Index

1. ईंट मनके और अस्थियाँ

1. आरंभ 2. निर्वाह के तरीके 3. मोहनजोदड़ो 4. सामाजिक विभिन्नताओं का अवलोकन 5. शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी 6. माल प्राप्त करने सम्बन्धी नीतियाँ 7. मुहरें लिपि तथा बाट 8. प्राचीन सभ्यता 9. सभ्यता का अंत 10. हड़प्पा सभ्यता की खोज 11. अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएं मानचित्र बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 अंकीय प्रश्न उत्तर 2 अंकीय प्रश्न उत्तर

2. राजा किसान और नगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

3. बंधुत्व जाति और वर्ग

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

4. विचारक विश्वास और इमारतें

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 1 बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर 2

6. भक्ति सूफी और परम्पराएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

7. एक साम्राज्य की राजधानी विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

8. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

10. उपनिवेशवाद और देहात

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

11. विद्रोह और राज

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

13. महात्मा गाँधी और आन्दोलन

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

15. संविधान का निर्माण

बहुविकल्पीय प्रश्न उत्तर

Class 12th History Chapter 14 Important Question Answer 8 Marks विभाजन को समझना राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 1. “कुछ लोगों का विचार है कि भारत का विभाजन अचानक हुआ।” इस कथन को न्यायोचित ठहराइए।
उत्तर : (i) विभाजन ने ऐसी स्मृतियाँ, घृणाएँ, छवियाँ और पहचाने रच दी हैं कि वे आज भी सीमा के दोनों ओर लोगों के इतिहास को तय करती चली आ रही हैं। ये घृणाएँ सामुदायिक टकरावों में स्पष्ट झलकती हैं।
(ii) कुछ विद्वान यह मानते हैं कि देश का विभाजन उस सांप्रदायिक राजनीति का अंतिम बिंदु था जो 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में शुरू हुई। उनका तर्क है कि अंग्रेजों द्वारा 1909 में मुसलमानों के लिए बनाए गए पृथक् चुनाव क्षेत्रों का सांप्रदायिक राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसी राजनीति का अंतिम परिणाम विभाजन था। प्रारंभ में मुस्लिम लीग के नेताओं ने भी एक संप्रभु राज्य के रूप में पाकिस्तान की माँग खास संजीदगी से नहीं उठाई थी। प्रारंभ में शायद खुद जिन्ना की पाकिस्तान की सोच को सौदेबाजी में एक पैतरे के तौर पर प्रयोग कर रहे थे जिसका वे सरकार द्वारा कांग्रेस को मिलने वाली रियासतों पर रोक लगाने और मुसलमानों के लिए और रियासतें प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकते थे।
निःसंदेह पाकिस्तान के बारे में अपनी माँग पर मुस्लिम लीग की राय पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी। उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए सीमित स्वायत्तता की माँग से विभाजन होने के बीच बहुत ही कम समय-केवल सात साल रहा।

प्रश्न 2. भारत के विभाजन के दौरान साधारण लोगों की अनुभूत पीड़ा को समझने में मौखिक इतिहास हमारी किस प्रकार सहायता करता है? समझाइए।

