Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 14 Important Question Answer 3 Marks विभाजन को समझना राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 1. भारत में मुस्लिम लीग की स्थापना के क्या कारण थे ? इसकी स्थापना में अंग्रेजों की ‘विभाजन एवं शासन करो’ की नीति का क्या योगदान था ?
उत्तर : भारत में मुस्लिम लीग की स्थापना के मुख्य कारण निम्नलिखित थे :(i) उच्च वर्ग के मुसलमान अभी तक यह नहीं भूले थे कि मुसलमानों ने वर्षों तक भारत पर शासन किया है परन्तु अंग्रेजी शासन काल में उनके सभी अधिकार छिन गए थे। वे अपनी संस्था स्थापित करके फिर से प्रभावशाली स्थान प्राप्त करना चाहते थे।
(ii) अलीगढ़ में मुहम्मडन ऐंग्लो ओरियंटल कॉलेज के मुस्लिम । छात्रों को अंग्रेज प्रिंसिपल हिंदुओं के विरुद्ध भड़काते रहते थे।
(iii) मुस्लिम लीग की स्थापना का एक और मुख्य कारण भी विभाजन एवं शासन करो’ की नीति थी। इस नीति पर चलते हुए उन्होंने मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया। उन्होंने बताया कि कांग्रेस एक हिंदू संस्था है और वह मुस्लिम हितों के बारे में नहीं सोच सकती। अंग्रेजों की यह नीति सफल रही तथा मुसलमानों ने अपनी एक अलग संस्था बनाने का निश्चय कर लिया। यह संस्था 1906 ई. में मुस्लिम लीग के रूप में अस्तित्व में आई।

प्रश्न 2. भारत के विभाजन का बंगाल और पंजाब पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर : विभाजन के बंगाल पर प्रभाव : (i) देश के अन्य भागों की तुलना में बंगाल में यह पलायन लंबे समय तक चलता रहा। (ii) पंजाब के विपरीत, बंगाल में धर्म के आधार पर आबादी का बँटवारा भी उतना स्पष्ट नहीं था। (iii) बहुत -सी बंगाली हिंदू पूर्वी पाकिस्तान में जबकि बहुत-से बंगाली मुसलमान पश्चिम बंगाल में ही रुके रहे। (iv) अंततः बंगाली मुसलमानों (पूर्वी बंगाल के मुसलमान) ने पहल की और इस सिद्धांत को नकारते हुए पाकिस्तान से अलग होने का निर्णय लिया। इस प्रकार 1971-72 में बांग्लादेश की स्थापना हुई। धार्मिक एकता पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को एक-दूसरे से जोड़कर नहीं रख पाई।
विभाजन के पंजाब पर प्रभाव : (i) विभाजन का सबसे खूनी और विनाशकारी रूप पंजाब में सामने आया। (ii) पश्चिमी पंजाब से लगभग सभी हिंदुओं और सिखों को भारत की ओर तथा लगभग सभी पंजाबी भाषी मुसलमानों को पाकिस्तान की ओर हाँक दिया गया। (iii) यह सब कुछ 1946 से 1948 के बीच, मात्र दो साल में हो गया। इस प्रक्रिया में भीषण रक्तपात हुआ, अग्नि तथा लूटपाट की घटनाएँ हुईं तथा महिलाओं से शर्मनाक बलात्कार हुए।

