदू मुस्लिम एकता को बल मिला।

प्रश्न 8. खिलाफत आंदोलन के शुरू होने के क्या । कारण थे ? भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में उसका क्या योगदान था ?
उत्तर : खिलाफत का संबंध खलीफा से है। खलीफा सभी मुसलमानों का धार्मिक मुखिया था। तुर्की के सुल्तान को मुस्लिम. जगत् का मुखिया स्वीकार किया जाता था। युद्ध के पश्चात् राजनीतिक रूप से भारतीय मुसलमान अंग्रेजों तथा मित्र राष्ट्रों से इसलिए खिन्न थे, क्योंकि उन्होंने तुर्की के सुल्तान के साथ उचित व्यवहार नहीं किया था। उन्होंने तुर्की साम्राज्य का विभाजन भी कर दिया था और तुर्की का एक भाग (थ्रेस) भी उससे छीन लिया था। यह उस युद्ध घोषणा के विपरीत बात थी जो ब्रिटिश प्रधानमंत्री लायड जॉर्ज ने की थी। उसने घोषणा की थी कि हम तुर्की को एशिया माइनर और थ्रेस के उस भाग से वंचित नहीं कर रहे हैं जहाँ की मुख्य जनसंख्या तुर्की नस्ल से संबंधित है। मुसलमान यह नहीं चाहते थे कि तुर्की के सुल्तान के सम्मान को तनिक भी आँच आए। जब अंग्रेजों ने भारतीय मुसलमानों की आशा के विपरीत कार्य किए तो वह तुरंत संघर्ष की राह पर उतारू हो गए।
राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान (Contribution to the National Movement) : इस संघर्ष से राष्ट्रवादी आंदोलन को बड़ा बल मिला। 1916 में लखनऊ समझौते के कारण हिंदुओं तथा मुसलमानों में एकता की भावना का बीजारोपण तो हो ही चुका या परंतु अब खिलाफत आंदोलन के कारण अनेक राष्ट्रवादी नेता इसके समर्थन में उतर आए।
1.खिलाफत समिति का गठन हुआ और देशव्यापी आंदोलन आरंभ हो गया।
2.नवंबर, 1919 में दिल्ली में अखिल भारतीय खिलाफ़त सम्मेलन बुलाया गया। इसमें यह प्रस्ताव पारित किया गया कि यदि उसकी माँगें नहीं मानी गईं तो वे सरकार से हर प्रकार का सहयोग वापस ले लेंगे।
3.मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के प्रत्येक राजनीतिक आंदोलन का समर्थन किया।
4. कांग्रेसी नेताओं ने खिलाफत आंदोलन का साथ देकर हिंदू-मुस्लिम एकता को सुदृढ़ किया और मुस्लिम जनता को राष्ट्रीय आंदोलन के लिए प्रेरित किया।
5.गाँधीजी ने तो यहाँ तक भी घोषणा कर दी थी कि खिलाफत का प्रश्न सुधारों के प्रश्न से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि तुर्की के साथ किया गया शांति समझौता भारतीय मुसलमानों को संतुष्ट नहीं करेगा तो वे अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन चलाएँगे। इस तरह गाँधीजी खिलाफत आंदोलन के एक महान नेता के रूप में उभरे।
6.खिलाफत आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की गति तीव्र हुई और महात्मा गाँधी ने शीघ्र ही असहयोग आंदोलन आरंभ किया। यह अंग्रेजी साम्राज्य का अंत करने की ओर पहला कदम था।

प्रश्न 9. असहयोग आंदोलन कब प्रारंभ हुआ ? इसके कार्यक्रम अथवा उद्देश्य क्या थे? इसके महत्त्व को भी बताइए।
उत्तर : असहयोग आंदोलन 1920 में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलाया गया। यह अंग्रेजी शासन तथा सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध एक व्यापक जन प्रतिरोध था।
असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम अथवा उद्देश्य : असहयोग आंदोलन की रूपरेखा निम्न थी :(i) विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी माल का प्रयोग किया जाए।