अथवा

भारत के विभाजन के काल में आम लोगों के दर्दनाक अनुभवों का वर्णन कीजिए।
उत्तर : 1. मौखिक वृत्तांत, संस्मरण, डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे-इन सबसे तकसीम के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों व मुसीबतों को समझने में मदद मिलती है। लाखों लोग बँटवारे को पीड़ा तथा एक मुश्किल दौर की चुनौती के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह सिर्फ संवैधानिक विभाजन या मुस्लिम लीग, कांग्रेस अथवा औरों की दलगत रियासत का मामला ही नहीं था। उनके लिए यह जीवन में अनपेक्षित बदलावों का समय था। 1946-1950 के तथा उसके बाद भी जारी रहने वाले इन बदलावों से निपटने के लिए मनौवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक समायोजन की जरूरत थी।
2.व्यक्तिगत स्मृतियों-जो एक तरह की मौखिक स्रोत हैं-की एक खूबी यह है कि उनमें हमें अनुभवों और स्मृतियों को तथा बारीकी से समझने का मौका मिलता है।
3.मौखिक इतिहास से इतिहासकारों को गरीबों और कमजोरों-यानी अब्दुल लफीक के पिता, भुआ खालसा की औरतों, गेहूँ के खाली बोरों को बेचकर चार पैसे का जुगाड़ करने और थोक-भाव पर खुदरा गेहूँ बेचने वाले शरणार्थियों, बिहार में बन रही सड़क पर काम के बोझ से दोहरी हुई जा रही एक मध्यवर्गीय बंगाली विधवा, एक पेशावरी व्यापारी जिसे भारत जाकर कटक में छोटी-मोटी नौकरी गजब की चीज दिखाई दे रही थी लेकिन उसे यह मालूम न था कि 44 ‘कटक कहाँ है, यह हिंदुस्तान के ऊपरी हिस्से में है या निचले हिस्से में पेशावर में तो हमने कभी उसके बारे में सुना ही नहीं” के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से निकाल कर अपने विषय के किनारों को और फैलाने का मौका मिलता है।
4.अभी भी बहुत सारे इतिहासकार मौखिक इतिहास के बारे में शंकालु हैं। वे यह कहकर इसको अस्वीकार कर रहे हैं कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती और उनसे घटनाओं का जो क्रम उभरता है वह अक्सर सही नहीं होता।
5.भारत के विभाजन और जर्मनी के महाध्वंस जैसी घटनाओं के संदर्भ में ऐसी गवाहियों की कोई कमी नहीं होगी जिनसे पता चलता है कि उनके बीच अनगिनत लोगों ने कितनी तरह की और कितनी भीषण कठिनाइयों व तनावों का सामना किया। इस प्रकार इनमें रुझानों की पहचान करने और अपवादों को चिह्नित करने के लिए साक्ष्यों की भरमार है।
6.परंतु हमें इस बात का पता होना चाहिए कि बँटवारे के बारे. में मौखिक विवरण खुद-ब-खुद या आसानी से उपलब्ध नहीं होते। उन्हें साक्षात्कार के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है और साक्षात्कार में भी लोगों के दर्द के अहसास और सूझबूझ से काम लेना पड़ता है। इस संदर्भ में सबसे पहले मुश्किल यही होती है कि मुमकिन है इन अनुभवों से गुजरने वाले निहायत निजी आपबीती के बारे में बात करने को राजी ही न हों। उदाहरणार्थ कोई ऐसी औरत किसी अजनबी के सामने अपने खौफनाक अनुभवों को कैसे बेपर्दा कर देगी जिसका बलात्कार किया गया था? साक्षात्कार लेने वालों को किसी की एकदम निजी पीड़ा और सदमे में झाँकने से आम तौर पर परहेज करना चाहिए। उन्हें पीड़ित महिला से सघन और उपयोगी जानकारियाँ हासिल करने के लिए आत्मीय संबंध विकसित करने चाहिए। इसके बाद याददाश्त की समस्या आती है, सो अलग। किसी घटना के बारे में कुछ दशक बाद जब बात की जाती है तो लोग क्या याद रखते हैं या भूल जाते हैं, यह आंशिक रूप से इस पर निर्भर करता है कि बीच के सालों में उनके अनुभव किस तरह के रहे हैं, इस दौरान उनके समुदायों और राष्ट्रों के साथ क्या हुआ है। मौखिक इतिहासकारों को विभाजन के “वास्तविक” अनुभवों को “बनावटी” यादों के जाल से बाहर निकालने का चुनौतीपूर्ण काम भी करना पड़ता है।

प्रश्न 3. 1937 में हुए प्रांतीय चुनावों तथा उसके परिणामों एवं प्रभावों की चर्चा कीजिए ।