प्रश्न 3. बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में सांप्रदायिक अस्मिताएँ राजनीतिक कारणों के अतिरिक्त किन कारणों से पक्की हुईं ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में सांप्रदायिक अस्मिताएं कई और कारणों से भी पक्की हुईं। 1920 से 1930 तक अन्य और कई घटनाओं के कारण बहुत से तनाव उभरे। सांप्रदायिक दंगे कई बार भड़के। इन दंगों में कई लोगों की जान गई। सम्पत्ति की हानि हुई, महिलाओं व बच्चों पर अत्याचार हुए। अनेक हिन्दू संगठनों ने शुद्धिकरण और मुस्लिम संगठनों ने तबलीग (प्रचार) आंदोलन शुरू किया। गौ-हत्या का जमकर विरोध किया गया, आर्य समाज ने शुद्धि की कोशिशें की। अब हिन्दी हिन्दुओं की व उर्दू मुसलमानों की भाषा बन गई। नमाज़ के वक्त मस्जिद के सामने संगीत बजाने को नमाज़ में मुसलमान खलल मानते थे, उन्हें. ऐसे वक्त गुस्सा आना स्वाभाविक था । धीरे-धीरे लोग अपने-अपने समुदायों व संगठनों में एकत्रित होकर एक दूसरे को संगठनों के विरुद्ध भड़काते हुए एकजुट होने लगे जिससे जगह-जगह दंगे भड़कने लगे। इस प्रकार सांप्रदायिक दंगों से एक दूसरे के प्रति द्वेष बढ़ता गया और हिंसा की आग फैलती गई। हिन्दू मुसलमानों को अपना विरोधी समझकर उनके खिलाफ रहे और मुसलमान हिन्दुओं को विरोधी मानकर उनके खिलाफ रहे जिससे सांप्रदायिकता भड़कती रही।

प्रश्न 4. भारत के विभाजन को सूत्रबद्ध करने में संस्मरणों और मौखिक वृत्तांतों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर : मौखिक इतिहास से विशेषकर भारतीय बँटवारे से संबंधित पहलुओं के जानने में अनेक प्रकार से बड़ी सहायता मिलती है।
(i) मौखिक इतिहास के फायदे-वृत्तांत, संस्मरण डायरियाँ, पारिवारिक, इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे आदि विभाजन के दौरान आम लोगों की कठिनाइयाँ, मुसीबतों को समझने में हमारी विशेष सहायता करते हैं।
(ii) जनसाधारण के लिए यह बँटवारा केवल एक संवैधानिक विभाजन या फिर कांग्रेस-मुस्लिम लीग का आपसी टकराव मात्र या ब्रिटिश सरकार का राजनीतिक पचड़ा आदि नहीं था। इसने तो उनके अस्तित्व को हिलाकर रख दिया था जितना ब्यौरा वे खुद दे सकते हैं और कोई नहीं इसलिए यह मौखिक इतिहास उनकी पीड़ा, वास्तविकता और कठिनाइयों को व्यक्त कर सकता है और कोई स्रोत नहीं।
(iii) व्यक्तिगत स्मृतियों की, जो मौखिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अंग है, अपनी खूबी यह है कि उनमें हमें विभिन्न लोगों के अनुभवों और स्मृतियों को और बारीकी से समझने का मौका मिलता है। इससे इतिहासकारों को बँटवारे से संबंधित लोगों की कठिनाइयों की एक बहुरंगी और सजीव तस्वीर देखने को मिलती है।
(iv) सरकारी दस्तावेजों से ऐसी व्यक्तिगत और सजीव जानकारियाँ प्राप्त करना असंभव है। सरकारी दस्तावेज तो सरकारी अधिकारियों के नीतिगत निजी विचारों से प्रभावित होते हैं। उनमें बारीकी से लोगों की व्यक्तिगत कठिनाइयों और पीड़ा को नहीं जाना जा सकता। उनसे सरकारी नीतयों का तो पता चल जायेगा परंतु उन नीतियों से प्रभावित होने वाले लोगों के रोजमर्रा के हालात और अनुभवों के बारे में खास पता नहीं चलता।

प्रश्न 5. विभाजन के खिलाफ महात्मा गाँधी की दलील क्या थी ?