(ii) विदेशी सरकार द्वारा दी गई उपाधियों तथा अवैतनिक पद छोड़ दिए जाएँ।
(iii) स्थानीय संस्थाओं में मनोनीत भारतीय सदस्यों द्वारा त्याग-पत्र दे दिए जाएँ।
(iv) सरकारी स्कूलों तथा सरकार से अनुदान प्राप्त स्कूलों में बच्चों को चढ़ने के लिए न भेजा जाए।
(v) विदेशी अदालतों तथा वकीलों का धीरे-धीरे बहिष्कार किया जाए।
(vi) सैनिक, क्लर्क तथा श्रमिक विदेशों से अपनी सेवाएँ अर्पित करने से इंकार कर दें।
महत्त्व : (i) असहयोग आंदोलन के कारण कांग्रेस ने सरकार से सीधी टक्कर ली।
(ii) भारत के इतिहास में पहली बार जनता ने बढ़-चढ़कर इस आंदोलन में भाग लिया।
(iii) असहयोग आंदोलन में ‘स्वदेशी’ का खूब प्रचार किया गया। फलस्वरूप देश में उद्योग धंधों का विकास हुआ। सच तो यह है कि गाँधी जी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन ने भारत के स्वाधीनता संग्राम के लिए नई दिशा प्रदान की।

प्रश्न 10. स्वराज्य पार्टी के गठन के कारणों को स्पष्ट कीजिए। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में इनकी भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. स्वराज्य पार्टी का गठन (Formation of Swarajya Party) : 1922 में असहयोग आंदोलन को एकाएक गाँधीजी द्वारा स्थगित किए जाने से भारतीय नेताओं को निराशा के साथ क्रोध भी आया। फलस्वरूप कांग्रेस दो भागों-परिवर्तनकारी (Changers) और अपरिवर्तनकारी (Non-changers) में बँट गई। परिवर्तनकारी नेता बाद में स्वराज्यवादी कहलाये । ये लोग असहयोग में विश्वास नहीं रखते थे। वे चुनाव में भाग लेकर विधानसभाओं में प्रवेश करना चाहते थे। स्वराज्यवादियों का नेतृत्व देशबंधु चितरंजनदास और मोतीलाल नेहरू ने किया। इन्होंने मार्च, 1923 ई. में स्वराज्य दल की स्थापना की। अपरिवर्तनकारी राजगोपालाचारी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके विरोधी थे।
राष्ट्रीय आंदोलन में स्वराज्य पार्टी की भूमिका (The Role of Swarajya Party in Freedom Struggle) : स्वराज्य पार्टी ने 1923 ई. में होने वाले चुनावों में भाग लिया और उसमें इस पार्टी ने अच्छी विजय प्राप्त की। इस पार्टी को केंद्रीय विधानसभा में 101 स्थानों में से 42 स्थानों पर विजय हासिल हुई। केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा में रहकर स्वराज्य पार्टी ने वायसराय से पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापना की माँग की। इसी के साथ इन्होंने बंगाल में दमनकारी अध्यादेशों की समाप्ति की भी माँग की और एक गोलमेज सम्मेलन बुलाने की माँग रखी। दल के नेता चाहते थे कि इस गोलमेज सम्मेलन में सभी वर्गों के भारतीय सम्मिलित हों और वे अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा के लिए सुझाव दें तथा भारत के लिए एक संविधान भी बनाएँ। यह दल बार-बार केंद्रीय विधानसभा का बहिष्कार करके अंग्रेजी सरकार की नीतियों का विरोध भी कर चुका था।