अथवा

1937 के प्रांतीय चुनावों ने भारत-विभाजन की भूमिका किस प्रकार तैयार की ?
उत्तर : 1937 में पहली बार प्रांतीय संसदों के गठन के लिए चुनाव कराए गए। इन चुनावों में मताधिकार केवल 10 से 12 प्रतिशत लोगों को ही प्राप्त था।
परिणाम : इन चुनावों में कांग्रेस के लिए परिणाम अच्छे रहे। उसने 11 में से 5 प्रांतों में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और 7 में अपनी सरकारें बनाईं। परन्तु मुसलमानों के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। मुस्लिम इन क्षेत्रों में बहुत अच्छे परिणाम नहीं दिखा पाई। उसे इस चुनाव में कुल मुस्लिम मतों का केवल 4.4 प्रतिशत भाग ही प्राप्त हुआ। उत्तर-पश्चिम सीमा -प्रांत में उसे एक भी सीट नहीं मिली। पंजाब की 84 आरक्षित सीटों में से केवल 2 सीटें प्राप्त हुईं और सिंध में 33 में से केवल 31
प्रभाव : (1) संयुक्त प्रांत (वर्तमान में उत्तर प्रदेश ) में मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती थी। परन्तु वहाँ कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त था। इसलिए उसने लीग की इस माँग को ठुकरा दिया। कुछ विद्वानों का मत है कि इससे लीग के सदस्यों के मन में यह बात घर कर गई कि यदि भारत अविभाजित रहा अल्पसंख्यक मुसलमानों के हाथ में राजनीतिक सत्ता कभी नहीं आ पाएगी। ऐसी सोच के पीछे लीग की यह धारणा थी कि मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व कोई मुस्लिम पार्टी ही कर सकती है, कांग्रेस नहीं, क्योंकि कांग्रेस को वे एक हिंदू दल मानने लगे थे परन्तु जिन्ना की यह जिद कि मुस्लिम लीग को मुसलमानों का “एकमात्र प्रवक्ता” माना जाए उस समय बहुत कम लोगों को स्वीकार थी। लीग संयुक्त प्रांत, बंबई और मद्रास में लोकप्रिय थी, परन्तु बंगाल में अभी भी उसका सामाजिक आधार काफी कमजोर था। उत्तर-पश्चिम सीमा-प्रांत तथा पंजाब में तो न के बराबर था। सिंध में भी लीग सरकार नहीं बना पाई थी। आश्चर्य की बात यह है कि केवल दस साल बाद ही इन सभी प्रांतों से पाकिस्तान बनाया गया क्योंकि इस काल में लीग ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाने के प्रयास दोहरे कर दिए थे।
(2) कांग्रेस मंत्रालयों ने भी मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस के बीच की खाई को गहरा कर दिया। संयुक्त प्रांत में पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाने के बारे में मुस्लिम लीग के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था क्योंकि मुस्लिम लीग जमींदारी प्रथा का समर्थन कर रही थी, जबकि कांग्रेस उसे समाप्त करना चाहती थी, भले ही कांग्रेस ने अभी तक इस दिशा में कोई ठोस पग नहीं उठाया था। न ही कांग्रेस को अपने “मुस्लिम जनसंपर्क” कार्यक्रम में कोई विशेष सफलता मिल पाई थी। इस प्रकार, कांग्रेस के धर्म-निरपेक्ष और रैडिकल बयानों से रूढ़िवादी मुसलमान और मुस्लिम भू-स्वामी तो चिंता में पड़ ही गए, कांग्रेस भी मुसलमानों को अपनी ओर आकिर्षित करने में भी सफल नहीं हो पायी।
(3) तीस के दशक के अंतिम वर्षों में कांग्रेस के बड़े नेता धर्म-निरपेक्षता पर पहले से भी अधिक बल देने लगे थे परन्तु कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक या कांग्रेस के मंत्री भी इन विचारों पर पूरी तरह सहमत नहीं थे। मौलाना आजाद ने 1937 में यह प्रश्न उठाया था कि कांग्रेस के सदस्यों को लीग में शामिल होने की छूट नहीं है, तो उन्हें हिंदू महासभा में शामिल होने से क्यों नहीं रोका जाता। उनके अनुसार कम-से-कम मध्य प्रांत (वर्तमान मध्य प्रदेश) में यही स्थिति थी। कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने दिसंबर, 1938 में जाकर यह घोषणा की कि कांग्रेस के सदस्य हिंदू महासभा के सदस्य नहीं बन सकते। प्रसंगवश, यह वही समय था जब हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस. ) की शक्ति बढ़ती जा रही थी। तीस के दशक में ही आर.एस.एस. ने नागपुर से बढ़ते हुए संयुक्त प्रांत, पंजाब और देश के अन्य भागों में अपना प्रभाव जमा लिया था। 1940 तक आर. एस. एस. के पास हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित अत्यंत अनुशासित 1 00 ,000 से भी अधिक कार्यकर्ता थे। उनका विश्वास था कि भारत केवल हिंदुओं का देश है। देश का ऐसा सांप्रदायिक वातावरण भावी विभाजन की ओर ही संकेत कर रहा था।