अथवा

बँटवारे के विरुद्ध गाँधीजी के विचारों की समीक्षा कीजिए ।
उत्तर : महात्मा गाँधी धार्मिक सद्भावना में विश्वास रखते थे और सभी संप्रदायों की एकता के समर्थक थे। इसलिए वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे वे नहीं चाहते थे कि सदियों से एक साथ रहने वाले हिंदू-मुस्लिम भाई एक-दूसरे से बिछुड़ जाएँ। वह कहा करते थे कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। अतः उन्होंने समझौता करने के अपने प्रयास अंत तक जारी रखे परन्तु लूटमार, रक्तपात, अपहरण आदि की घटनाओं ने वातावरण को पूरी तरह दूषित कर दिया। ऐसे में विभाजन के विरोधी कांग्रेस के सभी नेताओं ने विभाजन के निर्णय को स्वीकार कर लिया। इससे गाँधीजी को गहरा आघात पहुँचा परन्तु वे विवश थे। अतः उन्हें भी बुझे मन से विभाजन को स्वीकार करना पड़ा।

प्रश्न 6. भारतीय राजनीति पर कैबिनेट मिशन प्रस्तावों के पड़े प्रभाव का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
उत्तर : ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तावित कैबिनेट मिशन 29 मार्च, 1946 को नई दिल्ली आया। इसमें ब्रिटिश कैबिनेट के तीन मंत्री-सर पैथिक लारेंस (भारत विषयक सचिव), सर स्टेफोर्ड क्रिप्स (व्यापार बोर्ड के अध्यक्ष) तथा लार्ड ए. वी. एलेक्जेंडर (नौसेना विभाग प्रमुख) शामिल थे। कैबिनेट मिशन का उद्देश्य सता हस्तांतरण के तरीके को प्रस्तावित करना, संविधान निर्मात्री सभा के गठन के लिए उपाय सुझाना तथा साथ ही अन्तरिम सरकार का गठन करना था। कैबिनेट मिशन ने 16 मई, 1946 को अपने प्रस्तावों की घोषणा की। इन प्रस्तावों में सर्वाधिक विवादास्पद प्रस्ताव प्रांतों का वर्गीकरण था। यह मुख्य रूप से मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने के लिए किया गया था ताकि उन्हें मुस्लिम बहुल प्रांतों में प्रायः पूर्ण स्वायत्तता का उपभोग करने के लिए ‘पाकिस्तान का सत्व’ प्राप्त हो सके। कांग्रेस ने संविधान सभा से संबंधित प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि मुस्लिम लीग को उसमें असंगत प्रतिनिधित्व दिया गया था मुस्लिम लीग ने पहले तो 6 जून, 1946 को कैबिनेट मिशन योजना स्वीकार कर ली, लेकिन 29 जुलाई, 1946 को उसने अपनी स्वीकृति वापस ले ली। फिर लीग ने पाकिस्तान की प्राप्ति के लिए सीधी कार्यवाही का सहारा लेने के लिए मुसलमानों का आह्वान किया। फलतः सांप्रदायिक दंगे हुए और विभाजन अपरिहार्य दिखाई देने लगा और एक वर्ष बाद ही भारत का विभाजन हो गया।

प्रश्न 7. कैबिनेट मिशन भारत क्यों आया ? इसके क्या सुझाव थे ? भारत की राजनीति पर इनका क्या प्रभाव पड़ा ?

अथवा

1946 में कैबिनेट मिशन द्वारा सुझाई गई योजना की समीक्षा कीजिए तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने कैबिनेट मिशन की सिफारिशों को क्यों ठुकरा दिया ? कारण स्पष्ट कीजिए।

अथवा

1946 के कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों की आलोचनात्मक परख कीजिए।
उत्तर : कैबिनेट मिशन मार्च 1946 में मुस्लिम लीग की माँग (पाकिस्तान.की) का अध्ययन करने तथा स्वतंत्र भारत के लिए एक उचित राजनीतिक रूप-रेखा सुझाने के लिए दिल्ली आया। तीन सदस्यीय इस मिशन ने तीन महीने तक भारत का दौरा किया और निम्नलिखित सुझाव दिए
(i) भारत एक ढीला-ढाला त्रिस्तरीय महासंघ होगा। इसमें भारत एकीकृत ही रहने वाला था परन्तु उसकी केंद्रीय सरकार काफी कमजोर होती जिसके पास केवल विदेश, रक्षा और संचार का जिम्मा ही होता।
(ii) संविधान सभा का चुनाव करते हुए वर्तमान प्रांतीय सभाओं को तीन भागों में समूहबद्ध किया जाना था : हिंदू-बहुल प्रांतों को समूह ‘क’, पश्चिमोत्तर मुस्लिम बहुल प्रांतों को समूह ‘ख’ और पूर्वोत्तर (असम सहित) के मुस्लिम-बहुल प्रांतों को समूह ‘ग’ में रखा गया था।