प्रांतीय विधानसभाओं में भी स्वराज्यवादी पार्टी को काफी अच्छी सफलता मिली थी। बंगाल और मध्य भारत में पार्टी का काफी अच्छा प्रभाव था। इन दोनों राज्यों में अंग्रेजों की द्वैध शासन प्रणाली को ठप्प कर दिया था। उन्होंने न तो अपना मंत्रिमंडल बनाया, न अंग्रेजों को मंत्रिमंडल बनाने दिया। उन्होंने अंग्रेजी शासन के काम में अड़ंगा लगाने की कोशिश की। इस कार्य में स्वराज्य पार्टी को काफी सफलता भी मिली। इस संबंध में एच. ए. ब्रेलफोर्ड ने कहा था कि स्वराज्य पार्टी की अड़ंगा लगाने की नीति बिल्कुल उचित थी, क्योंकि उसने ब्रिटिश अनुदार दल को इस बात पर कायल कर दिया कि द्वैध शासन प्रणाली अव्यवहार्य है। इसी पार्टी ने 1924 ई. में सबसे पहले मोलमेज सम्मेलन व भारत के लिए संविधान बनाने की माँग की थी। गोलमेज सम्मेलन की माँग 1930 ई. में मानी गई। इस पार्टी के दबाव के कारण ही अंग्रेजी शासन ने तुरंत साइमन कमीशन की नियुक्ति कर दी ।

प्रश्न 12. ऐसे विभिन्न स्रोतों का वर्णन कीजिए जिनसे हम गाँधीजी के राजनीतिक सफर एवं राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास को सूत्रबद्ध कर सकते हैं।
उत्तर : (i) निजी पत्र व सार्वजनिक स्वर : महात्मा गाँधी और उनके सहयोगियों व प्रतिद्वंद्वियों के लिखे पत्र और भाषण उस इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। निजी पत्रों से हमें व्यक्ति के विचारों की जानकारी प्राप्त होती है। इससे लिखने वाले का गुस्सा, पीड़ा, असंतोष और बेचैनी, आशाओं और निराशाओं का पता चलता है। इसमें व्यक्ति उन विचारों को व्यक्त कर सकता है जिन्हें वह सार्वजनिक वक्तव्यों में नहीं कर सकता। महात्मा गाँधी ‘हरिजन’ नामक अखबार में लोगों से मिलने वाले पत्र प्रकाशित करते थे। आंदोलन के दौरान नेहरू द्वारा उन्हें लिखे गए पत्रों को ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स के नाम से प्रकाशित किया ।
(ii) आत्मकथाएँ : आत्मकथाओं से हमें व्यक्ति के अतीत के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है। व्यक्ति अपनी यादों के आधार पर अपने अतीत की घटनाओं आदि का विवरण देता है परंतु आत्मकथाओं में व्यक्ति अपनी इच्छानुसार घटनाओं का वर्णन करता है; विशेष रूप से ऐसी घटनाओं का वर्णन जो उसके जीवन में महत्त्वपूर्ण थीं या औरों की दृष्टि में वह अपने आपको कैसा दर्शाना चाहता था। आत्मकथा लिखना अपनी तस्वीर बनाने का एक तरीका है। फलस्वरूप इन विवरणों को पढ़ते हुए यह देखने का प्रयास करना चाहिए जो लेखक हमें नहीं दिखाना चाहता। हमें उन चुप्पियों का कारण समझना चाहिए। इच्छित या अनिच्छित विस्मृति के उन कृत्यों को समझना चाहिए।
(iii) सरकारी रिकॉर्ड्स : सरकारी ब्यौरे अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक विशेष उद्देश्य के लिए लिखे जाते हैं, जैसे पाक्षिक रिपोर्ट एक क्षेत्र की घटनाओं तथा स्थिति का वर्णन करती है ताकि उसके आधार पर सरकार कार्रवाई कर सके। साधारणतया इस प्रकार के सरकारी ब्यौरे अर्थात् पुलिसकर्मियों तथा अन्य अधिकारियों की रिपोर्ट गोपनीय होती हैं। इनमें मिलने वाली सूचनाओं के अतिरिक्त मुख्य अधिकारी अपने विचार को भी सम्मिलित करते थे, जैसे नमक सत्याग्रह के समय अधिकारी यह मानने को तैयार नहीं थे कि गाँधीजी को व्यापक समर्थन मिलेगा। रिपोर्टों में इस यात्रा को एक नाटक, एक करतब, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आवाज उठाने के प्रति अनिच्छुक और शासन के अंतर्गत सुखी लोगों को गोलबंद करने की एक हताश कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया गया जबकि सत्य यह था कि दांडी यात्रा के साथ-साथ गाँधीजी की लोकप्रियता में वृद्धि हुई थी।