प्रश्न 4. 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की मुख्य विशेषताओं पर विचार प्रकट कीजिए ।
उत्तर : भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 (Indian Independence Act, 1947): माउंटबेटन योजना को 18 जुलाई को ब्रिटिश सम्राट ने विधिवत् स्वीकृति दे दी। इस अधिनियम में कुल 20 धारायें थीं। इनमें से कुछ प्रमुख धाराओं की नीचे बतलाया गया है
1.15 अगस्त, 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो हिस्से बना दिये जायेंगे और ब्रिटिश सरकार उन्हें सत्ता सौंप देगी।
2.दोनों अधिराज्यों का वर्णन किया गया और यह भी बतलाया कि बंगाल और पंजाब की विभाजन रेखा निश्चित करने के लिए एक सीमा आयोग होगा।
3.दोनों अधिराज्यों की संविधान सभाओं को शासन की सत्ता । सौंपी जायेगी। इन्हें अपना संविधान बनाने का पूर्ण अधिकार होगा ।
4. इन दोनों अधिराज्यों को अधिकार होगा कि वे ब्रिटिश । राष्ट्रमंडल के सदस्य रहें या उसे त्याग दें।
5.दोनों के लिए अलग अलग एक गवर्नर जनरल होगा जिसकी नियुक्ति उनके मंत्रिमंडल की सलाह से होगी।
6.इन हिस्सों के विधानमंडल को कानून बनाने का अधिकार होगा। 15 अगस्त, 1947 के बाद ब्रिटिश सरकार का इन पर कोई अधिकार न होगा, न ही उसका कोई कानून लागू होगा।
7.भारत मंत्री का पंद समाप्त कर दिया जायेगा।
8.जब तक दोनों संविधानों का निर्माण हो, तब तक दोनों हिस्सों और प्रांतों का शासन 1935 के भारत शासन अधिनियम के अनुसार चलेगा, परंतु इन पर गवर्नर जनरल, प्रांतीय गवर्नर का कोई विशेषाधिकार न रहेगा।
9.जब तक नए विधान के अनुसार चुनाव होंगे, वर्तमान प्रांतीय विधानमंडल कार्य करेंगे।
10.15 अगस्त, 1947 से ब्रिटिश सरकार की देसी रियासतों पर सर्वोच्चता को समाप्त कर दिया जाएगा। इसके पश्चात् दशा रियासतें नवीन अधिराज्यों से अपने राजनीतिक संबंध स्थापित करने में स्वतंत्र होंगी। अब वह इच्छानुसार भारत और पाकिस्तान में चाहे मिल सकती हैं अथवा स्वतंत्र रह सकती हैं।
11. भारतीय नागरिक सेवाओं के सदस्य अधिकारों को बनाए रखा जाए।