प्रश्न 8. भारत के विभाजन के काल में आम लोगों के दर्दनाक अनुभवों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : (i) बँटवारे के दौरान चारों तरफ हिंसा का दौर था जिसमें लाखों लोग मारे गए और बेघर हुए। लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को सरहद के इस पार या उस पार जाना पड़ा। लोग परिवार के सदस्यों और दोस्तों से बिछुड़ गए। वे अपनी जड़ों, मकानों, खेतों और कारोबार से वंचित हो गए। अपनी स्थानीय व क्षेत्रीय संस्कृतियों से वंचित होकर लोगों को दोबारा तिनकों से अपनी जिंदगी खड़ी करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
(ii) बँटवारे के दौरान यह भय, कि शत्रु औरतों की इज्जत को नापाक कर सकता है, के कारण औरतों को मार डाला गया। उदाहरणतया रावलपिंडी जिले के थुआ खालसा गाँव में 90 औरतों ने “दुश्मनों” के हाथों में पड़ने की बजाय “अपनी मर्जी से ” कुएँ में कूदकर अपनी जान दे दी थी।
(iii) विभाजन के समय को 16 माह का गृहयुद्ध कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि सरहद के दोनों तरफ पूरी-पूरी जनसंख्या लोगों का दुश्मनों की तरह सफाया करने पर उतारू थी। लोगों ने इस घटना को “माशल लॉ” (मार्शल लॉ), “मारामारी” और “रौला” या हुल्लड की संज्ञा दी। कुछ विद्वानों ने इसे महाध्वंस (होलोकॉस्ट) कहा जो कि इसकी सामूहिक जनसंहार की भयानकता को दर्शाता है।

प्रश्न 9. भारत में 1937 के प्रांतीय चुनावों के परिणामों की परख कीजिए।
उत्तर : (i) 1937 में पहली बार प्रांतीय संसदों के गठन के लिए चुनाव कराए गए। इन चुनावों में मताधिकार केवल 10 से 12 प्रतिशत लोगों को ही प्राप्त था।
(ii) इन चुनावों में कांग्रेस के लिए परिणाम अच्छे रहे। उसने 11 में से 5 प्रांतों में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और 7 में अपनी सरकारें बनाई परंतु मुसलमानों के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा । मुस्लिम लीग भी इन क्षेत्रों में बहुत अच्छे परिणाम नहीं दिखा पाई। उसे इस चुनाव में कुल मुस्लिम मतों का केवल 4.4 प्रतिशत भाग ही प्राप्त हुआ। उत्तर-पश्चिम सीमा-प्रांत में उसे एक भी सीट नहीं मिली। पंजाब की 84 आरक्षित सीटों में से केवल 2 सीटें प्राप्त हुईं और सिंध में 33 में से केवल 3।
(iii) संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी परंतु वहाँ कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त था। इसलिए उसने लीग की इस माँग को ठुकरा दिया। कुछ विद्वानों का मत है कि इससे लीग के सदस्यों के मन में यह बात घर कर गई कि यदि भारत अविभाजित रहा तो अल्पसंख्यक मुसलमानों के हाथ में राजनीतिक सत्ता कभी नहीं आ पाएगी।
ऐसी सोच के पीछे लीग की यह धारणा थी कि मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व कोई मुस्लिम पार्टी ही कर सकती है, कांग्रेस नहीं, क्योंकि कांग्रेस को वे एक हिंदू दल मानने लगे थे परंतु जिन्ना की यह जिद कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का “एकमात्र प्रवक्ता” माना जाए। उस समय यह बहुत कम लोगों को स्वीकार थी।