प्रश्न 13. गाँधीजी का जन अनुरोध भारतीय राजनीति के संदर्भ में नि:संदेह कपट से मुक्त था तथा उसने राष्ट्रवाद के आधार के विस्तार में उनकी सफलता में योगदान दिया। कैसे ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर : इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय राजनीति के संदर्भ में गाँधीजी का जन अनुरोध कपट से मुक्त था। इस बात ने राष्ट्रवाद के आधार को व्यापक बनाने में उन्हें बहुत अधिक सहयोग दिया। इस बात के पक्ष में निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं :
(i) 1922 तक गाँधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया। अब राष्ट्रीय आंदोलन केवल व्यवसायियों तथा बुद्धिजीवियों का ही आंदोलन नहीं रह गया था। अब इसमें हजारों की संख्या में किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी भाग लेना शुरू कर दिया।
(ii) साधारण लोगों के साथ गाँधीजी की पहचान उनके वस्त्रों में विशेष रूप से दिखाई देती थी। जहाँ अन्य राष्ट्रवादी नेता पश्चिमी शैली के सूट अथवा भारतीय बंद गला जैसे औपचारिक वस्त्र पहनते थे, वहीं गाँधीजी लोगों के बीच एक साधारण धोती में जाते थे।
(iii) गाँधीजी जहाँ भी जाते थे वहीं उनकी चमत्कारिक शक्तियों की अफवाहें फैल जाती थीं। कुछ स्थानों पर यह कहा गया कि उन्हें राजा द्वारा किसानों के कष्टों को दूर करने के लिए भेजा गया और उनके पास सभी स्थानीय अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत कर देने की शक्ति है। कुछ अन्य स्थानों पर यह दावा किया गया कि गाँधीजी की शक्ति ब्रिटिश सम्राट से उत्कृष्ट है और उनके आने से औपनिवेशिक शासक जिले से भाग जाएँगे। इन अफवाहों ने गाँधीजी की लोकप्रियता को घर-घर तक पहुँचा दिया।
(iv) गाँधीजी गरीब किसानों से अत्यधिक सहानुभूति रखते थे। दूसरी ओर गरीब किसान उनकी ‘महात्मा’ के समान पूजा करते थे।
(v) महात्मा गाँधी अपने प्रयत्नों से राष्ट्रवाद के आधार को और अधिक व्यापक बनाने में सफल रहे। उनके नेतृत्व में भारत र के विभिन्न भागों में कांग्रेस की नई शाखाएँ खोली गई। रजवाड़ों री में राष्ट्रवादी सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए ‘प्रजा मंडलों’ की स्थापना की गई।
(vi) गाँधीजी ने राष्ट्रवादी संदेश का प्रसार अंग्रेजी भाषा की बजाय मातृभाषा में करने को प्रोत्साहन दिया। इस प्रकार कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं की बजाय भाषाई क्षेत्रों पर आधारित थीं। इन अलग-अलग तरीकों से राष्ट्रवाद देश के कोने-कोने में फैल गया।
(vii) 1917 और 1922 के बीच भारतीयों के एक बहुत ही प्रतिभाशाली वर्ग ने स्वयं को गाँधीजी से जोड़ लिया। इनमें महादेव देसाई, वल्लभभाई पटेल, जे.बी. कृपलानी, सुभाषचंद्र बोस, अबुल कलाम आजाद, जवाहरलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत और सी. राजगोपालाचारी शामिल थे।
(viii) गाँधी जी द्वारा हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल देने से भी राष्ट्रवाद का आधार मजबूत हुआ।

प्रश्न 14. निजी पत्रों और आत्कथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है ? ये स्रोत सरकारी व्यौगें से किस तरह भिन्न हैं ?