प्रश्न 5. भारत को किन परिस्थितियों में स्वतंत्रता प्राप्त हुई ?
उत्तर : कैबिनेट मिशन की सिफारिशों से मुस्लिम लीग पार्टी तरह से संतुष्ट नहीं थी। फिर भी कैबिनेट मिशन ने इंग्लैंड लौटने से पूर्व कांग्रेस व मुस्लिम लीग को संविधान सभा के सदस्यों को चुनने तथा अंतरिम सरकार बनाने के लिए तैयार कर लिया। सितम्बर 1946 ई. को जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में अंतरिम सरकार बनी। कुछ दिनों बाद (अक्टूबर, 1946 ई. में) मुस्लिम लीग भी इस सरकार में शामिल हो गई, लेकिन उसने संविधान सभा का बहिष्कार किया। वह देश विभाजन की माँग पर अड़ी रही। फलस्वरूप देश को सांप्रदायिक दंगों की आग में जलना पड़ा। इस तरह क्रिप्स मिशन मुस्लिम लीग की हठधर्मी के कारण असफल हो गया और विभाजन की माँग पर अड़ी रही जिससे बंगाल, बिहार तथा बम्बई आदि नगरों में सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें बड़ी संख्या में हिन्दू मुसलमान मारे गए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लार्ड एटली ने 20 फरवरी, 1947 ई. को घोषणा की के अंग्रेज जून 1948 ई. तक भारत छोड़ देंगे। मार्च 1947 ई. में लार्ड माउंटबेटन भारत में वायसराय बनकर आया। उसने कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में समझौते का एक रास्ता निकाला कि देश स्वाधीन तो होगा किन्तु एक नहीं रहेगा। उन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए जो योजना बनायी उसे माउंट बेटन योजना कहा जाता है।
माउंटबेटन ने ब्रिटिश सरकार से स्वीकृति लेकर 3 जून, 1947 ई. को अपनी योजना प्रस्तुत कर दी, जिसे कांग्रेस व लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। इस योजना की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-
1.भारत का दो भागों-भारत और पाकिस्तान में विभाजन कर दिया जायेगा।
2. बंगाल एवं पंजाब का विभाजन किया जाएगा और इस बात का निर्णय यहाँ की व्यवस्थापिकाएँ करेंगी।
3.असम के सिलहट जिले के लोगों को यह निर्णय करना था कि वे असम में रहना चाहते हैं अथवा पूर्वी बंगाल में मिलना।
4.पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के लोगों को जनमत संग्रह से तय करना था कि वे भारत में रहना चाहते हैं या पाकिस्तान में । 5. दोनों देशों की स्वतन्त्रता की तिथि 15 अगस्त निश्चित कर दी गई।
5.देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान में मिलने अथवा अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखने का अधिकार दिया गया। 7. दोनों भावी राज्यों को राष्ट्रमंडल में रहने या न रहने की स्वतंत्रता दे दी गई।

प्रश्न 6. भारत के विभाजन के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

अथवा

1947 में भारत के विभाजन के लिए उत्तरदायी कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर : ब्रिटिश भारत का बँटवारा कई कारणों से हुआ । कुछ कारण निम्नलिखित हैं :(i) अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति : 1909 में मुसलमानों के लिए अलग चुनाव क्षेत्र बनाए गए, जिनका 1919 में विस्तार किया गया। इस व्यवस्था में राजनीतिज्ञों को लालच रहता था कि वे सामुदायिक नारों का प्रयोग करें और अपने धार्मिक समुदाय के व्यक्तियों को नाजायज रूप से फायदा पहुँचाऐं। इस प्रकार उन्होंने हिंदू और मुसलमान समुदायों के बीच फूट डालने का कार्य किया।
(ii) मुस्लिम लीग की स्थापना : मुस्लिम लीग की स्थापना के पीछे मुसलमानों द्वारा अंग्रेजों से प्रेरणा और संरक्षण था। अपने हितों के लिए जिन्ना जैसे मुसलमान अंग्रेजों के भक्त बन गये। जिन्ना ने बाद में स्पष्ट कर दिया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। इसी के परिणामस्वरूप 1940 में मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान की माँग की गई।
(iii) कांग्रेस की कमजोर नीति : कांग्रेस मुस्लिम लीग की अनुचित माँगों को मानकर उसे बढ़ावा देती रही। 1916 के लखनऊ समझौते में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व को स्वीकार करके संप्रदायवाद को प्रोत्साहित ही किया। इसके पश्चात् खिलाफत आंदोलन की असहयोग आंदोलन में शामिल करना और सी.आर. योजना में लीग को अधिक रियायतें देना कांग्रेस की दुर्बल नीति के परिणाम थे।
(iv) सांप्रदायिक दंगे : पाकिस्तान की माँग मनवाने के लिए मुस्लिम लीग ने ‘सीधी कार्यवाही’ आरंभ कर दी और इसके परिणामस्वरूप समूचे देश में सांप्रदायिक दंगे होने लगे। इन दंगों को अब केवल भारत विभाजन के द्वारा ही रोका जा सकता था।