प्रश्न 10. कांग्रेस मंत्रालयों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य की खाई को कैसे और गहरा कर दिया? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1937 में प्रांतीय चुनाव और कांग्रेस मंत्रालय : (i) प्रांतीय विधायिकाओं के गठन के लिए 1937 में पहली बार चुनाव कराए गए। इन चुनावों में मताधिकार केवल 10 से 12 प्रतिशत लोगों के पास था। इन चुनावों में कांग्रेस के परिणाम अच्छे रहे। उसने 11 में से 5 प्रांतों में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और 7 में अपनी सरकारें बनाई। मुसलमानों के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा परंतु मुस्लिम लीग भी इन क्षेत्रों में बहुत अच्छा नहीं कर पाई।
(ii) संयुक्त प्रांत (वर्तमान में उत्तर प्रदेश) में मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी परंतु यहाँ कांग्रेस का पूर्ण बहुमत था, इसलिए उसने लीग की इस माँग को ठुकरा दिया।
(iii) कांग्रेस मंत्रालयों ने भी इस खाई को और गहरा कर दिया। संयुक्त प्रांत में पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाने के बारे में मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि मुस्लिम लीग जमींदारी प्रथा का समर्थन करती प्रतीत होती थी, जबकि कांग्रेस उसको समाप्त करना चाहती थी।
पाकिस्तान का प्रस्ताव (The Pakistan Resolution): पाकिस्तान की स्थापना की माँग धीरे-धीरे ठोस रूप ले रही थी।
23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल इलाकों के लिए सीमित स्वायत्तता की माँग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया। इस अस्पष्ट से प्रस्ताव में कहीं भी विभाजन या पाकिस्तान का उल्लेख नहीं था बल्कि इस प्रस्ताव को लिखने वाले पंजाब के प्रध नमंत्री और यूनियनिस्ट पार्टी के नेता सिंकदर हयात खान ने 1 मार्च 1941 को पंजाब असेम्बली को संबोधित करते हुए घोषणा की थी कि वह ऐसे पाकिस्तान की अवधारणा का विरोध करते हैं जिसमें “यहाँ मुस्लिम राज और बाकी जगह हिंदू राज होगा….”

प्रश्न 11. सन् 1942 से 1947 तक भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की प्रमुख विशेषताओं की समीक्षा कीजिए।
उत्तर : 1. सन् 1942 से 1947 तक की अवधि के बीच राष्ट्रीय आंदोलन ने और उग्र रूप धारण कर लिया। इसी बीच सन् 1939 से 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा गया। क्रिप्स मिशन 1942 और कैबिनेट मिशन 1945 में भारत आये। इसी अवधि अर्थात् 1942 में जापान भारत की सीमाओं तक आ पहुँचा। सन् 1942 में भारतीय नेताओं ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ छेड़ दिया। क्रुद्ध जनता ने भारी मात्रा में सरकारी सम्पत्ति को हानि पहुँचाई। अंग्रेजी सरकार ने प्रदर्शनकारियों को शक्ति से दबाया, परंतु वे समझ गये कि अब उनके भारत में रहने के दिन समाप्त हो गये हैं।
2.अंग्रेजों के विरुद्ध सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया गया। इस सेना ने जापानी सैनिकों से मिलकर बर्मा की ओर से भारत पर धावा बोल दिया परन्तु दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों व उनके मित्र राष्ट्रों को विजय मिली। इससे विवश होकर आजाद हिन्द फौज को हथियार डालने पड़े।
3.सन् 1945 में जब दूसरा महायुद्ध समाप्त हुआ तब इंग्लैंड में भी सरकार में परिवर्तन हो गया था। यह सरकार लेबर पार्टी की थी जो भारत को स्वतंत्रता दिलाने के पक्ष में थी। इसलिये उसने कैबिनेट मिशन जैसे अनेक मिशन भारत भेजे जिससे कि भारत को स्वतंत्र कराने की परिस्थितियों का अध्ययन कराया जा सके।
इस प्रकार 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिल गई।