उत्तर : निजी पत्रों तथा आत्मकथाओं से हमें संबंधित व्यक्ति की रुचियों तथा व्यक्तित्व का पता चलता है।
आत्मकथाएँ : आत्मकथाएँ हमें उस अतीत का ब्यौरा भी देती हैं जो काफी समृद्ध होती हैं। परन्तु यहाँ भी हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम आत्मकथाओं को किस दृष्टि से पढ़ते हैं और उनकी कैसे व्याख्या करते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि ये आत्मकथाएँ प्रायः स्मृति के आधार पर लिखी गई होती हैं। उनसे हमें पता चलता है कि लिखने वाले को क्या याद रहा, उसे कौन-सी बातें महत्त्वपूर्ण दिखाई दीं या फिर वह क्या याद रखना चाहता था। वास्तव में आत्मकथा लिखना लोगों में अपनी छवि गढ़ने का एक तरीका है। फलस्वरूप, इन विवरणों को पढ़ाते समय हमें वह देखने का प्रयास करना चाहिए कि लेखक हमें क्या नहीं दिखाना चाहता और इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं।
निजी पत्र : व्यक्तिगत पत्र हमें व्यक्ति के निजी विचारों से परिचित करवाते हैं। इन पत्रों में हमें लिाने वाले के क्रोध और पीड़ा, असंतोष और बेचैनी, आशाओं और हताशाओं का पता चलता है। इनमें से बहुत-सी बातों को वे सार्वजनिक नहीं कर सकते परन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कई बार निजी-सार्वजनिक का यह अंतर मिल जाता है। बहुत से पत्र व्यक्तियों को लिखे जाते हैं इसलिए वे व्यक्तिगत पत्र होते हैं, परन्तु कुछ हद तक वे जनता के लिए भी होते हैं। इन पत्रों की भाषा इस बात से भी तय होती है कि संभव है कि एक दिन उन्हें प्रकाशित कर दिया जाएगा। किसी पत्र के प्राकशित हो जाने की आशंका में प्राय: लोग निजी क्षेत्रों में भी अपना मत स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त नहीं करते। महात्मा गाँधी अपने अखबार (हरिजन) नामक में उन पत्रों को प्रकाशित करते थे जो उन्हें लोगों से मिलते थे। नेहरू ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उन्हें लिखे गए पत्रों का एक संकलन तैयार किया और उसे ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स के नाम से प्रकाशित किया।
सरकारी रिकॉर्ड्स : औपनिवेशिक शासक ऐसे तत्वों पर सदा कड़ी नजर रखते थे जिन्हें वे अपने विरुद्ध मानते थे। इस दृष्टि से सरकारी ब्यौरे भी हमारे अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। उस समय पुलिसकर्मियों तथा अन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र तथा रिपोर्टे गोपनीय होती थीं; परन्तु अब ये दस्तावेज अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं जिन्हें कोई भी देख सकता है।
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों से गृह विभाग द्वारा तैयार की जाने वाली पाक्षिक रिपोर्ट (हर पंद्रह दिन या हर पखवाड़े में तैयार होने वाली रिपोर्ट) इस दिशा में काफी महत्त्वपूर्ण रही हैं। ये रिपोर्ट स्थानीय प्रदेशों से पुलिस के माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं पर आधारित होती थीं परन्तु उनमें यह भी दिखाई दे जाता था कि बड़े अधिकारी क्या देखते थे या क्या मानना चाहते थे। राजद्रोह की संभावना होते हुए भी वे स्वयं को इस बात का आश्वासन देना चाहते थे कि ये आशंकाएँ आधारहीन हैं।

प्रश्न 15. 1935 के अधिनियम में प्रस्तावित प्रांतीय स्वायत्तता का अर्थ स्पष्ट कीजिए। 1935 के अधिनियम के प्रस्तावों के प्रति कांग्रेस के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1919 ई. के एक्ट की कमियों को पूरा करने के लिए 1935 ई. को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास किया गया। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं
1.इस एक्ट के अनुसार सभी प्रांतों तथा रियासतों को मिलाकर संघ सरकार बनाये जाने की व्यवस्था थी।
2.संघ विधान मंडल में दो सदन बनाये गये।
(i) राज्य परिषद् जिसमें कुल 260 सदस्य होते थे, जो 156 प्रांतों, 104 रियासतों का प्रतिनिधित्व करते थे।