प्रश्न 7. मार्च 1946 से भारत-विभाजन की ओर ले जाने वाले घटनाक्रम की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर : मार्च 1946 से भारत-विभाजन की ओर ले जाने वाली मुख्य घटनाएँ निम्नलिखित थीं :(i) कैबिनेट मिशन का आरंभ : द्वितीय महायुद्ध के बाद इंग्लैंड की सत्ता श्रमिक दल के हाथ में आई और ऐटली वहाँ का प्रधानमंत्री बना। वह भारत को स्वतंत्र करने के पक्ष में था। उसकी घोषणा के अनुसार भारत की समस्या का समाधान करने के लिए मंत्रियों का एक मिशन 12 मार्च, 1946 को भारत आया। इस मिशन ने भारत के अनेक राजनीतिक नेताओं से बातचीत की। इस मिशन ने यह सिफारिश की कि भारत में संघीय सरकार की व्यवस्था की जाए।
(ii) सांप्रदायिक झगड़े : संविधान सभा के लिए 1946 में चुनाव हुए। कांग्रेस को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। ईर्ष्या के कारण मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में शामिल होने से इन्कार कर दिया। उसने फिर से पाकिस्तान की माँग की और सीधी कार्यवाही करने का निश्चय किया। फलस्वरूप स्थान-स्थान पर सांप्रदायिक दंगे होने लगे। आखिर, सितंबर, 1946 में अंतरिम सरकार की स्थापना हुई। मुस्लिम लीग ने इस सरकार में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया, परन्तु उसने प्रधानमंत्री को सहयोग न दिया।
(iii) अंतरिम सरकार की असफलता : 1946 ई. में बनी अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग को साथ-साथ कार्य करने का अवसर मिला, परन्तु लीग कांग्रेस के प्रत्येक कार्य में कोई-न-कोई रोड़ा अटका देती थी। परिणामस्वरूप अंतरिम सरकार असफल रही। इससे यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू और मुसलमान एक होकर शासन नहीं चला सकते।
(iv) इंग्लैंड द्वारा भारत छोड़ने की घोषणा : 20 फरवरी, 1947 को इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ऐटली ने जून, 1948 ई. तक भारत को छोड़ देने की घोषणा की। घोषणा में यह भी कहा गया कि अंग्रेज केवल उसी दशा में भारत छोड़ेंगे जब मुस्लिम लीग और कांग्रेस में समझौता हो जाएगा, परन्तु मुस्लिम लीग पाकिस्तान प्राप्त किए बिना किसी समझौते पर तैयार न हुई। फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने भारत-विभाजन की योजना बनानी आरंभ कर दी।
(v) भारत का विभाजन : भारत-विभाजन के उद्देश्य से लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भारत भेजा गया। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से एक ही मास में नेहरू और पटेल को विभाजन के लिए तैयार कर लिया। आखिर 1947 ई. में भारत को दो भागों में बाँट दिया गया।