प्रश्न 12. बंगाल में पलायन अधिक लम्बे समय तक कैसे चलता रहा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः (i) प. पंजाब से और सिखों की लगभग पूरी आबादी 1946 से 1948 के बीच भारत चली गई।
(ii) भारत के विभिन्न हिस्सों तथा यू.पी. और बिहार से मुस्लिम परिवार वर्ष 1950 और 1960 में पाकिस्तान चले गए।
(iii) लेकिन बंगाल में जनसंख्या की अदला बदली पंजाब की तरह नहीं थी, बहुत से हिन्दू परिवारों ने पूर्वी पाकिस्तान में रहना पसंद किया और बहुत से बंगाली मुसलमान पश्चिम बंगाल में बने रहे।
(iv) अन्तत: यह पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली मुसलमान ही थे जिन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद को नकार दिया और पाकिस्तान से अलग होकर बांगलादेश का निर्माण किया।

प्रश्न 13. उन तीन समूहों के बारे में संक्षेप में लिखिए जिनके विषय में 1946 में भारतीय संघ के बारे में कैबिनेट मिशन ने प्रस्ताव रखा था।
उत्तर : (i) मानचित्र में 1941 के जनगणना के आधार पर मुस्लिम बहुल अर्थात् यहाँ मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक थी अर्थात् पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल तथा सिंध ऐसे क्षेत्र माने गए।
(ii) 1941 में वे सभी क्षेत्र जहाँ बड़ी संख्या में हिंदू रहते थे, भारत में माने गए। इनमें केरल और कुछ क्षेत्र देसी राज्यों को छोड़कर लगभग सारा उत्तरी भारत और अधिकांश दक्षिण भारत जिसमें महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश उड़ीसा,बिहार और उत्तर प्रदेश शामिल था।
(iii) मानचित्र में जो देसी रियासतों के क्षेत्र को कैबिनेट मिशन ने कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए वस्तुतः ब्रिटिश सरकार उन्हें अपना प्रिय मानती थी और उन्हें वह तीन विकल्प-स्वयं स्वतंत्र रहें, पाकिस्तान में मिलें या भारतीय संघ में शामिल हो जाएँ देना चाहती थी।

प्रश्न 14. सन् 1947 में स्वतंत्र भारत की प्रमुख समस्याओं का विश्लेषण कीजिए, जिनका उसे सामना करना पड़ा।
उत्तर : 1. सन् 1947 में स्वतंत्र भारत के सामने समस्याओं का पर्वत खड़ा था। इनमें सबसे अधिक गम्भीर समस्या थी-शरणार्थी लोगों के रहने और उनके खाने का प्रबंध। लाखों की संख्या में हिन्दू घर द्वार छोड़कर पाकिस्तान से भारत आये थे। उनके रोजगार की भी गम्भीर समस्या थी। भारत की आर्थिक दशा इतनी कमजोर थी कि वह अंग्रेजों द्वारा बिगड़ी हुई कृषि व्यवस्था को इतनी तेजी से नहीं सुधार सकती थी कि सभी लोगों के लिए अनाज का प्रबन्ध हो सके।
2.देश में शांति व्यवस्था कायम करना भी जरूरी था जिससे लोगों में सद्भावना उत्पन्न हो क्योंकि लोग सांप्रदायिकता से बुरी तरह प्रभावित हो चुके थे।
3.देशी राज्यों के पुनर्गठन की समस्या भी बड़ी गम्भीर थी क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें स्वतंत्र करते हुए स्पष्ट कहा था कि वे चाहें तो पाकिस्तान में मिलें अथवा भारत में, अतः उन पर कोई बाहरी दबाव नहीं डाला जाएगा। हैदराबाद जूनागढ़ जैसे भारत के अन्दरूनी भागों में भी देशी राज्य थे, उन्हें पाकिस्तान से मिलने की इच्छा देखकर भारत के नेताओं को चिन्ता हुई। अतः सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे लौह पुरुष ने इस समस्या का समाधान बड़ी तत्परता से किया।