(ii) दूसरा सदन विधानसभा था, जिसमें कुल 375 सदस्य होते थे, जिनमें 250 प्रांतों तथा 123 रियासतों के सदस्य थे।
3.केंद्रीय कार्यकारिणी में दोहरी शासन व्यवस्था रखी गई। दूसरे शब्दों में कुछ विषय वायसराय और उसकी कौंसिल को सौंप दिये गये। शेष विषय भारतीय मंत्रियों को दे दिए गये। इन मंत्रियों को केंद्रीय विधानमंडल के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
4.बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रांत, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और उड़ीसा, इन सब में एक एक सदन था, जिसे विधानसभा कहा जाता था।
5.प्रांतीय विधानमंडल की सदस्य संख्या बढ़ा दी गई। यह भी निर्णय लिया गया कि सभी सदस्यों का चुनाव हुआ करंगा।
6.दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई, जो ब्रिटिश प्रांतों तथा रियासतों में होने वाले झगड़ों आदि का निपटारा कर सके।
कांग्रेस का दृष्टिकोण (Attitude of the Congress) : 1935 ई. का अधिनियम केवल कागजी घोड़ा मात्र सिद्ध हुआ क्योंकि जिस उत्तरदायी सरकार को अस्तित्व में लाने के लिए केंद्रीय सरकार के अधीन ब्रिटिश प्रांत तथा रियासतें आने वाली थीं, वे न आ सकीं। प्रांतीय क्षेत्रों के गवर्नरों को अभी वे सारी शक्तियाँ प्राप्त थीं, जिन पर अंकुश आवश्यक समझा गया था।
अतः हम कह सकते हैं कि संवैधानिक सुधारों के नाम पर 1919 ई. का अधिनियम तथा 1935 ई. का अधिनियम एक छलावा मात्र था। केवल कुछ शक्तियों के हेर-फेर से उस कानून का रूप तो बदला हुआ दिखाई देता था, परंतु उसकी वास्तविक शक्तियाँ तो अंग्रेजों के पास ही थीं। उन्हें ही उन शक्तियों का पात्र समझा जाता था। उत्तरदायी सरकार का तो केवल बहाना मात्र ही था। साम्राज्यवादी अंग्रेज भलीभाँति समझते थे कि बार-बार शब्द जाल में भारतीयों को उलझाया जा सकता था।

प्रश्न 16. अगस्त, 1947 के बाद सांप्रदायिक सौहार्द लाने में गाँधीजी के प्रयासों को स्पष्ट कीजिए। उनकी मृत्यु पर जनता में क्या प्रतिक्रिया हुई ?
उत्तर : (i) 15 अगस्त, 1947 के राजधानी में हो रहे उत्सवों में महात्मा गाँधी नहीं थे। उस समय वे कलकत्ता (कोलकाता) में थे लेकिन उन्होंने वहाँ भी न तो किसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया, न ही कहीं झंडा फहराया। गाँधीजी उस दिन 24 घंटे के लिए उपवास पर थे।
(ii) बहुत सारे विद्वानों ने स्वतंत्रता बाद के महीनों को गाँधीजी के जीवन का “श्रेष्ठतम क्षण” कहा है। बंगाल में शांति स्थापना के लिए अभियान चलाने के बाद गाँधीजी दिल्ली आ गए।
(iii) गाँधीजी ने स्वतंत्र और अखंड भारत के लिए जीवन भर युद्ध लड़ा। फिर भी, जब देश विभाजित हो गया तो उनकी यही इच्छा थी कि दोनों एक-दूसरे के साथ सम्मान और दोस्ती के संबंध बनाए रखें।
(iv) बहुत सारे भारतीयों को उनका यह सहृदय आचरण पसंद नहीं था। 30 जनवरी की शाम को गाँधीजी की दैनिक प्रार्थना सभा में एक ऐसे ही युवक ने उनको गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया। उनके हत्यारे ने कुछ समय बाद आत्मसमर्पण कर दिया। वह नाथूराम गोडसे नाम का ब्राह्मण था। पुणे का रहने वाला गोडसे एक चरमपंथी हिन्दुत्ववादी अखबार का संपादक था।
(v) गाँधीजी की मृत्यु के कारण संपूर्ण देश में सर्वत्र उदासी एवं दु:ख व्याप्त हो गया। लोग फूट-फूट कर रोने लगे। सभी ने उनके योगदान को याद किया तथा करोड़ों लोगों ने विश्व भर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थनाएँ आयोजित की गई। गाँधीजी की गहनता से अभिव्यक्ति के लिए एक तत्कालीन महान वैज्ञानिक ने कहा, “शायद कुछ वर्षों के उपरांत लोगों को यह विश्वास ही नहीं होगा कि गाँधी जैसे महान व्यक्ति भी कभी इस देश में पैदा हुए थे, क्योंकि यह दुनिया स्वार्थी नेताओं से भरी पड़ी है।”

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