प्रश्न 8. ‘देश का बँटवारा एक ऐसी सांप्रदायिक राजनीति का आखिरी बिंदु था जो 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों से शुरू हुआ। स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर : मार्च 1946 से भारत-विभाजन की ओर ले जाने वाली मुख्य घटनाएँ निम्नलिखित थीं :
(i) कैबिनेट मिशन का आरंभ : द्वितीय महायुद्ध के बाद इंग्लैंड की सत्ता श्रमिक दल के हाथ में आई और ऐटली वहाँ का प्रधानमंत्री बना। वह भारत को स्वतंत्र करने के पक्ष में था। उसकी घोषणा के अनुसार भारत की समस्या का समाधान करने के लिए मंत्रियों का एक मिशन 12 मार्च, 1946 को भारत आया। इस मिशन ने भारत के अनेक राजनीतिक नेताओं से बातचीत की। इस मिशन ने यह सिफारिश की कि भारत में संघीय सरकार की व्यवस्था की जाए।
(ii) सांप्रदायिक झगड़े : संविधान सभा के लिए 1946 में चुनाव हुए। कांग्रेस को भारी बहुमत प्राप्त हुआ। ईर्ष्या के कारण मुस्लिम लीग ने अंतरिम सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया। उसने फिर से पाकिस्तान की माँग की और सीधी कार्यवाही करने का निश्चय किया। फलस्वरूप स्थान-स्थान पर सांप्रदायिक दंगे होने लगे। आखिर, सितंबर, 1946 में अंतरिम सरकार की. स्थापना हुई। मुस्लिम लीग ने इस सरकार में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया, परंतु उसने प्रधानमंत्री को सहयोग न दिया।
(iii) अंतरिम सरकार की असफलता : 1946 ई. में बनी अंतरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग को साथ-साथ कार्य करने का अवसर मिला, परंतु लीग कांग्रेस के प्रत्येक कार्य में कोई-न-कोई रोड़ा अटका देती थी। परिणामस्वरूप अंतरिम सरकार असफल रही। इससे यह स्पष्ट हो गया कि हिंदू और मुसलमान एक होकर शासन नहीं चला सकते।
(iv) इंग्लैंड द्वारा भारत छोड़ने की घोषणा : 20 फरवरी, 1947 को इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ऐटली ने जून, 1948 ई. तक भारत को छोड़ देने की घोषणा की। घोषणा में यह भी कहा गया कि अंग्रेज केवल उसी दशा में भारत छोड़ेंगे जब मुस्लिम लीग और कांग्रेस में समझौता हो जाएगा, परंतु मुस्लिम लीग पाकिस्तान प्राप्त किए बिना किसी समझौते पर तैयार न हुई। फलस्वरूप । ब्रिटिश सरकार ने भारत-विभाजन की योजना बनानी आरंभ कर दी।
(v) भारत का विभाजन : भारत-विभाजन के उद्देश्य से लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भारत भेजा गया। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से एक ही मास में नेहरू और पटेल को विभाजन के लिए तैयार कर लिया। आखिर 1947 ई. में भारत को दो भागों में बाँट दिया गया।

प्रश्न 9. मौखिक इतिहास के फायदे तथा नुकसानों की पड़ताल कीजिए। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन के बारे में हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिलता है ?

अथवा

मौखिक इतिहास के लाभों और हानियों का वर्णन कीजिए। ऐसे किन्हीं चार स्रोतों का उल्लेख कीजिए जिनसे विभाजन का इतिहास सूत्रों में पिरोया गया है।