प्रश्न 15. भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की दरार अभी तक नहीं भर पाई। क्यों ?
उत्तर : भारत में पाकिस्तान से और पाकिस्तान में भारत से घुणा करने वाले दोनों ही समुदाय बँटवारे की उपज हैं। कई बार गलतफहमी में लोग यह सोचते हैं कि भारतीय मुसलमानों की वफादारी पाकिस्तान के साथ है। उनकी इस कथित गैर-भारतीय, अखिल इस्लामी निष्ठा की धारणा के साथ कई और भी आपत्तिजनक विचार जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए कई लोगों को लगता है कि मुसलमान क्रूर, कट्टर और गंदे होते हैं। वे आक्रमणकारी हमलावरों के वंशज हैं जबकि हिंदू दयालु, उदार, शुद्ध और हमलों के शिकार लोगों के वंशज हैं। पत्रकार आर.एम. मर्फी ने अपने अध्ययन में दिखाया है कि पाकिस्तान में भी इस तरह की रूढ़ छवियों (stereotypes) की कमी नहीं है । उनका कहना है कि कुछ पाकिस्तानियों को लगता है कि मुसलमान निष्पक्ष, वीर, एकेश्वरवादी (एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाले) और मांसाहारी होते हैं जबकि हिंदू काले, कायर, बहु ईश्वरवादी तथा शाकाहारी होते हैं। भले ही इनमें से कुछ छवियाँ विभाजन से भी पहले की हैं तो भी 1947 की घटनाओं से उन्हें और अधिक बल मिला है। इतिहासकार इन धारणाओं में विद्यमान गलतफहमियों की बार-बार आलोचना करते रहे हैं। फिर भी दोनों ही देशों में घृणा के ये स्वर शांत होने का नाम नहीं लेते।

प्रश्न 16. बिना हिन्दू और मुसलमान के भेदभाव के सभी लोगों की सेवा में एक सिख डाक्टर खुशदेव सिंह की भूमिका की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : 1. हिंसा के कचरे और देश के विभाजन की अपार पीड़ा के नीचे, इन्सानियत एवं सौहार्द का एक विशाल इतिहास दबा पड़ा है। इतिहासकारों ने इसी के संदर्भ में कई कहानियों को लोगों के सामने उजागर किया है कि देश के विभाजन के वक्त अनेक लोग किस तरह से एक-दूसरे की सहायता कर रहे थे। इस लिहाज से खुशदेव सिंह हमारे समक्ष एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है।
2. खुशदेव सिंह एक सिख डाक्टर थे और तपेदिक के विशेषज्ञ थे। वे उस समय धर्मपुर में तैनात थे जो अब हिमाचल प्रदेश में पड़ता है। दिन-रात लगकर डाक्टर साहब ने असंख्य प्रवासी मुसलमानों, सिखों, हिन्दुओं को बिना किसी भेदभाव के एक कोमल स्पर्श, भोजन, आश्रय और सुरक्षा प्रदान की।
3.धर्मपुर के लोगों ने उनके इन्सानी जज्बे और सहायता के प्रति गहरी आस्था और विश्वास उत्पन्न हो गया था । उन पर लोगों को वैसा ही भरोसा था जैसे, दिल्ली और कई जगह के मुसलमानों को गाँधीजी पर था। उनमें से एक मुहम्मद उमर ने खुशदेव सिंह के चित्रण में लिखा था, “पूरी विनम्रता से मैं यह कहना चाहता हूँ कि मुझे आपके अतिरिक्त किसी भी शरण में सुरक्षा दिखाई नहीं देती। इसलिए कृपा करके आप मुझे अपने अस्पताल में एक सीट दे दीजिए।”
4.इस डॉक्टर द्वारा किये गये अथक राहत प्रयासों के बारे में उनके संस्मरण हमें बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यों के बारे में इतना ही लिखा कि “उन्होंने इन्सान होने के नाते अपने अन्य इन्सान भाइयों के प्रति अपनी डॉक्टर होने की जिम्मेदारी ही निभायी थी।”

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