अथवा

मौखिक इतिहास के महत्त्व और सीमाओं की समीक्षा कीजिए। मौखिक इतिहास विभाजन को समझने में किस प्रकार सहायक था ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-मौखिक इतिहास के लाभ और हानियाँ निम्नलिखित हैं।(क) लाभ : (i) इससे विभाजन के समय साधारण लोगों की कठिनाइयों और मुश्किलों की जानकारी प्राप्त होती है जैसे उनके साथ क्या-क्या हुआ, किस प्रकार उनकी जानें बचाई गईं या कैसे उनके परिवार के सदस्यों को मारा गया।
(ii) मौखिक इतिहास के आधार पर एक सजीव व बहुरंगी वृत्तान्त लिखने में सहायता मिलती है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपना अनुभव अलग-अलग दृष्टिकोण व प्रकार से बताता है।
(iii) मौखिक इतिहास से हमें गरीब और कमजोर लोगों के अनुभवों का पता चलता है। यह जानकारी महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि साधारणतया इतिहास इन लोगों को नजरअन्दाज कर देता है व उनका वर्णन बहुत कम करता है।
(ख) हानियाँ : (i) मौखिक इतिहास में सटीकता की कमी होती है तथा उसका वर्णन क्रम के अनुसार करना कठिन होता है।
(ii) मौखिक इतिहास छोटे-छोटे कई प्रकार के अनुभवों पर निर्भर करता है। इस आधार पर कोई सामान्य निष्कर्ष निकालन कठिन होता है क्योंकि इसका गवाह या देखने वाला एक या कुछ व्यक्ति होते हैं।
(iii) कई बार मौखिक इतिहास के अनुभव अप्रासंगिक होते हैं और उनका इतिहास से सम्बन्ध नहीं होता।
(ग) उपर्युक्त लाभ और हानियों के बावजूद मौखिक इतिहास से विभाजन की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। मौखिक वृत्तान्तों की दूसरे स्रोतों से तुलना करके उनकी विश्वसनीयता का अनुमान लगाया जा सकता है। साधारणतया मौखिक स्रोतों व अन्य स्रोतों की जाँच एक-दूसरे के साथ करके सच्चाई की गहराई तक पहुँचा जा सकता है। उदाहरणतया सरकारी स्रोतों से सरकारों द्वारा “बरामद” की गई औरतों की संख्या तो पता चल सकती है परन्तु उनके साथ कैसा व्यवहार किया गया यह तो उनके मौखिक बयानों से ही पता चल सकता है, अत: मौखिक स्रोत व अन्य स्रोत – दूसरे के पूरक हैं। एक भारत के विभाजन की घटना के अध्ययन में मौखिक इतिहास का महत्त्व अंगीकार किया गया है।
(i) मौखिक वृत्तांत, संस्मरण, डायरियाँ, पारिवारिक इतिहास और स्वलिखित ब्यौरे-इन सबसे तकसीम के दौरान आम लोगों की कठिनाइयों व मुसीबतों को समझने में मदद मिलती है । लाखों लोग बँटवारे को पीड़ा तथा एक मुश्किल दौर की चुनौती के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह सिर्फ संवैधानिक विभाजन या मुस्लिम लीग, कांग्रेस अथवा औरों की दलगत सियासत का मामला ही नहीं था। उनके लिए यह जीवन में अनआपेक्षित बदलावों का समय था।
(ii) व्यक्तिगत स्मृतियों-जो एक तरह की मौखिक स्रोत हैं-की एक खूबी यह है कि उनसे हमें अनुभवों और स्मृतियों को बारीकी से समझने का मौका मिलता है ।
(iii) मौखिक इतिहास हमारे देश के इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ने में सहायक हैं पुराने लोग जो विवरण सुनाते हैं वे अपने संस्मरणों, डायरियों, परिवार संबंधी इतिहास और अपने द्वारा लिखे गए ब्यौरों को इतिहासकारों की अनेक कठिनाइयों और स्रोत संबंधी जानकारी की प्राप्ति की कठिनाइयों को दूर करने और इतिहास को समझने में सहायता देते हैं।
(iv) हमारे देश का विभाजन अगस्त, 1947 में हुआ। लाखों लोगों ने बँटवारे की पीड़ा और हिंसक ( काले) दौर को देखा । उनके लिए केवल संवैधानिक विभाजन या राजनैतिक पार्टियों द्वारा उठाए गए दलगत राजनीतिक मुद्दे का मामला नहीं था। मौखिक इतिहास की गवाही देने वाले और सुनने वाले लोगों के लिए यह बदलावों का ऐसा वक्त था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी।

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